ध्यान और पुनर्जन्म : अजय अमिताभ सुमन

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मैं सुबह सुबह ध्यान में बैठा हुआ था। बार बार अपनी आती जाती श्वासों की श्रृंखला पर ध्यान देकर निर्विचार होने की कोशिश कर रहा था। पर बार बार ऑ...

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मैं सुबह सुबह ध्यान में बैठा हुआ था। बार बार अपनी आती जाती श्वासों की श्रृंखला पर ध्यान देकर निर्विचार होने की कोशिश कर रहा था। पर बार बार ऑफिस में  सहकर्मी के साथ किये गए विवाद मेरे मन पर छाने लगते और मेरा प्रयास असफल होने लगता।

मैं फिर निर्विचार होने की कोशिश करता, पर मेरे मन के अवचेतन तल पर प्रतिशोध लेने की इच्छा जन्म लेने लगती। देखते ही देखते मैं स्वयं अपने विचारों में  सहकर्मी बन जाता और स्वयं ही अपने अधूरे विवाद को पूर्ण करता। बहुत सारी बातें थी जो ऑफिस में कहनी रह गयी थी। यहाँ कोई रोकने, टोकने वाला नहीं था। मेरे मन को जो इच्छा होती , कहता, जो इच्छा होती , अपने सहकर्मी को गली देता , यहाँ तक की मारता और पिटता भी। मेरे मन में चल रही इस द्वंद्व को न कोई रोकने वाला था , न कोई टोकने वाला था और ना ही किसी सजा का भय। अंत में अपने सहकर्मी को हराकर स्वयं के विजयी होने के रस का आनंद भी लेता।

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मेरे ध्यान में बाधाओं की ये श्रृंखला तब तब बनती , जब जब मेरा किसी से विवाद होता। जब जब कोई मित्र, कोई क्लर्क, कोई व्यक्ति दुर्भावना की भावना से  ग्रसित होकर मेरा हास्यास्पद मजाक उड़ाता, मेरे पे कटाक्ष करता , जब जब कोई मेरे अहम पर चोट पहुँचाता, तब तब मेरे मन में  बैर उपजता। तब तब ध्यान के समय ये नकारात्मक विचार मुझे परेशान करने लगते। मेरे अहम को ध्यान का समय ही सबसे उपयुक्त लगता, मेरे तथाकथित शत्रु को हराकर स्वयं के विजय का रसास्वादन के लिए। कारण कि यहाँ पे कोई रोकने वाला नहीं था।

मुझे महर्षि रमण की बात याद आने लगी। नफरत, क्रोध , बैर की भावना दीवाल में लगी हुई खूँटियों की भाँति कार्य करती है। इस कारण जीवात्मा स्वयं को जन्म और मरण रूपी दीवाल पर बार बार टांग देता है। जब जब आप किसी के प्रति नकारात्मक विचार निर्मित करते हैं, एक बात तो तय है, आप स्वयं को उस व्यक्ति से बाँध देते हैं। उस नकारात्मक विचार से मुक्ति पाने के लिए और उस के कर्मों के फल को भुगतने के लिए आपको बार बार शरीर धारण करना पड़ता है। इस जीवन और मृत्यु के चक्र में आपके फँसने का यही कारण बनता है। यही आपके पुनर्जन्म का कारण बनता है।

एक व्यक्ति के हृदय पर लोभ, मोह , भय , क्रोध , ईर्ष्या , जलन आदि की भावना कील की भांति कार्य करते हैं। जितनी ज्यादा एक व्यक्ति इन नकारात्मक भावनाओं को अपने मन में प्रश्रय देता है , उतनी ज्यादा सम्भावना बनती है उसे इस जीवन और मरण के जाल में फंसने की। ध्यान एक विधि है , जिसके द्वारा एक साधक इस संसार को पार करने की कोशिश करता है। जाहिर सी बात है ध्यान के समय एक साधक को इस बात की अनुभूति ज्यादा प्रगाढ़ होती है कि ईश्वर के मार्ग पर अवरोधक तत्व कौन कौन से हैं?

यदि समस्या है तो इसके उपाय भी अवश्य हैं।  मैंने अपने ध्यान के दौरान ये महसूस किया कि मेरे द्वारा किसी के प्रति किया गया प्रेम का भाव कभी भी बाधा नहीं बनता। किसी के प्रति की गई प्रार्थना कभी भी ध्यान में समस्या पैदा नहीं करती। मैंने महसूस किया कि प्रेम भाव या प्रार्थना के विचार मेरे ध्यान में सहायक बन रहे हैं। जब जब मैं किसी के प्रति प्रेम, श्रद्धा या आदर की भावना से परिपूर्ण रहा, मुझे ध्यान की गहराईयों में डुबकी लगाने में आसानी होती।

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एक बात ख्याल में रखने योग्य है कि प्रेम का मतलब वासना नहीं है। वासना तो शरीर के प्रति आसक्ति है। एक स्त्री का पुरुष के प्रति आकर्षण और एक पुरूष का एक स्त्री से सम्भोग की लालसा तो बंधन है। वासना की सबसे बुरी बात ये है कि आप इसे जितना तुष्ट करने की कोशिश करते हैं, इसकी क्षुधा उतनी ही बढती चली जाती है। वासना की सबसे बुरी बात ये है कि आप इसे जितना तुष्ट करने की कोशिश करते हैं, इसकी क्षुधा उतनी ही बढती चली जाती है। वासना आपको जन्म और मृत्यु के बंधन में पूरी तरह बाँध देती है।

प्रेम का भाव यानी आस्था , दया , करुणा , समर्पण , विश्वास , आदर , आनंद आदि इन सारी भावनाओं का समुच्च्यीकरण। जब आप एक नन्हे से बच्चे को पहली बार चलते हुए देखते है , जब फूलों को सावन के समय मुस्कुराते हुए देखते है , जब किसी असहाय की सहायता करने पे आपके हृदय को जो सुख मिलता है , जब आप कभी चित्र बनाते हैं , कविता लिखते है , गीत गाते है , जब आप अपने प्रतिस्पर्धी की सफलता का खुले दिल से स्वागत करते हैं। जीवन में इस तरह की अनेक घटनाएँ घटती है जो आपके हृदय के बंद द्वार को खोल आनंद की बारिश कर देती हैं।

कबीर ने अपना प्रसिद्ध दोहा "पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का पढ़ा सो पंडित होय" किस परिप्रेक्ष्य में कहा था , ये मेरी समझ में आने लगा। जब भी कोई नफरत, क्रोध , बैर आदि की भावना से भरता है, उसका हृदय संकुचित होता है। जबकि प्रेम की भावना एक व्यक्ति के हृदय के द्वार को खोलती है। नकारात्मक भावना आपको बार बार जन्म लेने को विवश करती हैं। ये प्रेम ही है जो आपके हृदय के द्वार को खोलकर आपको जन्म और मृत्यु की श्रृंखला से मुक्ति प्रदान कर सकती है।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

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