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राहत का बंटवारा - अंकुश्री की लघुकथाएँ

राहत का बंटवारा


‘‘मैंने बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण कर लिया है. काफी गरीब लोग हैं. भूख से लड़ने की उनकी आदत है. उन्हें विशेष राहत की जरूरत नहीं है.’’ मंत्री ने कहा, ‘‘मैंने पत्रकारों को बाढ़ की स्थिति गंभीर बता दी है; ताकि लोग स्थिति को भयावह समझ सकें और केन्द्र से राहत भी समुचित ढंग से प्राप्त हो सके.

‘‘इस कार्य के लिये केंद्र से राहत सहायता मिल चुकी है और स्वयंसेवी संस्थाओं ने भी आर्थिक सहायता दी है.’’

‘‘हां, मैं उसी के बारे में कह रहा हूँ.’’ मंत्री ने कहा, ‘‘30 प्रतिशत खर्च कर देने से बाढ़ग्रस्तों को पूरी राहत मिल जायेगी.’’

‘‘जी हां !’’ पदाधिकारी को मंत्री जी के बारे में पता था कि उनकी बातों में ‘uk’ कहने की गुंजाइश नहीं रहती.’’

, ‘‘बाढ़ग्रस्त जैसे निम्न और गरीब तबके वालों के लिये 30 प्रतिशत खर्च होगा. आप तो उनसे काफी श्रेष्ठ हैं. साली मंहगाई भी बहुत बढ़ी हुई है. 25 प्रतिशत से कम में आप जैसे ऊंचे पदाधिकारी का काम नहीं चलेगा.’’ मंत्री ने कहा, ‘‘मुझे अपने गांव में कुछ गरीबों की सहायता करनी है. 35 प्रतिशत में यह काम हो जायेगा.’’

‘‘- - - -’’

‘‘बचे हुए 10 प्रतिशत की चिंता छोड़िये, विभाग के बाकी लोगों के काम आ जायेगा.’’ मंत्री ने एक आंख दबा कर कहा, ‘‘आप राहत की कुल राशि के खर्च का विवरण बनवा लें. मैं कल प्रेस वालों को खर्च का विवरण दे दूंगा.’’

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पदाधिकारी आज्ञाकारी नौकर की तरह कार्य में लग गये.

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शरीफ


एक मकान की दीवाल से सट कर एक व्यक्ति लघुशंका के लिये खड़ा था. तभी मकान-मालिक ने आकर टोक दिया, ‘‘क्यों साहेब ! आपको यही जगह मिली है ? यह शरीफों का मुहल्ला है.’’

‘‘मैं आपको शरीफ नहीं लग रहा क्या?’’ उस व्यक्ति ने उत्तर देने के बदले प्रश्न उछाल दिया.

‘‘लेकिन यहां के शरीफ ऐसी हरकत नहीं करते.’’ मकान-मालिक ने गुस्सा कर कहा, ‘‘वे घरों के अंदर पेशाबखाने में जाते हैं.’’

‘‘तो मुझे भी वहीं ले चलिये; ताकि मेरी शराफत पर आपको शक नहीं रह जाये.’’ उस व्यक्ति ने फारिग होने के बाद इत्मीनान से कहा.

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सहायता


पूरे राज्य में अकाल की स्थिति पैदा हो गयी थी. राज्य का कुछ हिस्सा सूखा से ग्रस्त था तो कुछ वर्षा से त्रस्त. लोगों में हाहाकार मचा हुआ था. फसल मारे जाने के कारण किसानों के पास खेती के लिये बीज तक नहीं बचा था.

किसान परेशान थे ही, अकाल की चिन्ता से सरकार को भी नीन्द नहीं आ रही थी. राज्य में खेती के लिये तय किया गया कि दूसरे राज्यों से बीज लाकर किसानों को उपलब्ध कराया जाये.

प्रेस विज्ञप्ति द्वारा यह घोषणा कर दी गयी कि वर्तमान स्थिति से निपटने के लिये सरकार पूर्ण सक्षम है. रबी की खेती के लिये राज्य के किसानों को 75 लाख टन मुफ्त बीज उपलब्ध कराये जाने का निश्चय हुआ है. विज्ञप्ति में यह भी कहा गया कि इस साल राज्य में करीब एक करोड़ हेक्टेयर भूमि में रबी की खेती की जायेगी.

दूसरे राज्यों से पूछताछ करने, वहां से बीज लाने और उसे जिलेवार वितरित करने में काफी समय लग गया. किसान बीज की प्रतीक्षा करते-करते थक गये. अनेक किसानों ने अपने खेत भी तैयार कर लिये थे. लेकिन मौसम बीत जाने के कारण उनका श्रम और खर्च बेकार हो गया.

जिला-मुख्यालयों में प्राप्त बीज को अनुमण्डल कार्यालयों में पहुंचाया गया. वहां से प्रखण्ड-कार्यालयों और पंचायतों तक होते रबी फसल का बीज जब तक किसानों के पास पहुंचा, तब तक रबी के अगले वर्ष की फसल खेत में लग चुकी थी.

इतनी लंबी अवधि तक घूमने के पश्चात् किसानों के पास जो बीज पहुंचा, वह खेत में बोने लायक नहीं बचा था. किसानों ने प्राप्त बीज का उपयोग जानवरों को खिलाने के लिये करना चाहा. लेकिन वह इतना सड़ चुका था कि जानवरों ने भी उसे अपने उपयोग में लाने से इन्कार कर दिया.

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फैसला


कुत्ता को मरे हुए आठ दिन हो गये थे. उसकी लाश मुख्य मार्ग पर बीचों-बीच पड़ी थी. लाश सड़ने से आसपास का वातावरण दुर्गंधमय हो गया था. तेज वाहन में बैठे लोगों को कुत्ते की सड़ रही लाष से कोई विशेष बाधा नहीं हो रही थी. लेकिन रिक्शा और साइकिल सवार बहुत परेशान थे. सांस रोक कर तेजी में चलने के बावजूद मृत्त कुत्ते की सड़ांध नथुनों में घुस जाती थी. काफी देर तक वे हांफते रहते थे. पैदल चलने वालों का तो और भी बुरा हाल था.

सड़ांध के कारण सड़क किनारे रहने वाले लोग सबसे ज्यादा परेषान थे. जब हवा का झोंका चलता था तो आसपास के घरों में कोना-कोना सड़ांध से भर जाता था. सड़ांध के बीच एक मिनट भी रह पाना दूभर हो गया था.

कुत्ते की मौत की खबर उसके मरने के दिन ही नगरनिगम को दे दी गयी थी. लेकिन दूसरे के बाद तीसरे दिन भी मरा हुआ कुत्ता सड़क से नहीं हटाया गया. कुछ लोग फिर नगर निगम कार्यालय में गये. निगम वालों ने कहा, ‘‘जहां कुत्ते की लाश पड़ी हुई है, वह स्थान हमारे निगम क्षेत्र में नहीं पड़ता. वह स्थान उपनगर के नगरपालिका क्षेत्र में पड़ता है.’’

उस दिन कार्यालय-अवधि समाप्त हो चुकी थी. इसलिये मुहल्ले वाले दूसरे दिन उपनगर के नगरपालिका कार्यालय में जाकर बोले, ‘‘कुत्ते को मरे आज चार दिन हो गये हैं. कृपया उसे तुरंत हटवाने की व्यवस्था करवा दें.’’

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‘‘शाम से पहले कुत्ते की लाश हट जायेगी.’’ यह आश्वासन लेकर मुहल्ले वाले लौट आये.

किंतु शाम तक कौन कहे, दूसरे दिन भी कुत्ते की लाश सड़क पर यूं ही पड़ी रही. उसकी दुर्गंध से मुहल्ले वाले परेषान थे. अगले दिन फिर मुहल्ले वालों ने नगरपालिका का दरवाजा खटखटाया.

नगरपालिका वालों ने आश्वासन के बावजूद कुत्ते की लाश नहीं हटाये जाने का कारण बताया, ‘‘खेद है, आपकी सेवा करने में नगरपालिका असमर्थ है; क्योंकि जहां कुत्ते की लाश पड़ी है, वह क्षेत्र नगरनिगम में पड़ता है.’’

मुहल्ले वालों को बाद में पता चला कि जिस जगह कुत्ता पड़ा हुआ था वह नगरपालिका और नगरनिगम क्षेत्र का संधि स्थल है. कुत्ते की आधी देह नगरपालिका क्षेत्र में थी और आधी देह नगरनिगम क्षेत्र में. मुहल्ले वाले दोनों कार्यालयों में बारी-बारी से दौड़ते रहे. मगर यह फैसला नहीं हो सका कि कुत्ते की लाष कौन हटाये. लेकिन कुत्ते की लाश किसी फैसला का इंतजार किये बिना सड़ती रही. हवा भी किसी फैसला का इंतजार किये बिना उस सड़ांध को मुहल्ले वालों के घरों तक पहुंचाती रही.

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अंकुश्री


सिदरौल, प्रेस कॉलोनी,

पोस्ट बॉक्स 28, नामकुम,

रांची-834 010

E-mail : ankushreehindiwriter@gmail.com

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