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धनञ्जय द्विवेदी की कविताएँ

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1. होली

ये पावन पर्व है होली का
जल मरी इसी दिन होलिका
बूढ़े नाचे बच्चे नाचें,नाचे थे किशोर किशोरी सा....
सब मिलकर धूल उड़ाये थे
मस्ती में झूमे गाये थे
भाभी वा देवर भी मिलकर
खुब रंग गुलाल लगाए थे
प्रेमीजन भी थे खूब फबे
आपसे में थे बरजोर किए
वे तनिक न आज लजाए हैं
गालों को गुलाल बनाएँ हैं
मल मल कर कपोल को
लाल किए,
कहते थे रंग लगाए हैं ||

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बच्चे भी आज हो गये जवां
बच्ची संग होली खेल रहे
बाबा भी देवर हुए आज
आजी को खूब भरमाए हैं
सब लाज शरम को तज करके
होली का रंग चढ़ाए है ||

है उड़ा गुलाल अब अम्बर में
सब कुछ धुंधला दर्शाता है
रम गए आज सब आपस में
रिश्ता नाता न भाता है
कहते हैं आज है प्रेम का दिन
बस महज प्रेम दर्शाता है
यह प्रेम रंग की रोली है
या बेशर्मों की टोली है
कुछ मुझसे कहा न जाता है
ये कैसा रिश्ता नाता है..... ?||

यह न तो प्रेम की होली है
न बेशर्मों की टोली है
यह पुरूषों की चाल बड़ी
औरत के साथ ठिठोली है

कैसी यह कथा बनाई है
होलिका को आग लगाई है
औरत को जलाकर के देखो
औरत कैसे भरमाई है
ये कैसी लाग लगाई है..?

गोदी में लेकर भक्त प्रह्लाद को
बैठी आखिर होलिका ही क्यो
बैठा न क्यों हिरण्यकशयपु
है प्रश्न उठ रहा मन में यूँ
करुणा,ममता वत्सलता की
प्रतिमूर्ति रही जो नारी है
वह कैसे लेकर बैठ गयी
यह प्रश्न बहुत ही भारी है
जबकि कठोर, निर्मम, निष्ठुर
निर्दयी हृदय है पुरूष रहा
लेकिन वह लेकर न बैठा
यह कैसा है संयोग रहा

ऐसा तो नहीं यह
पुरूष हृदय का
स्त्री से षड़यंत्र रहा.....?

2. तुम्हारे लिए...1

हे सजनी ! तुम इस कदर,
मुझको सताओ मत।

देकर के अश्क-ए गम,
तुम मुस्कुराओ मत।।

हमारे अश्क़ है ये तेरे दिए,
यह भूल जाओ मत।

यूं भींचकर अधरों को अब,
मुसकी दबाओ मत।।

हमारे अश्क की बूदें,
तुम्हें शबनम जो लगती हो

महज़ बस बोल दो तुम ,
ये सनम आँसू सुखाओ मत |

है हक़ तुम्हें अब भी ,
मेरे से बात करने का,

महज तुम लाज की रजनी में,
मुख पंकज छुपाओ मत |

आज़ तुम मुस्कुरा कर बोल दो ,
मेरी वफा सनम,

प्यार मुझसे करो तुम झूमकर
गज़लें बनाओ मत ।

3. प्रेम का सफर प्रेमी से पिता तक, प्रेमिका से माँ तक

हमारे प्यार में उसको
नींद नहीं आती है
और हम हैं कि ,
खर्राटे भर रहे हैं

कहती है कि मैं तेरे
बिन जिन्दा न रह सकूं
मैं कहता कोई किसी बगैर
मरता कहाँ है?

उसने कहा तुम्ही मेरे सर्वस्व हो
मैंने कहा इसके पहले भी
कोई सर्वस्व था !

जवाब मिला हाँ था और है भी
पर तुम से जो प्रेम है
वह प्राञ्जल निस्वार्थ है.

मैंने कहा लेकिन मैं तो किसी
और को प्यार करता हूँ

वह हमारी मंजिल है,
वही आखिरी ख्वाहिश है
उसके बिना सब अधूरा है

उसने कहा ..
आह् !कुछ दिन पहले
मैंने भी कहा था
उनसे ऐसे ही
लेकिन आज तुम सर्वस्व हो मेरे
सबसे अधिक मैं तुम्हें प्यार करती हूँ........

मैंने कहा सच है,
कुछ दिन बाद
वह भी ऐसे ही
प्यार करेगी
किसी और को
और साथ दूंगा मैं भी
तब मैं कौन हूंगा?
वह कौन होगी
जो बात कर रही हैं
वह कौन है?

जवाब ढूंढ़ रहा हूँ........

4. सहबाला

दूल्हे की शादी में
उसका छोटा भाई
बनता है सहबाला,
बनता है सहबाला
तो दुलराया जाता है
बहलाया जाता है
दुलहन की बहनों द्वारा
फ़ुसलाया जाता है

कितना सुन्दर है देखों
दुलराव यह,
फुसलाव यह
बहलाव यह,
मिलती हैं साली सुन्दर ,
चञ्चल मनभावन

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उतना ही घातक है
यह दुलराना ,
बहलाना
फुसलाना

जाता है टूट शादी के बाद

जब.....
भाई से बचपन का अफ़साना

5. मंत्र
राम अधार को पता है
बहुत पुराना मंत्र
बिच्छू साँप विषखोपड़े,
सबसे रहे स्वतंत्र

सबसे रहे स्वतंत्र
तनिक न शंका पावे
करे काम तत्काल
वही जो मन को भावे

कहे धनञ्जय उसकी तो
है महिमा अपरम्पार
उन सर्पों को छोड़ हमें
वह झारे राम अधार

6. फुटबाल

मारो ठोकर
हाथों से नहीं पैरों से
मारो ...मारो...
अरे रुको जूते तो पहन लो
तुम्हारे मजबूत जूतों की ठोकर
मुझे उछाल देती है
दस फीट, पन्द्रह फीट
या उससे अधिक
मैं ज़मीन से ऊपर उठकर
गर्व में फूल जाता हूँ
हवा में झूल जाता हूँ
और यह भूल जाता हूँ
कि मुझे यह उछाल
तुम्हारे जूतों की नोक ने दी है
क्यों याद रखूं?
कौन चाहता है?
जूतों की नोक पर रहना
या उस समय को याद रखना
जब वह जूतों की नोक पर था ?

अरे ! यह क्या ?
मैं तुम्हारे जूते की
नोक के नीचे कैसे आ गया
अभी तो उछाला गया हूँ
उनके द्वारा ....

क्या कहा?
मैं उछाला ही इसीलिए गया था
कि तुम्हारे
जूते की नोक पर आ सकूं
आख़िर मैं क्या हूँ?
कब तक खाता रहूँगा
तुम्हारे पैरों की ठोकरें?
और सूंघता रहूंगा
पसीने से तर जुर्राब की बदबू
कब तक......?

तुम फुटबाल हो ,और....
हम एक ही टीम के खिलाड़ी हैं
जो अभ्यास कर रहे हैं
ठोकरें मारने की
वैसे ये ठोकरें मारने की
ताकत तुमने ही दी है
बार-बार मेरा स्पर्श कर
उन्हें मजबूत कर
ठोकर मारने योग्य
तुमने ही बनाया है...

मैं गोल नहीं हूँ
मुझमें हवा भी नहीं भरी है
फिर फुटबाल कैसे?

तो सीधे सुनो
तुम यूपी के शिक्षामित्र
बी.एड, टेट, सी टेट पास
बीटीसी हो
और वह जिसने उछाला था
अखिलेश था
और मैं जो उछाल रहा हूँ आदित्यनाथ हूँ
मेरे फुटबाल उछलते रहो
यही तुम्हारी फ़ितरत है

7. किसान और रूपसी

मैं किसान हूँ !
हे रूपसी !
तुममें हमारे में कोई न फर्क है
जेठ की चिलचिलाती धूप
आषाढ़ की टिपटिपाती बूंद
पौष-माघ की कंपकंपाती ठंड
हमारी त्वचा को त्रास देती है
इन सबसे बचकर तुम
बचाती हो अपने सौन्दर्य को
और इन सब में खटकर मैं
बचाता हूँ अपनी फसल को
फिर तुम्हारी बची हुई शकल
और हमारी बची हुई फसल पर
कितने ही भेड़ियों की नजर होती है
आज तक ऐसी कोई शकल और फसल न हुई

जो इन भेड़ियों से बच सकी हो
इस नियति से रूबरू होकर भी
हम लगाते हैं अपनी फस़ल को
तुम सजाती हो अपनी शकल को
फिर मुझमें और तुममें फर्क क्या है?..........

8. तुम्हारे लिए..2

प्रेयसी का खिलखिलाना
दौड़कर बाँहों में आना
मदभरी पुतली घुमाना
सबको अच्छा लगता है
हमको भी अच्छा लगता है |

पर उसी का रूठ जाना
झटककर बाहें छुड़ाना
नयन से आँसू गिराना
किसको अच्छा लगता है ?
हाँ हमको अच्छा लगता है |

लाज से मुख को छुपाना
झटक अलकों को उड़ाना
चुप्पियों को तोड़ जाना
सबको अच्छा लगता है
हमको भी अच्छा लगता है |

मुख ढ़ंका पर लाज न हो
केश रूखे अधखुले हों
होंठ पाटल भी खुले हों
पर सभी यह अनमने हों
तब किसको अच्छा लगता है?
हाँ हमको अच्छा लगता है |

दूर तुम हो या हो फिर पास
हो खुशी या फिर उदास
तेरा हँसना रोना गाना
मुझको सब अच्छा लगता है |

जब हँसती हो खिलखिल करके
नदियों सी कलकल ध्वनि आती
नयनों से आँसू जब गिरते
लगता है धरित्री को धोते
तब आँसू हो या फिर हँसना
मुझको सब अच्छा लगता है |

जब लाज से मुख को ढकती हो
लगता बदली में चांद छुपा
मुखपर जब उदासी छाती है
लगता रवि पर बादल छाया
फिर हो उदास या शरमायी
मुझको सब अच्छा लगता है |

जब रहती दूर तुम मुझसे हो
सुन्दर सपनों सी लगती हो
जब पास खड़ी हो तुम मेरे
अपनी सांसों सी लगती हो
तब दूर खड़ी हो या फिर पास
सब मुझको अच्छा लगता है

9. हत्यारे

विषैला हो रहा
स्रोतस्वनी का जल
जिसमें मछलियाँ बिलबिला रहीं हैं,
लोभी मांस के बगुले
भर रहे हैं अपनी चोंच उनसे
छूटने को फड़फड़ा रही हैं
मछलियों का बिलबिलाना चोंच में फड़फड़ाना ,
बस एक आस थी शायद
वह चोंच से छूट कर
जीवन के सागर में गिर जाए
जब उसे ज्ञात हुआ कि वहीं बैठे

बाज और चील उसे घूर रहे है,
तब उसने बिलबिलाना और फड़फड़ाना छोड़ दिया
फिर वह बिन मारे मर गयी बेचारी मछली
ऐसे ही बिन मारे
मर रहे हैं हम
और इन हत्यारों का
पेट भर रहा है

10. तुम्हारे फेसबुक चित्र के लिए

बहुत दिनों के बाद दिखी हैं आप,
सोचता हूँ लाइक करूं ,
या बैठ निहारता रहूं |
निहारने से सुनाई पड़ती है
आपकी वह मधुर बोली जो
जो थके हारे को विश्राम् देती थी
पर देर तक निहारना भी ठीक नहीं
लोग कहेंगे कि लोफड़ हूँ |
कहने को क्या ?
कुछ भी कहेंगे
तब भी कहेंगे
अब भी कहेंगे
एक विवेकहीन,
स्वार्थ से घिरा व्यक्ति
और कह ही क्या सकता है
यही सोच कर लाइक भी किया
निहारा भी
और लिख मारा
अब जो कहना हो कहो
मूर्खों क्या फर्क पड़ता है...

11. सस्ती सोच

वें हँसते हैं ....
जब मैं तुम्हारे साथ
उठता-बैठता व बोलता हूँ
वे टोकते हैं ....
जब मैं तुम्हारे
साथ चलता हूँ
क्योंकि .....
तुम लड़की हो
और मैं लड़का हूँ |
पर कभी यह नहीं सोचते
कि मैं उनके साथ
क्यों नहीं हँसता ,
उठता-बैठता व बोलता हूँ !
सच कहूँ.....
उनकी रद्दी मानसिकता से
निकली छल प्रपंच भरी
रद्दी फूहड़ बातों को
सुनने से अच्छा
मैं तुम्हारे साथ रहना
पसंद करता हूँ
उनका हंसना
पसंद करता हूँ

उन सस्ती मानसिकता वालों की
सस्ती सोच उन्हे मुबारक हो......
मैं उनके साथ बैठ
घुटने से अच्छा
तुम्हारे साथ चलना
पसंद करता हूँ

12. दिल की बात

हाँ हम पहनते हैं जनेऊं,
लगाते हैं चंदन, बाँधते हैं कलावा
जाते हैं मंदिर चढ़ाते हैं कांवर
होली मनाते हैं, दीपावली में
दीपक जलाते हैं
दशहरा व दुर्गा पूजा
बड़ी धूम से मनाते है
क्योंकि हम हिन्दू हैं

तुम जाते हो मस्जिद
पढ़ते हो नमाज, पहनते हो टोपी
मनाते हो मोहर्रम, बजाते हो ढोल
इद बकरीद उरूस, मिलाद
सब कुछ बड़े प्यार से मनाते हो
क्योंकि तुम मुस्लिम हो

हम हमारा धर्म और तुम तुम्हारा धर्म
निभा रहे हैं फिर भी तुमको बुला रहे हैं

आओ पकड़ो रंगबाल्टी खेलो होली
दीपावली में दीप जला तुम भर लो झोली
दुर्गापूजा और दशहरा तुम्हें दिखाएँ
कलावा जनेऊ का हम राज बताएँ
जब मैं कांवर ले जाऊं तुम पंथ बुहारो
मेरी मंदिर में तुम अपनी चादर वारो
पर मस्जिद का मार्ग हमें अपने दिखलाओ
मोहर्रम में ढोल नगाड़े हमेशा भी बजवाओ
ईद मनाओ तब हमको भी गले लगाओ
कुर्बानी की गाथा अपनी हमें सुनाओ

आते तो हम अब भी हैं एक दूजे़ के त्योहारों पर
भरी हुई बंदूकें और तलवारों की धारों पर
पर ऐसे आने से देखो मनुष्यता मरती है
लहू की धारा बहती वा नफरत की बेलें पलती है
बन्दूकें तलवारें अपनी फेंककर आओ
हम मानव हो जाएँ और तुम भी मानव हो जाओ

13. बचपन की यादें

याद आती है,
हाँ मुझे याद आती है
वो बचपन की बातें मुझको बहुत लुभाती हैं

वो सुन्दर से दिन, वो ख्वाबों की रात
वो पाटी वो बुदके किताबों की बात
गुल्ली-डण्डा कबड्डी वो कुश्ती की बात
वो नहर की बैठक वो बस्ती की बात
वो धनुष वो तरकश वो लट्टू की बात
वो घोड़े वो हाथी वो टट्टू की बात
वो गड़रे की गाँठें, वो झुरुमुट की बात
वो कौरे के आलू लड़ाई की बात
वो चूल्हें वो चौकें, पढ़ाई की बात
वो खो खो वो लुकम-छिपाई की बात
वो पापा मामा के बड़ाई की बात
वो पिंटू की हरकत पिटाई की बात
फिर मम्मी की डांटे वो लोरी की रात
याद आती हैं,
हाँ मुझे याद आती हैं
वो बचपन की बातें मुझको बहुत लुभाती हैं

वो मक्कों वो चनों के खेतों की बात
चोरी से तोड़े अमरूदों की बात
वो ककड़ी वो खीरों खरबूजों की बात
वो भैसों गायों के चरवाहों सी बात
वो झगड़ों वो रगड़ों खुराफातों की बात
वो झूलों वो फूलों वो भूलों की बात
जुम्मन मिया के वसूलों की बात
वो हरखू की बिटिया की तुतली सी बात
वो चंदन की डिबिया वो मछली सी आँख
वो पापा चाचा की लड़ाई की बात
वो आपस में घर की बटाई की बात
फिर मम्मी के साड़ी के सिकुड़न की बात
वो जाड़ों की रातें वो ठिठुरन की बात
फटीहाल जेबें और पापा की आस
याद आती हैं
हाँ मुझे याद आती हैं
बचपन की बातें मुझको बहुत लुभाती हैं ||

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