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आंगन // विनोद सिल्ला की कविताएँ

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1.

आंगन

यह आंगन
जिसमें बीता
हमारा बचपन
बहनें तो
नदियों माफिक
छोड़कर पहाड़ को
जा मिलीं
अपने-अपने सागर में
हम दोनों भाई
निकले थे
दाना-चुगा लेने
चिड़िया की तरह
दोनों की ही
नहीं हो पाई वापसी
अपने घोंसलों में

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यह आंगन
देता है ममता
मां की तरह
जब किसी अवसर पर
हो जाते हैं इकट्ठे
इस आंगन में
हम सब भाई-बहन

-विनोद सिल्ला©

2.

परिवर्तन

होता है विरोध
हर परिवर्तन का
नहीं आता रास परिवर्तन
यथास्थितिवादियों को
वे लगा देते हैं
एड़ी-चोटी का जोर
परिवर्तन रोकने के लिए
लेकिन आज तक
नहीं रोक पाया कोई
परिवर्तन को
क्योंकि परिवर्तन है
प्रकृति का नियम

थोड़े हो-हल्ले
थोड़े शोर-शराबे
के बाद
अपना लिया जाता है
परिवर्तन
क्योंकि हर विध्वंस
बना जाता है रास्ता
नव-निर्माण का

-विनोद सिल्ला©

3.

प्रेम विवाह

उन्होंने
नहीं की परवाह
जमाने की
नकार दिया
परम्पराओं को
हो गई मिसाल कायम
हो गया आगाज
परिवर्तन का
खुल गए नए द्वार
अगली पीढ़ी के लिए
वे लांघ गए सीमाएं
जाति, धर्म व राज्यों की
नहीं मिलाए गोत्र
सिर्फ दिल मिलाए

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और कर लिया
प्रेम विवाह
अड़चनें नहीं बनी बाधा
उनके मजबूत
हौसले के समक्ष

-विनोद सिल्ला©

4.

जादूगर

यहां
हर व्यक्ति है जादूगर
अक्सर दिखा देता है
जादूगरी
रह जाते हैं भौचक्के
देखकर उसकी जादूगरी
उनका अप्रत्याशित
व्यवहार देखकर
करता है मन
दाद देने को

किस ढंग से
चढ़ा लेते हैं
चेहरे पर चेहरा
किस ढंग से
बदल लेते हैं रंग
भोली शक्लें
कर देती हैं हेरा-फेरी
सुंदर चेहरे
बोल देते हैं झूठ
बड़ी सफाई से
हर एक के पास
है जादूगरी
एक से बढ़कर एक

-विनोद सिल्ला©

5.

सीखता रहा

ताउम्र
सीखता रहा इंसान
बहुत कुछ
सिखाया इसे
विकट परिस्थितियों ने
अपनों के दिए
जख्मों ने
जीवन में खाईं
ठोकरों ने
पीठ पर हुए वारों ने
बेवफाओं की
बेवफाई ने

इस तरह ताउम्र
सीखता रहा इंसान
वो सबक
जो नहीं सिखाए
किसी शिक्षण संस्थान ने

-विनोद सिल्ला©

6.

भविष्य

आज का युवा
कल का है भारत
कल का है भविष्य
देखता हूँ अक्सर
करते हुए
गाली-गलौज उसे
लांघते हुए सीमा
सभ्यता की
करते हुए आत्मसात
नैतिक पतन को
करता हुआ अवहेलना
कायदों की
जीता हुआ झूठी शान में
मैं हूँ चिंतित
भारत के
भविष्य को लेकर

-विनोद सिल्ला©

7.

वो हैं बड़े

वो हैं बड़े
नहीं-नहीं
शायद बहुत बड़े
मैं नहीं कहता
वे स्वयं कहते हैं
बात-बात पर
लेकिन मुझे उनमें
नहीं आया नजर
कोई बड़प्पन
वे बड़े हैं स्वयं-भू
बड़ा होने के लिए
लंबा कद
या बड़ा पद
पर्याप्त नहीं
बड़प्पन होना भी
अनिवार्य है
बड़प्पन के बिना
बड़ा होना भी
कुछ नहीं

-विनोद सिल्ला©

8.

वोटों की फसल

पक गई
वोटों की फसल
दिया गया इसमें
अराजकता का जल
समय-समय पर
डाली गई
दंगों की खाद
आवश्यकतानुसार
छिड़का गया
भाषावाद-क्षेत्रवाद व
जातिवाद का कीटनाशक
मठाधीशों के
आशीषों की वर्षा ने
लगा दिए चार-चांद
उपज में
मेहनती हाथ
लिए दराँती रह गए
घुस गए खेत में
पूंजीपति लोग
लेकर कंबाईन-हार्वेटर
बटोर ले गए
दाना-दाना
फसल का

-विनोद सिल्ला©

9.

शह-मात

जाने क्यों
शह-मात खाते-खाते
शह-मात देते-देते
कर लेते हैं लोग
जीवन पूरा
मुझे लगा
सब के सब
होते हैं पैदा
शह-मात के लिए
नहीं है
कुछ भी अछूता
शह-मात से
लगता है
शह-मात ही है
परमो-धर्म
शह-मात है
कण-कण में व्याप्त
शह-मात ही है
अजर-अमर

-विनोद सिल्ला©

10.

वो आजाद हैं

वो
पक्षियों का जोड़ा
बैठा है
पेड़ पर
लड़ा रहे हैं चोंच
कर रहे हैं कलोल
कर रहे हैं मस्ती
होकर बेपरवाह
दकियानूसी रस्मों से
खाप-पंचायतों से
गोत्र-विवादों से
जाति-मजहबों से
वो हैं आजाद
ये सब हैं
इंसान के लिए
लड़ते रहने के लिए
भिड़ते रहने के लिए

-विनोद सिल्ला©

11.

यादें तो यादें हैं

आ जाती हैं यादें
बे रोक-टोक
नहीं है इन पर
किसी का नियन्त्रण
नहीं होने देती
आने का आभास
आ जाती हैं
बिना किसी आहट के
दे जाती हैं
कभी गम का
तो कभी खुशी का
उपहार

जब भी
आती हैं यादें
स्मृतियों के
रंगमंच पर
चल पड़ता है
चलचित्र-सा
लौट आते हैं
पुराने दिन
पुराना समय
यादें तो यादें हैं

-विनोद सिल्ला©

12.

बच्चे नर होंगे या मादा

हमारे मुख्य द्वार पर
बैठा है
चिड़ियों का जोड़ा
दोनों ने बना लिया
एक-दूसरे को
अपना साथी
दोनों का संगम
बढ़ाएगा वंशबेल
वे निश्चिंत हैं कि
अंडों से
निकलने वाले बच्चे
नर होंगे या मादा
उन्होंने नहीं की चेष्टा
जन्म पूर्व
यह जानने की
अंडों से
निकलने वाले बच्चे
क्या होंगे
भ्रूण-हत्या का तो
सवाल ही नहीं

-विनोद सिल्ला©


परिचय


नाम - विनोद सिल्ला
शिक्षा - एम. ए. (इतिहास) , बी. एड.
जन्मतिथि -  24/05/1977
संप्रति - राजकीय विद्यालय में शिक्षक

प्रकाशित पुस्तकें-

1. जाने कब होएगी भोर (काव्यसंग्रह)
2. खो गया है आदमी (काव्यसंग्रह)
3. मैं पीड़ा हूँ (काव्यसंग्रह)
4. यह कैसा सूर्योदय (काव्यसंग्रह)

संपादित पुस्तकें

1. प्रकृति के शब्द शिल्पी : रूप देवगुण (काव्यसंग्रह)
2. मीलों जाना है (काव्यसंग्रह)
3. दुखिया का दुख (काव्यसंग्रह)

सम्मान

1. डॉ. भीम राव अम्बेडकर राष्ट्रीय फैलोशिप अवार्ड 2011
2. लॉर्ड बुद्धा राष्ट्रीय फैलोशिप अवार्ड 2012
3. ज्योति बा फुले राष्ट्रीय फैलोशिप अवार्ड 2013
4. लाला कली राम स्मृति साहित्य सम्मान 2015
6. रक्तदान के लिए अमर उजाला, समाचार-पत्र ने जून 2018
5. प्रजातंत्र का स्तंभ गौरव सम्मान 2018


पता :-

विनोद सिल्ला
गीता कॉलोनी, नजदीक धर्मशाला
डांगरा रोड़, टोहाना
जिला फतेहाबाद (हरियाणा)
पिन कोड-125120

3 टिप्पणियाँ

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