दलित-वर्ग और दलित साहित्य // डॉ. महेंद्रभटनागर से बातचीत // डॉ. आर. एच. वणकर

SHARE:

वार्तालाप एवं आत्म-कथ्य  // महेन्द्रभटनागर दलित-वर्ग और दलित साहित्य डॉ. महेंद्रभटनागर से बातचीत डॉ. आर. एच. वणकर दलित साहित्य वेदनाग्रस्त अ...

image

वार्तालाप एवं आत्म-कथ्य  // महेन्द्रभटनागर

दलित-वर्ग और दलित साहित्य

डॉ. महेंद्रभटनागर से बातचीत

डॉ. आर. एच. वणकर

दलित साहित्य वेदनाग्रस्त अहसास एवं भोगे हुए यथार्थ का प्रामाणिक दस्तावेज़ है।

डॉ. महेंद्रभटनागर (कवि एवं समीक्षक)

डॉ. महेंद्रभटनागर हिन्दी के यशस्वी कवि एवं समीक्षक हैं। वे अपने लेखन में सामाजिक विसंगतियों के विरुद्ध कुछ कर गुज़रने की चाह रखते हैं - आपके लेखन में बड़ी शिद्दत से यह जज़्बा देखने को मिलता है। आप मानवतावादी एवं दलित हित-चिन्तक लेखक हैं। आपने दलित समस्याओं को अपने साहित्य में अनेक जगहों पर उठाया है। आपका काव्य चूँकि प्रगतिवादी-जनवादी है; एतदर्थ वह दलित-कविता से अभिन्न है।

‘हिन्दी एवं गुजराती दलित साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन’ नामक शोध-विषय पर कार्यरत डॉ. आर. एच. वणकर द्वारा उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश ।

सवाल : डॉ. साहब, आपकी दृष्टि में दलित कौन है?

हिन्दू धर्म मानने वालों में दलित-समस्या, सदा की तरह, आज भी बहु-चर्चित है। वास्तव में, प्राचीन-काल और मध्य-काल से अधिक; आधुनिक-काल में दलित समस्या के प्रति ध्यान दिया जा रहा है। इधर, कुछ या अधिक वर्षों से तो दलित आन्दोलन निरन्तर मीडिया में ही नहीं, आम जनता के बीच भी विचार और बहस का ज्वलन्त विषय रहा है। आज पूरे देश में, दलित आन्दोलन बड़े प्रभावी और सशक्त रूप में उभर रहा है। प्रश्न उठता है, ये दलित कौन हैं? ये दलित क्या हिन्दू धर्म मानने वालों तक ही सीमित हैं? जा़हिर है, हिन्दुओं में प्रचलित जाति-प्रथा / जाति-व्यवस्था के फलस्वरूप ही, समाज के एक बड़े वर्ग का शोषण होता रहा है / हो रहा है। यह शोषित वर्ग अब जाग उठा है। जाति और धर्म के नाम पर इस वर्ग का शोषण अब और सम्भव नहीं। इस वर्ग ने स्वयं अपने को ‘दलित’ नाम से अभिहित किया। आज समाज, राजनीति और साहित्य में ‘दलित’ शब्द ने अपना सम्मानपूर्ण स्थान बना लिया है। दलित-वर्ग की विचार-धारा से स्वयं को जोड़े रखने में आज ग़ैर-दलित भी गर्व अनुभव करते हैं। यह शब्द और यह आन्दोलन प्रगतिशील-जनवादी मानव-समुदाय से अटूट रूप से सम्पृक्त है। दलित-वर्ग के प्रति सहानुभूति ही नहीं; वरन् उसके उद्धार और विकास में आज उसकी गहरी दिलचस्पी है। भले ही, अनेक मुद्दों पर वैचारिक मतभेद अपनी जगह हों।

सवाल : आपकी दृष्टि में दलित साहित्य की अलग अवधारणा क्या ठीक है?

अवधारणा अलग हो या न हो; वस्तुस्थिति यह है कि दलित साहित्य के पक्षधर और उसके पुरस्कर्ता पूर्ववर्ती अथवा मौजूदा किसी विचार-सरणि अथवा संस्था का अंग अपने को नहीं मानते। उन्होंने प्रेमचंद-समान प्रगतिशील और क्रान्तिकारी लेखक तक को अपनी आलोचना का लक्ष्य बनाया।

सवाल : डॉ. साहब, दलित साहित्य की सामाजिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालिये।

दलित-साहित्य की सामाजिक पृष्ठभूमि, हिन्दू धर्म में प्रचलित जाति-व्ववस्था से निर्मित है। पिछड़ी जातियों और जन-जातियों के उत्थान के लिए भारत सरकार के प्रयत्न सर्व-विदित हैं। लेकिन सामाजिक कुरीतियों को दूर करने में तो जनता को ही स्वयं आगे आने होगा। स्वतंत्रा भारत में जो जागृति दलित-वर्ग में उत्पन्न हुई; उससे दलितों की सामाजिक स्थिति में सुधार हुआ। इस अभियान में, राजनीतिक चेतना के साथ-साथ दलित साहित्य की भूमिका भी कोई कम महत्वपूर्ण नहीं है।

सवाल : अधिकतर लोग कहते हैं कि भारत में जाति-व्यवस्था एक अभिशाप है। क्या सही है

किसी समय जाति-व्यवस्था एक गतिशील और आदर्श व्यवस्था रही हो; किन्तु कालान्तर में वह दूषित होती गयी और आज तो वह नासूर बन चुकी है। देश में, प्राचीन काल से जाति-प्रथा का विरोध हो रहा है। इतिहास से प्रमाणित है, गौतम बुद्ध ने जाति-व्यवस्था का जमकर विरोध किया था। बौद्ध साहित्य में इसका उल्लेख उपलब्ध है। दलित हों या ग़ैर-दलित अधिकांश जन जाति-व्यवस्था के विरुद्ध बराबर संघर्ष करते रहे / कर रहे हैं।

सवाल : डॉ. साहब, वर्तमान में दलित साहित्य का समाज पर कितना असर पड़ा है? कुछ उदाहरण अपने निजी अनुभवों से साझा कीजिये।

दलित साहित्य दलित-वर्ग का ही साहित्य नहीं; वह आम जन का साहित्य है। आर्थिक दृष्टि से विपन्न विशाल जन-समुदाय उसमें अपनी समस्याओं और प्रश्नों को पाता है। वह उसे बल पहुँचाता है। सामाजिक परिवर्तन के लिए एक विराट जन-आन्दोलन देश में उठ चुका है / फैल रहा है।

सवाल : दलित साहित्य के लेखन में सवर्ण लेखकों का भी क्या कोई सरोकार है?

दलित साहित्य के लेखन में सवर्णों की पूरी भागीदारी है। लेखन का संबंध दलित या सवर्ण से नहीं; विचार-धारा से होता है। कहाँ जन्म लिया जाए; यह किसी के वश में नहीं है। जन्म एक प्राकृतिक कार्य-व्यापार है। मनुष्य-मनुष्य में भेद तो इस या उस समाज ने उत्पन्न किये हैं।। अतः मानव-समाज को दलित और सवर्ण में विभाजित करना उचित नहीं। इससे समाज में कलह का उत्पन्न होना स्वाभाविक है। यह एक बहुत गंदी भावना व विचारणा है। इसे कदापि प्रोत्साहन नहीं देना चाहिए। तथाकथित अनेक सवर्ण व्यक्ति दलित मानवता के पक्षधर हैं। दलितों के हित-चिन्तन में वे दलितों से अधिक सक्रिय हैं। उन्होंने दलितों के हित में पर्याप्त और उत्कृष्ट साहित्य-रचना की है / कर रहे हैं। हिन्दी का प्रगतिवादी-जनवादी लेखन तो प्रारम्भ से ही प्रतिक्रियावादी दकियानूस सवर्णों (पुरोहित वर्ग) के विरुद्ध रहा है। धर्म के नाम पर, पुरोहित-वर्ग द्वारा श्रद्धालु व धर्म-प्रवण जनता का शताब्दियों से शोषण हो रहा है। इसका विरोध दलितों ने स्वयं इतना नहीं किया; जितना कि प्रगतिशील चिचार-धारा वाले ग़ैर-दलितों ने किया। आज भी हमारा तथाकथित दलित समाज धर्माडम्बरों का शिकार है। घोर अंधविश्वासी है। उसके सुधार और विकास में रत मानव समुदाय को दलित और सवर्ण की दृष्टि से देखना बेमानी है।

सवाल : दलित साहित्य का स्वरूप क्या है?

लेबुलधारी ही नहीं; प्रत्येक प्रकार के साहित्य का स्वरूप रचनाकार की प्रकृति, उसके संस्कार, शिक्षा-दीक्षा, विचार, भावना आदि के अनुसार-अनुरूप होता है। स्वरूप का कोई आकार निश्चित नहीं किया जा सकता। अक़्सर यह कार्य सैद्धांतिक आलोचना के आचार्य करते हैं। किसी भी प्रकार के साहित्य का स्वरूप स्थिर करना; उस साहित्य की गति को अवरुद्ध करना है। यही बात दलित साहित्य के संबंध में लागू होती है। दलित विचार-धारा का लेखक / रचनाकार अपने व्यक्तित्व के अनुरूप ही साहित्य-सृजन करेगा। उसका वैचारिक और कला पक्ष साहित्य-सृष्टा पर निर्भर है। उसके लिए कोई नियम नहीं बनाये जा सकते। स्थूल रूप से कहा जा सकता है कि दलित साहित्य विद्रोही / क्रांतिकारी होता है। वह विरुद्ध स्थितियों-परिस्थितियों से कभी समझौता नहीं करता। सख़्ती और कठोरता उसका स्वभाव है। वहाँ ढुलमुल नीति से काम नहीं चलता। वस्तुतः दलित साहित्य स्पष्टवादी और दो-टूक होता है। किसी का कोई लिहाज़ नहीं करता। इसी प्रकार अभिव्यक्ति के संदर्भ में; उसके समक्ष आम आदमी ही रहता है। ज़ाहिर है, रहना ही चाहिए। भाषा अधिकाधिक आम आदमी की हो। प्रचलित शब्दों से भरपूर। क्लिष्ट और संस्कृतनिष्ठ भाषा-स्वरूप स्वीकार्य नहीं। कथन में दुरूहता न हो। रचना प्रसंग-गर्भत्व से बोझिल भी न हो। हिन्दी का दलित साहित्य, अभिव्यक्ति की दिशा में, बहुत-कुछ उसकी वैचारिक तीव्रता का साथ देता प्रतीत होता है। यह जो-कुछ कहा गया है; नया नहीं है। साहित्य-स्वरूप का एक सामान्य स्वरूप है। प्रगतिशील-जनवादी साहित्य का भी यही आदर्श होता है। जो भी साहित्य आम आदमी के लिए लिखा जाता है, उसमें ये विशेषताएँ प्रायः पायी ही जाती हैं।

सवाल : क्या दलित साहित्य से सामाजिक विषमता का अंत हो सकता है?

दलित साहित्य से सामाजिक विषमता का अंत हो जाएगा; ऐसा दावा तो नहीं किया जा सकता। हाँ, इसमें दो मत नहीं, ऐसे आन्दोलन सामाजिक विषमता के विरोध में सामाजिकों को सक्रिय करते हैं। उन्हें जागरूक बनाते हैं। बौद्धिक स्तर पर ही नहीं, व्यावहारिक दैनंदिन जीवन में भी समाज में कुछ बदलाव आता ज़रूर है। हिन्दी का आधुनिक दलित साहित्य अभी इतना व्यापक और सशक्त नज़र नहीं आता कि आप उससे किसी सामाजिक परिवर्तन की अपेक्षा कर सकें। माना कि शुरूआत अच्छी है।

सवाल : दलित आन्दोलन में डॉ. भीमराव अम्बेडकर के योगदान के बारे में कुछ कहें।

दलित आन्दोलन में डॉ. भीमराव अम्बेडकर का योगदान सर्वविदित है। वे इस आन्दोलन के प्रमुख प्रेरणा-स्रोत रहे हैं। बाबा साहेब अम्बेडकर कम्युनिस्ट पार्टी की विचार-धारा के समर्थक नहीं रहे; लेकिन वे समाजवाद के पक्षधर थे। पूँजीवाद के कट्टर विरोधी थे। हिन्दू सम्प्रदायवादी दलों (‘हिन्दू महासभा’ और ‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ’) से उन्होंने समझौता नहीं किया। वे जनतंत्रा प्रणाली में विश्वास रखते थे। बौद्ध होने के कारण हिंसा के विरोधी थे। हिन्दू जाति-व्यवस्था पर वे बराबर प्रहार करते रहे। अतः स्पष्ट है, डॉ. भीमराव अम्बेडकर और दलित आन्दोलन अभिन्न हैं।

सवाल : महात्मा गांधी के अछूतोद्धार के बारे में आपकी क्या राय है

निर्विवाद रूप से, महात्मा गांधी के अछूतोद्धार आन्दोलन का आज ऐतिहासिक महत्व है। इस दिशा में, अपने समय में, उन्होंने बड़ी क्रांतिकारी भूमिका निभायी। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में, तटस्थ भाव सें, उनके अछूतोद्धार संबंधी कार्यकलापों का मूल्यांकन अनिवार्य है। महात्मा गांधी मात्रा वैचारिक दुनिया के क्रांतिकारी नहीं थे; उन्होंने अछूत-वर्ग के परिवारों में घुल-मिल कर उनके उद्धार के कार्य किये।

सवाल : क्या दलितों की राजनीति में भागीदारी से समाज में कुछ बदलाव आयेगा?े

हाँ, बदलाव आएगा; ज़रूर आएगा। वर्तमान में राजनीति का ही बोलबाला है। राजनीति का देश की शासन-प्रणाली पर ही कब्ज़ा नहीं है; उसके नियंत्राण में आर्थिक व्यवस्था, सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक-साहित्यिक परिवेश भी है। आज की राजनीति और राजनीतिज्ञ कितने भ्रष्ट हैं; यह हम और आप रोज़ अनुभव करते हैं। हाँ, राजनायक अवश्य देश में बदलाव ला सकते हैं; बशर्ते वे संगठित और सक्रिय हों।

सवाल : दलित साहित्य की कौन-कौन सी समस्याएँ हैं

दलित साहित्य की अथवा किसी भी साहित्य की समस्याएँ क्या हो सकती हैं? दलित सामाजिक स्थिति और चेतना से प्रभावित होकर किसी भी भाषा के ग़ैर-दलित जागरूक लेखक साहित्य-सृजन कर सकते हैं / कर भी रहे हैं; किन्तु इसकी अपेक्षा भी कम नहीं कि दलित समाज से भी अधिकाधिक लोग आगे आएँ और अपने जीवन-अनुभवों को, साहित्य की विभिन्न विधाओं के माध्यम से, अभिव्यक्त करें, उन्हें रूपायित करें, उन्हें रेखांकित करें। हिन्दी में दलित-वर्ग के ऐसे कुछ लेखक व रचनाकार सक्रिय हैं। उनमें बड़ा आक्रोश और क्रोध है। वे ज़रूरत से ज़्यादा कठोर और हमलावर हैं। लेकिन उनकी दृष्टि यदि यथार्थवादी है तो इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है। यह भी अच्छा है कि दलित साहित्य का अपना सौन्दर्य-शास्त्रा भी आकार ले रहा है। माना, यह सौन्दर्य-दृष्टि प्रगतिवादी-जनवादी साहित्यकारों से साम्य रखती है। मज़दूर-किसान, हरिजन, भिक्षुक आदि सर्वहारा व निर्धन मानवता के आलम्बन वाम-साहित्य में जो उपलब्ध हैं वे दलित-साहित्य के भी आलम्बन बन सकते हैं। दलित-साहित्य की अपनी राजनीतिक विचार-धारा भी निर्मित हो रही है। खेद की बात है, वोटों के लिए, साम्प्रदायिक दलों से गँठजोड़ कर लिया जाता है या उनका सहयोग ले लिया जाता है।

सवाल : दलित साहित्य का भविष्य कैसा है?

निःसंदेह, दलित साहित्य उत्तरोत्तर विकास कर रहा है। उसमें निरन्तर वृद्धि हो रही है। साहित्य-लेखन और मीडिया में उसकी चर्चा प्रमुखता से हो रही है। इस संदर्भ में, अनेक विवादास्पद विषयों पर बहस भी जारी है। यह सब दलित साहित्य के महत्व को घोषित करता है। दलित साहित्य की अन्तर्वस्तु सामयिक है, सामाजिक दृष्टि से स्वस्थ है। उसकी भाषा और उसके सौन्दर्य पक्ष पर भी इधर ध्यान दिया जा रहा है। आम आदमी का साहित्य सशक्त तो होना ही चाहिए; उसमें भरपूर गांभीर्य भी हो। दलित साहित्य की पाठक और समाज उपेक्षा-अवहेलना नहीं कर सके - इस ओर ध्यान देना ज़रूरी है।

सवाल : आपकी काव्य-कृति ‘सरोकार और सृजन’ दलित चेतना को प्रकट करती है - इस संदर्भ में बताएँ।

‘सरोकार और सृजन’ नामक एन्थोलोजी में समाजार्थिक यथार्थ की मेरी विशिष्ट कविताएँ समाविष्ट हैं। इनका कथ्य दलित समाज की भावनाओं-विचारणाओं के अनुरूप है। मेरा काव्य इस तथ्य का साक्ष्य है कि मेरी काव्य-रचना का प्रारम्भ ही सामाजिक चेतना सम्पृक्त अनुभूतियों की अभिव्यक्तियों से हुआ। निर्धन परिवार में जन्म होने के कारण मेरे जीवन का अधिकांश भाग अभावों में बीता। सर्व-विदित है, उन दिनों ‘दलित’ शब्द हिन्दी कविता में इतना प्रचलित नहीं था; तथापि मेरी इन प्रारम्भिक कविताओं में ही पद-दलितों की भरपूर वकालत उपलब्ध है :

नग्न, दुर्बल, त्रस्त, पीड़ित, नत, बुभुक्षित जो रहे हैं,

दुःख क्या, अपमान कटुतर ही सदा जिनने सहे हैं,

जो तिरस्कृत आज तक, उनको उठाता जा रहा हूँ!

गीत गाता जा रहा हूँ!

(रचना : सन् 1945)

वस्तुतः, ‘सरोकार और सृजन’ की कविताओं पर दलित साहित्य के सुधी समीक्षकों और आप-समान शोधकर्ताओं को विमर्श करना चाहिए।

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: दलित-वर्ग और दलित साहित्य // डॉ. महेंद्रभटनागर से बातचीत // डॉ. आर. एच. वणकर
दलित-वर्ग और दलित साहित्य // डॉ. महेंद्रभटनागर से बातचीत // डॉ. आर. एच. वणकर
https://lh3.googleusercontent.com/-6NWCvLFcAA8/W8bcNGy11_I/AAAAAAABEwo/P8dOxcl7UPgIZCg5lqLuVyRxb2XtM2OggCHMYCw/image_thumb?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-6NWCvLFcAA8/W8bcNGy11_I/AAAAAAABEwo/P8dOxcl7UPgIZCg5lqLuVyRxb2XtM2OggCHMYCw/s72-c/image_thumb?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2018/10/blog-post_60.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2018/10/blog-post_60.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content