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जनप्रिय-कवि महेन्द्रभटनागर से डॉ० रंजीत रविशैलम का संवाद :

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वार्तालाप एवं आत्म-कथ्य  // महेन्द्रभटनागर

जनप्रिय-कवि महेन्द्रभटनागर से

डॉ० रंजीत रविशैलम का संवाद

1, अपने व्यक्तित्व पर आप क्या विशेष रूप से कहना चाहेंगे?

व्यक्तित्व के प्रकार दो हैं - बाह्य और आन्तरिक। आपका आशय आन्तरिक व्यक्तित्व से होगा।

मेरे बाह्य व्यक्तित्व पर आलोचक डॉ० रमाकान्त शर्मा (जोधपुर) का कथन द्रष्टव्य ह्रै -

“साँवला रंग, उन्नत ललाट, आँखों में छिपा गहरा दर्द, मध्यम ऊँचाई का स्वस्थ-सुडौल शरीर और अब दाढ़ी - यह है महेंद्रभटनागर का बाह्य व्यक्तित्व। वेशभूषा - घर में अधिकतर तहमद पहने मिलेंगे - गर्मियों में बनियान, जाड़ों में बुशर्ट-स्वेटर के साथ। बाजार में ज़्यादातर साइकिल पर या स्वेगा-लेम्ब्रेटा पर। लबो-लहज़ा मधुर-आकर्षक। व्यवहार बड़ा ही आत्मीयतापूर्ण। स्वभाव से शांत, किन्तु उसूलों के पक्के। अनियमित कार्यों से दूर। इस कारण, मतलबी मित्रों की नाराज़गी व उपेक्षा के शिकार। यात्रा-भीरु। मंच-भीरु। भाषण अथवा काव्य-पाठ करना यातना से गुज़रना। इस कारण, कार्यक्रमों-उत्सवों में बहुत कम दृष्टव्य। किसी धार्मिक मतवाद के क़ायल नहीं। दृष्टिकोण वैज्ञानिक व अत्याधुनिक । जातिवाद विरोधी। पूर्ण निरामिष। सुरा व सिगरेट कभी नहीं। हृदय-रोग के लक्षणों के कारण आजकल चाय-कॉफी भी कम। मेहमान-नवाज़ी विरासत में; किन्तु दुष्टों और चरित्रहीनों से ज़बरदस्त एलर्जी। राजनीतिज्ञों से ख़ास नफ़रत। सहज व स्पष्ट। नैतिक संवेदना से पूर्ण। साम्यवादी समाज-व्यवस्था के पक्षधर। उसके लिए निरन्तर संघर्षशील। स्वयं का अधिकांश कार्यकाल अल्प-वेतन पर बीता। रहन-सहन आडम्बरहीन। सादा। कुल मिलाकर महेंद्रभटनागर की एक ऐसी तस्वीर उभरती है, जो वैयक्तिक जीवन से संतुष्ट है, कोई आपाधापी नहीं, किन्तु अपने युग के प्रति सजग-व्यापक अन्तर्राष्ट्रीय क्षितिज के मध्य।” (‘महेन्द्रभटनागर-समग्र’, खंड -1 - पृ० 38 - ‘कवि महेन्द्रभटनागर : व्यक्ति और स्रष्टा’)

आन्तरिक व्यक्तित्व व्यक्ति के मस्तिष्क और हृदय से निर्मित होता है। लेखक-रचनाकार का आन्तरिक व्यक्तित्व उसकी रचनाओं-कृतियों में प्रतिबिम्बित रहता है। उसके मस्तिष्क की आन्तरिक बनावट और उसकी ह््रदय की संवेदनशीलता उसके लेखन में, उसकी अभिव्यक्ति में प्रमुखता से उभरती है; जो उसे विशिष्ट बनाती हैं। लेखक-रचनाकार के आन्तरिक व्यक्तित्व की परख आप उसके द्वारा विरचित साहित्य के माध्यम से कर सकते हैं। उसके संस्कार-विचार, उसकी मानवता, उसका बौद्धिक स्तर और भाव-सौन्दर्य-बोध, उसकी कल्पना-शक्ति आदि का परिज्ञान उसकी लेखन-सृष्टि से साक्षात्कार करने पर सहज सम्भव है।

जहाँ-तक मेरा संबंध है; धर्म-निरपेक्षता को मनुष्य बनने की पहली शर्त मानता हूँ। धार्मिक अंध-विश्वासों, तथा-कथित धार्मिक आडम्बरों में तनिक भी विश्वास नहीं। मनुष्य को बुद्धि और वैज्ञानिक दृष्टि से संचालित होना चाहिए। ‘वसुधैवकुटुम्बकम्’ की भावना का अधिकाधिक विस्तार हो। हिंसा और क्रूरता समाप्त हो। सहयोग और प्रेम मानवीय संबंधों का आधार हो। जब-तक मनुष्य का दिल और दिमाग़ ऐसा नहीं बनता, तब-तक वह पूर्ण मानव कहलाने का अधिकारी नहीं।

2, सन् 1945 से आपने अध्यापन-कार्य शुरू किया; एक समर्थ-सार्थक साहित्यकार का रूप प्राप्त करने में अध्यापन-कार्य ने आपको किस प्रकार योगदान किया?

अध्यापन-कार्य में रत व्यक्ति विद्या, शिक्षा, साहित्य, विज्ञान, आदि ज्ञान के विविध क्षेत्रों में तो सक्रिय रहते ही हैं; वे समाज, अर्थनीति और राजनीति से भी जुड़े रहते हैं। उनका सम्पूर्ण कार्यकाल अध्ययन-अध्यापन में व्यतीत होता है। उनकी गणना बुद्धिजीवियों में होती है। स्नातक, स्नातकोत्तर और शोधार्थियों के अध्यापन एवं मार्ग-दर्शन के लिए उन्हें नियमित अध्ययन करना पड़ता है। इससे उनकी प्रतिभा में निखार आता है। उनके भाषा-ज्ञान में वृद्धि होती है। उनमें मौलिक लेखन के प्रति आकर्षण उत्पन्न होता है। मेरे द्वारा लिखित आलोचना-साहित्य और शोधपरक-कार्य बहुत-कुछ इसी कारण सम्भव हो सका। लेखन की प्रामाणिकता और उच्च-स्तर की अपेक्षा अध्यापकों-प्राध्यापकों से की जाती है।

3, साहित्यिक-सामाजिक जीवन में आपके प्रेरणा-स्रोत कौन-कौन रहे?

साहित्यिक जीवन में मैं कबीर, तुलसीदास, प्रेमचंद, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, शेक्सपियर, रामचंद्र शुक्ल, रामविलास शर्मा, निराला, महादेवी वर्मा, जगन्नाथ प्रसाद मिलिन्द, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, आदि से प्रभावित रहा। सामाजिक जीवन में गौतम बुद्ध, कार्ल मार्क्स, महात्मा गांधी, विवेकानन्द आदि सर्वाधिक आकृष्ट करते हैं।

4, आपकी पहली रचना कौन-सी है?

मेरी प्रारम्भिक रचनाएँ ‘तारों के गीत’, ‘विहान’, ‘अभियान’ और ‘अन्तराल’ में सम्मिलित हैं। रचनाओं का रचना-काल दर्ज़ है। मेरा लेखन, जो कविता-संग्रहों में समाविष्ट है, नवम्बर 1941 से प्रारम्भ हुआ। इन दिनों मैं ‘विक्टोरिया कॉलेज’ (ग्वालियर) में अध्ययन-रत था। इसके पूर्व रचित कविताएँ अनुपलब्ध हैं। मेरी सर्वप्रथम प्रकाशित कविता ‘हुंकार’ है; जो ‘टूटती शृंखलाएँ’ में संगृहीत है। इसका प्रकाशन लब्ध-प्रतिष्ठ मासिक पत्रिका ‘विशाल भारत’ (कलकत्ता) के मार्च 1944 के अंक में हुआ।

हुंकार हूँ, हुंकार हूँ!े

मैं क्रांति की हुंकार हूँ!

मैं न्याय की तलवार हूँ!

शक्ति जीवन जागरण का

मैं सबल संसार हूँ!

लेक में नव-द्रोह का

मैं तीव्रगामी ज्वार हूँ!

फिर नये उल्लास का

मैं शान्ति का अवतार हूँ!

हुंकार हूँ, हुंकार हूँ!

मैं क्रांति की हुंकार हूँ!

इस संदर्भ में, यशस्वी साहित्यकार श्री.गिरीश पंकज जी (छत्तीसगढ़) का कथन दृष्टव्य है : ‘‘उनकी प्रथम प्रकाशित कविता का शीर्षक था - ‘हुंकार’। इससे कवि की सोच पता चलती है कि उसने कविता की दुनिया में अपनी उपस्थिति एक हुंकार के साथ दर्ज़ की और आज तक वे हुंकार रहे हैं अन्याय के विरुद्ध, अत्याचार के विरुद्ध, विसंगतियों के विरुद्ध।’’

इसके पूर्व एक अन्य कविता ‘सुख-दुख’; जो ‘विहान’ कविता-संग्रह में शामिल है; ‘विक्टोरिया कॉलेज मेगज़ीन’ (महाविद्यालय की वार्षिक पत्रिका) में छप चुकी थी। सत्र सम्भवतः- 1943-44

सुख-दुख तो मानव-जीवन में बारी-बारी से आते हैं,

जो कम या कुछ अधिक क्षणों को मानव-मन पर छा जाते हैं!

मानव-जीवन के पथ पर तो संघर्ष निरन्तर होते हैं,

पर, गौरव उनका ही है जो किंचित धैर्य नहीं खोते हैं!

यह ज्ञात सभी को होता है, जीवन में दुख की ज्वाला है,

यह भास सभी को होता है, जीवन मधु-रस का प्याला है!

हैं सुख की उन्मुक्त तरंगें, तो दुख की भी भारी कड़ियाँ,

ऊँचे-ऊँचे महल कहीं तो, हैं पास वहीं ही झोंपड़ियाँ!

कितनी विपदाओं के झोंके आते और चले जाते हैं,

कितने ही सुख के मधु सपने भी तो फिर आते-जाते हैं!

क्या छंदों में बाँध सकोगे जन-जन की मूक व्यथाओं को?

औ‘ सुख-सागर में उद्वेलित प्रतिपल पर नव-नव भावों को?

5, प्रगतिवादी-मानवतावादी कवि के रूप में आप विख्यात हैं। इसके लिए किन-किन तत्त्वों का पालन आवश्यक है?

प्रगतिवादी-मानवतावादी रचनाकार आम आदमी का पक्षधर होता है। जन-साधारण की समस्याओं और आवश्यकताओं को वह समझता है। उनके आर्थिक और सांस्कृतिक विकास में उसकी दिलचस्पी होती है। उनके सुख-दुख को वह अपनी रचनाओं में सम्पूर्ण शिद्दत से, तीव्रता से अभिव्यक्त करता है। वह लोकधर्मी होता है। मानवीय संवेदना उसका प्रमुख सरोकार होता है। वह शोषित, दलित, पीड़ित, अभावग्रस्त, त्रस्त, मानवता के कल्याण और विकास के लिए अपना जीवन होम कर देता है। उसका साहित्य जन-जन तक पहुँचे; अतः वह जन-भाषा का प्रयोग करता है। सम-सामयिक सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश की अनदेखी कर, गूढ़ लक्षणाओं-व्यंजनाओं का चमत्कार प्रदर्शित करना; उसके लिए श्रेष्ठ कवि-कर्म नहीं है। अभिधा-कथन भी प्रभावी हो सकता है; होता है। सचाई को अभिव्यक्त करने से, रचना स्वतः मर्मस्पर्शी और शक्तिशाली हो उठती है। वहाँ बात बोलती है। सुभद्राकुमारी चौहान (‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी!’) एवं अन्य जनवादी रचनाकारों में यह तथ्य दृष्टव्य है।

6. आपने छंदबद्ध और छंदमुक्त दोनों प्रकार की कविताओं की रचना की है। आपकी छंदमुक्त कविताओं की अपनी एक अनोखी शैली है; उसमें एक अद्भुत प्रवाह है; उसमें एक विशिष्ट ‘लय’ समाहित है। यह कैसे सम्भव हुआ?

‘छन्दमुक्त’ अत्यल्प; अधिकतर छन्दों में और ‘मुक्तछन्द’ में। ‘मुक्तछन्द’ मात्रिक होने के कारण लय युक्त है। यह मात्रिक-क्रम जड़ नहीं; पर्याप्त स्वतऩ़्त्र है। आन्तरिक तुकों से प्रभाव-वृद्धि स्वतः हुई है। ‘छन्दमुक्त’ रचनाओं में भी अपना एक विशिष्ट प्रवाह है। इन रचनाओं में भी गद्यात्मकता नहीं मिलेगी। मात्रिक-क्रम अपनाने के कारण छन्दानुशासन अनिवार्य हो उठता है। यह अभ्यास से ही सम्भव होता है। रचनाकार का शब्दों पर अधिकार इतना हो जाता है कि वांछित शब्दावली स्वतः सहज उतरती चली आती है। रुकावट या कठिनाई उत्पन्न नहीं होती। वैकल्पिक अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता रचनाकार को रहती ही है। इस सारी रचना-प्रक्रिया में समय तो लगता ही है। तभी तो रचना को साधना कहा जाता है। वह गद्य-लेखन की तरह आसान नहीं। इस गुर को न समझने के कारण आजकल कविता के नाम पर धाराप्रवाह लिखा जा रहा है। जो जितना बड़ा लफ्फाज़, वह उतना बड़ा कवि’! इन रचनाओं को ‘कविता’ विधा से हटकर किसी अन्य विधा-नाम से अभिहित करना अधिक युक्तियुक्त होगा। ऐसी रचनाएँ प्रभावशाली-शक्तिशाली हो उठती हैं; जब उनमें कथन-कला या कथन-भंगी विशिष्ट होती है। भाषा का इतना धनी हर कोई नहीं होता। इन रचनाओं में सारा चमत्कार अभिव्यक्ति-कौशल पर निर्भर करता है। इन लम्बी-लम्बी रचनाओं को बौद्धिकता-समृद्ध पाठक पसंद करते हैं। साधारण पाठक में इतना धैर्य नहीं होता। उत्तेजनापूर्ण भाषणकर्ताओं की तरह रचनाकार त्वरा-शैली अपनाता है। यहाँ न छन्द है, न तुकाग्रह है, न लय हैं। हाँ, एक प्रकार की अर्थ-लय ज़रूर है। लेकिन ऐसी रचनाएँ गाने-गुनगुनाने अथवा याद (कण्ठस्थ) रखने की कला-कृतियाँ नहीं होतीं। उनका अपना अलग-अलग ‘शिल्प’ होता है। इन रचनाओं को कविता न कहकर ‘कविताभास’ ही कहा जाएगा।

7. आपने विविध विषयों पर लिखा है; लेकिन आपके प्रमुख सरोकार कौन-कौन से हैं़?

प्रमुख सरोकार है मनुष्य। उसका दुख-सुख, उसकी समस्याएँ। आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्थाएँ। शोषण-मुक्त, भेदभाव रहित समाज-स्थापन के लिए संघर्ष।

8. सामाजिक परिवर्तन के लिए सृजनकर्मियों की भूमिका को आप किस रूप में देखते हैं?

सृजनकर्मी प्रभावी ढंग से सामाजिक-राजनीतिक चेतना उत्पन्न कर सकते हैं। कलाकृतियाँ पाठक-दर्शक को आकर्षित करने में अधिक सक्षम होती हैं। तात्कालिक प्रभाव की दृष्टि से भाषण या उपदेश की अपनी उपयोगिता है; किन्तु जन-मानस पर स्थायी प्रभाव कलाकृतियाँ ही अंकित करती हैं। रचनाकार कला की अवहेलना नहीं करता; यद्यपि प्रमुखता-प्राथमिकता अन्तर्वस्तु को, विचारों को, भावों को ही देता है।

9. आपके समकालीनों में आपकी पसंद?

मुझे प्रगतिशील विचारधारा वाले रचनाकार ही पसन्द हैं।

10. विदेष के किन-किन साहित्यकारों से आपकी मैत्री है?

सोवियत-संघ, चीन, जर्मनी, दक्षिण कोरिया, जापान, न्यूज़ीलेण्ड और चेकोस्लोवेकिया के हिन्दी-साहित्य प्रेमियों से सम्पर्क में आया; किन्तु सर्वाधिक निकटता मात्र चेकोस्लोवेकिया के
डा. ओडोलेन स्मेकल से रही।

यह एक संयोग मात्र है कि सर्वप्रथम किसी विदेशी विद्वान/लेखक से यदि परिचय हुआ तो वह डा. ओडोलेन स्मेकल से।

उनसे प्रथम सम्पर्क भी अपने में विशिष्ट रहा। भारत में प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पत्रिकाएँ विदेशों में भी जाती हैं। साहित्यिक पत्रिकाओं में नये प्रकाशनों की समीक्षाएँ प्रकाशित होती हैं; जिनमें लेखक का पता तो नहीं, प्रकशक का पता रहता है। डा. स्मेकल ने किसी पत्रिका, सम्भवतः ‘नया पथ’ (लखनऊ) में मेरे रेखाचित्र/लघुकथा संग्रह ‘लड़खड़ाते क़दम’ की समीक्षा देखी-पढ़ी होगी। ‘लड़खड़ाते क़दम’ के प्रकाशक ‘स्वरूप ब्रदर्स’, खजूरी बाज़ार, इंदौर के माध्यम से उन्होंने मुझसे सम्पर्क किया; पत्र भेजा। ग़नीमत है, प्रकाशक ने यह पत्र मेरे पते पर, पुनर्निर्देशित कर दिया। यों
डा. स्मेकल से मेरा परिचय हुआ और पत्राचार शुरू हुआ। यह परिचय आश्चर्यजनक था; सुखद था।

(देखें -‘साहित्यकारों से आत्मीय संबंध’ (संस्मरण - ‘मित्र डॉ. ओडोलन स्मेकल’ / पृ. 68)

डॉ. ओडोलन स्मेकल और मेरे संबंधों पर, ‘जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय’ के हिन्दी-प्रोफ़ेसर डॉ. सुधांशु जी का वक्तव्य दृष्टव्य है :

‘‘महेंद्रभटनागर जी के नाम से मैं लम्बे समय से परिचित हूँ। मुझे याद है कि 1959 में ‘हिन्दी-भवन’ में; जब वह ‘कनाट प्लेस’ में ‘रीगल सिनेमा’ के सामने बनी बैरकों के किसी कक्ष में था, चेकोस्लोवेकिया के विद्वान, हिन्दी-कवि, हिन्दी-प्रोफ़ेसर डॉ. ओडोनल स्मेकल ( जो आगे चलकर भारत में चेकोस्लोवेकिया के राजदूत बने) के सम्मान में आयोजित गोष्ठी में, उन्होंने अपने वक्तव्य में महेंद्रभटनागर की किसी कविता की पंक्तियाँ सुनाई थीं।

1959 में एक विदेशी के मुख से महेंद्रभटनागर जी की कविता का उल्लेख मेरे मानस में बस गया था। कह सकता हूँ कि तब से अर्थात 55 वर्षों से उन्हें कवि के रूप में जानता हूँ।’’

(देखें - ‘महेन्द्रभटनागर की कविता : अन्तर्वस्तु और अभिव्यक्ति’ में प्रकाशित डॉ. सुधांशु जी का आलेख।)

दक्षिण कोरिया के एक शोधार्थी के पी-एच. डी. हिन्दी शोध-प्रबन्ध का मैं परीक्षक रहा।

न्यूज़ीलेण्ड की अंग्रेज़ी-विदुषी लेखिका Dr. Patricia Prime ने मेरी काव्य-कृतियों की समीक्षाएँ लिखीं; जो मेरे काव्य-कर्तृत्व पर प्रकाशित सम्पादित समीक्षा ग्रंथों में भी समाविष्ट हैं।

जापानी में, मेरी कविताओं के अनुवाद श्रीमती पूर्णिमा राय के एक मित्र ने किये; जो उनकी जापानी-फ्रेंच द्वि-भाषिक पत्रिका में प्रकाशित हैं। एक अंक मेरे पास सुरक्षित है।

विदेशी साहित्यिक मित्रों के कुछ पत्र मेरे संस्मरण-ग्रंथ ‘साहित्यकारों से आत्मीय संबंध’ में शामिल हैं। यथा - ए. चेलिशेव, प. अ. बारान्निकोव, स्वेतलाना त्रिबुन्निकोवा आदि।

फ्रेंच में 108 कविताओं के अनुवाद भारतीय फ्रेंच-प्रोफ़ेसर श्रीमती पूणिमा राय ने किये; जो पुस्तकाकार प्रकाशित हैं।

11, अंग्रेज़ी-काव्यानुवाद और काव्य-रचना के प्रति आपके आकर्षण और प्रवृत्त होने का रहस्य क्या है? प्रकाष डालें।

अंग्रेज़ी भाषा से संबंध बचपन से ही रहा; क्योंकि अंग्रेज़ी शिक्षण-अध्ययन की माध्यम रही। मैट्रिक, इंटरमीडिएट, बी.ए., एल.टी. आदि परीक्षाओं का माध्यम अंग्रेज़ी रही। माध्यम ही नहीं, पाठ्य-क्रम का एक विषय भी अंग्रेज़ी रहा।

बी.ए. में अंग्रेज़ी-साहित्य विषय ऐच्छिक था; किन्तु सामान्य अंग्रेज़ी अनिवार्य। सामान्य अंग्रेज़ी के पाठ्य-क्रम में अंग्रेज़ी-साहित्य की कृतियाँ भी निर्धारित थीं। यथा - बर्नार्ड शॉ का नाटक ‘आर्म्स एण्ड द मैन’, चार्ल्स डिकन्स का उपन्यास ‘ए टेल ऑफ़ टू सिटीज़’, राजनीतिक ‘वादों’ पर निबन्ध-संग्रह आदि।

‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग’ के ‘विशारद’ पाठ्य-क्रम में मेरा एक ऐच्छिक विषय अंग्रेज़ी-साहित्य भी था। तब अंग्रेज़ी-कविता के अध्ययन का अवसर मिला। ‘गोल्डन ट्रेज़री’ नामक प्रसिद्ध काव्य-संकलन पाठ्य-क्रम में निर्धारित था। शेक्सपीयर के विश्व-विख्यात नाटक ‘जूलियस सीज़र’ का अध्ययन भी तब इसी कारण किया। ‘जूलियस सीज़र’ के संवादों ने मुझे बड़ा प्रभावित किया। उनसे शेक्सपीयर के मन-मस्तिष्क की गहराई व ऊँचाई का बोध हुआ। ‘ए टेल ऑफ़ टू सिटीज़’ से तत्कालीन यूरोपीय जन-जीवन की झलक पा सका।

इन दिनों रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविताएँ भी अंग्रेज़ी में पढ़ीं।

भूगोल, अर्थशास्त्र, शिक्षा-शास्त्र आदि सभी पाठ्य-विषयों का माध्यम अंग्रेज़ी रही। अध्ययन-काल के दौरान (सन् 1941 से 1945) जिस अंग्रेज़ी-साहित्य से वास्ता रहा; उसका प्रभाव आज भी बना हुआ है।

‘विक्टोरिया कॉलेज ग्वालियर’ में अंग्रेज़ी-विषय मुझे अंग्रेज़-प्राचार्यों ने ही पढ़ाया- श्री. बी.ए. इंग्लिश और श्री. एफ़. जी. पियर्स।

इस अवधि में, दैनिक समाचार-पत्र अंग्रेज़ी में ही पढ़ने को मिलते थे - ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ आदि।

जब-जब घर से बाहर रहना पड़ा, पिता जी को पत्र अंग्रेज़ी में ही लिखता था। पिता जी भाषा-त्रुटियाँ सुधार कर मेरे पत्र मुझे लौटा देते थे। मेरे अल्प अंग्रेज़ी-भाषा-ज्ञान पर नाराज़ होते थे।

घर-परिवार की आर्थिक दशा शोचनीय होने के कारण, बी.ए. उपाधि प्राप्त करने के बाद (सन् 1945) नौकरी करनी पड़ी। हाई स्कूल में भूगोल - हिन्दी अध्यापक बना। तदुपरान्त इंटरमीडिएट कॉलेज में हिन्दी-व्याख्याता (सन् 1950)।

जिन विद्यालयों-महाविद्यालयों में कार्यरत रहा; वहाँ के अंग्रेज़ी-अध्यापकों से मेरे संबंध-विशेष सहज व घनिष्ठ रहे। अंग्रेज़ी की पत्रिकाएँ भी देखता-पढ़ता था। कलकत्ता से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका ‘मॉडर्न रिव्यू’ का नियमित पाठक था। इस प्रकार, अंग्रेज़ी भाषा और साहित्य से निरन्तर जुड़ा रहा।

12. आप शोध-निर्देशक रहे और आज भी हैं; इस दिशा में, आपके क्या अनुभव रहे? हिन्दी और अंग्रेज़ी में, आपके साहित्य पर जो शोध हुआ है; उससे आप कहाँ तक संतुष्ट हैं?

महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में कार्यरत रहने के कारण शोध-दिशा में भी सक्रिय रहना पड़ा। वस्तुतः शोध मेरा क्षेत्र नहीं। शोध-विषयक मेरे अनुभव कड़वे हैं। अधिकांश छात्र-शोधार्थी ही नहीं; महाविद्यालयों के व्याख्याता तक नक़ल कर रहे हैं। मेरे साहित्य पर अधिक शोध-प्रबन्ध तो नहीं लिखे गये। लेकिन जो लिखे गये; उनमें से अधिकांश स्तरीय हैं। शोध-कार्य में वांछित विस्तार और गहराई की अपेक्षा तो ज़रूर बनी रहेगी। हिन्दी में मेरे साहित्य पर लिखे शोध-प्रबन्धों में, मा़त्र चार शोध-ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं। अंग्रेज़ी में एक शोध-प्रबन्ध प्रकाशनाधीन है। (शोधार्थी Dr. Karthikeyan Rama Krishnan, Lecturer, PACR Polytechnic College, Rajapalayam (TN)

13. भविष्य की योजनाएँ क्या हैं?

नयी योजनाएँ फ़िलहाल नहीं। इन दिनों अपने को समेट रहा हूँ। 90 पार कर चुका हूँ।

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