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रोचक आलेख - कंडा कथा - डॉ. सुरेन्द्र वर्मा


  एक ज़माने में गोबर को दीवालों पर थाप कर उपले बनाए जाते थे और उन्हें जलाऊ लकड़ी के साथ ईंधन की तरह इस्तेमाल किया जाता था। पर जब से गैस का इस्तेमाल शुरू हुआ है, कंडों की बड़ी बेइज्ज़ती हो गई। उन्हें अब कोई नहीं पूछता। लेकिन किन्हीं ख़ास मौकों पर उनकी ज़रूरत आज भी पड़ ही जाती है। कई ऐसी चीजें हैं जो कंडे की आंच पर ही सेकी जाती हैं। बैगन को कंडे की आंच पर भूनिए। फिर खाइए। क्या कहने हैं !  दूध को कंडे की आंच पर पकने दीजिए। स्वाद न बढ़ जाए तो कहिएगा। पर अब कंडे हैं कहाँ, और अगर हों भी तो लाएं कहाँ से जाएं ? एक समय था दूकानों पर जलाऊ लकड़ी और कंडे के ढेर लगे रहते थे। गिनती से बेंचे जाते थे। एक रूपए के पचास, सौ तक, मिल जाते थे। अब बड़ी मुश्किल हो गई है। बाज़ार में किसी दूकान पर तो कंडे मिलने से रहे। बड़े बड़े माँलों में भी आपको ऊपले तो नदारद ही मिलेंगे। सच तो यह है, उपले हों तो मिलें।

    हमारे शास्त्रों में केवल गाय ही नहीं, गाय का हर ‘उत्पाद’ पवित्र माना गया है। बीमारियों को दफा करने के लिए लोग गो-मूत्र दवा की तरह पी तक जाते हैं। और गोबर का तो कहना ही क्या है ? यह गाय का मल (विष्ठा) ज़रूर है लेकिन यह मैला नहीं करता बल्कि मैली जगह साफ़ करने के लिए इसे लीपा जाता हैं। वो कहावत है न, ज़हर ज़हर को मारता है। इसी के समानांतर, शायद मैल मैल को मारता है।

   यह गोबर ही सूख कर कंडा बन जाता है। कंडों को दीवार पर थापते देखना अपने आप में एक दिलचस्प और रोमांचक अनुभव हुआ करता था। इधर किसी गाय या भैस ने गोबर किया नहीं कि कंडे थापने-वालियां उसे झट उठाकर दीवाल पर चिपका देती थीं। दीवाल गोबर की थापों से भर जाती थी। दूसरे-तीसरे दिन सूख कर कंडे तैयार हो जाते थे। उन्हें बेंच दीजिए या खुद उनका ईंधन की तरह इस्तेमाल कर लीजिए।

     बाज़ार में आजकल कंडे ढूँढे नहीं मिलते। लेकिन ये ऑनलाइन बेशक मिल सकते हैं। इंटरनेट के जरिए आपको क्या नहीं मिल सकता ? मोबाइल मिलेगा, टीवी मिलेगा, वस्त्र मिलेंगे; दुनिया का कोई ऐसा सामान नहीं है जो यहाँ न मिलता हो। फिर भला कंडे ही क्यों रह जाएं ? पूजा करनी है, हवन होना है. ऊपले चाहिए। अपनी पसंद-दीदा साइट अमेज़न पर जाइए। सर्च में “काउ डंक केक” लिखिए। लीजिए हाज़िर हैं ऊपले। किस प्रकार के चाहिए ? गोबर के कंडे या आर्गेनिक-ऊपले ? हाथ की थाप वाले कंडे या मशीन से तैयार गोल गोल ऊपले ? हो सकता है इनकी कीमत आपको थोड़ी ज्यादह अदा करनी पड़ जाए, लेकिन आपको इन्हें पास के बाज़ार में ढूँढ़ने की ज़हमत नहीं उठाने पड़ेगी। घर बैठे आपको पहुंचा दिए जाएंगे और पैकिंग भी इतनी बढ़िया होगी कि आप देखते रह जाएं।

ऑन-लाइन बाज़ार दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है। आपको पूजा करनी है। पूजा के स्थान को लीपना है। लीपने के लिए कहाँ मिलेगा गोबर आपको ? पहले गाय-भैसें बाज़ार में स्वच्छंद घूमा-फिरा करती थीं। खाती, घूमती थीं तो, ज़ाहिर है, गोबर भी कर ही देतीं थीं। आसानी से मिल जाता था। अब गोबर की तो बात ही जाने दीजिए, घूमती फिरती गाय भी नही दिखाई देती। ऐसे में क्या करे? ज़रुरत के हिसाब से सौ ग्राम, पांच-सौ ग्राम या एक किलो-ग्राम गोबर का एक पैक ऑन-लाइन बुक करा दीजिए। काम लायक गोबर आपको घर बैठे प्राप्त हो जाएगा। पर इसे प्राप्त करने के लिए आप कहीं “गोबर” मत लिख बैठिएगा, ‘काउ-डंक’ ही अंकित कीजिएगा। हो सकता है त्यौहार के मौसम में फेस्टिवल सेल के नाम पर आपको कुछ अन्य आकर्षक प्रस्तावों के साथ गोबर में छूट भी मिल जाए। गाय के अन्य ‘उत्पादों’ के साथ साथ गोबर भी आपको किफायती दाम पर मिल सकता है।

    खरीदने वाले हर चीज़ खरीद लेते हैं। आप तो बस खरीदारी की शौकीन किसी महिला के कान में कह भर दीजिए, “और तो और अब तो कंडे भी ऑनलाइन बिकने लगे हैं”, फिर देखिए, ज़रूरत हो या न हो, कंडों के लिए ऑन-लाइन ऑडर न चला जाए तो आश्चर्य होगा। एक बार इंग्लेंड में एक व्यापारी को थोड़ी मसखरी सूझी। उसने विज्ञापन दिया की हमारे साईट पर आज से दो रोज़ तक सिर्फ गोबर के पैक ही किफायती दाम पर मिलेंगे। स्टाक सीमित है, जल्दी कीजए। फिर क्या था। देखते देखते उसके सारे के सारे गोबर-पैक हाथों-हाथ बिक गए।
    सूचनार्थ निवेदन है, कंडे भी ऑनलाइन बिक रहे हैं।

    • डा. सुरेन्द्र वर्मा
१०, एच आई जी
१, सर्कुलर रोड , इलाहाबाद -२११००१
   

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