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समाजार्थिक यथार्थ के कवि डॉ. महेंद्र भटनागर से कुछ प्रश्न // शिवा सहाय

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वार्तालाप एवं आत्म-कथ्य  // महेन्द्रभटनागर

समाजार्थिक यथार्थ के कवि

डॉ. महेंद्रभटनागर से कुछ प्रश्न

शिवा सहाय

कविता लिखने की प्रेरणा कैसे-कब हुई? अपने प्रारम्भिक काव्य-लोक पर प्रकाश डालें।

सर्वप्रथम कविता के प्रति आकर्षण उत्पन्न हुआ। कविता से परिचय सबसे पहले घर में हुआ - बहुत-कुछ घर के सांस्कृतिक वातावरण के फलस्वरूप। माता जी-पिता जी द्वारा ‘रामचरित मानस’ / वैदिक ऋचाओं का गान / पाठ करने, तीज-त्योहारों एवं विशिष्ट अवसरों पर घर-पड़ोस की महिलाओं द्वारा गायन करने, यहाँ-तक कि मुहल्ले में जब-तब किसी फ़कीर / साधु के गाते हुए गुज़रने पर - मेरी काव्य / गायन चेतना जाग उठती थी। सब काम छोड़कर मैं संगीत-गान की तरफ़ खिँच जाता था। तदुपरांत पाठशाला / विद्यालय में साहित्य / काव्य के अध्ययन ने मेरे मन में कविता के प्रति रुचि ही उत्पन्न नहीं की, काव्य-संस्कार भी दिये। और जब बृहत् समाज से जुड़ा तो नगर के साहित्यिक परिवेश ने प्रभावित किया। कवि-सम्मेलनों / मुशायरों को सुनने में ख़ूब आनन्द आता था। आसपास के सामाजिक जीवन और प्राकृतिक दृश्यों ने भी कोई कम प्रभावित-आकर्षित नहीं किया।

छात्र-जीवन से ही तुकबंदी करने लग गया था। इस कालावधि की रचनाएँ अनुपलब्ध हैं। मैट्रिक परीक्षा उ­त्तीर्ण करने के बाद, उच्च अध्ययन-हेतु, ‘विक्टोरिया कॉलेज’ में प्रवेश लिया (जुलाई 1941)। अपने सहपाठी अनेक युवा साहित्यकारों के सम्पर्क में फिर, ‘महेंद्र’ नाम से लिखने लगा। ‘महेंद्रभटनागर’ नाम से सर्वप्रथम कविता ‘हंस’ में प्रकाशित हुई (1948)। इस नाम का भी एक क़िस्सा है! ख़ैर।

सर्वप्रथम मेरी कविता (‘सुख-दुख’ / ‘विहान’ में संकलित) ‘विक्टोरिया कॉलेज मैगज़ीन’ में ही छपी। वस्तुतः मेरी सर्वप्रथम प्रकाशित कविता ‘हुंकार’ (‘टूटती शृंखलाएँ’ में संकलित) है, जिसे ‘विशाल भारत’ (कलकत्ता / मार्च 1944) में उस समय के यशस्वी सम्पादक श्री. मोहन सिंह सेंगर जी ने स्थान दिया। उपलब्ध कविताओं में प्रथम रचना नवम्बर 1941 में तारों पर लिखा एक गीत है, जो ‘तारों के गीत’ में संकलित है। मेरे क्रमशः प्रथम प्रकाशित (सन् 1949) दो कविता-संग्रह ‘तारों के गीत’ और ‘टूटती शृंखलाएँ’ हैं।

साहित्य-सर्जन से सम्बद्ध आपकी विचार-धारा क्या है?

वस्तुतः साहित्य-रचना किसी विशिष्ट विचार-धारा को ध्यान में रखकर प्रारम्भ नहीं की। जीवन और जगत में जो देखा, जो अनुभव किया वही साहित्य में व्यक्त किया। मेरे विचारों और अन्य विभिन्न विचार-धाराओं में कुछ साम्य हो सकता है। मैंने तो कभी विधिवत् धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक विचारकों के जीवन और उनकी विचार-धाराओं का ज्ञान प्राप्त नहीं किया। मेरे चिन्तन का जो वाम पक्ष है, वह पुस्तकीय नहीं। मेरा अधिकांश जीवन बड़ी ग़रीबी में बीता। न अच्छा खा सका, न पहन सका। न घूम-फिर सका, न उच्च अध्ययन करने के लिए कहीं दाख़िला ले सका। बी. ए. (1945) करते ही 60/- प्रति माह की मास्टरी करनी पड़ी। रहने को अति-साधरण आवास पा सका। अधिकांश जीवन बड़ी मशक़्क़्त से जी लेने के बाद, अपने और अपने परिवार के लिए जीवन की कुछ बुनियादी ज़रूरतें मुहैया करा सका। आज भी इतना क्षम नहीं हूँ कि अचानक गंभीर रोग हो जाने पर, अपना या अपने परिजनों का आधुनिक सुविधा-सम्पन्न अस्पतालों में आसानी से उपचार करवा सकूँ। विदेश जा सकना तो मात्र सपना है। सर्वत्रा धन-लोलुप राजनीतिक नेताओं, अतिभ्रष्ट-गंदे धर्माचार्यों और निकृष्ट स्तर के पूँजीपतियों को ऐश करते देखता हूँ। ऐसे माहौल में मेरी विचार-धारा यदि तथाकथित वाम विचार-धारा का भी अतिक्रमण करे (उसका विकास करे) तो इसमें आश्चर्य क्या? आलोचक यदि ऐलान करते हैं,ं ‘साम्यवादी’ हूँ तो इसमें परेशानी क्या? मतभेद क्या? जीवन की धुरी आर्थिक है। अर्थ का अधिकाधिक सम-विभाजन हो। श्रम का शोषण कदापि न हो। आदमी को इतना मजबूर न किया जाय कि वह बेइंसाफ़ियों को झेलते जानवर बन जाए (द्रष्टव्य मेरी ‘आग्रह’ शीर्षक कविता)। जनता की सामूहिक शक्ति ही दुनिया को बदल सकती है।

जीवन-दृष्टि पर प्रकाश डालिए।

सार्थक दिशा में ‘चरैवेति .... चरैवेति’। सार्थकता-विवेक - अन्तर्रात्मा की आवाज़।

सर्वाधिक महत्वपूर्ण जीवन-मूल्य - सहनशीलता, परोपकार, पर-दुख-कातरता, विनम्रता, कार्य में आस्था, अहं-त्याग, क्रोध-त्याग, लघुता की महत्ता का ज्ञान, बार-बार उद्देश्य / लक्ष्य च्युत होने पर भी हर बार प्रयत्नशील रहना, ग़लतियों और कमज़ोरियों से हताश न होना, पराजय से नव-शक्ति की प्राप्ति, आदर्श के प्रति निष्ठा, मृत्यु-भय से मुक्त, कष्ट-सहन-अभ्यासी, बौद्धिकता और वैज्ञानिकता - निर्णायक तत्व, मस्तिष्क के द्वार खुले रहें, शोषण-विषमता रहित समाज-रचना के लिए सक्रिय, विश्व-बंधुत्व (‘वसुधैवकुटुम्बकम्’)......

आदमी की पशुता-क्रूरता दूर हो - इसके लिए सामूहिक प्रयत्न करना, पर आदमी पर भरोसा रखना। दृष्टिकोण सदा सकारात्मक। अच्छे भविष्य के प्रति विश्वास कम न हो ......

आप लब्धप्रतिष्ठ प्रगतिवादी-जनवादी कवि हैं। वाम साहित्यान्दोलन को आपके लेखन से बल मिला है। 50-60 के दशक में आप सर्वाधिक चर्चित रहे। कुछ आलोचकों ने आपको प्रगतिवाद के द्वितीय उत्थान (नवप्रगतिवाद) का केन्द्रीय कवि माना है। अनेक प्रगतिशील साहित्यकारों से आपके घनिष्ठ संबंध रहे। यथा - राहुल सांकृत्यायन, शिवमंगलसिंह ‘सुमन’, रामविलास शर्मा, रांगेय राघव, शिवदानसिंह चौहान, प्रकाशचंद्र गुप्त, अमृतराय, त्रिलोचन, मुक्तिबोध, शिवकुमार मिश्र, कर्णसिंह चौहान, रवि रंजन आदि (द्रष्टव्य आपकी कृति ‘साहित्यकारों से आत्मीय संबंध’। इस सबके बावज़ूद, आपकी कविता का मूल्यांकन जैसा होना चाहिए था, नहीं हुआ। अन्य प्रगतिवादी कवियों की तुलना में आप पर्याप्त अनदेखे क्यों और कैसे रह गये

इसका उत्तर मैं क्या दे सकता हॅूँ!

शायद, इसका प्रमुख कारण, बाहर न निकलने का मेरा स्वभाव है। यात्राएँ, निकट की भी, करता नहीं। अधिकतर मजबूरी में ही, दुखी मन से , ब-मुश्किल कहीं जाता हूँ। साहित्यिक कार्यक्रमों और विशिष्ट अधिवेशनों में भाग नहीं लेता। स्थानीय आयोजनों तक में नहीं। स्वयं को पुरस्कृत-सम्मानित किये जाने वाले कार्यक्रमों तक में, स्वीकृति देकर भी, उपस्थित नहीं होता। पीएच. डी. / डी. लिट. के परीक्षार्थियों की मौखिकी लेने देश के अनेक विश्वविद्यालय बुलाते हैं, हवाई-यात्रा तक की अनुमति देते हैं, लेकिन नहीं जाता। कवि-सम्मेलनों और साहित्यिक गोष्ठियों में भाग लेने को मन नहीं करता। यह-सब जानबूझ कर मैं नहीं करता। इच्छा ही नहीं होती। मित्र डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय जी ने अपने एक पत्रा में मुझे लिखा भी - ‘‘आपने अनुभव किया होगा कि आपके अलग-थलग रहने से आपकी ओर समुचित ध्यान नहीं दिया गया। सो, कामरेड, अब इस कमी को पूरा कीजिए।’’

अन्य कारण मेरी कृतियों की अनुपलब्ध्ता हो सकता है। जिन प्रकाश्ाकों का व्यावसायिक-व्यापारिक तंत्र देश-विदेश में दूर-दूर तक फैला हुआ है, वहाँ से मेरी काव्य-कृतियाँ प्रकाशित नहीं हुईं। इस कारण उनका समुचित प्रचार-प्रसार सम्भव नहीं हो सका। पुस्तक-विक्रेताओं के पास मेरी कृतियाँ मिलती नहीं। चूँकि नये संस्करण प्रकाशित नहीं हो पा रहे, एतदर्थ प्रकाशकों के यहाँ भी वे अनुपलब्ध हैं। इस संदर्भ में, देश के विश्वविद्यालयों में कार्य-रत अनेक शोधार्थियों और उनके निर्देशकों के पत्र प्रायः आते हैं। वैसे मेरे काव्य-कर्तृत्व पर स्तरीय आलोचकों द्वारा बहुत-कुछ लिखा गया है, जो अनेक सम्पादित आलोचना-पुस्तकों में समाविष्ट है। स्वतंत्र आलोचना-कृतियाँ और अनेक शोध-प्रबन्ध भी उपलब्ध हैं। कुछ के नाम तो आप उद्धृत कर ही सकते हैं। यथा :

अध्ययन

(1) महेन्द्रभटनागर की काव्य-संवेदना : अन्तःअनुशासनीय आकलन / 2009 / डॉ. वीरेंद्र सिंह

(2) कवि महेन्द्रभटनागर का रचना-कर्म / 2002 / डॉ. किरणशंकर प्रसाद

(3) डॉ. महेन्द्रभटनागर की काव्य-साधना / 2005 / ममता मिश्रा

(4) महेंद्रभटनागर का काव्य-लोक / 2015 / वंशीधर सिंह

सम्पादित

(5) महेंद्रभटनागर की कविता : संवेदना और सर्जना / 2015 /

सं. डॉ. पाण्डेय शशिभूषण ‘शीतांशु’

(6) महेंद्रभटनागर की कविता : अन्तर्वस्तु और अभिव्यक्ति / 2015 / सं. डॉ. मनोज मोक्षेन्द्र

(7) कवि महेन्द्रभटनागर की रचना-धर्मिता / 2013 / सं. डॉ. कौशलनाथ उपाध्याय

(8) महेन्द्रभटनागर की काव्य-यात्रा / 2012 / सं. डॉ. रामसजन पाण्डेय

(9) डॉ. महेन्द्रभटनागर का कवि-व्यक्तित्व / 2005 / सं. डॉ. रवि रंजन

(10) सामाजिक चेतना के शिल्पी : कवि महेंद्रभटनागर / 1997 / डॉ. हरिचरण शर्मा

(11) कवि महेन्द्रभटनागर का रचना-संसार / 1980 / सं. डॉ. विनयमोहन शर्मा

(12) कवि महेन्द्रभटनागर : सृजन और मूल्यांकन / 1970 / सं. डॉ. दुर्गाप्रसाद झाला

शोध-प्रबन्ध / प्रकाशित

(13) महेन्द्रभटनागर और उनकी सर्जनशीलता / 1995 / डॉ. विनीता मानेकर

(14) प्रगतिवादी कवि महेन्द्रभटनागर : अनुभूति और अभिव्यक्ति / 2005 /

डॉ. माधुरी शुक्ला

(15) महेन्द्रभटनागर के काव्य का वैचारिक एवं संवेदनात्मक धरातल / 2009 /

डॉ. रजत कुमार षड़ंगी

अनेक उच्चकोटि के लब्ध-प्रतिष्ठ आलोचकों की कृतियों में, साहित्येतिहासों में, अनेक शोध-प्रबन्धें में भी मेरे साहित्यिक अवदान का उल्लेख मिलता है। माना, तमाम ऐसी कृतियाँ हैं, जिनमें उल्लेख होना चाहिए था, नहीं हुआ। ज़ाहिर है, इसके कारण, जानकारी का अभाव और मेरे साहित्य का उपलब्ध न होना है। मानता हूँ, व्यक्तिगत कारणों से भी, ऐसा करने वाले होते हैं। यह एक सर्वदेशीय-सर्वकालिक बात है। वस्तुतः, रचनाकार को इस-सब की चिन्ता करनी ही नहीं चाहिए। जिस लेखन में सार होगा, वह जीवित रहेगा। प्रचार से क्षणिक यश भले ही मिल जाए। काल सबसे बड़ा निर्णायक तत्व है। काल के चलने में साहित्य जब छनता है तो थोथा उड़ जाता है।

आप द्वि-भाषिक (हिन्दी और अंग्रेज़ी) कवि हैं। ‘इंडियन इंग्लिश पोइट्री’ में भी आपका नाम है / स्थान है। ‘पोइटक्रिट’ और ‘इंडियन जनरल ऑफ़ पोस्ट कोलोनियल लिटिरेचर्स’ जैसी अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं के आप सलाहकार हैं। विश्वविद्यालयों के अंग्रेज़ी-विभागों में भी आपके काव्य पर शोध-कार्य हुआ है, हो रहा है। अंग्रेज़ी में भी आपका विपुल काव्य-साहित्य पुस्तकाकार प्रकाशित है। ‘कॉनटेमपोरेरी वाइब्ज़’, ‘कोहिनूर’ आदि पत्रिकाओं के मुख-पृष्ठों पर आप के चित्र छपे हैं। इंटरनेट की विश्व-विख्यात वेबसाइटों में आपकी रचनाएँ प्रमुखता से प्रकाशित होती हैं। इंटरव्यू छपते हैं। अंग्रेज़ी में आपके काव्य-साहित्य पर जो आलोचनात्मक आलेख लिखे गये हैं, वे भी पुस्तकाकार प्रकाशित हैं। पाठकों को इस सब की कुछ जानकारी यदि देंगे तो उनकी जिज्ञासा कम हो सकेगी।

हाँ, अंग्रेज़ी में भी मैंने लिखा है। अंग्रेज़ी का अधिकांश काव्य-साहित्य हिन्दी से अनूदित है। अनुवाद मेरे अतिरिक्त, अंग्रेज़ी के विद्वानों ने किये हैं, जिनमें अधिकांश प्रोफ़ेसर हैं। इन अनुवाद-प्रारूपों में मैंने पर्याप्त संशोधन किये हैं। भावों और विचारों की दृष्टि से, अनुवादों को यथासम्भव मूल के अनुरूप बनाने की कोशिश की है। मेरे द्वारा विरचित अंग्रेज़ी-साहित्य की कुछ जानकारी इस प्रकार है :

अंग्रेज़ी में ग्यारह संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। यथा -

[1] Forty Poems of Mahendra Bhatnagar [2] After The Forty Poems

[3] Exuberance and other poems

[4] Dr. Mahendra Bhatnagar's Poetry

[5] Death-Perception : Life-Perception [6] Poems : For A Better World [7] Passion and Compassion

[8] Lyric-Lute [9] A Handful of Light

[10] New Enlightened World

[11] Dawn to Dusk

विषयानुसार पाँच एन्थोलोजी पृथक से प्रकाशित हैं :

[1] POEMS : FOR HUMAN DIGNITY

[Poems of social harmony & humanism : Progressive Poems.]

[2] LIFE : AS IT IS

[Poems of faith & optimism : delight & pain. Philosophy of life.]

[3] O, MOON, MY SWEET-HEARET! [Love poems]

[4] SPARROW and other poems [Nature Poems]

[5] DEATH and LIFE [Poems on Death-perception : Life-perception ]

अंग्रेज़ी में प्रकाशित आलोचना-साहित्य और शोध इस प्रकार है :

[1] Living Through Challenges : A Study of Dr.Mahendra Bhatnagar's Poetry /

By Dr. B.C. Dwivedy.

[2] Poet Dr. Mahendra Bhatnagar : His Mind And Art (In Eng. & French) /

Ed. Dr. S.C. Dwivedi & Dr. Shubha Dwivedi

[3] Concerns and Creation

[A Critical Study of Mahendra Bhatnagar's Poetry /

Ed. Dr. R. K. Bhushan

[4] Dr. Mahendra Bhatnagar's Poetry : In The Eyes Of Critics

[e-book.] /

By Kedar Nath Sharma

[5] Death and Life : Criticism /

Ed. Dr. D. C. Chambial

[6] Poet Mahendra Bhatnagar : Realistic and Visionary Aspects /

Ed. Dr. Vijay Kumar Roy

[7] Post-Independence Voice For Social Harmony and Humanism :

A Study of Selected Poems of Mahendra Bhatnagar / Thesis /

By Dr. Rama Krishnan Karthikeyan

आपने ‘समस्यामूलक उपन्यासकार प्रेमचंद’ शोध-प्रबन्ध/ आलोचना-कृति, ‘प्रकाश-स्तम्भ’ (अद्यतन तृतीय संस्करण) नाट्य-कृति और ‘जीवन का सच’ (अद्यतन तृतीय संस्करण) लघुकथाएँ लिखीं, जो प्रसिद्ध हैं। इन विधाओं पर आगे क्यों नहीं लिखा?

‘समस्यामूलक उपन्यासकार प्रेमचंद’ 1957 में प्रकाशित हुआ। इसमें उपन्यासकार प्रेमचंद के दृष्टिकोण पर प्रमुख रूप से विमर्श है। ‘प्रेमचंद-समग्र’ (2015) भी पृथक से प्रकाशित है, जिसमें प्रेमचंद के विचारक, उपन्यासकार और कहानीकार रूपों पर लिखा गया है। शोधपरक आलोचनात्मक लेख और भी लिखे हैं, जो ‘महेंद्रभटनागर-समग्र’ के खंड 4 और 5 में समाविष्ट हैं। मेरे द्वारा लिखित आलोचना-साहित्य भी विपुल है, जो समय-समय पर पुस्तकाकार प्रकाशित होता रहा। यथा - ‘आधुनिक साहित्य और कला’, ‘विजय-पर्व’ : एक अध्ययन’, ‘दिव्या : विचार और कला’, ‘नाटककार हरिकृष्ण ‘प्रेमी’ और ‘संवत्-प्रवर्तन’, ‘पुण्य-पर्व’ एक अध्ययन’, ‘हिन्दी कथा-साहित्य : विविध आयाम’, और ‘नाट्य-सिद्धान्त और हिन्दी नाटक’। मेरा सम्पूर्ण आलोचना-साहित्य ‘समग्र’ खंड 4 और 5 में उपलब्ध है। इधर की लिखी समीक्षाएँ निकट भविष्य में पुस्तकाकार प्रकाशित होंगी।

नाट्य-विधा के अन्तर्गत कुछ रेडियो-फ़ीचर लिखे, जो आकाशवाणी-केन्द्रों से प्रसारित हुए, आज भी प्रसारित होते रहते हैं। हरिकृष्ण ‘प्रेमी’ लिखित ‘संवत्-प्रवर्तन’ के पर्याप्त प्रकाशन-पूर्व, ‘गण-नायक विक्रम’ एक एकांकी लिखा, जो अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ। इसमें विक्रमादित्य को गण-नायक बताया गया है और ‘विक्रम संवत्’ के प्रचलन पर ंअपना मन्तव्य प्रस्तुत किया है। हाँ, एकांकी-लेखन में मेरी रुचि नहीं रही।

लघुकथाएँ भी लिखीं। ‘लड़खड़ाते क़दम’ तो ‘मध्य-भारत कला-परिषद्’ द्वारा पुरस्कृत (1952) भी हुई। लघुकथाओं का समग्र-संकलन ‘जीवन का सच’ अभिधान से इन दिनों उपलब्ध है। लेकिन, लघुकथा-लेखन में भी मेरी रुचि नही रही

आपने बाल-साहित्य भी लिखा है। बाल-साहित्य-लेखन के अनुभव बताइए।

बाल-साहित्य की मेरी पाँच पुस्तिकाएँ प्रकाशित हैं। ये ख़ूब बिकीं और पसंद की गयीं। बच्चों अथवा अ-हिन्दी भाषी छात्रों की कक्षाओं के पाठ्य-क्रमों में निर्धारित भी हुईं। अच्छी रॉयल्टी मिली! मैंने शौक़िया बाल-साहित्य लिखा ज़रूर, किन्तु बाल-साहित्य-लेखन भी मेरे लिए इतना प्रेरक नहीं रहा।

‘देश-देश की बातें’ ‘राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई। इसका द्वितीय संस्करण ‘देश-देश की कहानी’ अभिधान से ‘पीताम्बर पब्लिशिंग कम्पनी, नई दिल्ली’ से प्रकाशित हुआ।

‘बच्चों के रूपक’ के दो संस्करण ‘साहित्य प्रकाशन मंदिर, ग्वालियर’ से निकले। अगले दो संस्करण ‘स्वार्थी दैत्य एवं अन्य रूपक’ अभिधान से ‘अम्बर प्रकाशन, नई दिल्ली’ (‘पीताम्बर पब्लिशिंग कम्पनी’) ने छापे। ‘आकाशवाणी’ केन्द्रों ने इन रूपकों को प्रसारित किया।

‘जय-यात्रा’ (आलेख) के दो संस्करण ‘रवीन्द्र प्रकाशन, ग्वालियर’ ने प्रकाशित किये।

‘दादी की कहानियाँ’ ‘प्रसाद बुक ट्रस्ट, आगरा से छपी।

‘हँस-हँस गाने गाएँ हम!’ (बाल-काव्य)े कविता-संग्रह ‘साहित्य प्रकाशन मंदिर, ग्वालियर’ से प्रकाशित हुआ। संकलन की कविताएँ ‘आकाशवाणी’ केन्द्रों के बालकों के कार्यक्रमों में ख़ूब प्रसारित हुईं।

इन कृतियों के नये संस्करण निकलने हैं। अब बाल-साहित्य की पुस्तिकाओं का मुद्रण-स्वरूप पर्याप्त बदल गया है। जहाँ-तक इन पुस्तिकाओं की विषय-सामग्री का संबंध है, इनकी विषय-वस्तु आज भी प्रासंगिक है और आगे भी प्रासंगिक बनी रहेगी।

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