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गांधी जयंती विशेष आलेख - लो स्टेटस // हनुमान मुक्त


गांधी जी ने कहा था कि हम स्वस्थ सांस्कृतिक प्रभावों के लिए अपने दरवाजे खिड़की खुले रखें, पर अपनी बुनियाद पर कायम रहें। मैंने गांधी जी की ‘पर’ से पहले की बात को पूरी तरह आत्मसात कर लिया है और ‘पर’ के बाद भी बाद का अर्थ नहीं समझ पाने के कारण उस पर गौर करना ठीक नहीं समझा।


बुनियाद क्या होती है, मैं नहीं जानता और ना ही मुझे इससे कोई विशेष मतलब ही है। मैं नित नया टीवी और अखबारों से सीखता हूँ। मार्केट में कौन सा पेस्ट आ रहा है जो मेरे दांतों को मोती जैसा चमकाएगा, मुंह की दुर्गंध हटाएगा और मसूड़ों को सुरक्षित रखेगा। यह विज्ञापन में आने वाले डॉक्टर साहब मुझे बताते हैं।


सुन्दर सी छरहरे बदन वाली गोरी युवती मुझे यह बताती है कि मुझे कौन सा साबुन उपयोग करना है। कौन सा साबुन मुझे पसीने की बदबू से बचाएगा, शरीर को तरोताजा रखेगा। कीटाणुओं से रक्षा करेगा। मुझे साबुन से ज्यादा विज्ञापन देखना पसंद है। विज्ञापन में आने वाली युवतियों की मनमोहक अदाएं बरबस ही मुझे उनकी बात मानने पर मजबूर कर देती है। यह सब मानना स्वस्थ सांस्कृतिक प्रभाव के लिए आवश्यक है।


जब भी मैं कोई विज्ञापन देखता हूँ, पूरी तरह से अपने दिमाग के खिड़की-दरवाजे खोल देता हूँ। दिमाग में पहले से भरे हुए बासी ज्ञान को मैं अपने नए सामान्यज्ञान पर हावी होने नहीं देता। कभी-कभी मेरा दिमाग नए ज्ञान का थोड़ा बहुत प्रतिवाद करता है तो मेरी पत्नी और मेरा बेटा मुझे ऐसी गलती करने से रोक देते हैं। वे कहते हैं कि अपने दकियानूसी विचारों से घर का माहौल खराब नहीं करूं।
मैं तुरन्त अपने में सुधार कर लेता हूं और दिल और दिमाग के दरवाजे पूरी तरह खोल देता हूं। इससे दिमाग के साथ-साथ घर में भी ताजी हवा का प्रवेश हो जाता है। जिसका परिणाम होता है वातावरण में हमेशा ताजगी बने रहना।

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शरीर को पवित्र बनाए रखने के लिए गंगाजल से बना साबुन भी मार्केट में उपलब्ध है। यह साबुन बनाने का कारखाना गंगा नदी से कितनी कोस दूर है, इसमें गंगाजल कैसे मिश्रित हुआ, यह सब जानने की बिना जहमत उठाए, मैं अपने शरीर को भी गाहे-बगाहे, गंगाजल से पवित्र करता रहता हूँ।
मैं उन लोगों में से नहीं हूं और जो हर खाद्य पदार्थ से, हर पेय से, धुंआ देने वाले पदार्थों सहित हर ऐसी वस्तु से, अपने आपको अलग रखते हैं, जिन्हें स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बताया जाता है। मैं ‘मात्र स्वास्थ्य’ को प्राप्त करने के लिए स्वयं को इन सबके आनन्द से वंचित रखना मूर्खता समझता हूँ।

मुझे क्या करना है, इसके लिए मैं अपने दिमाग पर जोर नहीं डालता। मेरा मानना है कि इतने अनुसंधान करने के बाद जिस वस्तु को तैयार किया गया है, निश्चित रूप से वह उपभोग के लिए है, आनन्द के लिए है। मैंने पूरी तरह बौद्धिक दासता को स्वीकार कर लिया है। जैसा मुझे विज्ञापन बताते हैं उसे हूबहू स्वीकार कर लेता हूँ। टीवी पर आने वाले सीरियलों के पात्र कैसे कपड़े पहन रहे हैं, घर की सजावट कैसी है, रात को पार्टियों में क्या होता है। किस ब्राण्ड की कौनसी चीज इस्तेमाल करते हैं। यह सब देखकर ही मेरे घर की खरीददारी होती है। अनुकरण की संस्कृति से जितना फायदा उतना किसी में नहीं। जितना दिमाग लगाना था, उतना वे लोग लगाते थे। हम बेवकूफ नहीं हैं जो अपना दिमाग खपाएं।

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इस सबका परिणाम है कि मुझे और मेरे परिवार को मॉडर्न समझा जाना। मैं अपनी सोसायटी में मॉर्डन समझा जाता हूँ। मैंने अपने नाते-रिश्तेदारों के यहां जो मेरे स्टेटस के नहीं है, लो स्टेटस के हैं, के घर जाना बंद कर दिया है। उनमें सोसायटी के बैठने के, रहने के, खाने-पीने के एडिकेट्स नहीं है। उनके दिमाग के दरवाजे बंद हैं। कुछ भी नया ग्रहण करना नहीं चाहते।
मेरी दादी कहती है, मैं अपनी बुनियाद भूल गया हूं। अपनी पहचान भूलता जा रहा हूं। कहीं ऐसा ना हो कि मैं इस छद्म आधुनिकता की अंधी दौड़ में दौड़ता हुआ स्वयं को समाप्त कर लूं।

 

हनुमान मुक्त

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