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2 अक्तूबर गांधी जयंती विशेष - बापू के नाम एक खुला खत // हनुमान मुक्त

मेरे प्रिय बापू,

आपको यहां से सिधारे 60-65 वर्ष हो गए हैं। वे सभी लोग जो जनता के सेवक होने का दम भरते हैं वे आपको भुना-भुना कर खा रहे हैं। जैसे आदमी नहीं हुए कोई पापड़, मूँगफली या भुट्टे हो।

इतने सालों से खाते हुए भी उनका पेट नहीं भरा। मेरे माथे पर जनता का सेवक होने का दाग अभी तक नहीं लगा है, मैंने काफी कोशिश की, कि यह कलंक मेरे माथे पर भी लग जाए लेकिन इसको लगाने के लिए जितने पापड़ बेले, वे सब कम पड़ गए।

एक बार यार दोस्तों को बुलाकर मैं पापड़ बेलने की कोशिश कर रहा था। तभी वे लोग जिन पर पहले से ही सांसद, विधायक, मंत्री, नेता होने का कलंक लगा हुआ था। मुझे ऐसा करते देख भौचक्के रह गए। आपस में कहने लगे। जब यह छदाम सा लेखक ही जनता का सेवक बन जाएगा तो हमें कौन पूछेगा? इसे पता नहीं कि पापड़ कैसे और किसके साथ बेलने होते हैं। इस प्रकार बात करते हुए वे मेरे पास आए और हमारे बेले थोड़े बहुत पापड़ों सहित हमें वहाँ से दूर फेंक दिया।

उसके बाद मैंने बापू के नाम को भुनाकर सेवक बनने की जुर्रत नहीं की। जनता के सेवकों ने आज तक गाँधी का मार्ग नहीं छोड़ा। उन्हें जो-जो  मार्ग पसंद है उन्होंने उन सबका नाम गांधी मार्ग रख दिया। इसी मार्ग पर शराब की दुकानें हैं, अन्य जुए-सट्टे का कारोबार भी इसी मार्ग पर अच्छे से हो रहा है।

एक बार मैंने उनसे कहा कि आप हमेशा गाँधी की बात करते हो, उनके मार्ग पर क्यों नहीं चलते? वे हंसकर बोले, ‘अंधे हो क्या? हम जिस रास्ते पर चलते है उसी का नाम तो गाँधी मार्ग है।’

मैं उनको देखता रह गया। तब मेरी समझ में आया कि उनके द्वारा आपके नाम की, मार्ग पर, पथ पर पट्टिका क्यों लगाई जाती है?

बापू जी, जैसे राम राज्य की आपने कल्पना की थी, आजकल देश में वह रामराज्य आ गया है। सब कुछ रामभरोसे हो रहा है। किसी को किसी की कोई चिन्ताफिक्र नहीं है। सबकी चिंता करने वाला राम है।

राम की चिड़िया, राम के खेत। खाओ री चिड़िया, भर-भर पेट। देशविदेश में से कोई भी आओ और भर पेट खाओ। इस प्रकार को नीति, नेताओं ने बना रखी है। जनता के सेवकों के पेट आपके राम राज्य के सिद्धान्तों की वजह से फूल कर मटके जैसे हो गए हैं, जिसका परिणाम यह हो रहा है कि उनके कुरतों का कपड़ा कम पड़ने लग गया है। इसकी पूर्ति के लिए उन्होंने जनता से यह दिया है कि हम जनता के सेवक हैं। गाँधीजी के सिद्धान्तों को मानना हमारा परम कर्त्तव्य है। उन्होंने कपड़े पहनना छोड़ दिया था, आप भी कपड़ा पहनना छोड़ दो।

आज कल जनता नंगे बदन रहती है और उनके हिस्से के कपड़ों से इनके कुर्तों की लम्बाई-चौड़ाई बढ़कर इनके पेट को ढॉपने के काम आ रही है।

आपने स्वदेशी की जो कल्पना की थी उसके लिए उन्होंने विदेशों में स्वेदश के काले धन को रखना शुरू कर दिया है। इनका मानना है कि इस काले धन को अपने देश में रखने से देश के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। बापूजी कहना था कि स्वदेशी अपनाओ। विदेशी नहीं। इसलिए इन्होंने विदेशों में भी स्वदेशी धन को ही अपनाने के लिए अपनी और आगामी पीढ़ियों का इन्तजाम करना शुरू कर दिया है।

देश विभाजन की त्रासदी आपने देखी थी, कितने सांप्रदायिक दंगे हुए। उस विभाजन में आपकी सहमति थी। अब भी नेता लोग उस ट्रेलर की यदा-कदा पुनरावृति करते ही रहते हैं। उनका मानना है कि इससे देश का हाजमा ठीक रहता है। कभीकभार ऐसा होते रहने से उन्हें बापूजी की याद भी आ जाती है।

वैसे तुमको पता होगा कि यहाँ पर हमने तुम्हें नोटों पर बैठा रखा है। तुम्हारी खोपड़ी को नोट के दोनों तरफ छाप रखा है। बीच में भी तुम्हे लाठी सहित खड़ा कर रखा है। जितने भी जायज, नाजायज श्रम होते है वे बिना तुम्हारी फोटो के नहीं होते, जब तक वर्करों को तुम्हारे दर्शन नहीं होते, तब तक क्या मजाल वे किसी काम में हाथ लगाएं। सब जगह तुम्हारी महिमा है। तुमको भुनाने में किसी तरह की पार्टीपोलिटिक्स नहीं है, सभी लोग तुमको भूनकर खाना चाहते है, खाते भी है। जिसके हाथ जो लगता है उसी को भून लेता है। एक दिन वे आपकी टोपी को भून रहे थे। मैंने कहा, ‘ऐसे टोपी को भूनोगे तो वह जल जाएगी। तुम्हारे काम नहीं आएगी। इसे तो बापू को ही वापिस लौटा दो।’

वे बोले, ‘टोपी की ही तो लड़ाई है। इसे नहीं भूनेंगे तो यह जायकेदार कैसे बनेगी। इसे तो हम भूनेगें भी और मसाला मिलाकर जायकेदार बनाकर खाएगें भी।’ मेरे बहुत मना करने के बावजूद वे उसे भुनाकर जायकेदार बनाकर उसका स्वाद ले रहे है।

बापू, आपके इस सार्वभौमिक बापू नाम का भी ‘पेटेन्ट’ करवा लिया है। लोग आपकी आत्मा, चश्मे और डण्डे का भी पेटेंट करवाना चाहते हैं। वे आपकी लंगोट के बारे में जानकारी करने आपके पास आने की बहुत दिनों से सोच रहे हैं, लेकिन उन्हें आपके पास आने का रास्ता नहीं मिल रहा है। वे जिस रास्ते से भी आपसे मिलने आते हैं, रास्ते में ही अटक जाते हैं। उन्हें कोई भी रास्ता आप तक आने का नहीं मिल रहा है। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि आत्मा अमर है, वह मरती नहीं है, सिर्फ चोला बदलती है। मेरी बापू आपसे एक रिक्वेस्ट है, कृपया तुम मुझे यह अवश्य बतला दो, कि आजकल तुम्हारी आत्मा के किस चोले में है। वह उन जन सेवकों को देखकर कैसा महसूस कर रही है। कितना तड़प रही है। अंधेर नगरी, चौपट राजा। टका सेर भाजी, टका सेर खाजा। का मंत्र सही मायनों में यहां अपनाया जा रहा है।

बापू तेरे जन्मदिन पर मेरा तुझे यही पैगाम है।

आपका एक भारतीय

हनुमान मुक्त

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