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कहानी // बाणासुर की अमराई // मिहिर

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बाणासुर की अमराई

(ओ हेनरी की कहानी "द सेल्फिश जायंट" से प्रेरित)

मिहिर

मथुरा से कोई पचास कोस दूर नन्दग्राम के पास से गुजरते हुए एक फाटक पड़ता है जिसे "बाणासुर की अमराई" के नाम से जाना जाता है। इसपर लगी एक तख्ती दूर से ही बरबस उधर से गुजरने वालों का ध्यान खींचती है। इसपर लिखा है -"बाणासुर की बावड़ी"। बावड़ी तो अब रही नहीं बस दीवारों-ईंटों के अवशेष-भर बचे हैं। आते जाते लोगों द्वारा उसपर चढ़ाए गए फूल और मालाएं इसे एक पवित्र स्थल का रूप प्रदान करतीं हैं। कहते हैं कि यहाँ बाणासुर ने एक बाग़ लगाया था जिसे 'बाणासुर की अमराई' कहा जाता था। बाग़ तो अब रहा नहीं प्रायः उजाड़ ही नज़र आता है।

पर किसी ज़माने में यह बाग़ फूलों और फलों से भरा हुआ करता था। चिड़ियायें चहचहाती थीं। कोयलें गीत गाती थीं और प्रवासी पक्षी भी सर्दियों में आकर यहां डेरा डाला करते थे। बाणासुर की बावड़ी में एक रहट भी था। इस रहट का पानी बाग़ के फल-फूलों को सींचने के भी काम आता और पास के तालाब को भी हरा-भरा रखता था।

गर्मियों में जब प्यास से आकुल पशु-पक्षी और ग्वाल-बाल वहां से गुजरते तो वे भी उसी तालाब के पानी से अपनी प्यास बुझाते थे। बच्चों का तो यह मनपसंद ठिकाना ही था। वे तालाब में उतरते, पेड़ों पर चढ़ते, बागों में झूलते और शाम होने तक वहीं बने रहते। जब आसपास के जंगलों से उनकी गायें शाम को वापिस आने लगतीं तो वे भी उनके साथ ही घर को लौटते। इस तरह कोसभर में फैला ये बाग़ हंसते मुस्कुराते बच्चों से सदा खिलखिलाता ही रहता।

2

स्थानीय परम्पराओं के अनुसार दिल्ली के बादशाह की फौज का एक दुर्रानी मनसबदार था - उलुग खाँ। वह इस बाग़ का भी मालिक था। वह बड़ा ज़ालिम था। उसकी क्रूरता और तुनकमिजाजी के चलते स्थानीय लोग उसे ही बाणासुर कहने लगे। यह नाम कब और कैसे पड़ गया इसका तो पता नहीं चलता पर शायद उसे भी इस नाम की जानकारी थी और वह भी इस नाम को सार्थक बनाये रखने में कोई कोताही नहीं बरतता था।

बादशाह ने जब उसे गढ़ समुंद का फौजदार बनाकर मेवाड़ भेजा था तो वह बारह बरसों तक अरावली की पहाड़ियों में किसी शत्रु का पीछा करता रहा था। इसलिए फौज की शाही सेवा से रुखसती के वक़्त बादशाह ने उसे स्थानीय जागीर देकर गुज़ारे के लिए इस बाग़ का मालिकाना हक सदा के लिए दे दिया। इस तरह बारह बरस बाद जब वह वापिस अपनी जागीर में पहुंचा तो बाकी का वक़्त चैन से गुज़ारना चाहता था। फौजी सेवाओं के बदले मिली इस जागीर पर उसे बड़ा नाज़ था। उसकी अपनी भी कोई औलाद न थी न बीवी और न कोई सगा सम्बन्धी ही था। लोगों से मिलना जुलना भी उसे कम पसन्द था। बच्चों के तो नाम से भी उसे नफरत थी। पर जब वह लौटकर अपने बाग़ में आया तो वहां बच्चों को खेलते देख उसके क्रोध की कोई सीमा न रही।

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"तुम सब यहाँ क्या कर रहे हो बदजात? " वह गुस्से से लाल आंखें कर वहीं से चिल्लाया,"किसने तुम्हें यहाँ आने दिया?"

उसकी कर्कश आवाज़ को सुन बच्चे डरकर भाग खड़े हुए। उसने फौरन बाग़ की देखरेख करने वाले माली को बुलाकर खूब डांटा और काम से निकाल दिया। अगले ही दिन राजमिस्त्री को बुलाकर फौरन एक ऊंची दीवार चुनने का हुक्म दिया। दीवार पूरी होने तक वह स्वयम भी उनके साथ खड़ा रहा और वहां से आने जाने वालों को धमकाता रहा। दीवार पूरी होने पर उसने एक पत्थर पर खुदवा दिया -

"यह उलुग खां का बाग़ है। यहां पर बिना इज़ाज़त आने जाने वालों को सख्त से सख्त सज़ा दी जाएगी।"

इतना ही नही, अगले दिन पूरे इलाके में मुनादी करवा दी कि यह बाग़ बादशाह ने उसे नज़र कर दिया है अतः आइंदा से कोई भी उधर पैर न रखे। अब जाकर उसके दिल को चैन मिला। और वह सुकून से अपने बाग़ के किनारे बनी हवेली में रहने लगा।

उलूग खां बात बात पर अपने नौकरों को भी बेरहमी से पीट दिया करता था। धीरे धीरे सब उसे छोड़कर चले गए। अब वह अकेला और भी चैन से अपनी हवेली में पड़ा रहता और दिन रात हुक्का गुड़गुड़ाते रहता। हुक्का भरने के लिए भी अब बस एक पुराना नौकर ही बचा था जो बहुत बूढ़ा होने के चलते कहीं जा नही सकता था अतः मालिक की लातें खाकर भी वहीं बना रहा।

3

उस दिन से बच्चों का बाग़ में आना जाना बंद हो गया। वे बस कभी कभी बाग़ के बाहर बनी किलेनुमा ऊंची दीवार तक आते और उसीका चक्कर मार लौट जाते।

साल बीता। गर्मियों में पूरे गांव में आम के बाग़ों में बौरें आईं। भँवरे उनपर मंडराने लगे। कोयलें पेड़ों पर गाने लगीं। आम के बौराने के गीत पूरे इलाके में रातभर गाये जाने लगे। पर बाणासुर के बाग़ में कोयल नहीं आई।

"ये आधी रात को कौन गा रहे हैं, ज़फ़र?" बाणासुर ने पूछा।

"हुज़ूर! ये आसपास के हिंदी हैं जो सोहर गा रहे हैं। आम पकने को हैं न, इसलिए।"

"पता नहीं ये लोग भी क्या क्या गाते रहते हैं? लेकिन ज़फ़र, मेरे बाग़ में कोयल क्यों नहीं बोलती?"

"पता नहीं। पर वो आपका बाग़ है शायद इसलिए नहीं गाती।"

ऋतु बदली। मौसम की पहली फुहार आयी। गांव की अमराइयाँ महक उठी। गीली मिट्टी की सौंधी महक और उसपर अधपके आमों की सुगंध से पूरा इलाका महकने लगा। पूरा गांव धानी चादर ओढ़ रखा था। पर बाणासुर के बाग़ में तो जैसे बूंदें बरसती ही न थी। बादल आते भी तो ऊपर ही ऊपर मंडरा कर निकल जाते। मोरों का नाच देखकर ग्वाल-बाल बड़े प्रसन्न होते पर अपने बाग़ के छिन जाने से वे बड़े दुखी थे। कातर निगाहों से किलेनुमा ऊंची दीवारों  को देख मन मसोस कर रह जाते।

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पूरे इलाके के बागों में झूले पड़ गए। औरतें कजरी गाती तीज मनाती और पूरा गांव सावन के आनन्द में डूबा रहता। किसानों के हल गीली मिट्टी में धंस पड़ते। खरीफ की फसलें बोई जाती और बाणासुर एक ऊंची टेकरी पर यह देख मन ही मन भुनभुनाता रहता। उसे वर्षा और कीचड़ बिल्कुल पसंद न था। टेकरी से जहां तक नज़र जाती, बाणासुर की अमराई नज़र आती, पर आम नही।

"ज़रा देख तो ज़फ़र! बाग़ के कोने में आवाज़ें आ रही हैं। कहीं किसी की गाय तो नही घुस आई। मारकर भगा देना।" बाणासुर चिल्लाया। ज़फ़र ने गायों को बाहर से ही हाँक दिया।

XXX

फिर शरद की रातें और पूनम का पीला चांद आसमान पर आया। गांवभर के खेतों में निराई-गुड़ाई चल रही थी पर बाणासुर के यहां तो अब भी फ़ाक़ा चल रहा था। न तो बाग़ में कहीं फूल खिले, न पेड़ों पर। उधर, धान और ज्वार की फसलों के कटने से खाली पड़े खेतों के किनारे नारंगी -लाल फूलों से सज गए थे। हर तरफ त्यौहार का सा मौसम हो गया। गांवभर में बैलों के सींग ओंगाये जाने लगे। और रातभर घर-आँगन को दीयों की रोशनी से सजाया जाने लगा।  ग्वाल-बाल  खेतों के किनारे बड़ी सी आग के पास बैठकर रात-रात गीत गाने लगे -

"अवध में आये राजा राम, कि घर घर सजने लगे"

पूरा गांव जगमगाने लगा पर बाणासुर के बाग़ में रोशनी का एक कतरा भी न था।

"ये शोर कैसा, ज़फ़र?"

"दीवाली है हुजूर। हिंदियों का त्योहार। खेतों की कटाई-मँड़ाई के बाद अब त्योहार मना रहे हैं।

"और ये राजा राम कौन हैं?"

"बहुत पुराने ज़माने में अवध के राजा थे। बहुत भले राजा थे। लोकबाग आज भी याद करते हैं।"

XXX

फिर अगहन-पूस का महीना आया। खेतों में पीले पड़े कद्दू और लौकियाँ जहां एक ओर बीते मौसम की निशानियां दे रहे थे वहीं दूसरी तरफ नए सिरे से हरियाली की चादरें तनीं थी। हरे गेंहुओं ने अपने हाथ उठा दिए थे। बाणासुर का बाग़ वैसा ही नीरस, जड़ बना रहा।

बसन्त फिर आया। पूरा गांव फागुन के गीतों में फिर एक बार महकने लगा। खेतों खलिहानों में रंग बिरंगे फूलों पर मंडराती रंग बिरंगी तितलियां और न जाने कितने ही रंगों के पक्षी पेड़ों पर बैठने लगे। लोगों ने पीले वस्त्र पहनकर एक दूसरे को खूब बधाइयां दीं। मीठा भात खाते ग्वाल-बालों के खिलते चेहरों को देख मौसम भी खूब खुश हो रहा था।

पर बाणासुर के यहां कोई न आया। न बसन्त, न पक्षी, न फूल। सब तरफ बस सुखी झाड़ियां, मकड़जाले और अमरबेलों क सिवा कुछ दीखता ही न था।

"अब तक बसन्त क्यों नहीं आया ज़फ़र?"

"बसन्त तो आकर कबका चला भी गया हुज़ूर।"

"पर वह मेरे बाग़ में क्यों नहीं आया?"

"यह आपका बाग़ है शायद इसीलिए।"

4

गर्मियों की झुलसती ऋतु में शिरीष और कुट्ज के फूलों से पूरा इलाका दमकता रहा। गेंहू की बालियां हरे से पीली और पीली से सुनहरी हो गईं। फिर एक बार खलिहानों में कटाई और मंडाई होने लगी। ग्वाल-बालों के झुंड तपती दुपहरी में दूर से किलेनुमा दीवारों के ऊपर छा रखे आम के पेड़ों को देखते और मन ही मन अफसोस भी करते। अभी वे उस अमराई में झूले झूल रहे होते। तालाब में नहा रहे होते। रहट पर ऊंघ रहे होते। पर जब से बाणासुर लौटा था, तब से वहां जाना दूभर हो गया था।

कोयलें फिर बागों अमराइयों में गाने लगीं। चौमास की बरखा की फुहारें तन और मन को भिगोने लगीं पर बाणासुर की अमराई तो जैसे ठूंठ की ठूंठ ही बनी रही।

XXX

एक रात बड़ी ज़ोर की बारिश हुई और वर्षा का जल पूरे गांव भर में फैल गया। जब राह न मिली तो वर्षाजल बाणासुर की दीवार का एक हिस्सा तोड़कर दो सालों में पहली बार उसके बाग़ में भर आया।

सुबह हरियल पक्षी के गाने की आवाज़ ठीक अपनी खिड़की के बाहर सुन बाणासुर उछलकर बिस्तर से खड़ा हो गया। बहुत समय हो गया जब से उसने अपने बाग़ में किसी के गाने की आवाज़ नहीं सुनी थी। यह आवाज़ उसे बहुत मीठी लगी। आखिर कुदरत उसपर मेहरबान हो ही गयी थी। उसने खिड़की को खोलकर देखा - बाहर का नज़ारा ही बदला हुआ था। महकते फूलों की एक सुंगध भरी ताज़ी हवा का झौंका उसके कमरे में प्रवेश कर गया। पहले तो उसने समझा कि शायद बादशाह की सवारी पक्की सड़क से गुजरी हो। हवा में वैसी ही इत्र की सी खुशबू थी जैसी सबसे आगे और पीछे के सवारों द्वारा बादशाहों की सवारी के साथ रास्तों पर उड़ेली जाती थी।

बाणासुर ने बाहर जाकर देखा तो छोटे छोटे फूल और पौधे अचानक उसके बाग़ में खिल गए थे। पेड़ मुस्कुरा रहे थे, फूल खिलखिला रहे थे और बुलबुलें गीत गा रहीं थीं। न जाने कितने ही रंगों के पक्षी, तरह तरह की आवाजें निकालते हुए, तरह तरह के रंगों वाले पंखों को फड़फड़ाते हुए उन डालों पर मंडरा रहे थे जिनपर छोटे छोटे ग्वाल-बाल कूद-फांद रहे थे। असल में दीवार के टूटे हुए हिस्से से होकर कई  बच्चे उसके बाग़ में घुस आए थे। वे बाग़ में नज़र आने वाले हर पेड़ पर मौजूद थे। डालों पर खेल रहे थे, तालाब में कमल गट्टे छांट रहे थे, रहट पर बैठे पैर झुलाते गा रहे थे, हंस रहे थे। उनके आने से ही अमराई महक उठी थी। आमों के पेड़ भी बौरा आये थे और उनके बौराने की सुगंध ही हवा में तैर रही थी।

कई महीनों बाद सुबह सुबह अपने बाग़ को इतना हरा भरा देख बाणासुर बेहद खुश था। उसे समझ आ गया था कि बाग़ों की असल रौनक तो उन बच्चों से थी। उन्हें वापिस पाकर तो बाग़ भी बाग बाग हो उठा था। अमराई का केवल एक कोना अब भी शांत था और पहले जैसा ही उजाड़ था। बाणासुर ने देखा कि एक नन्हा बालक अपने नन्हे हाथों से कदम्ब की उस ऊंची डाली को पकड़कर ऊपर चढ़ना चाह रहा था। वह किसी दूसरे ग्वाले के कांधे पर सवार था पर फिर भी उसका नन्हा हाथ उस डाली को छू नहीं पा रहा था। इसलिए वह उदास हो रहा था। उसके उदास होने से बाग़ का वो कोना भी उदास नज़र आ रहा था।

बाणासुर हवेली से उतरकर सीधे उसी तरफ को लपका। उसे देखते ही बच्चे भाग खड़े हुए। चिड़ियाएं दूर उड़ गयीं। फूल फिर से मुरझा गए और पशु-पक्षी भाग खड़े हुए। अमराई अगले ही पल पहली सी उजाड़ हो गयी। वह छोटा बालक गिर पड़ा था। उसके साथी उसे छोड़ भाग गए थे। वह 'दाऊ-दाऊ' और 'मैया मैया' की पुकार कर रोने लगा था। बाणासुर ने जैसे ही उसे हाथों में उठाया वह मुस्कुरा उठा और उसने दोनों हाथों से बाणासुर के चेहरे को प्यार से जकड़ लिया। बाणासुर एकदम निहाल हो गया। उसकी खुशी का कोई ठिकाना न रहा। पहली बार उसे किसी ने इस तरह प्यार किया था। उसकी आँखों मे आंसू आ गए थे।

उसने बालक को उठाकर ज्यों ही कदम्ब पर रखा, कदम्ब की डाली फूलों से भर उठी।

"तुम अब तक कहाँ थे नन्हे? मैंने पहले तुम्हें क्यों नहीं देखा? और तुम्हारे दोस्त कहाँ गए?"

"वे चले गए। पर मैं अभी उनको बुलाता हूँ।"

कहकर नन्हे ने अपनी कमर में बंधी बांसुरी निकाल कर एक सुरीली धुन छेड़ दी। सारे पशु-पक्षी, ग्वाल-बाल लौट आये। अमराई फिर महक उठी। बाणासुर खुशी से नाच उठा। दिनभर वह पूरे बाग़ में बच्चों संग खेलता रहा, नाचता गाता रहा। आज वह बहुत खुश था। उसने फौरन ज़फ़र को बुलाकर उस दीवार को गिरा देने का हुक्म सुनाया और फिर अपने नन्हे दोस्त को खोजने लगा। पर नन्हा उसे कहीं नजर नहीं आया। शायद वह चला गया था।

XXX

शाम हुई। ग्वालों की गायें पास के जंगलों से लौटकर घर को जाने लगीं। ग्वाल-बाल भी घर को लौटने लगे तो बाणासुर ने उन्हें दूसरे दिन फिर आने का निमंत्रण देकर अपने नन्हे मित्र के बारे मे जानना चाहा।

"तुम्हारा वो नन्हा दोस्त कहाँ गया?"

"पता नहीं।"

"अच्छा कोई बात नहीं। कल उसे ज़रूर साथ लाना।"

"पर हम में से कोई भी नहीं जानता कि वो कौन है। और हमें उसका घर भी नहीं पता।"

ग्वाले चले गए। पर बाणासुर अपने उस नन्हे दोस्त को न भूल सका। अपनी गर्दन पर लिपटे उसके नन्हे हाथ याद आते ही वह उससे मिलने को बेचैन हो जाता। नन्हा अगले दिन नहीं आया और न उसके अगले दिन। बाणासुर रोज उसकी राह देखता पर वो फिर कभी नही दिखा और न ही बाणासुर उसे कभी भूल सका।

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साल बीते। बाणासुर अब बहुत बूढ़ा हो चला। अब वह चलने फिरने में असमर्थ भी हो गया था इसलिए बाग़ में बैठा बच्चों को खेलते देखा करता था। ज़फ़र भी परलोक सिधार गया था। अब उसकी मदद को कोई भी न था।

एक दिन बाणासुर सुबह सुबह अपने रहट पर बैठा धूप सेकता हुआ बच्चों के आने का इंतज़ार कर रहा था कि तभी उसके कानों में बांसुरी की वही सुरीली धुन सुनाई पड़ी। उसने देखा कि बाग़ के उसी कदम्ब वाले कोने में जहाँ से ग्वालों की गायें वनों को जाती थी, वहां उसका नन्हा दोस्त कदम्ब की डाली पर बैठा बांसुरी बजा रहा है। बाणासुर मारे खुशी के दौड़ता, गिरता, पड़ता उधर जा पहुंचा।

नन्हे ने बांसुरी एक ओर रखकर साथ के ग्वाले से कहा -

"दाऊ, देखो तो उसे।"

"अरे नन्हे, ये तेरा मित्र है कितना बूढ़ा हो गया?"

बाणासुर ने दौड़कर उसे उठा लिया। गोद मे भरा। और ढेर सारा प्यार किया।

"इतने दिन क्यों नहीं आया?"

"अब आया हूँ न?"

"अब जाने नहीं दूंगा।"

"बिल्कुल। अब तुम मेरे साथ चलोगे। मेरे बाग़ में।"

"वो कहाँ है?"

"यहीं पास ही यमुना किनारे।"

उस दोपहर जब ग्वालों का झुंड बाग़ में खेलने आया तो बाणासुर को कदम्ब के तले गिरे हुए पाया। उसका पूरा शरीर कदम्ब के ताजे फूलों से सर से पांव तक ढंका हुआ था।

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इस कहानी के सभी पात्र, घटनाएं और स्थान लेखक की निजी कल्पना हैं। यह कथा मात्र ओ हेनरी की लिखी कहानी "द सेल्फिश जायंट" से प्रेरित है।

लेखक - मिहिर

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