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गजल संग्रह 'जख्म दिल के' से 13 ग़ज़लें // हरीश कुमार 'अमित'

harísh kumār 'amit'

ग़ज़ल


यह दुनिया बड़ी चालबाज़ है यारो,
सुनती कहाँ दिल की आवाज़ है यारो।

तोड़ दे चक्रव्यूह बेरहम दुनिया का,
मुश्किल मिलता ऐसा जांबाज़ है यारो।

बेशक है वह बेवफ़ा, पर कोई ऐसा कहे,
इस पर हमें बहुत एतराज़ है यारो।

फँसा ले जाल में अपने हर किसी को,
दिखे भोला-भाला, पर जालसाज़ है यारो।

होती है मुलाक़ात यूँ तो कई लोगों से,
मुश्किल मगर मिलता हमराज़ है यारो।


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ग़ज़ल


रहे मंज़िल की खोज में, किनारा नहीं मिला,
तलाश बस रह गई तलाश, सहारा नहीं मिला।

इस इन्तज़ार में कि कोई अपना मिल सके,
काट दी उम्र सारी, कोई हमारा नहीं मिला।

लुटा दें जिस पर अपना दिल, अपनी जान,
ऐसा कोई हमें अब तक प्यारा नहीं मिला।

करते हैं इन्तज़ार हर इक रोज़ हम मगर,
आज तक कोई ख़त हमें तुम्हारा नहीं मिला।

छानी है ख़ाक हमने न जाने कहाँ-कहाँ की,
लेकिन तुम जैसा कोई इन्सां दुबारा नहीं मिला।


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ग़ज़ल


फिर वही रोज़ के सिलसिले,
सामने खड़े मुश्किलों के किले.

नफ़रतों से भरे इस जहान में,
स्नेह का कोई फूल तो खिले.

उनसे मुलाक़ात का मतलब,
बस शिकवे-शिकायतें और गिले.

उसकी बातें ऐसी कँटीली,
दिल का हर इक कोना छिले.

मजबूरियाँ मिलीं इतनी सारी,
रखने पड़े अपने लब सिले.


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ग़ज़ल


रोता रहता है मेरा दिल चुपके-चुपके,
उसकी बातों से जाता छिल चुपके-चुपके.

कभी साँस ली ही थी दो घड़ी चैन की,
तभी आई कोई मुश्किल चुपके-चुपके.

इधर लगा रहा कानून जुटाने में सबूत,
उधर हुआ फ़रार क़ातिल चुपके-चुपके.

ज़माने का पहरा सख़्त है बहुत, फिर भी,
कभी तो आकर हमसे मिल चुपके-चुपके.

उसकी बातों के नश्तर हों इतने तीखे,
कैसे बन गया वह संगदिल चुपके-चुपके.


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ग़ज़ल


दिल मेरा डरता रहता है,
पल-पल मरता रहता है.

दिल में यादों का तूफाँ,
हरदम चलता रहता है.

उसकी चाहत का ख़याल,
मन में पलता रहता है.

चंद बातों का अफसोस,
दिल को खलता रहता है.

लम्हा-लम्हा टूटे कोई रिश्ता
बर्फ-सा गलता रहता है.

ख़ुद पाएगा चैन वो क्या,
जो दूजों को छलता रहता है.

अपनी ख़ुशियाँ क्या भोगेगा,
औरों से जो जलता रहता है.


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ग़ज़ल


घर के लिए दो वक़्त की रोटी कमाने को,
अपने लहू से सींचा मैंने आशियाने को,

आता नहीं है कोई इन दिनों हमारे यहाँ,
सजाते रहते हैं फिर भी मेहमानख़ाने को.

रुलाई आने लगती है, टपकने लगते हैं आँसू,
बड़ा मुश्किल लगे कहता कोई जब मुस्कुराने को.

पुराने वक़्तों के साए जब-जब घेर लेते हैं,
चाहता है दिल कोई पुराना गीत गाने को.

उसके अपनेपन से मिलने का राज़ है शायद,
कोई तो चाहिए होता है किस्से सुनने-सुनाने को.


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ग़ज़ल


तेरा ही बस अहसास है,
लगता तू हरदम पास है.

मुझसे तू रुठा बरसों से,
फिर भी तेरे आने की आस है.

समन्दर है फैला चारों तरफ़,
बुझती फिर भी नहीं प्यास है.

दूजों को लगे चाहे फटी कमीज़,
मेरे लिए लेकिन बड़ी ख़ास है.

लगता नहीं दिल अब दुनिया में,
रहे मुरझाया और उदास है.


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ग़ज़ल


तेरा ख़याल दिल से मेरे न जाए है,
हर वक़्त तेरा चेहरा ज़हन में मुस्कुराए है.

हो गई आदत अब तेरे दर्द सहने की,
इसी में अब मेरा दिल सुकून पाए है.

गुज़रे हुए वक़्तों के हंसीं-रंगीं नज़ारे,
उनको ही याद करके क़रार आए है.

अब तेरे सिवा याद हमें और कुछ नहीं,
दिन-रात दिल हमारा तेरे ही गीत गाए है.

आते-जाते मौसमों की कुछ ख़बर नहीं,
तेरी यादों का मौसम ही सिर्फ़ भाए है.


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ग़ज़ल


भुला पाना उसे नहीं मुमकिन,
याद आए वही हमें रात-दिन.

बेवफ़ा है बेशक वह चाहे जितना,
हमारे दिल से न जाएगा लेकिन.

है वो ज़िन्दगी का हिस्सा ज़रूरी,
जी नहीं पाएँगे हम उसके बिन.

ज़हर भी लगेगा अमृत की तरह,
अगर डस ले वो हमें बनके नागिन.

हों फ़ौलादी जब किसी के इरादे,
रहता नहीं तब कुछ नामुमकिन.


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ग़ज़ल


न जाने दिल का क़रार कहाँ गया,
हमारी ज़िन्दगी से प्यार कहाँ गया.

कुछ कदम ही साथ अपने वह चला,
फिर करके हमें बेक़रार कहाँ गया.

ज़िन्दगी की मुश्किलों ने छीनी नींद,
वह मीठी नींद का ख़ुमार कहाँ गया.

इस यक़ीं के बाद कि वह अपना नहीं रहा,
अपने दिलबर का इन्तज़ार कहाँ गया.

मेरे शहर में आने पर मिलता था ज़रूर,
न जाने मेरा दोस्त इस बार कहाँ गया.


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ग़ज़ल


लगता है हमको हर कोई पराया,
अपना कोई ज़िन्दगी में न आया.

बन गई ज़िन्दगी दर्द की दास्तान,
पड़ा है इस पर ग़मों का ही साया.

हो जाए तरबतर अश्कों से चेहरा,
याद में तेरी मैंने जब भी गीत गाया.

दिल धड़के है बस उसकी ख़ातिर,
पड़ी है इस पर जैसे उसकी ही छाया.

समझें सब उसे बड़ा ख़ुशमिजाज़,
लेकिन वह अक्सर दर्द से ही मुस्कुराया.


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ग़ज़ल


करते रहे किसी अपने की आस,
रही हरदम किसी सपने की आस.

रहे ढूँढते कोई हमदर्द, हमसफ़र,
सदा रही प्यार के पनपने की आस.

कड़ी मेहनतें भी रहीं बेअसर,
लगाए रहे किस्मत चमकने की आस.

बच्चा ग़रीब का देखो कितना मासूम,
लगाए बैठा घर में पैसे खनकने की आस.

पूरी तरह समझते नहीं शायद मुझे,
है जिन लोगों को मेरे बिकने की आस.


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ग़ज़ल


अपनी राह पे चलता चल,
ख़ुश्बू की तरह पिघलता चल.

जैसा आए वक़्त कोई,
उसी तरह तू ढलता चल.

ऐसा न हो हर दूजे दिन,
गिरगिट-सा रंग बदलता चल.

जग में जीना नहीं आसान,
बस अपने दिल को छलता चल.

दुनिया को करने रोशन,
सूरज-सा तू जलता चल.


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परिचय

नाम हरीश कुमार ‘अमित’

जन्म 1 मार्च, 1958 को दिल्ली में

शिक्षा बी.कॉम.; एम.ए.(हिन्दी);

पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

प्रकाशन 700 से अधिक रचनाएँ (कहानियाँ, कविताएँ/ग़ज़लें, व्यंग्य, लघुकथाएँ, बाल कहानियाँ/कविताएँ आदि) विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. एक कविता संग्रह 'अहसासों की परछाइयाँ', एक कहानी संग्रह 'खौलते पानी का भंवर', एक ग़ज़ल संग्रह 'ज़ख़्म दिल के', एक बाल कथा संग्रह 'ईमानदारी का स्वाद', एक विज्ञान उपन्यास 'दिल्ली से प्लूटो' तथा तीन बाल कविता संग्रह 'गुब्बारे जी', 'चाबी वाला बन्दर' व 'मम्मी-पापा की लड़ाई' प्रकाशित. एक कहानी संकलन, चार बाल कथा व दस बाल कविता संकलनों में रचनाएँ संकलित.

प्रसारण - लगभग 200 रचनाओं का आकाशवाणी से प्रसारण. इनमें स्वयं के लिखे दो नाटक तथा विभिन्न उपन्यासों से रुपान्तरित पाँच नाटक भी शामिल.

पुरस्कार-

(क) चिल्ड्रन्स बुक ट्रस्ट की बाल-साहित्य लेखक प्रतियोगिता 1994, 2001, 2009 व 2016 में कहानियाँ पुरस्कृत

(ख) 'जाह्नवी-टी.टी.' कहानी प्रतियोगिता, 1996 में कहानी पुरस्कृत

(ग) 'किरचें' नाटक पर साहित्य कला परिाद् (दिल्ली) का मोहन राकेश सम्मान 1997 में प्राप्त

(घ) 'केक' कहानी पर किताबघर प्रकाशन का आर्य स्मृति साहित्य सम्मान दिसम्बर 2002 में प्राप्त

(ड.) दिल्ली प्रेस की कहानी प्रतियोगिता 2002 में कहानी पुरस्कृत

(च) 'गुब्बारे जी' बाल कविता संग्रह भारतीय बाल व युवा कल्याण संस्थान, खण्डवा (म.प्र.) द्वारा पुरस्कृत

(छ) 'ईमानदारी का स्वाद' बाल कथा संग्रह की पांडुलिपि पर भारत सरकार का भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार, 2006 प्राप्त

(ज) 'कथादेश' लघुकथा प्रतियोगिता, 2015 में लघुकथा पुरस्कृत

(झ) 'राष्ट्रधर्म' की कहानी-व्यंग्य प्रतियोगिता, 2016 में व्यंग्य पुरस्कृत

सम्प्रति भारत सरकार में निदेशक के पद से सेवानिवृत्त

पता  - 304ए एम.एस.4ए केन्द्रीय विहार, सेक्टर 56ए गुरूग्राम-122011 (हरियाणा)

ई-मेल harishkumaramit@yahoo.co.in

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