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लघुकथा // रिश्तों के खरीदार // दीपक दीक्षित

dípak díkhchit

साक्षात्कार के अधिकतर सवाल अब भी रमन के दिमाग में घूम रहे थे। “हमारे इस प्रोडक्ट को तुम आज कितने लोगों को बेच सकते हो ? तुम्हारे कितने जानने वाले इसे इस्तेमाल करते हैं ?”

वो परेशान था, ये सोच कर कि उससे उसकी योग्यता या कार्य क्षेत्र से सम्बंधित प्रश्न तो गिने चुने ही पूछे गए थे। वे लोग शायद बस ये जानना चाहते थे कि उसके प्रभाव का दायरा कितना बड़ा था और उसमें से उनके उत्पाद के कितने खरीदार हो सकते थे। उनका बस चलता तो वो उसके फोन की कांटेक्ट लिस्ट और सोशल मीडिया की फॉलोअर की डाटा एनालिसिस कर डालते। या शायद की भी हो? कम्प्यूटर आधारित दुनिया में आजकल कुछ भी हो सकता है ।

पर रमन को अंदर से मालूम था कि सही मानों में जो लोग उसकी बात सुन कर ये उत्पाद खरीद लें ऐसे लोग तो उँगलियों पर गिनने लायक ही थे और उन में से अधिकतर को वह अपनी पिछली कंपनी के उत्पाद बेच भी चुका था। अगर ये काम उसे मिल गया तो उसे नए रिश्ते बनाने होंगे।

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उधर साक्षात्कार लेने वालों की जूरी का अध्यक्ष बोला ,"'लडके का सोशल सर्किल काफी बड़ा लगता है जिसमें हमारे बहुत से ग्राहक हो सकते है। काम का अनुभव भी ठीक ही है। कम से कम 1000 आर्डर तो ला ही देगा इस क्वार्टर में ले लेते हैं।" साथ बैठे दोनों अन्य लोगों ने सर हिला दिए।

उधर जिस एजेंट कि मार्फ़त वो यह साक्षात्कार देने गया था ,जब उसे उसकी नियुक्ति का पता लगा तो उसने सोच चलो मेरा कमिशन तो पक्का हो गया , दोनों तरफ से , बस ये लड़का टिका रहना चाहिए ६ महीने तक।

रिश्तों की इस खरीद फरोख्त से सब खुश थे।


दीपक दीक्षित

रुड़की विश्विद्यालय (अब आई आई टी रुड़की) से इंजीयरिंग की और २२ साल तक भारतीय सेना की ई.ऍम.ई. कोर में कार्य करने के बाद ले. कर्नल के रैंक से रिटायरमेंट लिया . चार निजी क्षेत्र की कंपनियों में भी कुछ समय के लिए काम किया।

पढने के शौक ने धीरे धीरे लिखने की आदत लगा दी । कुछ रचनायें ‘पराग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘अमर उजाला’, ‘नवनीत’ आदि पत्रिकाओं में छपी हैं।

भाल्व पब्लिशिंग, भोपाल द्वारा 2016 में "योग मत करो,योगी बनो' नामक पुस्तक तथा एक साँझा संकलन ‘हिंदी की दुनिया,दुनियां में हिंदी’ (मिलिंद प्रकाशन ,हैदराबाद) प्रकाशित हुयी है।

कादम्बिनी शिक्षा एवं समाज कल्याण सेवा समिति , भोपाल तथा नई लक्ष्य सोशल एवं एन्वायरोमेन्टल सोसाइटी द्वारा वर्ष २०१६ में 'साहित्य सेवा सम्मान' से सम्मानित किया गया।

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वर्ष 2009 से ‘मेरे घर आना जिंदगी​’ ​(http://meregharanajindagi.blogspot.in/ ​) ब्लॉग के माध्यम से लेख, कहानी , कविता का प्रकाशन। कई रचनाएँ प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं तथा वेबसाइट (प्रतिलिपि.कॉम, रचनाकार.ऑर्ग आदि) में प्रकाशित हुई हैं।

साहित्य के अनेकों संस्थान में सक्रिय सहभागिता है । राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कई गोष्ठियों में भाग लिया है। अंग्रेजी में भी कुछ पुस्तक और लेख प्रकाशित हुए हैं।

निवास : सिकंदराबाद (तेलंगाना)

सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन

संपर्क​ : coldeepakdixit@gmail.com

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