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हास्य - व्यंग्य // जूते किस्तों में // सुरेश खांडवेकर

सुरेश खांडवेकर

पहले के जमाने में कोई किसी से कर्जा लेता, तो चुपके से लेता था। बात कहीं ज्यादा न फैल जाये। बहुत देर बाद पता चलता था कि अमुक साहब ने अमुक साहब से कर्जा लिया है, इसीलिये देनदार उसके आगे पीछे घूमता रहता है।

लेकिन उसके बाद का भी एक दौर आया। बैंकों के मैनेजरों को रिश्वत देकर कर्जा लिया जाता था। ओवर ड्राफ्रट के चैक पास कर लिये जाते थे। ऐसी रिश्तेदारी बैंकों से तो आज भी है।

पहले कर्जदार दीन-हीन माना जाता था। दूसरा कर्जदार जो बैंक बाबू को चाय पिलाता रहता था उसे चतुर कर्जदार माना जाता था। लेकिन अब यह दौर कर्जा देनेवालों का है। बैंक, वित्तीय कम्पनियां अब घर-घर जाकर पूछती हैं, ‘कर्जा ले लो। थोड़ा बहुत ले लो।’ आपका रिकॉर्ड उसके पास है। बैंक जानता है कि आप कर्जदार होंगे भी तो डुबने वाले नहीं हो। इसलिये खुल्लम-खुल्ला भी कर्ज की बात नहीं करता। चुपके से आपके मोबाइल पर घंटी बजती है। आपके कान में मधुर कंठ में कॉलर बोलती है, ‘कम्पनी आपके व्यवहार को देखकर पांच से दस लाख का कर्जा आफर करती है।’

‘नहीं चाहिये।’

‘ले लो ना, आपको कारोबार नहीं बढ़ाना?’

‘कारोबार तो बढ़ाना है लेकिन आपकी सहायता के बिना।

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‘क्यों?’

‘क्योंकि आप कभी-कभी हद कर जाते हैं।’

‘क्यों क्या हुआ?’

‘कुछ नहीं हमारे कुछ कर्जदार भाईयों ने कार फायनेंस की थी। उनके एक-दो बार क्या चैक बाउंस हो गये। आपने पहलवान भेज कर, उनसे गाड़ी छीन ली।’

‘तो किस्त तो चुकानी चाहिये ना।’

‘चुकानी तो है, लेकिन नहीं है पैसा, कामकाज बिगड़ गया। तो फिर से कर्जा लूं। कारोबार को जमने में समय लगता है। आपने तो उसकी कार ही छीन ली। दूसरा, उसको बदनाम किया। अब ना वो समाज का रहा और ना कारोबार का।’

‘नहीं, नहीं अब और नहीं होगा ऐसा। कोर्ट ने भी कह दिया है कि कर्जदारों को सताने के काम न करो।’

‘तो अब क्या करेंगे?’

‘अब हम हसीनाओं को, सुन्दर बालाओं को आपके पास भेजेंगे और किश्त चुकाने के लिए आग्रह करेंगे। इस तरह हम आपके साथ प्यार से पेश आयेंगे।’

‘इससे क्या होगा?’

‘आपको हिम्मत मिलेगी और हमें ब्याज। तुम्हारा भी काम चलेगा और हमारा भी।’

बैंकों की सहायता से बहुत कुछ आसान हो गया है। किश्तों पर तो सब कुछ मिल रहा है। बल्कि आज का 20 प्रतिशत कारोबार तो किश्तों पर ही है। कार, टीवी, फ्रिज, जमीन, मकान, कम्प्यूटर, फैक्ट्रियां, मशीनें।

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किश्तों पर खरीददारी अब तो बहुत आसान हो गयी है। हर तरह के ग्राहक के लिए अब कुछ भी खरीदना आसान है। वैसे भी आप के टेलीफोन और मोबाईल पर रोज पांच-सात बार लड़कियों के फोन इसी तरह के आते ही रहते हैं।

ऽऽऽ

एक ग्राहक जूते की दुकान पर गया। उसने एक जोड़ी जूते पसंद किये और दुकान के मालिक से बोला, ‘‘भाई साहब, आजकल तो सब कुछ किस्तों पर मिल रहा है, तो आप क्या ये जूते किस्तों में बेचेंगे।’’

‘‘नहीं हम किस्तों पर जूते नहीं बेचते। उधार ले जाओ।’’

नहीं साहब, मैं तो किस्तों पर लेना चाहता हूं।

दुकानदार इस ग्राहक को कई बार देखता कि वह दुकान से गुजरता और एक जूते को निहारता। बार-बार आग्रह पर दुकानदार बोला, ‘‘अच्छा ठीक है, मैं आपकी समस्या समझ रहा हूं। कितनी किस्तों में जूते खरीदना चाहते हो?

‘दो’

‘जूता पसंद किया?

‘‘हां यह रहा 1500 रुपये का’’ शोकेस से जूता उठा लाया।

‘‘तो समझो हमने जूते किस्तों पर बेचना आज से शुरू कर दिया।’’

‘‘तो ये लीजिए 750 रुपये बाकी की रकम अगले माह के पहले सप्ताह में!

दुकानदार ने सेल्समैन का जूता पैक करने को कहा। जूता पैक हो गया।

दूसरे दिन ग्राहक परेशान होकर भागता हुआ आया। पूछने लगा, ‘सर आपने पहचाना मुझे, कल मैंने आपसे जूते किस्तों पर लिये थे?

‘बिल्कुल मैं कैसे भूल सकता हूं।’

‘लेकिन आपने तो एक ही जूता दिया डिब्बे में?

‘‘हां, मैं जानता हूं! आपने जूते की कीमत किस्तों में दी और मैंने आपको जूते किस्तों में!

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