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प्राची - सितम्बर 2018 - लघुकथा // खून का रिश्ता // डॉ. नीना छिब्बर

रोज की तरह सुबह नौ बजे जैसे ही कॉलेज जाने के लिए गली के मोड तक पहुँची कि आठ-नौ साल की लड़की मीनू जो अक्सर अपनी मंदबुद्धि माँ के साथ पिछले कई महीनों से घूम रही थी, नजर आ गयी। वैसे तो पिछली गली में ही उसका घर है पर दिन-ब-दिन माँ का व्यवहार बिगड़ रहा था। लोगों की दया का वो नाजायज फायदा उठाने लगी थी। अब छोटी बेटी भी उस के साथ-साथ असामान्य तरीके सीख रही थी।

मीनू भी स्कूल छोड़ माँ के साथ घूमने लगी थी। मां की तरह अपशब्द बोलना सीख चुकी थी। दुकानों से नमकीन बिस्कुट, फल माँग कर खाना दिनचर्या बन गई थी। कुछ लोग लज्जावश या कुछ पीछा छुड़ाने के लिए खाना या पैसे दे देते। मीनू के लिये गाली हथियार बन गई।

ऐसा ही व्यवहार मुझसे भी करने की कोशिश की थी। मैंने समझाने का प्रयास किया, पर वह डाँट खाकर ही भागी। इसीलिए आज जब वह अपनी बारह साल की बहन जो उस के स्वभाव के विपरीत थी, के साथ नजर आयी, मैंने दोनों को रोका और कहा, "देख, यह अभद्र गालियाँ देती है. पिटेगी किसी दिन।" अभी ऐसी कुछ और तीखी बातें जुबान पर थीं कि बड़ी बहन हाथ जोड़ कर बोली, "आँटी आज नहीं आज इसका हैप्पी वाला बर्डे है।"

मेरी आँखें दोनों पर टिक गईं... एक भयभीत, दूसरी कारुणिक। मेरे हाथ अपने आप आशीर्वाद के लिए उठे और मैंने पर्स में से चॉकलेट निकाल कर दी। थैंक्यू कह कर दोनों भागीं।

मेरे दिल में तीर सा लगा कि हम तथाकथित ज्ञानी, पढ़े-लिखे, सुसभ्य भी रिश्तों को इस तरह नहीं निभा सकते, जैसे यह निभा गई।

संपर्क : 17/653, चौपासनी हाऊसिंग बोर्र्ड,

जोधपुर-342008 (राजस्थान)

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