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प्राची - सितम्बर 2018 - व्यंग्य // रील तेरा रियल दीवाना // अमित शर्मा

कुछ वर्ष पूर्व मुझे सत्य को गले मिलने की खुजली सता रही थी। गुमशुदा की रिपोर्ट लिखवाने के बाद भी, मैं सत्य को जादू की झप्पी देने में नाकाम रहा था। थक और उसके बाद हारकर, मैं सत्य की खोज में घर-बार को लॉग-आउट करके एकांत में जाना चाहता था। एकांत के लिए गूगल मैप से झड़प करने से पहले ही टीवी रिमोट के जरिए कुछ रियलिटी शोज से मेरी मुठभेड़ हो गई और मुझे रियलिटी अर्थात सत्य का एड्रेस मिल गया। आज के समय में सत्य का झरना केवल रियलिटी शोज से ही बह रहा है। रील से रियल चूसने का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है।

रियलिटी शोज ने वास्तविकता का ठेका काफी अच्छी दरों पर गोद ले रखा है। रियलिटी शोज में भाग लेने वालों के इतिहास और भूगोल की जेसीबी से खोज के जरिए रियलिटी का डोज, टीआरपी की रस्सी के जरिए, गले के नीचे अपलोड करवाया जा रहा। रियलिटी शोज ने देश के कोने-कोने से प्रतिभाओं को अगवा कर, उन्हें राष्ट्रीय मंच पर मुख्यधारा के फव्वारे से नहला कर, उनका अच्छे से मेकअप करने का काम किया है।

रियलिटी शोज ने मेकअप करके कई प्रतिभाओं को संवारा है तो मेकअप के जरिए कई प्रतिभाओं के पैकअप का भी गृहप्रवेश करवाया है। नाच-गाना, खेल-कूद सभी तरह के रियलिटी शोज का बाजार, अफवाहों के बाजार से भी 5-10 सेंटीग्रेड गर्म लगता है। किसी भी रियलिटी शोज में रियलिटी या प्रतिभा हो या ना हो लेकिन जज का होना अत्यंत जरूरी होता है बिना जज के शो के किसी भी प्रतिभागी की प्रतिभा उसके रोमकूपों से छन कर बाहर नहीं आ पाती है। यहाँ ध्यान और आशीर्वाद देने की जरूरत है कि कोई भी रियलिटी शो, प्रतिभा के बिना पूर्ण हो सकता है लेकिन विज्ञापनों के रिचार्ज के बिना नहीं। प्रतिभाओं के बीजारोपण से लेकर उनकी कोपलें फूटने तक उनका लालन-पालन, बाजार के विज्ञापन पूरी शिद्दत से करते हैं। प्रतिभाओं को प्रोत्साहन का ‘ग्लूकोन डी’ देने के लिए पहले दर्शकों को आयोडीन वाले नमक का एड दिखाना जरूरी होता है।

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प्रतिभागी की प्रतिभा चाहे देश के किसी भी कोने से जब्त हुई हो, लेकिन उसे जुर्माना चुकाने के लिए मुम्बई का टिकट कटाना पड़ता है। जजों द्वारा रियलिटी शो में भाग लेने वाले प्रतियोगी को मुम्बई भगाने के लिए उनकी प्रतिभा का बीपी चेक किया जाता है। निर्णायकों के अनुसार किसी भी दमदार प्रतिभा का मुम्बई जाना उतना ही आवश्यक है जितना आवश्यक कोई एप डाऊनलोड/अपडेट करने के लिए गूगल प्लेस्टोर में जाना।

रियलिटी शोज में केवल उन्हीं लोगों को प्रतिभाशाली माना जाता है जिन पर शो के निर्णायक अपनी कृपा दृष्टि का छिड़काव कर देते हैं। रियलिटी शो का प्रतिभागी होने के लिए पहले अभागी किस्मत का होना ठीक उसी तरह अनिवार्य होता है जिस तरह से एयरपोर्ट पर इंग्लिश बोलना अनिवार्य है। प्रतिभागी की दुःख भरी कहानी ही शो में आगे चलकर उसके ग्लैमरस सुखों की स्क्रिप्ट लिखती है। किसी भी ऐसे सामान्य व्यक्ति का शो में भाग लेना वर्जित होता है जिसके पास अपना दुखड़ा सुनाने के लिए आंसू ना हो। वही प्रतिभागी, प्रतिभा से लबालब भरा होता है जो न केवल अपने आंसुओं का टैंकर भर पाए; बल्कि अपने आंसूओ के टैंकर से जजों के आंसूओं की टोंटी भी चालू कर दे।

रियलिटी शो में भावनाओं के अवैध खनन से नियामक संस्थाओं के द्वारा चैनल को ओढ़ाए गए लाइसेंस में कोई छेद नहीं होता है। भावनाओं के सतत दोहन से ही प्रतिभाओं के सेंसेक्स में बाउंस का प्राकट्य संभव है।

रियलिटी शो में हार-जीत के फैसले तक सुरक्षित यात्रा करने के लिए कई हफ्तों को हफ्ता देना पड़ता है। हर हफ्ते कोई ना कोई पार्टिसिपेंट, वोटिंग में पिछड़ जाने के कारण घर पहुँचने की रेस में बाकि पार्टिसिपेंट्स से आगे निकल जाता है। किसी पार्टिसिपेंट द्वारा शो छोड़कर जाने पर ऐसा माहौल बनाया जाता है, मानो शो से बाहर हो जाने के बाद उस पर दुःखों का पहाड़ भूस्खलन के जरिए टूटने वाला है। छोड़कर जाने वाले पार्टिसिपेंट का सामान और ढांढस बंधाने का काम चैनल्स और बाकी पार्टिसिपेंट्स द्वारा दत्तचित्त निचोड़ कर किया जाता है।

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जनता द्वारा अपने पसंदीदा पार्टिसिपेंट को वोट और समर्थन का काढ़ा पिलाकर उसकी ग्लैमर सोखने की क्षमता बढ़ाई जाती है। जनता द्वारा डाले गए वोट्स को चैनल्स द्वारा गुप्तरोग की तरह गोपनीय रखा जाता है।

रियलिटी से लोहा लेते-लेते आखिरकार जब टीआरपी, आईसीयू में भर्ती की कगार पर होती है, तब जाकर पहले से निर्धारित विजेता को पब्लिसिटी और इनाम राशि के हवाले किया जाता है। आज जहाँ चारों ओर झूठ का मजबूत ब्रॉडबैंड नेटवर्क नजर आ रहा है, वहीं सत्य और वास्तविकता अभी भी रियलिटी शोज के वाई-फाई से झूठ को नीम अर्क से भी कड़ी टक्कर देते हुए नजर आ रहे हैं।

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