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कहानी - * बेटी का पिता होना * - डॉ आर बी भण्डारकर.

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तीन लोग बेखटके घुस आते हैं कमरे में।

वातानुकूलित कमरा अंदर से बंद तो था पर दिन का समय होने से वह सिटकिनी से बंद  नहीं किया गया था।

बेटी अभी अभी सोई थी,पर मञ्जुल जी पूरी सजगता से बैठी थीं।

आकस्मिक रूप से तीन नव्यागतों को देखकर मञ्जुल जी पहले तो कुछ चौंकी पर सौजन्य -वश, बोली "आइये बैठिये।"

तीनों के सोफे पर बैठते ही मञ्जुल जी ने चलभाष से अपने पति को फोन किया ,जो अस्पताल में ही स्थित मेडीकल स्टोर से दवा लेने गए थे-

" कोई दो महिलाएँ जिनके साथ एक लड़का भी है अभी अभी आयी हैं।"

"मैं आ ही रहा हूँ।"

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सुमतिराय आये; देखते ही पहचान कर समधिन जी(बेटी की सास) के पैर छुए अन्य दो की तरफ इशारा कर  " नहीं पहचाना, कौन हैं?"

"यह मेरी देवरौतिन(देवर की लड़की) है और यह इनका देवर।"संकेत कर समधिन बताती हैं।

सुमतिराय दोनों के और मञ्जुलजी,जो कि अब तक तीनों से अपरिचित थीं,तीनों के पैर छूती हैं।

"समधी जी किधर हैं?"सुमतिराय द्वारा पूछे जाने पर समधिन बताती है कि वे नीचे आधार तल पर ही स्वागत कक्ष में बैठे हैं।

सुमतिराय नीचे जाकर अपने समधी जी(बेटी के श्वसुर) को ले आते हैं। दोनों कमरे के बाहर पड़ी हुई कुर्सियों पर बैठते हैं।

सामान्य बातचीत के बाद सुमतिराय चाय बुलवाते हैं; दोनों चाय पीते हैं पर सुमति का मन कुछ दिन पीछे चला जाता है।

सुमतिराय ने अपने समधी को फोन कर अवगत कराया कि आपकी समधिन(अपनी पत्नी) का कहना है बेटी के प्रसव के लिए डॉक्टर ने 20 सितम्बर संभावित तिथि बताई है।

"समधी जी, मेरा कस्बा तो बहुत छोटा है,यहाँ उतनी चिकित्सा सुविधाएं भी नहीं है। आप बड़े शहर में हैं इसलिए डिलीवरी वहीं कराना ठीक रहेगा।"

जिम्मेदारी से इस प्रकार पल्ला झाड़ लेने से सुमतिराय को थोड़ा झटका सा तो लगा पर वे उसी दिन 200 किमी दूर कार्यरत अपनी बेटी को लेने के लिए प्रस्थित हो लिए।

अगले दिन बेटी द्वारा मातृत्व अवकाश की कार्यवाही कराकर उसी दिन बेटी को अपने साथ अपने घर ले आये।

नियत तिथि को बेटी को एक प्रतिष्ठित अस्पताल में भर्ती करा दिया। उस दिन उनके दामाद जी भी आ गए।

22 तारीख को दोपहर में चिकित्सक ने अवगत कराया कि डिलीवरी के लिए शल्य चिकित्सा करनी ही पड़ेगी।

चिकिसक महोदया पूर्व परिचित होने से विश्वसनीय थीं अतः मञ्जुलजी ने बेटी-दामाद से परामर्श कर शल्य क्रिया की सहमति दे दी।

सुमतिराय ने चलभाष द्वारा यह सूचना तुरन्त ही अपने समधी साहब(बेटी के श्वसुर साहब)को दे दी; साथ ही अस्पताल का नाम ,पता,वार्ड का कक्ष क्रमांक भी बता दिया।

इसी सूचना के फलस्वरूप बेटी के सास -श्वसुर आये हुए हैं।

चाय खत्म हुई तो सुमतिराय ने पूछा, "आप लोग किस गाड़ी से आये,रास्ते में कोई दिक्कत तो नहीं हुई?"

"प्रतापगढ़ सुपरफास्ट से आया हूँ। आराम से आया हूँ। रास्ते में कोई दिक्कत नहीं हुई।"

" लेकिन समधी साहब,यह गाड़ी तो सवेरे 5 बजे ही आ जाती है। अब तो साढ़े ग्यारह बज रहे है;देर क्यों हो गयी।"

"यहाँ से 30 किमी दूर मेरी भतीजी की ससुराल है। आप तो जानते ही हैं ,मेरे कोई बेटी न होने से मैं उसे ही बेटी मानता हूँ;उसे ही लेने चला गया था।"

"अच्छा,अच्छा।"

इसी बीच समधिन जी बाहर आती हैं।समधी जी को इशारे से कुछ कहती हैं।

समधी जी-हाँ, हाँ, आप लोग कर लें;उसमें हमारी क्या आवश्यकता?

सुमतिराय आश्चर्य चकित हैं कि उनके समधी ने अभी तक एक भी बार बिटिया और नवजात की कुशल-क्षेम नही पूछी;अब यह लोग क्या करना चाह रहे हैं।

"क्या करना है समधी जी,समधिन जी क्या करने के लिए कह रहीं थीं?"

"अरे कुछ नहीं,वो बुआ अपने नवजात भतीजे को काजल लगाती है न,उसी के लिए कह रही थीं;इसीलिए हम अपनी बिटिया को लिवा लाये हैं।"

पुनः....

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"चलो चलो अंदर चलकर ही बात करते हैं।"

अंदर पहुँचते ही सुमतिराय कहते हैं - "समधी साहब ,बच्चे का जन्म कल रात 9 बजे हुआ है।अभी वह 15 घण्टे का ही हुआ है।शल्य क्रिया के कारण अभी जच्चा-बच्चा दोनों को संक्रमण से बचाना है अस्पताल वाले हम लोगों को भी सेनेटाइजर से हाथ पैर साफ करके ही अंदर आने देते हैं।ऐसे में काजल लगाने की प्रक्रिया से संक्रमण का डर है।...वैसे भी हमारे यहाँ तो काजल की रस्म छटे दिन सूर्य पूजा के समय की जाती है।...अभी रहने दें,तभी कर लेना यह रस्म।"

"अरे नहीं,आप समझे नहीं;यह तो रस्मोरिवाज़ हैं,इन्हें तो करना ही पड़ता है। काजल आँख में न लगाकर माथे पर एक किनारे पर लगा दिया जाएगा,औपचारिकता पूरी हो जाएगी।"

बेटी को इंजेक्शन लगाने,बच्चे को सम्हालने के लिए दो नर्सें कमरे में आईं तो उन्होंने बेटी को जगाया। उसे बैठने की मनाही थी।अस्तु  लेटी अवस्था में ही एक नर्स ने इंजेक्शन लगाया,दूसरी ने बच्चे की स्पनजिंग की।

एक नर्स-"आप लोगों ने यहाँ इतनी भीड़ क्यों लगा रखी है,सब लोग बाहर जाइये ,अंदर केवल एक व्यक्ति रहेगा।"

समधिन-"वो हमारे यहाँ बुआ द्वारा बच्चे को काजल लगाने का रिवाज़ है,उसी के लिए हम लोग आए हैं।"

"गज़ब हैं आप लोग ! अभी बच्चे की स्किन भी मजबूत नहीं हुई है,उसका अभी इस दुनिया के वातावरण से

अनुकूलन भी नहीं हुआ है।...... दो दिन बाद अपने घर ले जाकर करना धार्मिक रीति-रिवाज,कौन रोकता है;लेकिन अभी यहाँ कुछ नहीं,भई।....आप लोग कृपया बाहर बैठे,अंदर केवल एक व्यक्ति।"

नर्स तो इतना कहकर चली गईं पर यहाँ आसमान टूट पड़ा। नाराजगी में समधी साहब अपनी बेटी से बोले "चलो तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ आते हैं।"

मञ्जुल जी ने आग्रह किया कि यह तो अस्पताल है,अभी आप लोग हमारे घर चलें। वहाँ भोजन आदि के बाद हम लोग इन बिटिया जी की विधिवत विदाई करेंगे पर समधी जी नहीं माने। मजबूर मञ्जुल जी ने चलभाष से अपनी छोटी बेटी से कहा कि अमुक स्थान पर साड़ी आदि वस्त्र रखे हैं तुम उन्हें लेकर जल्दी अस्पताल आ जाओ।

घर अस्पताल से 15 किमी दूर था बेटी को आने में समय तो लगा ही। मञ्जुल जी ने बड़ी मुश्किल से किसी तरह उतनी देर तक उन्हें रोक कर रखा। भेंट आदि के बाद तुरन्त वापस आने का कहकर समधी साहब अपनी बेटी को लेकर चले गए फिर उस दिन लौट कर ही नहीं आये।

अगले दिन आते ही बोले ,अब  मैं तो अपने घर जाऊँगा, आपकी समधिन अभी 5,6 दिन रुकी रहेंगी।

तमाम आग्रह के बाद भी उन्होंने घर चलने का आग्रह स्वीकार नहीं किया।

चलते समय धीरे से अपने पुत्र(दामाद जी) से कहते हैं -"मैं तो इन लोगों के कहने से ही काजल न लगाने की बात मान जाता; नर्स से इतना कहलवाने की क्या आवश्यकता थी।"

सुमितराय,मञ्जुलजी,दामाद जी सब अवाक रह जाते हैं।

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