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कहानी // आसमान झुक गया // अजय अमिताभ सुमन

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मेरे पिताजी अति अनुशासन प्रिय व्यक्ति रहे हैं। पेशे से शिक्षक है। स्कूल में भी बहुत अनुशासन प्रिय और योग्य शिक्षक के रूप में उनकी प्रसिद्धि थी। अब सेवानिवृत्त हो चुके है। उनकी अनुशासन प्रियता घर में भी लागू होती थी। रोज सुबह 5 बजे उठकर हम सब बच्चे  कसरत करते, प्रार्थना करते। शाम के 5 बजते ही हम सब बच्चों को लालटेन के पास पढ़ाई के लिए बैठना होता था। मेरे पिताजी की नजरों में सिनेमा पढ़ाई लिखाई से बच्चों को भटकाता है। अतः किसी भी बच्चों को सिनेमाघर जाने की इजाजत नहीं थी।

मुझे याद है होली के समय मेरे गाँव में हुड़दंग का माहौल रहता था। गाँव के बच्चे रंग खेलते, एक दूसरे पे कीचड़ फेंकते। गोबर लगाते। पूरे सड़क पे तमाशा चलता रहता था। इसी हुड़दंग के माहौल में मेरे पिताजी नहा धोकर, खादी का कुर्ता पायजामा पहनकर , गर्दन में सफेद मफ़लर लगाकर अपने लाइब्रेरी निकलते पढ़ने के लिए। और इस हुड़दंग के माहौल में, होली के हुल्लड़ में भी सारे लोग रास्ते से हट जाते। भागो भागो मास्टरजी आ रहे हैं यह कहकर सारे भाग जाते। किसी को हिम्मत नहीं होती कि मेरे पिताजी पर रंग फेंक सके। इस तरह का आतंक था मेरे पिताजी की अनुशासन प्रियता का।

इन्हीं दिनों, एक बार होली के समय गाँव के सारे बच्चे रंग खेल रहे थे। मैं अपने पिताजी के प्रकोप के कारण रंग नहीं खेल पा रहा था। मैंने अपनी माँ से याचना की पर माँ भी पिताजी के प्रकोप के कारण कुछ नहीं कर पायी। मन अति खिन्न हो उठा। गुस्से में उठकर मैं चुपचाप घर से निकलकर गाँव के खेतों में सुदूर स्थित एक नीम के पेड़ के नीचे जाकर बैठ गया। शाम तक वहीं बैठा रहा। पिताजी की अति अनुशासन प्रियता के कारण मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था।

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इधर घर से मेरी अचानक अनुपस्थिति से सारे परेशान हो उठे। शाम को मेरे बड़े पिताजी ढूंढते हुए आये और मुझे शांत करके घर ले गए। मैं घर जाते वक्त काफी डरा हुआ था। मुझे इस बात की चिंता थी कि शायद मेरे पिताजी गुस्सा होंगे। पर घर जाने पर परिस्थितियाँ उल्टी थी। मेरी माँ मेरे अचानक गायब होने से बहुत परेशान थी। मेरी दादी के सामने मेरे पिताजी अपराधी भाव से खड़े थे। मुझे देखकर मेरी माँ और दादी काफी खुश हो गए। मेरे पिताजी के चेहरे पे क्रोध के स्थान पर सुकून का भाव दृष्टिगोचित हो उठा।

शाम के वक्त हम सब बच्चों को अपने से बड़ों को पैर छूकर प्रणाम करना होता था। मेरी इच्छा नहीं थी फिर मैंने सबको प्रणाम किया। अचानक मैंने देखा जब मैं दादी को प्रणाम कर रहा था तो मेरे पिताजी वहाँ से खिसक पड़े। पूछने पर ज्ञात हुआ पिताजी बचपन से लेकर आज तक कभी दादी को हिचकिचाहट वश प्रणाम नहीं किए थे।

मुझे मौका मिल गया। आज हिरण के हाथ में तलवार मिल चुका था। शेरे भागने लगा। हिरण पीछा करने लगा। मैंने देखा मेरे पिताजी अपने दोस्तों की मंडली में जाकर बैठ गए है। मैंने सबके सामने अपनी दादी को ले जाकर खड़ा कर दिया और आदेश दिया, पिताजी , दादी को प्रणाम कीजिए।

पिताजी के दोस्त आश्चर्यचकित हो उठे। आजतक किसी ने मेरे पिताजी के लिए आज्ञासूचक शब्दों का प्रयोग नहीं किया था। माजरा स्पष्ट होने पर सबलोग मेरे पक्ष में उठ खड़े हुए। आज आसमान के झुकने का समय था। मेरे हृदय की अग्नि के शांत होने का समय था।

हिचकिचाते हुए उन्होंने मेरी दादी को प्रणाम किया। लज्जावश घुटने तक प्रणाम करके हटने की कोशिश की। मैं जोर से चिल्लाया, ठीक से प्रणाम कीजिए। उन्होंने फिर घुटने तक प्रणाम किया और भागने की कोशिश की। इस पर दादी ने कहा, पोता ठीक ही तो कह रहा है। ठीक से क्यों नहीं प्रणाम कर रहे हो? इस बात पर मेरे पिताजी लज्जित होते हुए दादी को 10 बार दंडवत प्रणाम किया। परिवार के सारे लोग ताली मार कर प्रसन्नता व्यक्त कर रहे थे। उनके मित्र मुस्कुरा रहे थे। दादी बोल रही थी आज मेरे पोते के कारण मेरे बेटे ने पूरी जिंदगी में पहली बार प्रणाम किया है। मेरे दिल की अग्नि शांत हो चुकी थी। आज आसमान झुक गया था।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

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