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हास्य - व्यंग्य // मूर्ति या व्यंग्याकृति // सुरेश खांडवेकर

सुरेश खांडवेकर

मूर्ति या प्रतिमा शब्द के उच्चारण के साथ ही ऐतिहासिक, आध्यात्मिक अथवा देवी-देवताओं की कल्पना साकार रूप लेने लगती है। भावुक व्यक्ति भाव-विभोर हो जाता है। मूर्ति का नाम लेते ही श्रद्धा और प्रेरणा का भाव मन में जाग जाता है।

प्रतीक किसी विराट का स्वल्प स्वरूप है तो किसी सूक्ष्म का विराटस्वरूप भी। आत्मा को किसी ने देखा नहीं केवल अनुभव किया है। कहते हैं आत्मा अति सूक्ष्मरूप है, पर हमने उसका विराट स्वरूप भी उकेर दिया है। पत्थर का शिवलिंग, वैष्णो देवी अथवा नारियल एक ईश्वर आराध्य का प्रतीक है। इन प्रतीकों को पूजने, समझने, मानने से ही बड़े से बड़े व्यक्ति का दम्भ दूर हो जाता है। आस्था के सामने स्वयं बौना हो जाता है। उसके सामने झुक जाता है।

यह न आशीर्वाद देता है न ही संहार करता दिखाई देता है। किसी ने किसी विशेष पत्थर को गणेश मान लिया, तो किसी ने मारूतिनंदन। चक्र को कालचक्र और कालचक्र को सूर्य माना। ऐसे अनेक सूक्ष्म प्रतीक, विराट देवता, ब्रह्मांड या व्यापक दर्शन व्यक्त करते हैं। यह तो ऐसे ही हैं जितना बड़ा सिर उतना बड़ा प्रतीक का अर्थ। बुद्धि की दौड़ है सबकी अपनी-अपनी।

प्रतिमा प्रतीक का सुधरा हुआ संकुचित किंतु अलंकृत स्वरूप है। प्रतीक चिन्हों को प्राणियों से लेकर मानवीय हाड-मांस और मुख मंडल से लेकर समस्त अवयवों में धर दिया है मूर्तिकारों ने। राम, कृष्ण, भोलेशंकर की मूर्तियां इसी प्रकार की है। इन मूर्तियों में तारक और मारक दोनों पक्ष दिखाई देते हैं।

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त्रिकालदर्शी होने से तीन मुखमण्डल व्यक्त हुए हैं। देवी-देवताओं की भुजाएं चार से छः हो गई और तो और दसों दिशाओं को देखने वाले रावण के दस सिर प्रकट हुए।

सुर और असुरों का चित्रण भी मूर्तियों में स्पष्ट हुआ। सुर यानी आस्तिक। सुरों के मुखमण्डल सौम्य, प्रखर और शांतिपूर्ण तो असुरों का वीभत्स और भयानक। देवतागण दाहिने हाथ से शुभ और आशीर्वाद देते दिखाई देते हैं तो बाएं हाथ में संहार के शस्त्र-अस्त्र थामे रहते हैं। इस प्रकार एक हाथ में शास्त्र तो दूसरे हाथ में शस्त्र। पता नहीं कब किसी जरूरत पड़ जाए। जबकि असुरों के प्रत्यांग में शस्त्र ही शस्त्र एवं आसुरी शक्तियां।

इन्हीं मूर्तियों में आध्यात्मिक एवं जनचेतना भरने वाले महात्माओं के दोनों हाथों में क्रमशः आशीर्वाद और शास्त्र था। किसी की आंखें मौन तो किसी की नम। किसी के हाथ बंधे हुए तो किसी के योग मुद्रा में। महर्षि व्यास, नारद, शंकराचार्य, गुरु नानक, समर्थ रामदास, गौतम बुद्ध, महावीर, रामकृष्ण परमहंस, दयानन्द सरस्वती, विवेकानंद और महात्मा गांधी आदि। सच्चिदानंद में डूबते हुए, भले ही भौतिक हाथ खाली दिखाई देते हैं किन्तु सब कुछ न्यौछावर करते हुए दिखाई देते हैं।

भले ही भौतिक हाथ खाली दिखाई देते हैं किन्तु प्राचीन और अर्वाचीन इतिहास को देखे तो अनेक रणनायक हुए भारत में। राणा सांगा, छत्रपति शिवाजी, अमरसिंह राठौर, पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप, लक्ष्मीबाई आदि। इनकी भी मूर्तियां बनीं। इन वीरों या नायकों को स्मरण करने योग्य माना गया। इसलिए इनकी मूर्तियों को स्मारक कहा जाता है। इन्हें भी मूर्ति कहना भारी पड़ता है क्योंकि इन मूर्तियों में इनका विशिष्ट पक्ष झलकता है। जैसे इनका शरीर वीरोचित सौष्ठव कसा हुआ। अधिकतर मूर्तियों में नायक घोड़े पर सवार दिखाई देते हैं, एक हाथ में घोड़े की लगाम तो दूसरे हाथ में तलवार। युद्ध के लिए कूच करते हुए या विजय के बाद लौटते हुए नायकों की प्रतिमूर्ति।

आज के नेताओं की मूर्तियां देखें जो चौराहों या राज-प्रासादों में स्थापित हैं और सैकड़ों हजारों की संख्या में स्थापित हो रही हैं, इनको कोई आस्थावान पूजता नहीं। इसलिए मंदिरों और आश्रमों में कोई पूछता नहीं। आज देश की आन चौराहों की शान बन गई है। मजबूरी के दर्शन को सुदर्शन बना रहे हैं कई राजनेता और कमाऊ वास्तुविद! बड़ा अंतर आ गया है इन प्रतिमाओं की प्रस्तुति में। हालांकि स्वाभाविक, भव्य स्वरूप दिखता है। प्रतीक कहें या प्रतिमा कहें, स्मारक कहें या पुतला कहें, समझ में नहीं आता। क्या प्रतीकों का व्यापक स्वरूप इतना सिमट गया है? या सिमटे हुए सूक्ष्म स्वरूप का फिर वृहत्तर अर्थ निकलने लगा है?

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चौराहे पर इन प्रतिमाओं के स्वरूप व भाव भंगिमाओं को देखें तो नेताओं का शरीर ढीला तो पेट थुलथुला दिखता है। न कोई रथ, न हाथी, न कोई घोड़े पर ही सवार है। न म्यान में तलवार है, न हाथ में किताब दिखती है। कोई चश्मा लगाये हुए, कोई बिना चश्मे के। किसी के सिर पर टोपी तो किसी के सर पर साफा, किसी का सिर खाली, कोई धोती-कुर्ते में, तो कोई कुर्ते-पैजामे में और अब एक नई शृंखला सूट-बूट और सफारी सूट में प्रकट हो गई है। कहीं-कहीं नेताओं की प्रतिमा दूध में धुली दिखती है तो अधिकांश प्रतिमाओं के सिर पर कबूतरों के खेल और बीट दिखती है।

न इनके हाथ में सुदर्शन चक्र है और ना बाण या तलवार। एक हाथ आसमान में लहराता हुआ। किसी की तर्जनी निशाना साधते हुए संकेत देती है कि इसमें मशाल, मिसाइल, चुप्पी, शांति, सबक और धमक सब शामिल हैं। श्रीकृष्ण को तो संहार करने के लिए तर्जनी में सुदर्शन चक्र धारण करना पड़ा था। अर्जुन को कांधे पर धनुष और पीठ पर गांडीव लादना पड़ा। हनुमान की एक मुट्ठी कांधे पर लदी गदा जकड़े रहती थी। यह सारी शक्तियां नेताओं की तर्जनी में समाहित हैं। संकेत मात्र से विजय और सफलता दोनों एक हाथ।

सम्भवतः तर्जनी बाकी अंगुलियों को यह भी निर्देश देती हो कि तुम आराम करो अपनी जगह मैं अकेले ही काफी हूं संहार के लिए।

ऐसे ही किसी को दाहिने हाथ का पंजा आसमान में खुला हुआ है तो अभी भी संकेत देता है कि देश ही नहीं सारे संसार को मुट्ठी में भींचना चाहता है। इसमें ललक भी है और ललकार भी। चाहे संसार को तुच्छ समझो या सब कुछ।

खुला अंगूठा कभी साक्षरता की बात करता है तो कभी ठेंगा भी दिखाता है। तर्जनी दोष थोपती है तो संहार का संकेत भी देती है। मध्यमा अनुसरण करती है। अनामिका उसमें प्रकाश डालती है और कनिष्ठा बौद्धिक कौशल दिखाती है।

दूसरा हाथ धरती की ओर लटका हुआ, ललचाता हुआ। कुर्सी की ललक में ढीला पड़ा हुआ है। कुर्सी मिले तो राहत मिले। अपने साथ इस स्थूल शरीर को उसमें आबद्ध कर ले या फिर आयेगा इस धरती पर अपने अधूरे काम पूरे करने। इसी भूमि पर, इन्हीं चौराहों पर फिर मिलेंगे एक बार। जैसे जन-जन से याचना करता हो। ‘हे नाथ, हे मतदाता मेरा एक हाथ कुर्सी पकड़ने के लिए खाली रहने दो - मेरा हाथ आपको सारे ब्रह्मांड की खुशियां परोसेगा।’

इन्हें प्रतीक कहें, प्रतिमा कहें, प्रतिमूर्ति कहें या प्रतिकृति या फिर अनाकृति आकृति या व्यंग्याकृति?

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