हास्य - व्यंग्य // शोकसभा में // सुरेश खांडवेकर

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कहते हैं प्रसन्नता और दुख के अवसरों पर अनिवार्यता के साथ उपस्थित होना चाहिये। किंतु इन अवसरों को छोड़ दिया जाये तो कौन से अवसर बचे रहते है? ...

सुरेश खांडवेकर

कहते हैं प्रसन्नता और दुख के अवसरों पर अनिवार्यता के साथ उपस्थित होना चाहिये। किंतु इन अवसरों को छोड़ दिया जाये तो कौन से अवसर बचे रहते है? बीच में तो अवसर ही नहीं है।

बलीराम के चार बेटे थे। उसने अपने बाप का मकान तो भाईयों को ठोक पीट कर हथिया ही लिया था और बाप को भी नदी किनारे वानप्रस्थ दिलवा दिया था। अब, बलीराम के मरने की बारी आई तो उसने अपने मकान के चार हिस्से करवा दिये। बड़े में बलीराम खांसता रहता। एक भी बेटा उसे अपने साथ नहीं रखता था। अतः सुबह शाम पारी-पारी वह एक-एक बेटे के घर खाना खाता और चाय पीता। दिनभर इधर-उधर भटकता। पटवारी से मकान के हिस्सों की लिखा-पढ़ी बाकी थी, वरना उसे भी अमरावती नदी के किनारे अपने बाप की तरह बबूल के नीचे आसन जमाना पड़ता।

एक दिन बेटों ओर बहुओं के बीच क्या विवाद बढ़ा, पटवारी से लेकर सारा मोहल्ला इकट्ठा हो गया। चम्मचों से लेकर बड़े बर्तनों तक, और पुरानी इंटों के टुकड़ों से लेकर नाली के पत्थर तक के बराबर-बराबर हिस्से हो गये। एक दिन बलीराम जी मात्र एक तुलसी की माला लिये निकले और नाली के पत्थर से फिसले। चारों भाईयों ने अंतिम समय की सामाजिक दया और दवा उंडेली, पर वे अपने पिता को बचा नहीं पाए।

धनीराम मोची ने लाख बार समझाया बलीराम को, कि जूतों के सोल में गोखरू ना लगाए। पर क्या जाने यमराज ने ही उसे सलाह दी हो तो क्या करें।

बलीराम की आपात मृत्यु पर चारों बेटों का मतभेद उनके अंतिम संस्कार तक खत्म हो गया था। बेटे गले मिल कर रोए। नाली का पत्थर जिस बेटे के हिस्से आया था, बार-बार उसे देखता आंखें पोंछता, नाक से सिस्कारी भरकर रो लेता और सोचता, ‘‘कम से कम इस पत्थर को कहीं ठिकाने तो लगा देते तो यह हादसा न होता। गिने-चुने दिन तो हुए बंटवारे हुए। दो साल पहले ये पत्थर मेरे हिस्से आया होता तो।’’

बलीराम व उसके बेटों के सगे संबंधी आने लगे। खूब जमावड़ा हुआ। चारों बेटों ने बारी-बारी कंधे दिये। ‘राम नाम सत्य है’। और दबे और बुझे स्वर से यात्रा निकली।

अमरावती नदी का यह मोक्षदामिनी किनारा अंतिम संस्कारों के लिए प्रसिद्ध है।

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बलीराम की अर्थी यहां टिकने से पहले किनारे पर डुबकी लगाने के लिए पानी में उतारी गयी। यहां पानी में एक फैली हुई चट्टान बहुत काम आती है। चट्टान के आगे घुटने तक पानी है। फिर जैसे-जैसे आगे बढ़ो पानी गहरा होता जाता है।

कुछ निकट सम्बंधी और चार बेटे भी घुटने तक पानी में आ गये। तीन डुबकियां देते समय बड़े बेटे ने अर्थी की कमर में कुछ पीला-पीला अंगुली जैसा देखा। पिता की कमर में बंधा कमरडोरा था। जिसके एक सिरे में पीली चमकीली गांठ थी। वह पानी में कभी ऊपर तैरती कभी लहरों के साथ बहती। ऐसे में कमर से लिपटी धोती भी बहती। अब कमरडोरे की गांठ में सोने की अंगूठी बेटे ने देख ली तो बाप को और रगड़रगड़कर नहलाने लगा। सोचता था कि ऐसे में वह कमरडोरा उसके हाथ आ जाये। कमरडोरा टूटे तो अंगूठी उसकी वरना चार हिस्से होंगे।

सुधाकर पंडित भी अर्थी के स्नान में मदद कर रहा था। वह फूल चढ़ाते-चढ़ाते, फेंकते-फेंकते अपना ध्यान जमा रहा था।

बेटे ने सोचा, बोलता हूं तो चारों भाईयों का हक होगा, नहीं बोलता तो अंगूठी पंडित ले लेगा। बड़ें भाई ने सबसे छोटे भाई को इशारे से अपने गुट में शामिल किया। कान में कहा, पंडित से कहो, ‘चलों लकड़िया बिछाने का ढ़ंग बताओ। पिताजी ने कमरडोरा में सोने की अंगूठी छिपा कर रखी है, मैं उसे निकालता हूं।’

दुर्भाग्य से कुछ नहीं बन पाया। पंडित सुधाकर ने कहा, ‘क्या चला रखा है, मुर्दे को डुबकी लगाओ और बाहर निकालो।’

चारों भाई मुंह लटकाकर घर वापिस आये। छोटे ने बड़े से धीरे से पूछा, ‘अंगूठी निकाली?’

‘नहीं पंडित हटता ही नहीं था।’

छोटे का भरोसा उठने लगा, ‘मुझे मौसा ने कहा कि उसने कमरडोरा ही काट डाला था।’

‘तुम क्या समझते हो मै इतना कमीना हूं कि मरे हुए बाप की कमर में बंधी अंगूठी काट लू?’

छोटा बोल पड़ा, ‘मै सबके सामने भांडा फोड़ दूंगा कम से कम मेरा हिस्सा मुझे मिल जाये।’

बहुओं ने कुछ नहीं सुना। बस हिस्सा-हिस्सा सुना। और अपने अपने घर वालों के साथ आ धमकी। तो दोनों चुपचाप। दो-तीन निकट के वृद्ध आये तेवर देखकर पिल पड़ें, ‘अभी बाप की आग ठंडी भी नहीं हुई और हिस्से-हिस्से कर रहें हो। तुम्हारे हिस्से बंटवारे तो पहले ही हो चुके हैं। अब किस बात का हिस्सा? देनदारी का?’

‘मामा, बात अंगूठी की चल रही है।’

‘सब चौंके, ‘कौन सी अंगूठी?’

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‘बड़ा भाई बोला, ‘कुछ नहीं ऐसे ही बकबक कर रहा है।’

‘मैं बकबक नहीं कर रहा हूं, तुम बड़ें भाई हो कर छोटे भाईयों के साथ इतनी नीच हरकत करोगे, यह नहीं सोचा था मैंने?’

‘अरे कौन सी अंगूठी?’

‘वही, जो पिताजी के कमर के धागे से बंधी थी।’

‘वहां कुछ नहीं था।’

‘थी।’

‘तो तुम ने क्यों नहीं निकाली?’ उसने उस पर सवाल दागा।

‘तुमने कहा था कि मैं निकालता हूं तू पंडित को परे कर दे।’

‘वहीं तो कह रहा हूं नहीं निकली, और सबके सामने ये काम करना मैंने ठीक नहीं समझा। बात बढ़ी तो धनीराम मोची भी आया। बलीराम का साथी था, पूछने लगा, ‘मेरी चाबी से तूने क्या काटा?’

बस... इतना बोलना था कि बलीराम के विरासत में छोड़े फटी चप्पलों से एक दूसरे की धुनाई शुरू हो गई।

तीसरे दिन बाप की आग ठण्डी हुई, बेटे फूल चुनने गये। फूल घर में रख के क्या करते हरिद्वार गंगा में बहा आये।

एक हाड़मांस का बाप चला गया इसका तो शोक था। खुशी इस बात की थी कि मकान में और दो दीवारें खिंच गई।

शोक व्यक्त करने वालों के उद्गार काफी मंगलकारी थे।

‘आखिर तक, अपनी जिद पर अड़ा रहा। कौड़ी-कौड़ी के लिए बच्चों को परेशान किया पर आखिर में मकान चारों बच्चों को दे दिया।’’

दूसरा बोला, ‘पत्थर से फिसल के मरा, वरना यह तो ओर पचास बार यमराज को भगा देता।’

तीसरा बोला, ‘घर में मार-धाड़ करता था, तो परिवार का कोई मेम्बर उससे बात नहीं करता था। ये तो खानदानी बात थी।’ फिर बहुत नम्र होकर बोला, ‘मेरे सामने ही चार-पांच बार भाभी को मारा भी और अस्पताल भी ले गया। देखभाल की। क्रोध में पक्का था तो दया भी कूटकूटकर भरी थी।’

चौथा बोला, ‘कौन कहता है नाली के पत्थर से फिसला और मर गया। अरे नाली के पत्थर से सीड़ियां चढ़ गया।’

अंत में पड़ोस का एक वृद्ध बोला, ‘जो होनी थी हो गयी। अब दुख मत मनाओ।’ वह आगे धीरे-धीरे बोला, ‘अंतिम समय तक तुमने उसे शांति से जीने नहीं दिया। तुम बंदर बांट की तरह घर में लूट मचाते रहे। वो तो गजब का समझदार निकला। वास्तव में तुम्हारा बाप था।’

उसकी बात सुन चारों बेटे और बहुएं सकपका गये, वह फिर बोला, ‘तुम्हारी करतूतों को वह जानता था, इसलिए सोने की अंगूठी बजाये हाथ की उंगली के कमर में बांधता था। बाप, मरते वक्त भी सबक दे गया। ये लो, उसने कमरडोरा दिया’ और बोला, ‘ये तो पानी कम था, और करडोरा तैर रहा था, देखा अंगूठी है। पता नहीं अर्थी जलने से पहले ही कमर से कैसे फिसल गई। वाह-वाह बलीराम। भस्म होने से पहले भी अपने बेटों का ध्यान रखा।’

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रचनाकार: हास्य - व्यंग्य // शोकसभा में // सुरेश खांडवेकर
हास्य - व्यंग्य // शोकसभा में // सुरेश खांडवेकर
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रचनाकार
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