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प्राची - सितम्बर 2018 - शोध पत्र नागार्जुन : यथार्थ चेतना एवं लोक दृष्टि // सरिता कुमारी

शोध पत्र

नागार्जुन : यथार्थ चेतना एवं लोक दृष्टि

सरिता कुमारी

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हिन्दी काव्य साहित्य के अन्तर्गत नागार्जुन प्रतिबद्ध जनवादी कवियों में अग्रगण्य हैं। उनके काव्य में प्रगतिशीलता और प्रयोगशीलता दोनों ही दृष्टिगत होती हैं। उनकी कविताओं में यथार्थ की विरूपताओं के अंकन के साथ-साथ मानव-मन की रागात्मक और सौंदर्यमयी छवियों का बखूबी अंकन हुआ है। जो अपनी संवेदना और कलात्मकता की दृष्टि से अलग पहचान बनाती हैं।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी नागार्जुन ने संस्कृत, हिंदी और मैथिली में कविताएँ करने के साथ-साथ उपन्यास-लेखन के क्षेत्र में भी अपनी एक विशिष्ट पहचान बनायी। राजनीतिक रूप से नागार्जुन साम्यवादी विचारधारा के पोषक रहे, इसलिए इनकी कविताओं में सामाजिक जीवन का यथार्थ चित्रण हुआ है। इनकी कविताओं में सहजता, आक्रोश, व्यंग्य, अक्खड़ता, हुंकार एवं ललकार है। शोषण के विरुद्ध आवाज उठाकर शोषितों के प्रति सहानुभूति दिखाकर तथा अन्याय का विरोध करने वाली कविताओं की रचना करके उन्होंने पीड़ित मानवता को स्वर प्रदान कर कवि के उत्तरदायित्व को भली-भाँति निबाहा है।

नागार्जुन शोषित और पीड़ित समाज का एक ऐसा निष्प्राण रूप हैं जिनका जीवन अभावों, दुःखों और कष्टों में बीता जैसा कि महान आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा ने कहा- जो नामवर सिंह द्वारा सम्पादित पुस्तक नागार्जुन : प्रतिनिधि कविताएँ के पृष्ठ आवरण में उद्धृत है- ‘जहाँ मौत नहीं बुढ़ापा नहीं है, जनता के असन्तोष और राज्यसमाई जीवन का संतुलन नहीं है वह कविता है नागार्जुन की। ढाई पसली के घुमन्तु जीव, दमे के मरीज, गृहस्थी का भार- फिर भी क्या ताकत है, नागार्जुन की कविताओं में! और कवियों में जहाँ छायावादी कल्पनाशीलता प्रबल हुई है, नागार्जुन की छायावादी काव्य-शैली कभी की खत्म हो चुकी है। अन्य कवियों में रहस्यवाद और यथार्थवाद को लेकर द्वन्द्व हुआ है, नागार्जुन का व्यंग्य और पैना हुआ है, क्रांतिकारी अवस्था और दृढ़ हुई है, उनके यथार्थ-चित्रण में अधिक विविधता और प्रौढ़ता आयी है। उनकी कविताएँ लोक-संस्कृति के इतना नजदीक हैं कि उसी का एक विकसित रूप मालूम होती हैं। किन्तु वे लोकगीतों से भिन्न हैं, सबसे पहले अपनी भाषा-खड़ी बोली के कारण, उसके बाद अपनी प्रखर राजनीतिक चेतना के कारण और अंत में बोलचाल की भाषा की गति और लय को आधार मानकर नये-नये प्रयोगों के कारण। हिंदी भाषी किसान और मजदूर जिस तरह की भाषा समझते और बोलते हैं, उसका निखरा हुआ काव्यमय रूप नागार्जुन के यहाँ है।

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नागार्जुन सत्ता, व्यवस्था एवं पूंजीवाद के प्रति आक्रोश व्यक्त करने में निरंतर अग्रणी रहे। उनकी कविता में राष्ट्रप्रेम तथा यथार्थ भारत की तस्वीर झलकती है। उन्होंने युगीन यथार्थ एवं समसामयिक गतिविधियों को अपने काव्य का विषय बनाया। समाज के विभिन्न शोषित वर्गों का बारीकी से अध्ययन किया और परखा कि किस प्रकार शोषित वर्ग अभावों की चक्की में पिस रहा है, श्रमिक भरपेट भोजन नहीं जुटा पा रहा, किंतु उच्च वर्ग भोग-विलास में पानी की तरह धन बहा रहा है। लोग मुखौटा लगाए हुए दोहरी जिंदगी जी रहे हैं। बाहर से खद्दर-

धारी हैं पर भीतर से कसाई। इसी संदर्भ में ‘सच न बोलना’ नामक कविता से निम्न पंक्तियाँ उद्धृत हैं -

‘जमींदार है, साहुकार है, बनिया है, व्यापारी है,

अन्दर-अन्दर विकट कसाई, बाहर खद्दरधारी है!’

दूरदर्शिता व यथार्थता के प्रतिबिम्ब बाबा नागार्जुन द्वारा तत्कालीन समस्याओं पर उठाये गए संवेदनशील मुद्दे वर्तमान दौर में प्रासंगिकता का स्वरूप धारण किये हुए हैं। इनकी कविताएँ एक ओर जहाँ जन-चेतना को झंकृत करती हैं, तो वहीं दूसरी ओर सामाजिक चेतना के पैरोकार बुद्धिजीवी वर्ग को सोचने पर मजबूर करती हैं। नागार्जुन का केन्द्रीय विषय भावना और कल्पना से इतर लोक-दृष्टि, जन-जागरूकता, मानवीय मूल्यों पर आधारित हैं। उनका विचार कभी भी रहस्यवाद और यथार्थवाद के द्वंद्व की जटिलता में नहीं पड़ा; बल्कि यथार्थ चित्रण में अधिक

विविधता के साथ स्पष्टतः दिखायी पड़ता है, अर्थात् उनकी कविताएँ लोक-संस्कृति के इतने नजदीक हैं कि उसी का एक विकसित रूप मालूम होता है।

नागार्जुन की कविताओं में जन-जीवन की आशा-आकांक्षा व्याप्त है तथा वे सामाजिक चेतना से परिपूर्ण हैं। उन्होंने अभावों से ग्रस्त पीड़ित एवं शोषित सर्वहारा वर्ग की वेदना को अनुभव किया। यही कारण है कि उन्हें सामाजिक विषमता की बढ़ती हुई खाई दुखी करती है और वे अपनी पीड़ा कविता के माध्यम से व्यक्त करते हैं। साथ ही कवि ने रचना में यथार्थ का चित्रण अपनी पूरी नग्नता एवं सच्चाई के साथ की है। उन्होंने कुछ भी छिपाने का प्रयास नहीं किया। कवि वर्त्तमान और भावी संभावनाओं के परिप्रेक्ष्य में इस बात को उद्घाटित करते हैं कि सत्य बोलना पाप है, और चापलूसी करना झूठ बोलना युगधर्म बन गया है उक्त संदर्भ में उनकी चंद पंक्तियाँ निम्न हैं :-

सपनों में भी सच न बोलना, वर्ना पकड़े जाओगे,

भैया, लखनऊ-दिल्ली पहुँचे, मेवा-मिसरी पाओगे।

माल मिलेगा रेत सको यदि गला मजूर-किसान का,

हम मर-भुक्खों से क्या होगा, चरण गहो श्रीमान का!

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नागार्जुन के व्यक्तित्व पर क्लासिकी मार्क्सवाद का पूरा प्रभाव दृष्टिगत होता है। उनके अन्तर्मन में विद्यमान करुणा, मैत्री, शांतिप्रियता तथा मानव-प्रेम, बौद्ध-धर्म, करुणा के प्रभाव के कारण हैं। उनके काव्य मानव-जीवन के प्रति गहरी सम्पृक्ति के कारण सम्प्राण और जन-संवेद्य बन पड़े हैं। उनकी भाषा में सरलता, सहज-सम्प्रेषणीयता के साथ ही उसमें व्यंग्य की तल्खी के साथ-साथ करुणा और विनोद-वक्रता भी विद्यमान है। शिक्षा प्रणाली की स्थिति से पाठकों को अवगत कराते हुए नागार्जुन ‘मास्टर’ नामक कविता में लिखते हैं :-

‘घुन-खाए शहतीरों पर की बाराखड़ी विधाता बाँचे

कटी भीत है, छत चूती है, आले पर बिसतुइया नाचे

बरसाकर बेबस बच्चों पर मिनट-मिनट में पाँच तमाचे

दुखहरन मास्टर गढ़ते रहते किसी तरह आदम के साँचे।’

नागार्जुन समाज के सूक्ष्म पारखी थे, उन्होंने समाज को समग्रता के साथ अध्ययन किया। उनकी विहंगम दृष्टि का ही परिणाम है कि लोकजीवन में दिखने वाली समान वस्तु औरों की संवेदना को अछूती छोड़ जाती है, वहीं उनकी रचना-भूमि बन जाती हैं। इस दृष्टि से काव्यात्मक साहस में नागार्जुन अप्रतिम हैं। उन्हीं की बीहड़-प्रतिभा एक मादा सुअर पर ‘पैने दाँतों वाली’ नामक कविता में उद्धृत की है :

‘जमना-किनारे

मखमली दूबों पर

पूस की गुनगुनी धूप में

पसरकर लेटी है

यह भी तो मादरे हिंद की बेटी है।’

नागार्जुन की लोकदृष्टि अत्यंत व्यापक और विषद् है। उन्होंने जहाँ समाज के प्रत्येक कुवृति को परत-दर-परत पर्दाफाश किया, वहीं देश में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं योजनाओं की विफलता को यथार्थ रूप में रेखांकित किया। नागार्जुन जनकवि हैं, यह स्वयं चरितार्थ भी करते हैं, क्योंकि उनकी भाषा, विचारधारा, रहन-सहन आदि विषयानुरूप ढाल लेते हैं। वे वास्तव में जनता के चारण हैं। वे गांव गली की बात कहते हैं और उस भाषा में कहते हैं जिससे सब परिचित हैं। बिना किसी लाग-लपेट के अपनी बात को कहने वाले कवि के रूप में सर्वाधिक लोकप्रिय हैं।

चूँकि नागार्जुन राजनीतिक रूप से साम्यवादी (मार्क्सवादी) विचारधारा के कवि हैं, अतः राजनीतिकरण से उपजे शोषणमूलक विचारधारा की परिधि में परिपाटी उनकी लेखनी का उग्र बिन्दु रहा है। उन्होंने उन मुद्दों को मुखर रूप प्रदान किया जो समाज की ढाँचागत व्यवस्था में नकारात्मक परिवर्तन कर देता है। सामाजिक वंचनाओं, व्यक्तिगत स्वतंत्रता व उनकी अभिव्यक्ति की कसौटी के प्रति कवि की पीड़ा संवेदनशील है। उन्होंने ‘अकाल और उसके बाद’ नामक कविता में अकाल के वीभत्स रूप का चित्रांकन किया है कि किस प्रकार अनाज के अभाव में प्राणीजन त्राहिमाम कर उठते हैं, वसुधा की सजीवता शून्य निर्जनता के घोर संताप में तब्दील हो जाती है। कवि की मर्मस्पर्शी चेतना यहीं तक नहीं ठहरती; बल्कि उन्होंने निम्न पंक्तियों के माध्यम से चूल्हा-चक्की, कानी-कुतिया, छिपकली, चूहा की त्रासदी को भी दर्शाते हैं :-

‘कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास

कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास

कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त

कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त।’

नागार्जुन की लोकदृष्टि केवल समाज की व्यवस्थाओं पर ही नहीं गई; बल्कि अप्रकाशित विषयों पर भी उनकी निगाह है. यह उनकी निगाह है. यह उनकी सूक्ष्म चेतना का ही परिणाम है कि रिक्शा खींचने वाले, फटी बिवाइयों वाले, गुट्ठल घट्ठों वाले जैसे विषयों पर ‘खुरदरे पैर’ नामक कविता में चर्चा की है :-

‘खुब गए

दूधिया निगाहों में

कटी बिवाइयोंवाले खुरदरे पैर

धँस गए

कुसुम-कोमल मन में

गुट्ठल-घट्ठों वाले कुलिश-कठोर पैर।’

इसी तरह यथार्थ के वे रूप जिन्हें शिष्ट और सुरुचिपूर्ण कविगण वीभत्स समझकर छोड़ देना ही उचित समझते हैं, नागार्जुन की साहसिक कल्पना से काव्य का रूप प्राप्त करते हैं।

‘प्रभु तुम कर दो वमन।

होगा मेरी क्षुधा का शमन’

जैसी पंक्तियाँ लिखने का साहस नागार्जुन ही कर सकते हैं। इसी प्रकार ‘प्रेत का बयान’ नामक कविता में भूख के कारण मरे अध्यापक की दशा का यथार्थ इन शब्दों में करते हैं :-

‘ओ रे प्रेत’

कड़क कर बोले नरक के मालिक यमराज

‘सच सच बतला।

कैसे मरा तू?

भूख से, अकाल से?

बुखार, कालाजार से?’

कविवर नागार्जुन राजनीतिक व्यवस्था से उपजी विकृति को भी दर्शाते हैं। वे कहते हैं कि अभी भी भारत औपनिवेशिक मानसिकता से ऊबर नहीं पाया है। देश के नए नीति-नियामक के रगों में लोकतंत्र की महक कम और राजसत्ता की भूख ज्यादा आकर्षित करती है। कविवर यह खेद प्रकट करते हुए ‘आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी’ नामक कविता में लिखते हैं :-

‘आओ रानी हम ढोएंगे पालकी,

यही हुई है राय जवाहर लाल की

रफू करेंगे फटे-पुराने जाल की

यही हुई है राय जवाहर लाल की।

आओ रानी हम ढोएंगे पालकी!’

इस प्रकार अपने युग के सर्वकालीन कवियों में नागार्जुन निश्चित तौर पर अग्रगण्य माने जाएँगे। कवि ने यथार्थ चेतना व लोक-दृष्टि पर आधारित कविता लिखकर समाज को एक नयी दिशा प्रदान की। इनकी कविताओं में जनमानस से जुड़े विभिन्न पहलुओं का सांगोपांग वर्णन मिलता है। कवि की दृष्टि एक ओर जहाँ भौगोलिक सीमाओं को पार कर जाती है, वहीं दूसरी ओर इनकी सूक्ष्म विषयक शैली भी देखने को मिलती है। समाज में घटित होने वाली घटनाओं का साहित्यिककरण का स्वरूप यदि देखना है तो निःसंदेह नागार्जुन खरे उतरते हैं। यह बात स्पष्ट है कि जीवन की मौलिक गतिविधियाँ उनकी रचना में परिलक्षित होती है जो उन्हें यथार्थ के शिखर पर ले जाती हैं।

एक ओर जहाँ उनकी लेखनी निचले तबके के आँसू पोंछने में संलग्न है, तो दूसरी ओर समाज, राजनीति, प्रशासनिक व्यवस्था, सामाजिक व्यवस्था में फैली बुरी प्रवृत्तियों को जड़ से उखाड़ने हेतु तलवार की धार है। कविवर की प्रतिभा बहुमुखी है. इसका अनुपम उदाहरण हमें अछूती संवेदनाओं से जान पड़ती है, जो उनके गहन चिंतन का सूत्रपात करती है। कवि की यही चतुर्दिक विशेषता उन्हें यथार्थ चेतना के उतुंग बिन्दु में प्रतिष्ठित करता है। निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि कवि ने मजदूर, किसान, व्यापारी, नेता, जमींदार सब पर दृष्टिपात करते हुए उनका वर्णन किया है। उसे सामाजिक-व्यवस्था पर आक्रोश है, वैयक्तिक अभावों से पीड़ित जनता से उसे सहानुभूति है और शोषकों के वैभव एवं विलास पर वे खुलकर व्यंग्य करते हैं। अतः जनवादी विचारों से ओतप्रोत कबीर विचारधारा से प्रेरित नागार्जुन सचमुच यथार्थ चेतना एवं लोकदृष्टि के सिपहसालार हैं।

संदर्भ सूची :

1. सिंह, नामवर (संपा.) : डॉ. रामविलास शर्मा का कथन, पुस्तक- नागार्जुन : प्रतिनिधि कविताएँ, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण : 1984

2. बादल, शम्भु (संपा.) : ‘आज की विविध कविताएँ’, आदित्य पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, मेन रोड, हजारीबाग, पृ. 42

3. बादल, शम्भु (संपा.) : ‘आज की विविध कविताएँ’, पूर्वोक्त, पृ. 43

4. सिंह, नामवर (संपा.) : डॉ. रामविलास शर्मा का कथन, पुस्तक- नागार्जुन : प्रतिनिधि कविताएँ, पूर्वोक्त, पृ. 98

5. सिंह, नामवर (संपा.) : डॉ. रामविलास शर्मा का कथन, पुस्तक- नागार्जुन : प्रतिनिधि कविताएँ, पूर्वोक्त, पृ. 80

6. सिंह, नामवर (संपा.) : डॉ. रामविलास शर्मा का कथन, पुस्तक- नागार्जुन : प्रतिनिधि कविताएँ, पूर्वोक्त, पृ. 98

7. सिंह, नामवर (संपा.) : डॉ. रामविलास शर्मा का कथन, पुस्तक- नागार्जुन : प्रतिनिधि कविताएँ, पूर्वोक्त, पृ. 35

8. सिंह, नामवर (संपा.) : डॉ. रामविलास शर्मा का कथन, पुस्तक- नागार्जुन : प्रतिनिधि कविताएँ, पूर्वोक्त, पृ. 94

9. सिंह, नामवर (संपा.) : डॉ. रामविलास शर्मा का कथन, पुस्तक- नागार्जुन : प्रतिनिधि कविताएँ, पूर्वोक्त, पृ. 101

संपर्क : शोधार्थी, हिन्दी विभाग,

विनोबा भावे विश्वविद्यालय,

हजारीबाग (झारखण्ड)

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