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प्राची - सितम्बर 2018 - शोध पत्र भारतेन्दु हरिचन्द्र नवजागरण के अग्रदूत // आरती कुमारी

शोध पत्र

भारतेन्दु हरिचन्द्र नवजागरण के अग्रदूत

आरती कुमारी

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न्नीसवीं शताब्दी में भारत में अनेक प्रतिभाओं ने जन्म लिया, जिन्होंने अपने लेखन से भारतीय समाज, धर्म, राजनीति और साहित्य को नई दिशा दी। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र उनमें से एक थे, जिन्होंने अपनी लेखन क्षमता से साहित्य से लेकर सामाजिक विद्रूपता, राजनीतिक भ्रष्टाचार, अंधविश्वास आदि पर अपने विचारों को प्रकट कर एक सही दिशा प्रदान की और हिन्दी साहित्य को नवीन भंगिमा और नया कलेवर प्रदान किया। इन्होंने हिन्दी भाषा को नवीनतम विषयों की ओर उन्मुख करने के साथ-साथ हिन्दी गद्य को नूतन संस्कारों से संस्कारित किया। अपने समाज और देश के प्रति उत्तरदायित्व का इन्हें स्पष्ट बोध था। भारतेन्दु हिन्दी में आधुनिकता के पहले रचनाकार थे। इनका कार्यकाल युग की संधि पर खड़ा है। इन्होंने रीतिकाल की सामंती संस्कृति की पोषक वृत्तियों को छोड़कर स्वस्थ परंपरा की भूमि अपनाई और नवीनता के बीज बोए। साहित्यिक क्षेत्र में इन्होंने सुधारात्मक कदम उठाये। खड़ी बोली को गद्य की भाषा बनाना, हिन्दी के विविध विधाओं का आगाज होना, परंपरा से चली आ रही रंगमंचीय गतिविधि पर परिवर्तन कर वंश, वाणी, अभिनय के स्वरूप और गीतों के स्वाभाविक प्रयोग आदि पर बल देना। भारतेन्दु जी के समय में भारत पूरी तरह से अंग्रेजी शासन की गिरफ्त में आ चुका था। अंग्रेजों के दमनचक्र से भारत कराह उठा था। इतना ही नहीं भाषा के स्तर पर भी अंग्रेजी का कारवां बढ़ने लगा था, इस स्थिति में भारतेन्दु ने गद्य की भाषा के साथ-साथ लोगों के लिए भी एक ऐसी भाषा की आवश्यकता महसूस की जो सबके लिए सर्वसुलभ हो, जिस भाषा में अपनापन का एहसास हो, वह थी ‘खड़ी बोली’। वे ‘भारत-दुर्दशा’ नाटक में लिखते हैं-

‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति कौ मूल।

बिन निज भाषा ज्ञान के मिटै न हिय कौ शूल।’

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भारतेन्दु हरिश्चन्द ने अल्पायु में ही अपने समय के भारत की समस्याओं को भली-भांति अनुभव किया। अपने लेखन द्वारा इन्होंने भारतीयों को सामाजिक और राजनीतिक रूप से जागृत करने की कोशिश की। इन्होंने अंग्रेजों पर हमला करते हुए कहा कि वे यहाँ सुख-सम्पन्नता से रह रहे हैं, इसमें हम लोगों को ऐतराज नहीं, किंतु यहां से धन का निष्कासन हो रहा है यह बड़े दुख की बात है-

‘अंगरेज-राज सुख साज सजे सब भारी।

पै धन विदेश चलि जात इहै अति ख्वारी।’

भारतेन्दु जी पत्र-पत्रिकाओं में साहित्यिक श्रीवृद्धि करने वाली विषय-सामग्री के साथ-साथ देश और समाज के हित से संबंधित मुद्दों को प्रमुखता से छापा। इनके द्वारा तीन पत्रिकाओं का संपादन किया गया- ‘कविवचन सुधा’, ‘हरिश्चन्द्र-मैगजीन’, ‘बालबोधिनी’। इन पत्रिकाओं का दायरा काफी व्यापक था। भारतेन्दु प्रचलित रूढ़ियों और आडम्बरों से भारतीयों को मुक्त होने की सीख दे रहे थे तथा भारत को आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से सशक्त बनाने के लिए प्रयत्नशील थे। 1874 ई. में इन्होंने ‘कविवचन सुधा’ में प्रतिज्ञापत्र छापा-

"हम लोग परमेश्वर को साक्षी देकर यह नियम मानते हैं और लिखते हैं कि हम लोग आज के दिन से कोई विलायती कपड़ा न पहिनेंगे- हिन्दुस्तान का ही बना कपड़ा स्वीकार करेंगे- सब देशी हितैषी इस उपाय की वृद्धि में अवश्य उद्योग करेंगे।"

विदेशी शासन के आर्थिक शोषण से देश की आर्थिक दशा जर्जर हो रही थी। राजनीतिक जागृति के अभाव से भारतीय किंकर्त्तव्यविमूढ़ थे। भारतेन्दु जी के ऐसे समय में देशोद्धार का संकल्प लिया। इन्होंने जनता को भारत के पतन के कारणों से अवगत कराया तथा भारत के उत्थान हेतु कार्य करने को प्रेरित किया।

‘रोबहु सब मिलि, आबहुँ भारत भाई।

हा! हा! भारत दुर्दशा न देखी जाई।’

यह वह समय था जब साहित्य रीतिकालीनशृंगारिकता की चमक-दमक में बेसुध हुआ जा रहा था; जबकि राष्ट्र की शक्ति निरंतर क्षीण होती जा रही थी। साहित्य न समाज की आवश्यकता समझ रहा था और न समाज साहित्य की। साहित्यकार नारी की कजरारी चितवन के शब्द चित्रांकन और कटिप्रदेश को मापने में ही अपनी लेखनी की उपयोगिता समझ रहे थे। उनको न समाज का पतन दिख रहा था, न ही राष्ट्र का शोषण।

ऐसे समय में भारतेन्दु ने साहित्य को सही मार्ग दिखाया। इन्होंने रीतिकालीनशृंगारिकता से एकदम से नाता तोड़ना उचित नहीं समझा, वह धीरे-धीरे साहित्य कोशृंगारिकता के भंवरजाल से निकालकर राष्ट्रीयता के स्वच्छ समुद्र में लाये। उनकी रचनाओं मेंशृंगरिकता और राष्ट्रीयता दोनों परस्पर गुंथे प्रतीत होते हैं, किंतु गहराई से देखने पर स्पष्ट होगा कि भारतेन्दु धीरे-धीरेशृंगारिकता से राष्ट्रवादिता की ओर उन्मुख होते जाते हैं, जिनकी गतिशीलता बहुत धीमी थी, परंतु रचनाएँ इसका स्पष्ट प्रमाण हैं।

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आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में- ‘एक ओर तो उनकी लेखनी सेशृंगार रस के ऐसे रसपूर्ण और मर्मस्पर्शी कवित्त-सवैया निकलते थे जो उनके जीवन काल में इधर-उधर लोगों के मुँह से सुनाई पड़ने लगे थे और दूसरी ओर स्वदेश-प्रेम से भरे हुए उनके लेख और कविताएँ चारों ओर देश में मंगल का मंत्र सा फूंकती थी।’ भारतेन्दु जी के निबंध शीर्षक ‘भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो?’ से पता चलता है कि भारत की उन्नति के लिए वह जीवनपर्यन्त चिन्तित ही नहीं रहे; बल्कि इसके निमित्त निरंतर कार्य भी करते रहे। यह निबंध दिसम्बर 1884 ई. में बलिया के ददरी मेले के अवसर पर आर्य देशोपकारणी सभा में भाषण देने के लिए तैयार किया गया था। इसमें लेखक ने भारतीयों के विकास के लिए बाधित तत्त्वों, कुरीतियों और अंधविश्वासों को त्यागकर अच्छी से अच्छी शिक्षा प्राप्त करने, उद्योग धंधों को विकसित करने, सहयोग एवं एकता पर बल देने तथा सभी क्षेत्रों में आत्मनिर्भर होने की प्रेरणा दी है। वे निबंध में जिक्र करते हैं-

‘भगवान कहते हैं कि पहले तो मनुष्य-जन्म ही बड़ा दुर्लभ है जो मिला और उस पर गुरु की कृपा और उस पर मेरी अनुकूलता इतना सामान पाकर भी जो मनुष्य इस संसार के पार न जाय, उसको आत्महत्यारा कहना चाहिए. वही दशा इस समय हिन्दुस्तान की है।’ कविता की नवीन धारा के बीच भारतेन्दु की वाणी सबसे मिस्र स्वर देशभक्ति का था। ‘विजयिनी विजय वैजयंती’ में जो मिश्र में भारतीय सेना की विजय-प्राप्ति पर लिखी गई थी, देश-प्रेम-व्यंजक कैसे भिन्न-भिन्न संचारी भावों में उद्गार है। कहीं गर्व, कहीं क्षोभ, कहीं विषाद।

‘सहसन-बरसन से सुन्यों जो सपने नहि कान सौ ‘जय-आरज शब्द’ को सुन और फरकि उठी उसकी भुजा, खुरखि उठी तलवार। क्यों आपुहि ऊँचे भये आर्य मोंछ के बार।’

नाटककार के रूप में भारतेन्दु की ख्याति जीवनकाल में ही हो गई थी। इन्होंने मौलिक और अनूदित नाटकों की रचना की। भारतेन्दु ने नाटकों में जो विषय उठाया वे पूर्णतया नवीन थे। पुरातन परंपरा का आधार ग्रहण कर इन्होंने नए युग का मुहावरा गढ़ा। इस दृष्टि से उनको आधुनिक नाटकों का आदि सूत्रधार कहा जा सकता है। भारतेन्दु के नाटक विविध विषयों से संबद्ध हैं- ‘विद्यासुंदर’ में प्रेमविवाह का मूल्यांकन करने का प्रयास किया है। ‘पाखण्ड विडम्बन’ में मदिरा-सेवन की प्रवृत्ति पर व्यंग्यात्मक शैली में प्रहार किया। ‘सत्य हरिचन्द्र’ में सत्यनिष्ठा और कर्तव्यपालन पर बल है। ‘नीलदेवी’ में इतिहास के कलेवर में भारतीय नारी की वीरभावना और पतिव्रत को उभारा गया है। ‘अंधेर नगरी’ में लोभवृत्ति और सत्ता-तंत्र पर कटाक्ष है. इस नाटक के पात्र घासीराम चूरूवाला तत्कालीन अवस्था को किस प्रकार अपने गाने में व्यक्त करता है, इसका पता निम्न पंक्तियों से चलता है-

‘चूरन हाकिम सब जो खाते

सब पर दूना टिकस लगाते।

सारा हिंद हजम कर जाता।’

भारतेन्दु जी ने जहां हास्य व्यंग्यात्मक नाटक, कविता, प्रहसन, निबंध लिखे वहीं व्यंग्य से भरी हुई मुकरियों की भी रचना की है। ‘नये जमाने की मुकरी’ शीर्षक से इन्होंने समकालीन सामाजिक-राजनीतिक विसंगतियों को लेकर लिखी है। मद्यपान के विषय में इनकी व्यंग्योक्ति देखिए :

‘मुँह जब लागै तब नहिं छूटे जाति मान धन सब कुछ लूटे।

पागल करि मोहिं करे खराब, क्यों सखि साजन? नहीं सराब।’

उपर्युक्त बातों के अवलोकन के पश्चात हम इस तथ्य पर पहुँचते हैं कि हिन्दी के जन्मदाता और भारतीय नवजागरण के अग्रदूत भारतेन्दु जी को जो सम्मान दिया गया, उसके वे हकदार अवश्य थे। इन्होंने देश समाज के हित में लेख लिखे, कविताएँ लिखीं, कहीं भाषण दिए, नाटक रचे और ‘अभिनय’ किया। विभिन्न बाधाओं के बावजूद वे अपने पथ से डिगे नहीं। वह खड़े रहे, अपनी प्रबल राष्ट्र निष्ठा और सुदृढ़ इच्छा शक्ति के साथ। निश्चित रूप से भारतेन्दु युगविधायक साहित्यकार थे। इन्होंने अपने जीवनकाल में पराधीन, आक्रांत, भयभीत राष्ट्र के दुःख और क्षोभ को प्रकट किया। हिन्दी भाषा ही नहीं हिन्दी साहित्य को भी नवीन राह दिखाई। उनके साहित्य में अगर रुदन है तो इसीलिए की जनसामान्य व्यथित था। खींझ है तो इसलिए की जनता असहाय थी। हुंकार है तो इसलिए कि यही देशोद्धार का एकमात्र मार्ग था।

संदर्भ सूची :

1. कुमार, डॉ. मनोज कुमार (संपा.) : ‘भारतेन्दु कृत भारत-दुर्दशा’, पण्डियन पब्लिशिंग हाउस, जयपुर, 2013, पृ. 14

2. कुमार, डॉ. मनोज कुमार (संपा.) : ‘भारतेन्दु कृत भारत-दुर्दशा’, पण्डियन पब्लिशिंग हाउस, जयपुर, 2013, पृ. 29

3. कुमार, डॉ. मनोज कुमार (संपा.) : ‘भारतेन्दु कृत भारत-दुर्दशा’, पण्डियन पब्लिशिंग हाउस, जयपुर, 2013, पृ. 51

4. शुक्ल, आचार्य रामचन्द्र : ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’, नागरी प्रचारिणी सभा, वारणसी, पेपरबैक्स, 1929, पृ. 246

5. सिंह, ओमप्रकाश : ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ग्रंथावली’, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, छठां संस्करण-2008, पृ. 431

6. सिंह, ओमप्रकाश : ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ग्रंथावली’, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, छठां संस्करण-2008, पृ. 447

7. सिंह, ओमप्रकाश : ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ग्रंथावली’, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, छठां संस्करण-2008, पृ. 441

8. डॉ. नगेन्द्र (संपा.)/डॉ. हरदयाल (सह संपा.) : ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’, मयूर पेपर बैक्स नोएडा-201301, बयालीसवां पुनर्मुद्रण संस्करण-2012, पृ. 445

संपर्क : ग्राम+पो.-बादम,

थाना-बड़कागाँव, जिला-हजारीबाग,

पिन-825311 (झारखण्ड)

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