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हास्य - व्यंग्य // नुक्ता चीनी // सुरेश खांडवेकर

सुरेश खांडवेकर

चीनी में नुक्ता निकालना कहां का बड़प्पन है। लेकिन ऐसे बुद्धिजीवियों की कमी नहीं। गुड़ की मिठास का मूल्यांकन करते-करते गुड़ के रंग पर इतनी बहस की उसकी मिठास ही उड़ जाये। शायद आप जानते हो, गुड़ या चीनी का संबंध मिठास से है। उसका चरित्र मिठास है। दोनों का नाम लेते हो लार टपकने लगती है, फिर कहने वालों का तांता मुहावरा बन गया, जितना गुड़ डालेंगे उतनी मिठास होगी। चाहे जूता बनाना हो, चाहे चप्पल बनाना हो, चाहे डिब्बा बनाना हो, चाहे पंखे बनाना हो, चाहे जो बनाना हो मूल पदार्थ के आवश्यक और प्राकृतिक गुण धर्म हो उसे ‘‘गुड़’’ कहा जाता है। अच्छा खालिस, शुद्ध कच्चा माल यानी गुड़। असल बात करनी है नुक्ता चीनी की।

चीनी में नुक्ता निकालना, चीनी में कड़वापन निकालना, चीनी को बेरंगा साबित करना, सफेद हो तो उसे जरूरत से ज्यादा चमकदार बताना। दाना छोटा हो बारीक बताना। दाना बड़ा हो तो मोटा बताता। जल्दी घुलती हो, नुक्ता चीनी की जमात बिना रेडियो, अखबारों और दूरदर्शन के इसका प्रचार करती रहती है। उनके विचार में दूरदर्शन के बजाय निकट-दर्शन कर चीजों पर, काम पर, भूमिका पर, तत्काल, किसी के भी सामने अपनी विपरीत दुरुत्साही प्रतिक्रिया व्यक्त करना उनका जाति धर्म है। यह जबरन, न चाहने पर बिना बुलावे, घुसपैठी, निठल्ले लेकिन समझदार जमात, बिना पूछे राय देती है। किसी पाषाण पुरुष को चेतना आने पर इस जमात का कोई नायक गलती से मिल जाये तो वह पत्थर तो हो ही जाता है, दूसरों की गाड़ी का भी रोड़ा बन जाता है।

आपको भी जरुर इस जमात के किसी वंशज से पाला पड़ा होगा। इस जमात का नाम है ‘‘विघ्न संतोषी’’ जमात! विघ्न डालो और संतोष पाओ, यह उनका सिद्धांत है। मजे कि बात यह कि वे बिल्कुल नहीं जानते कि वे बाधक बनते हैं। बल्कि वे स्वयं को संचेतक समझते है। बेवकूफ को सचेत करते है। भला काम करने के लिए घंटों गुजारते हैं। दूसरे के कठिन परिश्रम के गुड़ को यूं ही करेले में बदल देते हैं।

हमसे भी एक साहब अक्सर टकराते हैं। आजतक पूरा नाम नहीं जान पाया। लेकिन एस.बी. सिंह नाम मालूम है। टकराते-टकराते शाब्दिक प्रेम बढ़ गया। शाब्दिक इसलिये कि मैंने उसे निराशा से ओत-प्रोत पाया, लेकिन उपदेशों से लबालब। मेरे अक्सर आने-जाने के बीच में ही उनका मकान है। समय असमय टकराने पर मैं उसे दस-पांच मिनट का हमसफर पेसेंजर बनाता, लिफ्ट भी देता रहा। आखिर वह भी आदमी है। मानवीय गुणों से दबाता-दबाता मुझे निमंत्रण भी देने लगा। शायद पचास निमंत्रण के बाद मैंने सोचा इस उपदेश रत्न के घर जाना चाहिए। मौका मिला, एक चाय और नमकीन का प्रभाव तीन साल से जमा हुआ है निकलता ही नहीं, ना वह निकलता है और ना उसका प्रभाव।

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मैंने उसके बारे में एक परिचित से पूछा। उसने एक शब्द में परिचय दिया, ‘‘वह सिरफिरा।’’

मैंने पूछा, ‘‘वह छपाई लाईन में कब से है?’’

‘‘अरे हमारे साथ था, पंद्रह साल हो गये। उमर बीत गयी। सफेदी आ गयी लेकिन....’’

मैंने जवाब दिया, ‘‘कोई बात नहीं, कसूर उसका नहीं धंधे का है। पंद्रह सालों में तो स्याही कागज का बदल जायेगा, खून का रंग नहीं बदलता और कागज का रंग भी बदल जाता है, उसका भी बदल जायेगा।

मैंने पूछा ‘‘वैसे तो हम सिंग साहब-सिंह साहब कहते रहते हैं। सिंग का नाम क्या है?’’

‘‘एस. बी-एस. बी कहता फिरता है।’’

‘‘शिव बहादुर सिंह’’

‘‘उसका नाम बदल दो।’’

‘‘क्या रखें?’’

‘‘शिकायत बहादुर सिंह।’’

शिकायत बहादुर कितना कमाता है, यह मुझे नहीं मालूम। ना ही कोई अंदाजा है। बड़ी-बड़ी रंगीन छपाई के विज्ञापन एजेन्सियां उससे बड़े-बड़े रंगीन छपाई के काम कराती है। कभी 20 लाख के आफसेट प्रेस लगाने की योजना बनाते है। कभी अच्छा सा बड़ा सा कैमरा लगाना चाहते है। सरकारी प्रकाशन विभाग से भी लंबी बातचीत चल रही है। कई बड़ी-बड़ी कंपनियों के केटलाग और पोस्टर का आर्डर भी मिलने वाला है। इम्पोर्ट सब्सिटयूट प्रिंटिंग रिजल्ट मांगने वाली पार्टी भी उन्हें 50 लाख का धंधा देने वाली है। कई प्रोजेक्ट हाथ में है।

देश में बहुत पूछताछ करने के बाद अब ताईवान की एक कंपनी ने उन्हें तलाशा, साठ-सत्तर लाख रूपये की लागत का काम देने का भी वचन दिया है। एक दिन हमारे मित्र के कार्यालय में उसके अलावा चार दोस्त मिल गये। कार्यालय के कर्मचारियों के सामने हमने शिकायत बहादुर से चाय-नाश्ते का आग्रह किया। मुकरते गये.। आखिर हम चारों ने बातों ही बातों में उसे चारों खाने चित किया, तब उसने जेबें झाड़कर कुल ग्यारह रूपये निकाले। दस का नोट चपरासी को दे, और एक का नोट जेब में यह कहकर रखा कि उसे बस से घर भी जाना है।

हमने कहा, ‘‘यार इतना बड़ा काम और बसों में धक्के खाते हो अच्छा नहीं। ‘‘स्कूटर ले लो।’’

उसका स्पष्टीकरण था, ‘‘यार बजाज के मॉडलों में अब कोई दम नहीं, लोहिया भी अब रह ही गया, पैसे खूब कमा लिया। राजदूत मुझे पसंद नहीं, कायेनेटिक मेंढ़क जैसी लगती है। हालांकि है अच्छी। बुलट को लंबा रास्ता चाहिये, हीरोहांडा बकवास है, मोपेड भी कोई सवारी है, इससे साईकिल अच्छी। एटलस और हीरो ने तो कमाल कर दिया। ‘‘तो एक साईकिल रख लो’’ साईकिल से ही चलना है तो डी. टी. सी. बस क्या बुरी है।

वीर, वर्मा सुशील और शिकायत बहादुर अपने धंदे से सहपाठी रहें। व्यावसायिक मामलों में तो उन चारों से मुलाकात होती ही थी। धीरे-धीरे इस चाय मित्र से मैं भी जुड़ गया। पुराने तीनों मित्र उसके हमदर्दी है। उनके पास हौसले का स्टाक बहुत ज्यादा है, देते रहते है, चाय पिलाते रहते है, काम भी दिलाते रहते है। यहां तक नियत समय पर टेलीफोन और ऑफिस सुविधा भी निः शुल्क देते रहें है, लेकिन ढाक के तीन पात। यही नहीं कभी-कभी ढाक में एक पात भी नहीं रहता। वर्मा के बारे में कहता है।

‘‘यार वर्मा अभी तक कामयाब नहीं हुआ।’’

छपाई की प्रोसेसिंग फिल्मों में बेहिसाब गलतियां होती है।

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‘‘सिंह साहब पिछले 10 सालों से आप उसके टेलीफोन से दूसरों की घंटियां बजवा रहे हो, साथ-साथ काम सीखें। अब उसके पास अपना मकान है, स्टूडियो है, दस-बारह लोग काम कर रहें है। अरे कुछ तो अच्छाईयां होगी जो अपने बलबूते पर इतना बन गया।’’

अरे ऐसा बनना चाहते तो हम कहीं के कही पहुंच जाते, लेकिन हम काम एक्यूरेट देना चाहते हैं। समझौता बिल्कुल नहीं। काम करने वाले सैकड़ों है। फिर मैंने पूछा, ‘‘आप छापते हो सुशील की प्रेस में? अरे, सुशील को आठ साल हो गये प्रेस में, एक करोड़ की तो मशीनरी है उसके पास। पचास लोग काम करते है और यही नहीं, इतना सब होने के बाद खुद काम करता है, गुरूर नहीं।’’

‘‘यहीं तो मार खा जाता है, आदमी। अरे तुम तो कलर प्रिंटिंग का काम सुशील से छपवा रहे हो, मैं तो उसके काले (ब्लैक एण्ड वाईट) काम को भी नाली में फेंक दूं। इतना अखरता है।’’

इसकी दिव्य दृष्टि आदमी से लेकर चीजों के आर-पार हो जाती है। एक्सरे की किरणें जैसे केवल हड्डियों के ढांचे को दिखाती हैं, इनकी किरणें उससे भी ऊपर है। आदमी और चीजों के दोष दिखाती हैं। बसों की बात करो, घडियों की बात करो, टेलीफोन की, नेताओं की, कपड़ों मिठाइयों या सब्जियों की बात करो, ये दोषालंकृत करने में माहिर हैं। मिठाइयों या सब्जियों की बात करो, ये दोषालंकृत करने में माहिर हैं।

आप साहस समेटे रहो, इसी में आपकी भलाई है!

शिकायत सिंह एक आम आदमी है। उसकी अपनी एक आम राय है। उसे क्या पता कौन कितने पानी में हीरे-मोती, पत्थर, सीपियां या मछलियां निकालता है। उसे क्या पता उछलती लहरों और फुफकारती हवाओं का! जूता बनाने वाला ही जानता है उसकी सांसारिक तकलीफें!

शिकायत सिंह की जूतों के बारे में भी अपनी एक अलग राय है। ‘‘बाटा के क्या कहने, कीमतें बेहिसाब हैं। करोना का भी नाम है, उसका भी बड़ा हिसाब है। लखानी ने बहुत तरक्की की है, वैरायटी भी बहुत है, बस यह मिलते-जुलते ही हैं। एक्शन तो बहुत चढ़ गया है-एक से एक डिजाइने-सारे सब छुट-भैये नकल मारते हैं, लेकिन बस नाम ही नाम समझो।’’

‘‘आखिर आप कौन सा जूता पहनते हो?’’

‘‘अरे यार, कारीगर से बैठकर बनवाया, दो महीनों में जवाब दे दिया।’’

‘‘आपने उसे भी अपनी मुबारक सलाह दी होगी?’’

‘‘बेवकूफ है जहां धागा चाहिए था, उसे फेविकोल लगा दिया।’’

¬¬ऽऽऽ

एसबीएस यानी शिकायत बहादुर सिंह सिंह अभी-अभी ससुर की तेरहवीं की मुंह दिखाई कर बुरहानपुर से दिल्ली लौट आया। तबीयत से नुक्ता जीम आया। फिर भी अपने जीजा-साढ़ू के सामने अपनी भड़ास खूब निकाली, ‘परेश तो फिर भी ठीक है, नरेश ने तो हद कर दी। कामधाम का ठिकाना नहीं। बाप की तेरहवीं करने की क्या जरूरत थी? तीसरे में किरिया होती है आजकल। दो बार आना पड़ा। एक बार दाग देने के टेम और दूसरी बार तेरहवीं के दिन। बच्चों की रेलमपेल हुई अलग।

जीजा ने समझाया, ‘सिंग साहब, हमारे कुछ रीतिरिवाज भी हैं, जिनके पास ज्यादा कमाई है वे फटाफट उठाला कर देते हैं और जिनके कमाई नहीं उनके पास टेम ही टेम है। वे उठते-बैठते ही तेरह दिन काट ही लेते हैं। दिल्ली के लालाओं के पास कहां टाईम है 13 दिन का। जाम, लाल बत्तियां, प्रदूषण, दिल की बिमारियां...।’

साढू ने बीच में टोका, ‘ये लाला लोग भी 13 दिन की क्रिया करते तो आठ-दस दिन तो शान्ति के मिलते।’

सिंग साहब कैसे रुकते। बोल पड़े, ‘कहां की शान्ति, खून के रिश्ते वाले 13 दिन इकट्ठे हो जाए तो गजब हो जाये।’

‘कैसे?’

‘अभी दिल्ली में हर रोज 13 मर्डर होते हैं। 13 दिन रिश्तेदार इकट्ठे हो जाए तो 1 दिन में 130 मर्डर हो जाए।’

क्रिया का किरिया शब्द उच्चारण में भले ही असलाया रूप हो, फिर भी इसके भाव परिस्थितियों के अनुसार अलग है। तेरहवीं की क्रिया बोलने में अंतिम संस्कार के बाद की क्रिया का भाव थोड़ा हल्का हो जाता है।

साढू बोला, ‘किरिया-उठाला रोज-रोज होता है? डेढ़ लाख रुपये भी लग गये, ससुर की बीमारी में। परेश ने अपने दम पर कर्जा लिया।’

‘पता था कि बचना नहीं है मरने के बाद भी पैसा लगना है, बचा लेता 20-25 हजार रुपये?’

‘कैसी बात करते हो सिंग साहब?’

‘क्या गलत कह रहा हूं? परेश को अभी भी कर्जा लेना पड़ा?’

‘हमें मालूम नहीं। हम तो ज्यादा गहराई में जाते नहीं हैं।’

सिंह साहब रूके नहीं, ‘नुक्ते की बात सुनो, परेश के साथ मैं भी गया था। सेठ रामलाल के पास उससे पहले भी कर्जा लिया था। अब भी नुक्ते के नाम पर बीस हजार का कर्जा लिया। मेरे सामने की बात है। परेश कह रहा था सेठ से, ‘बस नुक्ता ठीक हो जाय। पिता की आत्मा को शान्ति मिल जाये।’

जीजा-साढू चुप बैठे रहे। सिंग साहब गांठ खोलते रहे, ‘अब कर्जा लिया नुक्ते के लिए तो नुक्ता तो ठीक करो। खाना तो ढंग का खिलाओ। नुक्ते के लड्डू परात में रखते ही फैल जाते थे। पूड़ी ऐसी थी दोनों हाथों से तोड़नी पड़ी। रायते की जगह खट्टा पानी पिलाया। इससे अच्छा तो गोलगप्पे का पानी पिला देता। बर्फी भी बनाई थी। नाम बर्फी का स्वाद बर्फ से भी फिका। ये तो आलू-बैगन की सब्जी थी, वर्ना वहीं हाथ धोधा के वापस आना पड़ता।’

फिर साढू बोला, ‘सिंह साहब नुक्ती के दाने बिखरे जरूर लेकिन आपने तबीयत से खाया ना?’

सिंग बोला, ‘आखिर मेरे ससुर थे, उनकी आत्मा की शान्ति के लिए क्या मैं सिर्फ आलू बैगन खाऊं? और वैसे भी हम क्या कोई शुगर के मरीज है?’

‘सिंग साहब,’ जीजा ने केबी को समझाया, ‘देखो इतनी तकलीफ के बाद भी परेश ने बाबूजी की तेरहवी की। सब रिश्तेदारों को मीठा खिलाया, तुम तो नुक्ते में से भी चीनी निकाल रहे हो?’

केबी सिंह उछल पड़ा, ‘ना करता नुक्ता, क्या हम इतने गये बीते हैं कि नुक्ते से पेट भरे? ससुरजी होते तो क्या कहते?’

साढू बोला, ‘वो होते नुक्ते की नौबत ही नहीं आती।’

जीजा बोला, ‘छोड़ो इन बातों को नुक्ते की चीनी मत निकालो।’

सिंग कहां रुकते बोले, ‘मैं नुक्ते में चीनी नहीं निकाल रहा हूं मैं कह रहा हूं पैसा नहीं था तो कर्जा निकालने की क्या जरूरत थी? नुक्ते की जगह दो-चार चम्मच चीनी खिला देते। आदिवासी तो गुड की ढेली खिला देती हैं। ससुरजी की आत्मा इसमें भी खुश हो होती।’

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