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प्राची - सितम्बर 2018 - पुस्तक समीक्षा प्रतिनिधि लघुकथाएँ संपादक- डॉ. कुंवर प्रेमिल

पुस्तक समीक्षा

प्रतिनिधि लघुकथाएँ अंक 9-10

संपादक- डॉ. कुंवर प्रेमिल

संपर्क : एम.आई.जी-8, विजयनगर, जबलपुर-2, (म.प्र.)

समीक्षक- आचार्य दिनेशनंदन तिवारी

संपर्क : कॉलोनी रायपुरा, विकास विहार, निर्मल अस्पताल के पास, पो. सुंदरनगर, रायपुर (छ.ग.)- 492013

प्रतिनिधि लघुकथाएं का संयुक्तांक 9-10 प्रकाशित हुआ है. कवर पेज चित्ताकर्षक है. इसमें अनियतकालीन प्रकाशित होने वाली ‘ककुभ’ भी शामिल है. इसमें लगभग 40 लघुकथाकारों की लगभग 120 लघुकथाएं शामिल की गई हैं।

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अंक की शुरुआत महिला लघुकथाकार विदुषी आभा सिंह से की गई है। महिलाओं को प्रथम पंक्ति में रखकर उन्हें सम्मानजनक स्थान दिलाना प्रतिनिधि लघुकथा परिवार की परंपरा रही है। उसके बाद रेणुचंद्रा, वंदना सहाय, उर्मि कृष्ण, आशा भाटी, नीता श्रीवास्तव, संगीता शर्मा की मर्मस्पर्शी लघुकथाएं हैं.

उसके बाद पुरुष लघुकथाकारों में अशोक अंजुम, श्याम कुमार राई, राधेश्याम पाठक उत्तम, कुंवर प्रेमिल, प्रदीप शशांक, राकेश भ्रमर, मनोहरा जी, देवेन्द्र कुमार मिश्रा, श्यामसुंदर गर्ग (सुमन जी) डॉ. रामकुमार घोटड़, सुरेश तन्मय, किशनलाल शर्मा, दिनेश नंदन तिवारी, के.बी. श्रीवास्तव, रामयतन यादव की हृदयस्पर्शी लघुकथाएं हैं. इसमें अन्य शामिल लघुकथाकारों की लघुकथाएं भी पठनीय तो हैं ही, मनन करने, विचार-विमर्श करने के योग्य भी हैं।

‘निरख-परख’ स्तंभ में वरिष्ठ लघुकथाकार माधव नागदा से प्रभारी संपादक द्वारा लिया गया साक्षात्कार है. जिसमें ‘लघुकथाकार की दृष्टि एक्सरे की भांति पैनी हो’- शीर्षक के तहत लघुकथा और लघुकथाकारों के बारे में विपुल सामग्री है. ‘मंजिलें’ में डॉ. तारिक असलम तस्नीम ने अपने साहित्यिक जीवन और यथार्थमय जीवन के बीच के अनुबंध को पूरी ईमानदारी से बयां किया है। ऐसा कोई सुलझा लघुकथाकार ही कर सकता है। तारिक साहेब लघुकथा पत्रिका के संपादक भी हैं और उन्होंने कई बेशकीमती लघुकथा सामग्री पाठकों को उपलब्ध कराई है. ‘जोगन’ लघुकथा पठनीय है, इसे साक्षात्कार के बाद तुरंत पढ़ा जा सकता है.

संपादक डॉ. प्रेमिल ने अंतिम कवर पेज पर लघुकथा को करिश्माई कहा है- उन्होंने लघुकथा को प्रकाश स्तंभ, जलती मशाल जैसी उपमाओं से अलंकृत भी किया है. स्मृति शेष- सतीश दुबे, महेन्द्रसिंह महलान, मो. मुइनुद्दीन अतहर को याद करते हुए सतीश दुबे जी को मरणोपरांत ‘लघुकथा सम्राट’ के सम्मान से नवाजा गया है. दुबेजी, महलान जी, अतहर जी की लघुकथा लेखन में गहरी पैठ थी...और दुर्भाग्य ने उन्हें हमसे जबरदस्ती समय से पहले ही छीन लिया.

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लघुकथा संग्रह ‘आठ’ बाबद भी आनन्द बिल्थरे, अशोक अंजुम, रामयतन यादव, डॉ. आभा सिंह, घोटड़ जी, सविता बजाज (धर्मयुग/कथाबिंब फेम) ने अंक को अपने प्रंशसात्मक दृष्टिकोण से परखा है. अंक 9-10 बाबद वरिष्ठ लघुकथाकार अशोक भाटिया (प्रतिक्रियायें आना शुरू) ने कहा ‘वास्तव में विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों से आ रहे’ विशेषांक/संकलन देख-पढ़कर ही लघुकथा के समकालीन परिदृश्य का समग्रता से अध्ययन किया जा सकता है. इस अंक के लिए संपादक मंडल का परिश्रम दिखाई दे रहा है, आपको बधाई.

बधाई पूरे संपादक मंडल को देकर भाटिया जी ने हर एक के श्रम का ईमानदारी से मूल्यांकन किया है- इसके लिए उन्हें भी बधाई. अंत में कवर पेज-3 के नीचे संपादक की यह पंक्ति जरूर उल्लेख करना चाहूँगा- ‘लघुकथा से अनभिज्ञ रहना यानी अज्ञानता की चादर ओढ़कर सोना है.’ इति.

प्रतिनिधि लघुकथाएँ अंक 9-10

संपादक : डॉ. कुंवर प्रेमिल

प्रकाशक : प्रज्ञा प्रकाशन, रायबरेली

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