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प्राची - सितम्बर 2018 - दिनकर के काव्य में राष्ट्रीय चेतना // प्रियंका शर्मा

शोध लेख

दिनकर के काव्य में राष्ट्रीय चेतना

प्रियंका शर्मा

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शोधार्थी, हिन्दी विभाग

विनोबा भावे विश्वविद्यालय,

हजारीबाग (झारखण्ड)

दिनकर जी आधुनिक युग के उन कवियों में से थे, जिन्होंने काव्य जगत पर छाये हुए बादलों के कुहासे को चीरकर राष्ट्रीयता और मानवता का प्रखर प्रकाश विकीर्ण किया। जन-जागरण की जो ध्वनि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के समय से आरम्भ हुई और जिसे मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी तथा नवीन जैसे कवियों ने मुखरित किया था, उसी ध्वनि को दिनकर ने भारत के कण-कण और जन-जन तक पहुँचाकर सच्चे जन-पक्षधार कवि का कर्त्तव्य निभाया। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ छायावादोत्तर काल के उन कवियों में से थे जो छायावाद की कल्पना के कुहासे से ढँके मानव-सौन्दर्य के खोखलेपन को पहचान चुके थे। हिन्दी की छायावादी कविता के बाद कविता को यथार्थ और सत्य की दृढ़ भूमि पर लाने वाले कवियों में दिनकर का स्थान शीर्ष पर है। उनकी ओजस्वी वाणी ने हिन्दी कविता को प्रेम औरशृंगार की सँकरी गलियों से निकालकर जीवन के संघर्ष-पथ पर ला खड़ा किया था।

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अंग्रेजी हुकूमत से महात्मा गाँधी सत्याग्रह और असहयोग के अहिंसात्मक उपायों द्वारा संघर्ष कर रहे थे। देश में नव-जागरण की लहर फैल चुकी थी। कुछ कवि उस लहर में बड़ी तेजी के साथ बह रहे थे। श्री मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, राम नरेश त्रिपाठी आदि कवियों ने कविता में राष्ट्रीयता का स्वर भरा था। परन्तु सच्चे अर्थों में भारतीय युवा वर्ग के निराश हृदय में देशभक्ति की उमंग लहराने वाले एकमात्र कवि उन दिनों ‘दिनकर’ ही थे। अनुभूति की तीव्रता, भावों की गतिशीलता और क्रांति की पुकार दिनकर की कविता में हमेशा गूँजती थी। स्वाधीनता के उपरांत भी जब-जब देश पर बाहरी आक्रमण के बादल मँडराये, दिनकर की सिंह दहाड़ ने जन-जन में राष्ट्र प्रेम और बलि भावना का संचार किया था।

दिनकर का प्रारंभिक काव्य राष्ट्रीय चेतना को ही उजागर करता है जिसका सृजन दिनकर ने नौकरशाही के शिकंजे के बीच रहकर किया। जनता के हृदय में जो भाव अस्पष्ट रूप से गूँज रहे थे दिनकर ने उन्हें सुस्पष्ट कर दिया। युग के हृदय में जो कविता बेबसी से छटपटा रही थी, दिनकर ने उन्हें छंद में बाँध कर युग के हाथों में धर दिया। 1920 ई. में गाँधी जी का अहिंसक आन्दोलन असफल हो चुका था। इस स्थिति से नवयुवकों के हृदय में आक्रोश उत्पन्न हो गया था। इसी आक्रोश को अभिव्यक्ति देते हुए दिनकर ने हिमालय से कहा-

‘रे रोक युधिष्ठिर को न यहाँ,

जाने दे उनको स्वर्ग धीर

पर फिरा हमें गाण्डीव गदा,

लौटा दे अर्जुन भीम वीर।’1

देश के अन्तर्मन में अहिंसा के विरुद्ध उग्र भावनाओं का जो स्वर जल रहा था, उसे अत्यन्त सबल भाषा में अभिव्यक्त करने का काम दिनकर ने किया। ‘विपथगा’ कविता में क्रांति कहती है-

‘असि की नोकों से मुकुट जीत अपने सिर उसे सजाती हूँ

ईश्वर का आसन छीन, कूद मैं आप खड़ी हो जाती हूँ

थर-थर करते कानून, न्याय, इंगित पर जिन्हें नचाती हूँ

भयभीत पातकी धर्मों से अपने पग मैं धुलवाती हूँ

सिर झुका घमण्डी सरकारें करती मेरा अर्चन-पूजन।’2

हुंकार कविता में दिनकर का राष्ट्रीय स्वर तीव्रतर होता दिखाई देता है. इस कविता में दिनकर देश की जनता को ललकारते हुए नजर आते हैं :-

‘उर में दाह, कंठ में ज्वाला,

सम्मुख यह प्रभु का मरुस्थल है

जहाँ पथिक जल की झांकी में

एक बूँद के लिए विकल है

घर-घर देखा धुआँ पर सुना,

विश्व में आग लगी है

जल ही जल जन-जन रटता है,

कंठ-कंठ में त्याग जगी है।’3

‘धूप और धुआँ’ उनकी स्वतंत्रता के तुरन्त पश्चात् प्रकाशित होने वाला काव्य संग्रह हैं। स्वराज्य से फूटने वाली आशा की

धूप और उसके विरुद्ध जन्में हुए असन्तोष का धुआँ ये दोनों ही इन रचनाओं में प्रतिबिम्बित होती है-

‘धुओं का देश है नादान! यह छलना बड़ी है

नयी अनुभूतियों की खान वह नीचे पड़ी है,

मुसीबतों से बिंधी जो जिंदगी रौशन हुई वह

किरण को ढूँढ़ता लेकिन, नहीं पहचानता है।’4

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‘परशुराम की प्रतीक्षा’ नामक काव्य की रचना दिनकर ने उन दिनों की, जब देश विदेशी आक्रमण की परिस्थितियों से जूझ रहा था। इस रचना में उन्होंने राष्ट्र-रक्षा हित युवकों के शौर्य को चुनौती देते हुए अपनी ओजस्विता का परिचय दिया है-

‘सामने देश माता का भव्य चरण है

जिह्वा पर जलता हुआ एक, बस प्रण है,

काटेंगे अरि का मुण्ड कि स्वयं कटेंगे

पीछे परन्तु सीमा से नहीं हटेंगे।’5

दिनकर जी ने अपनी मौजूदगी से यह अहसास करा दिया था कि कविता में वह शक्ति आज भी कायम है जो अनाचार-अत्याचार, शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ आग उगल सकती है, भूचाल ला सकती है, सत्ता के मद में बेहोश राज नेताओं की नींद हराम कर सकती है। राष्ट्र की वास्तविक सत्ता जनता है। अतः जनता को ही दिनकर ने राष्ट्र स्वामी स्वीकार किया और जन-विरोधी शक्तियों को ललकारते हुए कहा-

‘सदियों की ठंडी-बुझी राग सुगबुगा उठी,

मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;

दो राह समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।’6

वर्त्तमान में इस माहौल में दहाड़ने वाले प्राणवान कवि की कमी तो सबको खटक रही है। समय के जलते प्रश्नों पर जितनी प्रखर रचना दिनकर ने लिखा उतना किसी कवि ने शायद नहीं लिखा है।

निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि दिनकर के काव्य में राष्ट्रीय चेतना का स्वर अजस्त्र वेग से प्रवाहित हुई है। दिनकर की कविता का शब्द तत्कालीन परिवेश में जीवन, जागृति और चुनौती का संदेशवाहक शब्द है। राष्ट्रीय चेतना का विपुल साहित्य दिनकर ने जितना प्रस्तुत किया उतना बहुत कम साहित्यकार कर सके हैं। वास्तव में दिनकर का दिनकरत्व ‘रेणुका’, ‘हुंकार’, ‘कुरूक्षेत्र’, ‘रश्मिरथी’ और ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ में पूरे तेज से जलता है।

संदर्भ :

1. दिनकर, रामधारी सिंह : ‘रेणुका’, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद-1, पृ. 7

2. दिनकर, रामधारी सिंह : ‘हुंकार’, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद-1, पृ. 15

3. वही, पृ. 20

4. दिनकर, रामधारी सिंह : ‘धूप और धुआँ’, श्री अजन्ता प्रेस लिमिटेड, पटना, पृ. 12

5. दिनकर, रामधारी सिंह : ‘परशुराम की प्रतीक्षा’, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद-1, पृ. 14

6. दिनकर, रामधारी सिंह : ‘नील कुसुम’, उदयाचल, पटना-1, पृ. 29

सम्पर्क : द्वारा श्री प्रकाश बाबू

इन्द्रपुरी रोड नं.-13,

रातु रोड, राँची-834001 (झारखण्ड)

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