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2 लघुकथाएँ व 1 ग़ज़ल // राजकुमार निजात

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भूखा

सांझ ढले पार्क में एक कोने में बेंच पर बैठे हुए दोनों दिन भर की थकान उतारने का बहाना बनाकर शराब पी रहे थे । तभी वहाँ सात आठ साल का एक मरियल सा लड़का वहाँ आया और उसने अपना हाथ उनके आगे फैला दिया ।

" भूख लगी है साहब ?

" तो क्या दूं तेरे को ......पेग मारेगा ....? "

" नहीं साहब ! दारू नहीं रोटी .... पैसा दे दो । ......दो रूपिया , पाँच रुपिया ..... ? "

" अरे दारु पी ना ! भूख अपने आप मिट जाएगी। "

" नहीं साहब ! मेरे बाप जैसा मत बोलो । वह रोज दारु पी कर आता है और शाम को रोटी मुझसे मांगता है । रोटी नहीं मिली तो वह मारेगा मुझे । "

बालक ने ऐसा बोला तो उसके कान खड़े हो गए । वह अपने दारूबाज दोस्त से बोला , " आज से दारु वारु सब खत्म । इस लौंडे ने मेरी खोपड़ी हिला दी यार । मेरा बेटा भी इस जैसा ही है । आज सुबह उसने बोला था कि आज उसका जन्मदिन है । कहीं वह मेरा इंतजार करते-करते भूखा ही न सो गया हो ? "

कहते हुए वह उठा और तेजी से बाहर गेट की ओर दौड़ पड़ा ।

उसे लगा कहीं उसका बेटा भी इसी तरह भीख मांगने की आदत का शिकार ना हो जाए ?

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** लघुकथा की पीड़ा  **  

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उसने लघुकथा से पूछा , " तुम्हें सब जानते हैं । क्या तुम भी सबको जानती हो  ? "

वह बोली  , " जब से मैं सबकी चहेती हो गई हूँ ,  मुझे स्वयं का भी पता नहीं रहता कि मैं अब कहाँ हूँ  ,  कैसे हूँ और किसकी हूँ  ? "

         "  ऐसा क्यों  ? तुम्हें सब पाना चाहते हैं  , तुझसे बात करना चाहते हैं , तुम्हें देखना चाहते हैं , सुनना और पढ़ना चाहते हैं  ? " 

         "  दरअसल हर किसी ने मुझे अपने साहित्य पथ की सीढी बना लिया है । किसी ने मुझे रचना की सीढी बनाया तो किसी ने आलोचना की । किसी ने संपादक की तो किसी ने प्रकाशक की सीढी बना लिया । कोई मुझे अपने ग्रुप में बाँध कर बैठ गया है तो कुछ चालाक लोगों ने मुझे बाजार बना दिया है । लोग अंधाधुंध लिख रहे हैं  , मुझे थोक में लिख रहे हैं । वह न मेरी सुनते हैं और ना किसी और की । "

          "  यह तो अच्छा है लघुकथा  !  तुम्हारा विस्तार हो रहा है , विकास हो रहा है । तुम कहानी और ग़ज़ल से ज्यादा जानी - पहचानी जाने लगी हो  ?  "

          " लेकिन आलोचक लोगों ने मुझे अपनी प्रयोगशाला बना लिया है । वह मुझे रोज चीरते - फाड़ते हैं , मेरी बखियाँ उघेड़ते हैं । बस अपनी कहकर चले जाते हैं  ,न मेरी सुनते हैं  ,  न किसी दूसरे की । मैं करूं तो क्या करूं  ? "

          " तुम न्याय की मांग क्यों नहीं करती  ? "

         "  किससे करूँ ? "

         "  आलोचकों से करो , संपादकों से करो , लेखकों से करो  ? "

         "  यही तो वे लोग हैं जो मुझे न्याय देने की बजाय खुद न्याय के लिए भटक रहे हैं । "

         "  अच्छा मुझे पहचाना मैं कौन हूँ  ? " प्रश्न कर्ता ने उसकी आँख में आँख डालकर सवाल किया ।

         ,"  अरे  ! तुम अब पत्रकार बन गए हो  ? पहले तुम केवल लघुकथाकार थे । फिर तुम संपादक बने  , फिर आलोचक बने , उसके बाद प्रकाशक बन बैठे । आजकल तुम फेसबुक पर जमकर बैठ गए हो  ......और अब ..... ?  यह क्या भेष बना रखा है तुमने अपना  ? ...... तुम लेखक ही अच्छे थे मेरे भाई   !   केवल लघुकथाकार .... ? "

लघुकथा ने जब यह प्रश्न पूछा तो प्रश्नकर्ता गायब था ।

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एक ग़ज़ल

सुकून  बाँटे वो आँगन कहीं तलाश करें
सुबह की धूप सा सिमरन कहीं तलाश करें

कबीर आज भी  लोगों में गुनगुनाता है
वहीं दोहे वही रहिमन कहीं तलाश करें

जगा दे सोए हुए आदमी की सोई जमीर
दिलों में ऐसी ही धड़कन कहीं तलाश करें

आदमी खो सा गया है शहर के जंगल में
जगा दे उसको वो बचपन कहीं तलाश करें

नहीं  हो   जाएँ   सभी   जर्द  ये   हरे   पत्ते
बस एक टुकड़ा वो सावन कहीं तलाश करें

हर एक  घर में   नफरत की कुलबुलाहट है
  हो जिसमें प्यार फकत वो सहन तलाश करें

हरेक पत्ते पे खुशबू की चासनी है  ' निजात '
दिलों के हूक सी खनखन कहीं तलाश करें

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संपर्क सूत्र :

राजकुमार निजात

मकान नंबर 57 , गली नंबर 1 , हरिविष्णु कॉलोनी , कंगनपुर रोड , सिरसा - 12 50 55 ( हरियाणा )

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