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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 13 // बंद दरवाज़ों के पार - पूर्णिमा वत्स


प्रविष्टि क्रमांक - 13

बंद दरवाज़ों के पार
पूर्णिमा वत्स
उसने कहा था कि किसी रोज़ वो यूँ ही दरिया हो जाएगा ...पर कोई सुन नहीं रहा था !उन दिनों सुनने वालों की दुनिया में अपार कमी थी। आज की तरह कहीं भी सोशल मीडिया नहीं था। हाँ तो मैं कहाँ थी....?यहीं कि उसने कहा था कि उसे अब दुनिया बेज़ार नज़र आती है ,लक्ष्यहीन और ऊबाऊ भी और सबको लगा था कि वो ऐसे ही मज़ाक कर रहा है। उसे कविताएं पसन्द थी और दूर तक जाती हवाओं भरी लंबी नदी भी.क्या वो बहना चाहता है ? ठीक-ठीक उसने सोचा नहीं था उसने कल ही अपने कमरे में एक ओर पंख बनाने का सामना रख छोड़ा था। कुछ मोर पंख ...कुछ कागज़ कुछ ज़िन्दगी की तरह सतही चीज़ें भी ....कमरे के एक ओर से आकाश दरवाज़े में से हौले-हौले झांका करता वो नीले पर्दों को कभी यूँ चढ़ा देता मानों दुनिया की उसे ख़बर ही नहीं हो ! एक दिन उसने औचक कहा क्या तुम्हें नहीं लगता वे सब जो दुनिया की खबरें रखने का दावा करतेंहैं वे कभी दुनिया को नहीं जान पाते?और मैं तेज़ी से खिलखिला कर हँस दी थी ...जानते हो न तुम कितनी बेतुकी बात किया करते हो ? उसकी आँखों में गहरा तेज़ था ...क्या तुम्हें बेतुके होने से डर नहीं लगता? मैंने फिर कहा था....क्या तुम्हें लॉजिकल होने से नहीं लगता?....हम्म ...शायद पर मेरा डर बड़ा है तुम्हारे डर से। वो कभी लॉजिकल नहीं होता और अगर होता भी तो लॉजिकल की उसकी अपनी परिभाषा थी मानो वो दुनिया में होकर भी नहीं था.....दुनिया से अलग उसके कमरे में दो दरवाज़े खुलते थे एक का रास्ता बाहर की दुनिया के लिए खुला करता था और दूसरे का दरवाज़ा उसकी अपनी जगह के लिए। मैं अक्सर वहां जाती ,जहां वो रहा करता था ...क्या ये बाहर वाला दरवाज़ा मैं खोल सकती हूं?हाँ... यदि तुम दुनिया के अभी इस तरफ़ न खड़ी हो तो ..."इस तरफ माने ?किस तरफ़ ? उसी तरफ़ जिसे तुम लॉजिक कहा करती हो ...
.दरवाज़े की इस तरफ़ की दुनिया लॉजिक के उस पार है वहां तुम अपने ज्ञान के साथ नहीं जा सकती ...जैसे अगर तुम मध्य रात्रि के चाँद को सिर्फ़ ये कह कर झुठला सकती हो कि वो एक तारा भर है और उसकी रौशनी सिर्फ़ सूर्य की है तो तुम कभी रात के आसमान को नहीं पा सकती .....एक दुनिया में जाने के लिए तुम्हें दूसरी दुनिया को बिसरा देना पड़ेगा....!
क्या कर सकोगी ?
मैं पहाड़ों पर भाग आयी थी और मुझे हमेशा लगा कि ये रात में गिरती हुई बर्फ़ ...ये दूर तक फैले हुए पहाड़ ही मेरे लिए कोई दूसरी दुनिया थे ...पर इससे आगे मैंने कभी किसी स्वर्ग के रास्ते के बारे में नहीं सोचा .... एलिन क्या तुम किसी स्वर्ग का रास्ता पा गए हो ......?
नहीं तो ...क्या तुम्हें लगता है वैसी कोई जगह यहां इस द्वीप पर खोजी जा सकती है????
शायद हाँ.... दूर तक फैला ये नीला पानी और उत्कर्ष पहाड़ तो कुछ ऐसे ही अंदेशा दिया करते हैं....
वो गर्म चिमनी के पास बैठा था... कमरे में एक ओर दूर तक भारी लकड़ियों के लठ्ठे पड़े हुए थे....उसने हल्के से जलती हुई आग में एक लठ्ठा डाल दिया...और चिंगारी तेज़ी से ऊपर की ओर गई ....वो देर तक चुप रहा और हमें लगा हम शून्य में हैं ...भीतर की चिंगारी बाहर की बर्फ़ ...और दूर तक का विराट शून्य .....!सहसा उसने मेरे हाथों को थाम लिया और एक गीत की धुन शुरू हो गयी ...वो अक्सर अपनी उदासी में यूँ ही किया करता...जाने क्यों उसे लगता कि उदासी की दवा बस हाथ भर होती है ...आप उसे थामें घण्टों गुजार सकते हैं ऑर्केस्ट्रा की धुनों के साथ उसका स्पर्श अक्सर ही मिलकर संगीत पैदा करता और तब मुझे लगता कि मैं एक ओर दुनिया में हूँ दुनिया जिसे मैं बस पहाड़ों तक ही अलग पाती आयी थी ...
क्या तुम एक कप कॉफ़ी पीना पसंद करोगी?उनसे फिर संगीत बंद कर कहा था पर मैं अभी भी एक अजीब संगीत में थी मेरे कानों के पास अभी तक उसके स्वर नहीं पहुँचे थे ...क्या वो इसी दुनिया की बात किया करता था ....बेसुध ...बेपरवाह सी दुनिया जिसमें हर चीज़ बस महसूस भर होती है ....और दिखाई कुछ भी नहीं देता?? उसने मुझे झकझोर कर फिर पूछा ....सुबह हो गई है...उठो तुम्हें अब घर जाना चाहिए.... क्या मैं सच में सपने में थी एलिन....? उसकी आँखों में अजीब सी आभा थी...क्या लॉजिकल लोग सपने में हो सकते हैं......हाहाहा हाँ शायद यदि तुम वहां से निकल आओ जहां तुम थे या तुम हो सकने की चेष्टा करते हुए दिखाई दो ....."कॉफ़ी को उसके सफेद टेबुल के करीब रखते हुए एक सफ़ेद फूल भी उसके साथ रख डाला था ....वो फूल किसी पेड़ की डाली से टूटा हुआ नहीं था पर वो फूल बर्फ़ का बना फूल था...जो कप की गर्माहाट से धीरे-धीरे पिघलने लगा था।
उस रोज़ बाहर भारी बर्फ़बारी हुई थी और हम दोनों की एक दूसरे के साथ उस दो कमरे के मकान में सिमट कर रह गए थे ...भीतर हल्की सी रौशनी थी और गहरा अंधेरा था ...वो एक ओर दो टेबल और एक कुर्सी लगी जगह पर जा बैठा था ...मेरे लिए ये आश्चर्य का विषय था ...अमूमन लोग दो टेबल नहीं रखा करते एलिन इसका क्या राज है ???
क्या तुम्हें इसमें कोई राज नजर आता है ? हाहाहा फिर कहा न हर जगह लॉजिकल !ऐसे मैं भी नहीं रखता पर इधर -उधर इतने जर्नल्स हैं कि मुझे दो की जरूरत पड़ ही जाती है। इसमें न कहीं दर्शन है ना लॉजिक ही सिर्फ और सिर्फ़ परिस्थिति वश है ये !ओह चलो कुछ तो था तुम्हारी जगह पर जो सामान्य था। क्या ...अच्छा यदि तुम सामान्य को परिभाषित करना चाहो तो कैसे करोगी ? वही जो सबकी तरह रहता है !और भला क्या ?
क्या फिर तुम सबकी तरह रहती हो ??सब कुछ में ....
जैसे मैं कहूँ कि तुम सब की तरह इन दस सालों में आज तक मुझे ये नहीं कह पाई कि तुम मेरे प्रेम से बंध गयी हो ...! क्या कहा तुमने ???वही जो तुम सुनना चाहती थी ....! मैंने अक्सर तुम्हारी साँसों को अपने करीब महसूस किया है ....क्या तुम्हें नहीं मालूम कि जब तुम उन बारीक फूलों को चुन रही थी तो ओर फूल अचानक कहाँ से गिर आये थे ???ओह मैं अभी भी तुम्हारे स्पर्श को महसूस कर पा रही हूं क्या हम अभी इस समय उस दूसरी दुनिया में जा सकते हैं ....?प्रेम का एक अर्थ रहस्योद्घाटन भी है एलिन जब तक तुम मुझे अपनी दुनिया में नहीं ले जाते मैं कैसे कह दूं कि तुम से अधिक मुझे तुम्हारी दुनिया से प्रेम है। सुनो अभी रात की बर्फ़ बाकी है तुम्हारे कोलम कदम उस पर चोट खा सकते हैं ...मुझे अभी इसी समय तुम्हारे अंधकार की दरकार है ....क्या प्रेम में होना काफ़ी नहीं .....इल्याना! हाँ शायद क्यों न तुम वो सामने रखी हुई अंगूठी आज ही मुझे पहना दो और हम प्रेम करे एक दूसरे के पाश में बंधकर ,मैं तुम्हारी दुनिया का हिस्सा हो जाना चाहती हूं एलिन ...जिसके पार वो दरवाज़ा खुलता है ...मेरी आत्मा को अब लॉजिक की दुनिया से अधिक तुम्हारे प्रेम की रौशनी की दरकार है ....क्या तुमने आगे का दरवाजा बंद कर दिया है ?उसे बंद करते हुए ही तुम मेरी दुनिया मेरे प्यार में आ सकती हो इल्याना " हाँ उस पर बर्फ़ की चादर है अभी कुछ वर्षों तक वे हमें प्रेम करते हुए नही पा सकेंगे।
(नींद के बाद )
क्या तुमने कहीं मेरी फ्रॉक देखी है तुम उसे फिर दूसरी दुनिया में फेंक आये हो ...जानते हो न वहां प्रेम ,आलिंगन के लिए सख्त मनाही है ...हाँ जानता हूँ ....पर यहां नहीं है ...ये पीछे का दरवाजा है और आज हम इसी दुनिया में अपने को समर्पित करते हैं ...........!
पीछे के दरवाज़े के खुलते ही उसके भीतर से तेज रोशनी बह रही थी ....सामने विशाल मैदान में असंख्य खरगोश उछल -कूद मचा रहे थे ....बाहर एक सोत बहा रहा था जिसमें तितलियां गा रही थी ....उस दुनिया में असंख्य जोड़े थे जो इसी दो दरवाज़े वाले घर में प्रेम में पड़े लॉजिक की दुनिया से दूर अब प्रेम में मशगूल थे ....जानती हो लॉजिक हर जगह नहीं होता ...पर प्रेम वो हर दुनिया में हर जगह अपना स्थान तलाश ही लेता है ...कभी किसी प्रेमिका की आँखों में ,कभी आलिंगन में तो कभी अधरों से अधरों के बीच की दूरी में !तुम मेरा लॉजिक और मेरी दुनिया के बीच में बना प्यार हो जिसमें आज भी दो दरवाजे हैं एक मेरी दुनिया का आधा और एक तुम्हारे सपनों का आधा।
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