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प्राची अक्टूबर 2018 : संपादकीय : ये विदेशी लोग // राकेश भ्रमर

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सम्पादकीय

ये विदेशी लोग

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दिल्ली की मैट्रो ट्रेन में यात्रा कर रहा था. सीट नहीं मिली थी, इसलिए खड़ा था. मेरे पीछे खड़े दो व्यक्ति आपस में बात कर रहे थे. एक कह रहा था, "यार, ये अचानक एसी कम कैसे हो गया? अभी तो ठंडा था, अब गरमी लग रही है. ये मैट्रो वाले भी न!’’

दूसरे ने केवल ‘हूं’ कहा और चुप हो गया, परन्तु पहले वाला चुप नहीं रहा. वह आगे बोला, "यार, मैट्रो का सफर बहुत खराब होता है."

"हाँ," इस बार दूसरे व्यक्ति का मुंह खुला.

मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ. ये कौन व्यक्ति हैं, जो दिल्ली की मैट्रो के साफ-सुथरे, वातानुकूलित और शोर रहित सफर को खराब बता रहे थे. मैंने पीछे मुड़कर देखा- दो हट्टे-कट्टे व्यक्ति, जो शक्ल से मेहनतकश लग रहे थे, आपस में बात कर रहे थे. उनके कपड़ों से लग रहा था, कभी उनको अच्छे कपड़े नसीब नहीं हुए थे.

मैं सोच में पड़ गया- बेचारे दिल्ली में रहने वाले विदेशी लोग! उन्हें डीटीसी की बसों का धक्कमपेल और हाड़तोड़ सफर सुहाना लगता होगा. टैक्सी में कभी सफर नहीं किया होगा, परन्तु क्या करें बेचारे! बढ़िया सफर को बुरा नहीं कहेंगे, तो कैसे पता चलेगा कि वह भारत में रहनेवाले विदेशी लोग हैं.

ऐसे विदेशी लोग न तो खुद के लिए कुछ करते हैं, न देश और समाज के लिए, परन्तु बातें बड़ी-बड़ी करते हैं. जैसे उनकी बातों से ही यह देश चलता है. ऐसे लोगों को हर चीज बुरी लगती है. वह राह चलते गंदगी करते हैं, यहां वहां थूकते रहते हैं और नगर निगम को कोसते हैं कि सफाई कर्मचारी कूड़ा नहीं उठाने नहीं आते. सरकार की आलोचना करना ऐसे लोगों का जन्मसिद्ध अधिकार होता है, परन्तु कर्तव्य का पालन उनके कार्यक्षेत्र में नहीं आता.

कुछ ऐसे भी विदेशी होते हैं, जो वास्तव में विदेश में रहते हैं, परन्तु गाहे-बगाहे भारतीयों की उनकी औकात बताने के लिए भारत आते रहते हैं. वह महंगी कारों में चलते हैं, और विदेशी सड़कों की तारीफ करते हुए देशी सड़कों पर खाली पानी की बोतलें और फास्ट फूड के रैपर फेंकते रहते हैं. वह सड़क किनारे की गंदगी को देखकर नाक-भौं सिकोड़ते हैं, परन्तु स्वयं बीच में गाड़ी रोककर लघु शंका करने लगते हैं. कुछ लोग आपातकाल में दीर्घ शंका भी कर लेते हैं, क्योंकि दूर-दूर तक कहीं शौचालय नहीं होते. पिछली सरकारों ने बनवाये ही नहीं. वर्तमान सरकार बनवा रही है, तो गालियां खा रही है कि जब पेट में नहीं जाएगा दाना, तो कौन जाएगा पाखाना.

आंकड़े बताते हैं कि देश में अमीरों की संख्या बढ़ी है, परन्तु लोग कहते हैं कि सरकार लोगों को रोजगार मुहैया नहीं करवा पा रही है. फिर बताओ, देश में शौचालयों की क्या आवश्यकता. जो लोग थोड़ा-बहुत खाते-पीते हैं, वो लोग कहीं भी सड़क-रेल के किनारे शंकायें व्यक्त कर लेते हैं.

विदेशी सोच के व्यक्ति अपने हर देश की तुलना विदेशी चीजों से करते रहते हैं. वह विदेश कभी नहीं जाते, परन्तु उनको पता है कि दिल्ली के ओखला की सब्जी मंडी एशिया की सबसे बड़ी सब्जी मंडी है.और मुंबई के धारावी की झोंपड़-पट्टी संसार की सबसे बड़ी झोंपड़ बस्ती है.

विदेशी लोग कर्म में विश्वास नहीं करते. वह सिद्ध आलोचक होते हैं. देश में रहने वाले इन विदेशी लोगों को शत् शत् प्रणाम!!!

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