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प्राची अक्टूबर 2018 : पाठकों के पत्र

आपने कहा है

अंक की श्रेष्ठ कहानी ‘आत्मा की मौत’

पत्रिका ‘प्राची’ का सितम्बर, 2018 अंक प्राप्त हुआ. प्रारम्भिक रूप से आवरण चित्र की कलात्मकता हृदय को छू गयी. चित्रकार का नाम नहीं मिला!

पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को श्रद्धांजलि देते हुए बहुत गरिमा और स्तरीय रूप से सामग्री प्रकाशित की गयी है. धरोहर के रूप में भारतेन्दु हरिश्चंद्र का प्रहसन और व्यंग्य प्रकाशित किया जाना एक अपनी थाती के प्रति समुचित सम्मान ही है! कहानियों में प्रभात दुबे की कहानी ‘यशोदा’ ने लगभग अंत तक प्रभावित किया, परंतु अंत में बच्चे की माँ का कार से कूद जाना अनावश्यक और व्यर्थ नाटकीय था। वह डॉक्टर के यहाँ रह कर या उनकी सहायता से कुछ आजीविका कमा कर भी अपने पुत्र को समुचित शिक्षा दे सकती थी, परन्तु कहानीकार का अपना दृष्टिकोण उसकी एक प्रकार की ‘आत्महत्या’ से क्या रहा, यह समझ से परे की बात है!

डॉ. बलदेव पाण्डेय की कहानी ‘विषकन्या’ भी भलीभांति चलते हुए अंत में अस्पृश्यता उन्मूलन के बहाने ‘होंठों’ पर अटक गयी! लड़की की रोटी खाने के साथ ही कथा अपने उद्देश्य तक पहुँच चुकी थी.

एकमात्र सम्पूर्ण कहानी राकेश भ्रमर की कहानी ‘आत्मा की मौत’ लगी. वर्तमान परिवेश की प्रमुख समस्या को कहानीकार बहुत संयत और साहित्यिक रूप से लेकर चले और अंत तक इस स्तर को बनाये रखा. कहानी का अंत अत्यंत स्वाभाविक है और स्वयं इस पत्र के लेखक द्वारा यत्किंचित भोगा हुआ है! कमलाकांत जिस लड़की की माँ को उसकी पुत्री के बहकते कदमों के सन्दर्भ में बताने गये, वह माँ, जो कमलाकांत के पूर्व शिष्य की पत्नी है, उन्हें ही झूठे प्रकरण में फंसाने की धमकी देने लगी! ये स्थितियां अत्यंत स्वाभाविक हैं और कहानी को सहज बनाती हैं. कहानी का अंत बहुत वास्तविक और मर्मस्पर्शी है- आहत, हताश और निराश कमलाकांत जब अपने घर पहुंचे, तो वह इस तरह खटिया पर गिरे, जैसे उनकी आत्मा उड़ चुकी थी. आत्मा तो मरी थी, परंतु किसकी? कमलाकांत की, शिवानी की, उसकी माँ की या समाज की? किसी न किसी की आत्मा उस दिन अवश्य मरी थी. सुन्दर! एक बहुत सुन्दर कहानी!!

गणेश चन्द्र राही का आलेख ‘भारत यायावर की कविताएं’ एक सार्थक आलेख रहा. डॉ. विनय भारद्वाज से डॉ. भावना शुक्ल की बातचीत बहुत ज्ञानवर्द्धक है. डॉ. भावना के प्रश्न सामयिक और अर्थपूर्ण थे और उनके डॉ. विनय भारद्वाज ने बहुत सच्चे और सार्थक रूप से दिये. साक्षात्कार कला का यह अच्छा उदाहरण है.

दिलीप कुमार अर्श और ज्योति स्पर्श की कविताओं ने प्रभावित किया. शिक्षक दिवस पर आकांक्षा यादव का आलेख ‘प्रकाश-स्तम्भ की भांति हैं शिक्षक’ बहुत सुन्दर आलेख लगा. आलेख के अंतिमांश में वर्तमान शैक्षिक परिवेश के सन्दर्भ में लिख कर लेखिका ने उक्त लेख को उच्चता प्रदान की है, जो सीखने वाली बात है.

डॉ. नीना छिब्बर की लघुकथा ‘खून का रिश्ता’ सुन्दर कथ्ययुक्त है. पुस्तक समीक्षा भी महवपूर्ण स्तम्भ है, जिसे और बढ़ाया जा सकता है. पत्रिका में शोधपत्र प्रकाशित किया जाना सार्थक है. समग्रतः ‘प्राची’ एक स्तरीय पत्रिका लगी, जिसका श्रेय निस्संदेह इसके सम्पादक और प्रकाशक को जाता है. बहुत शुभकामनाएं!!

डॉ. सम्राट् सुधा, 94- पूर्वावली, गणेशपुर.

रुड़की, उत्तराखंड

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