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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 01 व 02// अशोक कुमार ढोरिया की 2 लघुकथाएँ


प्रविष्टि क्रमांक - 01
(1)
ईमानदारी का ज़मीर
बीते समय की बात है। उन दिनों मेरे पिता जी गरीबी की मार से जूझ रहे थे। परिवार बड़ा था। काम कभी मिलता तो उसकी मजदूरी का पैसा समय पर नहीं मिलता था। यहाँ तक कि कई बार तो बिना रोटी खाए सोना पड़ता था। भूखे पेट नींद तो कहाँ आती पर मजबूरी .......क्या नहीं कराती। एक दिन मैंने जंगल से कुछ लकड़ी काट कर,बाजार में बेचकर 10 रुपये कमाए और आटा लेने दुकानदार के पास गया। दुकानदार ने मुझे पाँच रुपये का आटा दिया और 50 रुपये का नोट मेरे हाथ में थमा दिया। मैंने दुकानदार से पूछा-ये इतने पैसे वापस क्यों दे रहे हो?दुकानदार ने मुझे झाड़ लगाते हुए कहा-कमीने कहीं के! पाँच रुपये मेँ तेरे को एक बोरी आटा दे दूँ ,दुकान तेरे नाम करवा दूँ। वह कुत्ते की तरह मुझ पर टूट पड़ा। इतना ही नहीं उसने मेरे गाल पर धमाक से चाटा जमा दिया। इसके बावजूद भी मैंने अपना ज़मीर नहीं खोया। मैं अपनी ईमानदारी पर कायम रहा। मैंने अपने आँसू पोंछते हुए दुकानदार से कहा आपने मुझे पाँच रुपये वापस देने थे और गलती से आपने 50 रुपये दे दिए हैं। ये वापस ले लो। हकीकत जानकर दुकानदार की आँखों में आँसू आ गए और मुझको अपने गले लगाते हुए अपनी दुकान में स्थायी रूप से नौकर रख लिया।

प्रविष्टि क्रमांक - 02
(2)
शाबासी लेने की ज़िद
बचपन कहूँ या शरारती जीवन कहूँ। जब मैं गाँव की प्राथमिक पाठशाला में पढ़ता था। एक दिन मेरे बड़े भाई ने मुझसे कोई काम करने को कहा। मैंने काम करने से मना कर दिया। भाई ने कहा यदि तू ये काम कर देगा तो मैं तुझे शाबासी दूँगा। फिर क्या था, मैंने झट से वह काम कर दिया। मुझे यह मालूम नहीं था कि शाबासी क्या होती है? मैं शाबासी को कोई चीज समझ बैठा था। काम करने के बाद मैंने भाई से शाबासी देने को कहा। भाई ने मेरी पीठ थपथपाते हुए कहा-शाबास! मैंने कहा नहीं, मुझे शाबासी दो। मैंने ज़िद कर ली। भाई ने कहा यही तो शाबासी है। मैं कहाँ मानने वाला था। मैं शाबासी के लिए  भाई के गले पड़ गया। भाई ने अपना पीछा छुड़ाते हुए मुझे इंग्लिश की एक पुरानी  ग्रामर की पुस्तक पकड़ा दी। पुस्तक लेकर मैं मान गया। मैंने ये शाबासी सम्भाल कर रख ली। ज्यों ही मैं बड़ा हुआ। इस पुस्तक का गहन अध्ययन किया। मुझे इंग्लिश ग्रामर का बहुत अच्छा ज्ञान हुआ। भाई की दी हुई उस शाबासी ने मुझे आज एक शिक्षक बना दिया। भाई  की दी हुई वो शाबासी  मुझे आज भी याद है और सम्भाल कर रखी हुई है।


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अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर (झज्जर)
हरियाणा

व्यवसाय -शिक्षक














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