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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 04 // नवनीता कुमारी की लघुकथा : जन्मदिन का उपहार

 

प्रविष्टि क्रमांक - 04 // नवनीता कुमारी की  लघुकथा
जन्मदिन का उपहार
अरी! ओ संचिता गूंगी होने के साथ -साथ बहरी भी हो गई है क्या? कमबख्त किसी काम की नहीं है। माँ -बाप चले गये इस दुनिया से और जी के जंजाल को हमारे पास छोड़ गये -------गुस्से में तमतमाती हुई संचिता की मामी ने संचिता को ढ़ेर सारी खरी-खोटी सुना दी। संचिता बेचारी अपनी मामी के पास गई तो संचिता की मामी ने उसे जूठे बर्तन साफ करने के लिए उसे थमा दी और पैर पटकती हुई चली गई।
संचिता अपने माँ-बाप को कार -एक्सीडेंट में खोने के साथ अपनी आवाज भी खो दी थी। बिन माँ -बाप की बच्ची को हमेशा अपनी मामी के ताने सुनने पड़ रहे थे।
संचिता की मामी थोड़ी लालची स्वभाव की थी। वह अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए संचिता को दूसरो के घर मजदूरी के लिए भेजने लगी। संचिता अपनी मामी के आदेशानुसार सेठ धर्मचंद्र के यहाँ काम करने लगी।
सेठ धर्मचंद्र की एक लड़की थी और वह स्वभाव से बेहद ही दयालु प्रकृति की थी। उसका नाम अमृता था। वह जब भी संचिता को काम करते देखती तो उसे उस पर तरस आ जाता था।
एक दिन अमृता संचिता के काम समाप्त होने पर अपने पास बुलाई और बोली -'तुम्हारा क्या नाम है? यह सुनकर संचिता रो पड़ी और थोड़ी देर के बाद पास पड़े चॉक से लिखकर अपना नाम संचिता बताई। तब अमृता ने संचिता से इशारे में दोस्ती करने के लिए पूछा, तो संचिता थोड़ी सकुचाती हुई 'हाँ' में अपना सर हिला दी।
फिर एक दिन अमृता ने संचिता को कलम और कॉपी देते हुए बोली -कि क्या तुम्हें पढ़ना-लिखना पसंद है? तब संचिता अमृता को इशारे करके बताई कि उसकी मामी ने उसका नामांकन पास के ही स्कूल में करा दी थी जहाँ गूंगे बच्चों को शिक्षा दी जाती थी, ताकि दुनिया की नजर में अच्छी बनी रहे।
धीरे-धीरे संचिता अमृता से घुल-मिल गई और वह अपने सारे दुःख -दर्द को अमृता की दी हुई कॉपी में कविता व कहानियों के रूप में उतारने लगी। जब अमृता को संचिता की इस छिपी कला के बारे में बता चला तो वह बहुत खुश हुई और वह संचिता की इस कला को दुनिया के सामने लाने के लिए अपने पिता सेठ धर्मचंद्र के पास गई और बोली-"पिताजी! आज मैं अपनी जन्मदिन के शुभअवसर पर आपसे कुछ मांगना चाहती हूँ, आशा करती हूँ कि आप मुझे निराश नहीं करेंगे। तब सेठ धर्मचंद्र अमृता को आश्वासन देते हुए बोले -"बोलो! बेटी तुम्हें "जन्मदिन के उपहार "के रूप में क्या चाहिए।
तब अमृता बोली -"पिताजी! संचिता जो हमारे घर काम करने आती है उसमें एक अद्भुत कला छिपा हुआ है, वह बहुत अच्छी -अच्छी कविता व कहानियाँ लिखती है जिसे पढ़कर किसी में भी आत्मविश्वास भर जाएगा। मैं चाहती हूँ कि आप संचिता की कविता और कहानियों को प्रकाशित करवाएँ।
सेठ धर्मचंद्र बेहद ही दयालु एवं सुलझे हुए इंसान थे, वे किसी की भी सहायता के लिए तत्पर रहते थे। वे मुस्कराते हुए बोले -बस! इतनी सी बात। मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई कि मेरी बेटी किसी की भी सहायता के लिए तत्पर रहती है। समझो मैंने तुम्हें तुम्हारे 'जन्मदिन का उपहार 'तुम्हें दे दिया।
अगले दिन ही सेठ धर्मचंद्र अपने कर्मचारी से कहकर संचिता के लिखे कविता व कहानियों को पुस्तक संग्रह के लिए भेज दिया।
संचिता की लिखी कविता व कहानियों वाली पुस्तकें लाखो में बिकने लगी और इसके बदले में संचिता को पैसे भी मिले और उसे कई जगहों पर सम्मानित भी किया जाने लगा। संचिता को ऐसा लग रहा था जैसे उसका खोया हुआ आवाज उसे फिर वापस मिल गया है।
इधर अमृता भी बेहद खुश थी क्योंकि अमृता को अपना बेहद ही कीमती "जन्मदिन का उपहार " मिल चुका था।
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