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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 06 से 10 // सलिल सरोज की लघुकथाएँ

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प्रविष्टि क्रमांक - 06 से 10 सलिल सरोज की लघुकथाएँ प्रविष्टि क्रमांक - 06 1. शीर्षक :महत्वाकांक्षा (प्रेम कहानी ) “प्यार की मजार पे ...


प्रविष्टि क्रमांक - 06 से 10
सलिल सरोज की लघुकथाएँ

प्रविष्टि क्रमांक - 06

1. शीर्षक :महत्वाकांक्षा (प्रेम कहानी )

“प्यार की मजार पे चढ़ाए गए फूल भी फूल ही होते हैं,जो बीतते वक़्त के साथ मुरझाने लगते हैं। जो फूल कभी अपनी खुशबू के लिए प्रेयसी के बालों में झूमा करते हैं, वो दिन बदलते ही किसी चौराहे पे अपरिचित की तरह दुत्कार दिए जाते हैं”
दिव्या और संभव ने अपने प्यार की शुरुआत खुशनुमा मौसम में खिले फूल की तरह की थी। जिसकी महक में दोनों ने अपने ग़म भुला कर एक नई जिंदगी की शुरुआत की थी। दिव्या और संभव एक ही एम एन सी में साथ साथ एक ही शिफ्ट में काम करते थे। एक ही डेस्क जॉब होने के कारण दोनों में नज़दीकियाँ बढ़ीं और दोनों परिणय सूत्र में बँध गए। “शादी से पहले किए गए वायदे सावन की बौछारों की तरह होते हैं ,जब तक गिरते रहते हैं राहत देते हैं और रूक जाने पर उमस बढ़ाकर बेचैन कर देते हैं”।शादी से पहले संभव ने दिव्या के साथ घर के हर काम करने की कसमें खाई थीं और हर कदम पर उसका साथ देने की जिम्मेदारी भी उठाई थी। वहीं दिव्या ने संभव को एक गृहस्थ जीवन की हर खुशी देने और एक बेहतरीन जीवन साथी बनने की कसमें खाईं थी।
महत्वाकांक्षा अगर जीवन को सुखी बनाने हेतु की जाए तो अच्छी है और अगर उसे दूसरों से आगे बढ़ने का जरिया बना लिया जाए तो परिणाम बहुत ही भयानक सिद्ध होता है। दिव्या और संभव दोनों जवानी की दहलीज पर अपने लिए सब हासिल करना चाहते थे। अच्छा घर,अच्छी सैलेरी,अच्छा खान-पान,अच्छी गाड़ी और वो सभी भौतिक सुविधाएँ जो उन्हें अपने दोस्तों से आगे खड़ा कर सके।”रेस में दौड़ने वाले को पता होता है कि जीत में क्या मिलेगा लेकिन अक्सर ये पता नहीं होता कि जीत कर भी क्या हार जाएँगे। रेस जीतने वाले कई बार रिश्तों की मिठास भूल जाते हैं। दिखावा इस कदर हावी हो जाता है कि खुद को पहचानने के लिए आइने की आवश्यकता महसूस होती है।”दिव्या और संभव को 2 साल के लिए विदेश में इंटर्नशिप के लिए अलग देशों में भेजा गया। दूर से रिश्ते निभाना उतना ही कठिन है जितना कि पास हो के रिश्ते ना निभाना। पहले दोनों फोन पे, इंटरनेट पे बातें किया करते थे। मिलते भी थे 15-20 दिनों में। पर काम बढ़ता गया और दूरियाँ भी । विदेश की चकाचौंध ,खुला जीवन और अनियंत्रित जीवन शैली ने दोनों की ज़िन्दगियों पर प्रतिकूल असर डाला। संभव ने सिगरेट,शराब पीना शुरू कर दिया। रात को देर तक जागना और पैसों की बेवजह खपत से उसकी सारी बैंक बैलेंस खत्म होती जा रही थी। वहीं दिव्या अकेलेपन की ज़िन्दगी से ऊब कर नए दोस्त तलाश करने लगी। संभव का फोन उठाना बंद कर दिया। झूठ बोलना शुरू कर दिया।
महत्वाकांक्षा ने दोनों को पारिवारिक सुखों से वंचित कर दिया था। दोनों की शादी को 4 साल होने को थे। दिव्या का शरीर काम से थक चुका था,मन कहीं न कहीं मरता जा रहा था। संभव का जिस्म शराब की लत में पड़कर गल चुका था। जिन बच्चों को देख कर संभव का चेहरा खिल उठता था ,अब अपनी असमर्थता को देख कर ,अपने बच्चे नहीं कर पाने की कोफ़्त से जल उठता था।
आज दिव्या और संभव अपने दोस्तों के बीच भौतिक सुख में काफी आगे खड़े थे। लेकिन मात्र 30 साल की उम्र में उनके चेहरे का रंग और शरीर का ढाँचा खत्म हो चुका था।
“शहरी जीवन अगर संतुलित न हो तो,वो आयु आधी जरूर कर देता है”। इंटर्नशिप खत्म करके जब दोनों वापस आए तो दोनों की आँखों में बस एक ही सवाल था-“हमारा प्यार,हमारे महत्वाकांक्षा के आगे इतना छोटा कैसे पड़ गया। हम एक दूसरे को क्यों नहीं समझ पाए। एक दूसरे को क्यों नहीं बाँध पाए।”
और दोनों के दिमाग में बस यही उत्तर घूमता रहा-“काश हमने सिर्फ प्यार को जिया होता,महत्वाकांक्षा को नहीं।”
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प्रविष्टि क्रमांक - 07

2. शीर्षक :तुम चलोगी क्या? (प्रेम कहानी )

“तुम चलोगी क्या?”
क्षितिज ने जूतों के फीते बाँधते हुए रसोई में व्यस्त रश्मि से पूछा। कुकर की सीटी में क्षितिज की आवाज़ कहीं दब गई और सवाल जस का तस वहीं खड़ा रहा। जब कुछ देर तक कोई जवाब नहीं आया तो उसने फिर पूछा-“रश्मि,तुम चलोगी क्या?”
उसकी तेज़ आवाज़ सुनकर मानो रश्मि किसी नींद से जाग गई हो और हड़बड़ाकर उसने पूछा-“कहाँ?”
“तुम्हें क्या हो गया है?हर बात तुम भूल जाती हो। कल ही तो बताया था कि मेरे ऑफिस के दोस्त रोहन की सगाई की पार्टी है आज।”
अन्यमनस्क रश्मि ने बुझे मन से कहा-“ठीक है,शाम को मैं तैयार रहूँगी। वैसे मैं क्या क्या पहनूँ?”
रश्मि का सवाल इस बार क्षितिज के सवाल की तरह कार के इंजन की चीख में दब गया। और रश्मि का वो सवाल वहीं का वहीं रह गया।
सुबह से हो रही छिटपुट बारिश की कुछ छींटें जब रश्मि के चेहरे पे पड़ी तो उसे अहसास हुआ कि बारिश हो रही है। हालाँकि उसका बदन तो हर सावन की बारिश के साथ भीग जाता था ,पर मन रेगिस्तान की तरह सूखता जा रहा था।
रश्मि और क्षितिज की शादी को कुछेक दो साल ही हुए थे लेकिन इन दो सालों में उनके रिश्ते में दो जहां का फासला आ गया था। क्षितिज को अपने कामों से फुर्सत नहीं और रश्मि पढ़ी-लिखी और आधुनिक समाज में पल कर भी अपने जीवन के सबसे खूबसूरत और हसीन लम्हें घर की चार दीवारी से बातें करती और बर्तनों से लड़ते-झगड़ते गुजार रही थी।
पर उनके प्यार की शुरुआत भी एक झगड़े,एक पार्टी और बरसात की एक शाम से ही हुई थी। दोनों की मुलाकात अपने साथी की शादी के दौरान खाने की लाईन में हुई थी । जैसे ही दावत की शुरुआत हुई,झमाझम बारिश अपनी पूरी मादकता से लबरेज,न आब देखा न ताब बरस पड़ी। कतार में सभी लोग छिपने की जगह ढूंढने लगे,बस क्षितिज और रश्मि को छोड़कर। दोनों को आइसक्रीम और स्ट्राबेरी फ्लेवर्स पसंद थे। दोनों में जंग छिड़ी थी कि आइसक्रीम पर पहला हक़ मेरा है । इस हाथापाई में आइस क्रीम उछल कर कब रश्मि के भीगे चेहरे पे लिपस्टिक के साथ घुलने लगा,ये पता ही नहीं चला। हाथों से पिघलकर आइसक्रीम कब का ज़मीन में कब का गुम हो चुका था,बचे थे तो बस जुड़े हुए एक दूसरे के हाथ और दो गर्म साँसों से भाप बनती बारिश की बूंदें। रश्मि, क्षितिज की कब हो गई और क्षितिज कब खुद का ही नहीं रह गया,ये बस बारिश की बूंदें ही बयाँ कर सकती थीं। इश्क़ की हवा ऐसी चली कि दो भीगे जिस्म सदा के लिए एक खूबसूरत रिश्ते में बँध गए।
रश्मि आज उन्हीं यादों में खोई हुई खुद को पार्टी के लिए तैयार कर रही थी। बालों का जूड़ा किसी नागिन से कम नहीं लग रहा था। गले का हार जैसे पति के सात जन्मों की डोर हो। होंठों पे दहकती लाली और आंखों में छाई कजरारी किसी भी भले मानस को बेईमान कर सकती थी। शादी की वही साड़ी जिसे पहन के उसने अपनी ज़िंदगी की दूसरी पारी शुरू की थी,वही साड़ी पहनकर रश्मि हू-ब-हू नई-नवेली दुल्हन लग रही थी।
रश्मि चलने को बस तैयार ही थी । इंतज़ार था कि क्षितिज अब आए कि तब। प्यासे मन को शायद आज तृप्ति मिल जाए।
तभी रश्मि का मोबाइल बज उठा और क्षितिज ने कहा कि आज काम काफी है ,सो आज पार्टी में नहीं जा सकते। मानो की रश्मि के होंठों तक किसी ने जाम पहुंचाकर उसके दामन में छलका दिया हो। और रश्मि का मन फिर एक बार सूखा ही राह गया।
और सूने घर में गूँजता रहा-“तुम चलोगी क्या?”
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प्रविष्टि क्रमांक - 08

3. शीर्षक :रोटियाँ (प्रेम कहानी )

“चाची,रोटी क्या इतनी भी गोल हो सकती है,मानो कि पूनम का चाँद हो जैसे और वो भी बिना किसी दाग के। अगर तुम ऐसी ही रोटियाँ मुझे खिलाती रही तो मैं तो पूरे महीने का राशन एक दिन में खा जाऊँगा।” कौशल चाची की तारीफ करते-करते न जाने कितनी रोटियाँ खा चुका था।
चाची बोली ” बेटा,ये तो बड़ी अच्छी बात है कि मेरे हाथ की रोटियाँ तुझे अच्छी लगती हैं,पर ये रोटियाँ आज मैंने नहीं बनाई हैं। ”
“तुमने नहीं तो फिर किसने और तुम्हारे जैसी सुंदर रोटियाँ और कोई बना सकता है क्या चाची ? तुम भी सुबह-सुबह ही मुझे छेड़ रही हो। ” कौशल हतप्रभ होकर चाची की तरफ इस तरह देखकर बोला मानो चाची के इस उद्घोष से उस के ऊपर सौ घड़े पानी पड़ गए हों।
”बेटे, कल शाम ही मेरे गाँव से पड़ोस में रहने वाली सुगंधा आई है। कई महीनों से कह रही थी कि उसे शहर घूमना है। सो मैंने बुला लिया। ”
तभी उधर से गुलाबी कमीज,सफ़ेद सलवार और हलके पीले रंग का दुपट्टा ओढ़े सुगंधा कुछ और रोटियां हाथों में लिए कौशल ले सामने खड़ी हो गई और पूछा “कितनी रोटियाँ दूँ,आपको? ”
कौशल ने शायद सवाल सुना नहीं या शायद उसे टकटकी बाँध के देखने के क्रम में सवाल को जान-बूझ कर अनसुना कर दिया। भूख तो मिट जाएगी कुछ रोटियों के बाद, पर अब जो प्यास सुगंधा को देखते ही शुरू हो गयी थी पता नहीं वो कब बुझेगी। सुगंधा को देख के कौशल को लगा की अभी-अभी किसी ओस में लिपटी हुई चहलकदमी करती कोई भोर कमरे में दाखिल हुई है -बिलकुल साफ़,शफ्फाक,पवित्र और श्वेत। खुशबू ऐसी कि तितलियाँ फूलों को छोड़कर उसकी तरफ दौड़ी चली आ रही हों। चेहरे का गोरापन उगते सूरज का कोई अक्स और होंठ जैसे दो शोले एक साथ जुड़े हुए और दाँत मानो अनार के दाने। कौशल को लगा कि स्वर्ग से कोई अप्सरा उतर कर ज़मीन पर उसके लिए ही आ गयी हो।
“बेटा,कितनी रोटियाँ लोगे। वो कब से पूछ रही है। तुम पता नहीं कहाँ खोये हुए हो ?” अब कौशल चाची को क्या बताता कि वो कहाँ खोया और कहाँ डूबा हुआ है।
”चाची, तुम सुगंधा को शहर घुमाने जाओगी इस गर्मी में ?”
“बेटे, आज तो सुबह से बादल ने पाँव फैला रखे हैं। धूप तो है ही नहीं। और तुझे पता है मैंने एक काला चश्मा भी खरीद लिया है धूप से बचने के लिए।” चाची के इस अनपेक्षित जवाब से कौशल का चेहरा फीका पड़ गया, खिली हुई बाँछें किसी कोने में दुबक गयी। पर चाची, कौशल का मन पढ़ चुकी थी और बोली ” बेटे, इस उम्र में मैं कहाँ जाऊँगी ,वैसे भी मेरे पैरों में दर्द रहता है ,तुझे तो पता ही है। और ये चश्मा सुगंधा बेटी का है। मैं तो तुझसे पूछने ही वाली थी कि क्या तू सुगंधा को शहर घुमा देगा।
अँधे को क्या चाहिए -दो आँखें।
“चाची,वैसे मुझे आज डाकखाने तो जाना था, लेकिन तुम्हारी बात भी तो नहीं टाल सकता। ”
चाची कुछ बोली नहीं ,बस मुस्कुरा कर रह गयी।
कौशल उठा कर बोला ”चाची ,आज तो बस मज़ा ही आ गया खाने का। तुम सुगंधा से बोलना की तैयार रहे। मैं अपनी छमिया मतलब बुलेट में पेट्रोल भरा के के अभी आया।”
सुगंधा ने होंठों पे हलकी सी लाली , माथे पे छोटी बिंदी, आँखों में काजल,हाथों में चूड़ी, पैरों में पाजेब और जूती पहन कर चलने को तैयार हो कर आई तो लगा कि आज कौशल के इंतक़ाम के दिन आ गए थे।
“अच्छा चाची , मैं इसे घुमा कर आता हूँ। शाम को भी ऐसी ही रोटियाँ मिलेगी ना ”
सवाल चाची के लिए जरूर था मगर जवाब जिससे चाहिए था,उसने ही कहा ” जरूर मिलेगी, पहले शाम तो आने दो ”
बुलेट पर सुगंधा ,कौशल के पीछे ज्यों ही बैठी , बिना किसी गियर के कौशल मानो उछल पड़ा हो।
”क्या हुआ ” सुगंधा बोली।
”कुछ नहीं, तुम ठीक से बैठ गयी ना? “‘
“‘हाँ”
“तो चलें”‘
“चलो”
बुलेट अभी कुछेक सौ मीटर भी नहीं चली होगी की हलकी-हलकी बारिश शुरू हो गयी।
“‘कहीं रूक जाएँ क्या ?” कौशल ने पूछा।
“नहीं ,इतना तो अच्छा मौसम है और इतनी बारिश से तुम गल नहीं जाओगे। चलते रहो ”
कौशल को यकीन नहीं हो रहा था कि उसके बुलेट की पीछे वाली सीट पर बैठी लड़की इस तरह से बात कर रही थी मानो उसे जन्मों से जानती हो।
हवा के झोंकों के साथ जब बारिश की बूँदें उसकी लटों से छेड़खानी कर रहे थे तो सुगंधा बार-बार कोशिश करके अपनी नाज़ुक उँगलियों से उसे अपने कान के पीछे कर रही थी। आँखों को बंद करके सर को आसमान की तरफ करके मानो इस ख़ूबसूरत फ़िज़ाओं को अपने आगोश में भरने की कोशिश हर लम्हे के साथ कर रही हो। वो खुद को जी रही थी।
और ये सब नज़ारे कौशल बुलेट के मिरर में देख रहा था। पता नहीं कब उसके मन में ये बात घर कर गयी कि सुगंधा ही उसकी बुलेट की पिछली सीट की सदा की हक़दार बन जाए। कौशल ने पूरे दिन क्या किया , उसे कुछ भी याद नहीं। वो बस एक टक से सुगंधा की खूबसूरती में खो कर रह गया था।
शाम को जब चाची ने पूछा कि कैसा रहा सब कुछ तो सुगंध ही लगातार बोले जा रही थी और कौशल कुछ भी नहीं। जब सुगंधा चुप हुई तो कौशल ने चाची से कहा ” चाची, मैं क्या बताऊँ। जब ये शहर देख रही थी, तब मैं सिर्फ इसे देख रहा था। “‘
सुगंधा झेंप के अंदर चली गयी।
चाची,तुम सुगंधा और मेरी शादी की बात करो ना।
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सुगंधा और कौशल की शादी के दो साल हो गए। अब उनकी छोटी सी इक गुड़िया जैसी बेटी है जो पूरे घर में तूफ़ान भी मचाने के काबिल है। सुगंधा का सारा समय बेटी को संभालने में चला जाता है। इसी कारण अब रोटियाँ कभी जली, कभी कच्ची,कभी अधकच्ची,कभी टेढ़ी तो कभी बेशक्ल ही बनती हैं।
पूनम का चाँद तो दूर अब सिर्फ उसमें दाग ही दिखने लगे थे।
बस वैसी नहीं बनती हैं जैसा कि कौशल खा कर सुगंधा का कायल हो गया था।
“सुगंधा, रोटी आज फिर जली हुई हैं। मैं अब तुम्हारे हाथ की रोटियाँ नहीं खा सकता। मेरा पेट खराब हो जाएगा इस तरह। “‘
“क्यों, कल तक तो रोटियाँ बड़ी प्यारी थी। आज क्या हो गया? और रोज़ एक जैसी रोटियाँ तो नहीं बन सकतीं। मैं भी इंसान हूँ। गलतियाँ हो जाती हैं। और बेटी के चक्कर में कुछ गड़बड़ हो भी गया तो क्या तुम एक दिन जली रोटियाँ नहीं खा सकते। तब तो तुम मेरे हाथ से ज़हर भी खाने को तैयार थे ” सुगंधा गुस्से में तमतमा के बोली।
”सच कहा। तुम्हारी रोटियाँ अब ज़हर से कम थोड़ी न हैं। मुझमें ये ज़हर कितना भर गया है ,शायद तुम्हें पता नहीं। मैंने ये तो बिलकुल नहीं सोचा था कि तुमसे शादी करके ठीक ढंग का खाना भी नहीं मिलेगा। ”
और फिर दोनों बिना खाए उठ गए और एक -दूसरे की तरफ मुँह फेर कर सो गए और बेटी बीच में रोती रही।
यह झगड़ा अब रोज़ का ही हो गया था। सुगंधा कोशिश करके भी कौशल के मन का खाना नहीं बना पाती थी और कौशल इस तरह के खाने का आदी नहीं हो पा रहा था।
“अच्छा चलो, आज मैं पहले जैसी रोटियाँ बनाऊँगी । तुम दोस्तों को बुला लेना शाम को ”
“‘पक्का ना “‘
“‘हाँ बाबा,पक्का “‘
शाम को सारे दोस्त खाने की मेज़ पर तैयार थे। पर दिन भर की परेशान और थकी हुई सुगंधा से वैसी रोटियाँ नहीं बनी और सारे दोस्तों के सामने ही उनकी लड़ाई हो गयी।
और कौशल गुस्से में बड़बड़ाता घर से बाहर चला गया।
पीछे रह गए- बेसुध सुगंधा, बिलखती बेटी और कुछ रोटियाँ।
सलिल सरोज
मेरी यह रचना पूर्ण रूप से मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित है।
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प्रविष्टि क्रमांक - 09

4. शीर्षक : स्त्री मन (प्रेम कहानी )

सिद्धान्त और भावना कॉलेज की कैंटीन में घंटों से बैठे हुए थे लेकिन उनकी अभी तक एक कॉफ़ी खत्म नहीं हुई थी । दोनों घंटों से एक दूसरे की आँखों में डूब कर उस रस का आनन्द ले रहे थे जो किसी कॉलेज की किसी भी कैंटीन में नहीं मिलती ।
भावना और सिद्धान्त सामजशास्त्र में परास्नातक की पढ़ाई कर रहे थे। भावना,सिद्धान्त से एक साल जूनियर थी । भावना ने सिद्धान्त को पहली बार सेमिनार में देखा था। सिद्धान्त का नाम पुकारते ही पूरे हॉल में तालियों की गड़गड़ाहट गूँज उठी। मानो कि कोई जनमानस का नेता अपने क्षेत्र के लोगों को संबोधित कर रहा हो। सिद्धान्त अपने सीनियर,जूनियर,शिक्षकों और अपने कॉलेज में बहुत लोकप्रिय था और यह बात, ताली की हर एक गूँज से पता चल रही थी।
सिद्धान्त ने ज्यों ही माइक पकड़ा और बोलना शुरू किया,पूरे हॉल में शांति छा गयी। मानो हर दर्शक और हर श्रोता उसके बोले हर शब्द को सुनना चाहता हो। सेमिनार का विषय था:”स्त्री का मन।” पूरी तरह से समाजशास्त्र का विषय तो मालूम नहीं होता लेकिन उस दिन सिद्धान्त ने जिस तरह से बोलना शुरू किया, वो विषय समाजशास्त्र का ही हो कर रह गया।
“स्त्री का मन पढ़ने से ज्यादा छूने और महसूस करने को लालायित रहता है। पढ़ी हुई चीज़ें हम अक्सर भूल जाते हैं,लेकिन शिद्दत से महसूस की गई चीज़ जीवनपर्यन्त हमारे साथ चलती रहती है। स्त्री मन केवल उतने वक़्त के लिए ही अपना होता है जब तक वो किसी और को सब कुछ नहीं मान लेता। और एक बार यह समर्पण आ जाए, फिर मौत ही अन्तिम पड़ाव है इस अद्भुत यात्रा की । स्त्री मन जो महसूस करता है उसे लिखने के लिए ग्रंथ या उकेरने के लिए कोई बड़ा कैनवास नहीं बल्कि एक प्रेमातुर दिल और विवेकशील बुद्धि की ज़्यादा आवश्यकता होती है।” हर वाक्य के बाद तालियाँ बज रही थी। भावना की तरह कितनी ही लड़कियाँ अब तक सिद्धान्त की कायल हो चुकी थी। भावना तो मानो कहीं डूब गई हो । उसकी आँखें सिद्धान्त के चेहरे से हट ही नहीं रही थी।
सिद्धान्त ने पानी पीने के लिए विराम लिया। तब तक भावना को लग चुका था कि ये जिस लड़की का जीवन साथी बन जाए,वो लड़की दुनिया की सबसे खुशनसीब लड़की होगी।
“इश्क़ में पहले इज़हार कर देना अच्छा होता है। और कोशिश करके हासिल न कर पाना, न कोशिश करके न हासिल करने से ज्यादा काबिले तारीफ है”।
भावना ने पानी की बोतल पहुँचाने के बहाने अपनी फीलिंग एक चिट में लिख कर सिद्धान्त को थमा दी। सिद्धांत ने चिट खोला और पढ़ा-“स्त्री मन को तुमसे बेहतर कोई नहीं समझ सकता। अब मेरी आँखों में देख कर बोलो और बताओ कि इस स्त्री का मन क्या कहता है।”
भावना अभी सीढ़ियों से उतर ही रही थी कि सिद्धान्त ने उसकी तरफ देखा और उसके बैठ जाने तक उसको देखता रहा। बहुत ही साधारण सी दिखने वाली लड़की की असाधारण बात उसके दिल में घर कर गई।
अब सिद्धान्त ने भावना की आँखों में देख कर बोलना शुरू किया। “एक स्त्री का मन जो पुरुष पढ़ सकता है ,वो दुनिया के तमाम रहस्य हल कर सकता है। स्त्री मन कमजोर नहीं है लेकिन उसे भी एक हमसफर की चाहत हमेशा रहती है। स्त्री मन अधिकार और कर्तव्य से अधिक समर्पण और प्रेम से आकर्षित होता है। यह सृष्टि की रचना मान ली जाए या स्त्रियों के मन की आन्तरिक इच्छा,पर यह सत्य है।”
मैं इन्हीं शब्दों के साथ अपना वक्तव्य समाप्त करता हूँ और सबसे अपील करता हूँ कि स्त्रियों को महसूस करें,उसे केवल पढ़े नहीं।
सेमिनार खत्म हुआ और सिद्धान्त ज्यों ही हॉल से बाहर निकला,तो पहली प्रशंसा किसी और से नहीं बल्कि भावना की तरफ से ही आई।
सिद्धान्त और भावना कैंटीन में कॉफी पीने गए और दोनों एक दूसरे को एक टक देखते रहे। मुलाकातों का सिलसिला बढ़ा। दोनों रोज़ मिलने लगे,जानने लगे और एक दूसरे से प्यार करने लगे। सिद्धान्त को भावना का भोलापन भा गया और भावना को सिद्धान्त का स्त्रियों के बारे में विचार ने कायल कर दिया।
कॉलेज ख़त्म हुआ । दोनों ने अपनी डिग्रियाँ प्राप्त की। सिद्धान्त को उसी कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी मिल गई। भावना की भी नौकरी लगी पर उसने सिद्धान्त की प्रगति और घर की शांति के लिए नौकरी नहीं की। “”स्त्री,पुरुष की समानता करनी शुरू कर दे तो घर ही सबसे पहले टूटता है,यह बात भावना जानती थी और मानती भी थी।”‘
प्यार में कही गयी हर बात प्यारी लगती है। खामियाँ छुप जाती हैं और जिम्मेदारियाँ खेल का विषय लगता है। किताब में पढ़ी गई बातें जीवन के ऊबड़-खाबड़ रास्तों पे हिचकोले खाने लगती हैं। और शादी के बाद इनके जीवन में भी ऐसा ही कुछ शुरू हो गया था। सिद्धान्त अपने कॉलेज के कामों में इतना व्यस्त हुआ कि उसका वैवाहिक जीवन जो कि भावना का भी था,कहीं खो सा गया था ।
भावना खुद को स्टोर रूम में जमा कबाड़ की तरह महसूस करने लगी, जो घर में होता तो है लेकिन उसकी जरूरत किसी को नहीं होती।
आज सुबह जब सिद्धान्त कॉलेज जाने के लिए तैयार हो रहा था तो खुद के न होने की भावना ने भावना का धैर्य तोड़ दिया और वो चीख पड़ी-“सिद्धान्त,क्या तुम वही हो जिसको मैं चाहती हूँ। तुम्हारे स्त्री को समझने की बेजोड़ क्षमता से प्रभावित होकर मैं तुम्हारे साथ आई,और आज जब मेरी इच्छाएँ चिल्लाती हैं तो भी तुम्हें सुनाई नहीं देती। क्या यह सचमुच सच है कि शादी के बाद सब बदल जाता है-समय,परिस्थिति और इंसान भी। मेरी बात अब तुम क्यों नहीं समझ पाते। मेरी तकलीफ से तुम्हें क्यों दर्द नहीं होता। तुम्हारे पास मेरे लिए क्यों समय नहीं होता। क्या मैं तुम्हारे लिए ज़िन्दा भी हूँ या नहीं ।” इतना कहकर भावना रोने लगी और खुद के चुनाव को कोसने लगी।
सिद्धान्त चुपचाप सुनता रहा और खाना खत्म करके उठा और बोला-“हर कही गई बात को अमल में लाना इंसान के हद में नहीं होता। और क्या सिर्फ मैं बदल गया हूँ। दिन रात व्यस्त हो के तुम्हारी खुशियों के लिए ही कमाता हूँ। और तुम फिर भी मेरे साथ आज खुश नहीं।
“भावना,सेमिनार में कही बातों से अगर जीवन तय होता तो आज समाज कहीं और होता। अब मुझे खुद पर भी शक होता है कि मैं क्या स्त्री मन को समझ पाता हूँ या क्या मैं खुद को भी नहीं समझ पाता।” सिद्धान्त यह कहता हुआ घर से निकल गया।
और रोती हुई भावना के दिमाग में किसी की कही मात्र एक बात घूमती रही-
“स्त्री मन पढ़ने की नहीं,महसूस करनी की चाहत रखती है।”

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प्रविष्टि क्रमांक - 10

5. शीर्षक : सफलता की ललक (प्रेम कहानी )

"तुम्हें बारिश कैसी लगती है?"सौम्या ने झमाझम बरसते हुए बूँदों की तरफ देखकर कमल से पूछा।
"ये बारिश मुझे बिल्कुल तुम जैसी लगती है"कमल ने बड़ी खूबसूरती से सौम्या के सवाल का जवाब दिया।
"कैसे" अब की बार सौम्या ने उत्सुकता से लबरेज़ होकर कमल से पूछा।
कमल,सौम्या की आँखों में आँखें डाल कर और सौम्या का हाथ अपने हाथों में लेकर बोला-" गौर से देखो,सौम्या। ये बारिश की झीनी-झीनी बूँदें को एक साथ देखो तो तुम्हारे घने ज़ुल्फ़ों का गुमान सा होता है। जब ये बारिश की बूँदें धरती के सीने से लिपटती हैं ,तो उसकी सारी पीड़ा,वेदना,व्यथा भाप बनकर कहीं उड़ जाती है और धरती को बेहद सुकून मिलता है। उन्हीं बूँदों की तरह जब तुम मेरे सीने से लग जाती हो तो मेरी सारी परेशानियाँ, उलझनें,घबराहट दूर हो जाती हैं और मुझे एहसास होता है कि मैं दुनिया की हर बेशकीमती चीज़ हासिल कर सकता हूँ। ये बारिश धरती के जिस्म को धो कर उसे बिल्कुल नवजात बच्चे की भाँति नवीन और नूतन कर देती हैं। तुम्हारे प्यार के साये में मुझे भी किसी माँ के आँचल की ठंडक मिलती है।"
कमल की बातों में पता नहीं क्या जादू था कि सौम्या उसके चेहरे में कहीं खो सी गयी थी।
"अरे,तुम कुछ सुन भी रही हो या फिर में इस बारिश से ही बातें किए जा रहा हूँ।" कमल ने सौम्या को झकझोरते हुए पूछा।
"कमल,चलो न हम भी बारिश में भीगते हैं। देखो ना, कितने सारे लोग बारिश का मज़ा ले रहे हैं। और उनको देखो ,ऐसा लग रहा है कि वो बारिश का आनंद ही नहीं ले रहे बल्कि उसको पी भी रहे हैं। ये लोग बारिश को जी रहे हैं।"सौम्या,कमल को बारिश में खींचते हुए बोली।
"सौम्या,ये बेवकूफी मैं नहीं करूँगा। मैं बीमार पड़ जाऊँगा। तुम्हें जाना है तो जाओ,में यहीं इंतज़ार करूँगा।"कमल,सौम्या से हाथ छुड़ाते हुए बोला।
पर सौम्या कहां कमल की सुनने वाली थी। सौम्या ने कमाल को धक्का देकर बारिश के बीचोंबीच लाकर खड़ा कर दिया। कमल किसी छोटे बच्चे की तरह बार बार भागता रहा पर सौम्या भी अपनी ज़िद्द पर थी। आखिरकार कमल बारिश में सौम्या के साथ घंटों भीगता रहा। कमल भीग तो रहा था पर सौम्या की खूबसूरती जो बारिश की पानी से और भी निखर गया था,उझको एक तक देखे जा रहा था।सौम्या पूरी मस्ती में उछाल-कूद,भाड़-दौड़ किए जा रही थी। कमल को सौम्या आज बेहद की खूबसूरत नजर आ रही थी। होंठों की लाली,आंखों का काजल,गालों को सुर्खी ,सब में एक गज़ब का तीखापन आ गया था। सौम्या अपने खुले बालों से जब बारिश को बूँदों को झटक रही थी तो मानो कमल के बदन में हज़ारों वॉट के झटके लग रहे हों। पहले सौम्या,कमल की बातों में खो गयी थी,अब कमल,सौम्या की खूबसूरती में खो चुका था। बारिश कब की बैंड हो चुकी थी। सौम्या पास के टी स्टॉल से कमल को लगातार आवाज़ दिए जा रही थी पर कमल आँखें मूंदें किसी और ही दुनिया में खो चुका था। जब मोटर को हॉर्न कमल के कानों में पड़ी और वो धचके खाते-खाते बचा तो वो वापस अपने होश में आया।
"अरे,तुम यहाँ कब आई?"कमल ने अचम्भे में भर कर सौम्या से पूछा।
"वाह,में यहां दस मिनट से खड़ी हूँ। कितनी आवाज़ें दी तुमको,पर पता नहीं तुम कहाँ खोए थे। बताओ मुझे क्या सोच रहे थे।"सौम्या ने नटखट भाई अंदाज़ से कमल को छेड़ते हुए पूछा।
अब कमल क्या बताता कि वो सौम्या की खूबसूरती के भंवर में खोया था। जितना उबड़ने कि कोशिश कर रहा था,उतना ही डूबता जा रहा था।
"अरे ,कहीं नहीं। मुझे नहीं पता था कि बारिश में भींगने में इतना मज़ा आता है । अब तो हर बारिश में में भींगा करूँगा अगर तुम साथ हो "कमल ने अंतिम वाक्य बुदबुदाते हुए बोला।
"अच्छा,सौम्या। क्लॉस भी खत्म हो गई है। और काफ़ी मस्ती भी हो चुकी है। हमने बातों बातों में कई कप चाय भी पी ली है। अब वापस अपने-अपने घर चलते हैं।
सौम्य और कमल दिल्ली एक ही कोचिंग में सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करते थे। कमल इस साल सिविल सेवा परीक्षा का इंटरव्यू दे रहा था। हालाँकि दोनों और भी परीक्षाएँ साथ-साथ देते थे। सौम्या पारिवारिक और आर्थिक रूप से कमल से ज्यादा मजबूत थी। सौम्या और कमल एक ही शहर के थे लेकिन उनकी जाति में भी ज़मीन-आसमाँ का अंतर था जो समाज को विवाह के लिए स्वीकार नहीं था। सौम्या और कमल को यह बात बहुत अच्छी तरह से पता था। सो दोनों ने यही रास्ता निकाला कि अगर अच्छी नौकरी मिल जाएगी तो समाज,परिवार,दोस्त सब राज़ी हो जाएँगे।
सिविल सेवा परीक्षा के नतीजे आए। कमल मेरी लिस्ट में 14 अंकों से पीछे राह गया और उसे एक पल को लगा कि उसकी जिंदगी ही खत्म हो गई। तब सौम्या ने उसे हर तरह से सहारा दिया। साल भर को और कोई भी रिजल्ट नहीं आया।
अगले साल सौम्य और कमल दोनों की नौकरी सी ए जी में एस एस सी के द्वारा ऑडिटर के पद पर दिल्ली में ही लग गई। सौम्या अपनी नौकरी में पूरे दिल से लग गई। पर कमल को चैन नहीं मिल्स।
नौकरी अच्छी थी,तो थोड़ा विरोध के बावजूद दोनों की शादी भी हो गई। कमल शादी के बाद भी उस मेहनत और जोश से सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करता रहा। कमल 3 सालों में 3 मेन्स और 2 इंटरव्यू दे चुका था पर मेरिट लिस्ट में नहीं आ पास रहा था। इस क्रम में कमल तमाम इम्तहान पास कर चुका था ,लेकिन जो करना चाह रहा था,वही नहीं हो पा रहा था।
इसका प्रतिकूल असर कमल के ऑफिस के काम पर भी पड़ना शुरू हो चुका था। कमल दफ्तर के कामों से जी चुराने लगा था। कहीं न कहीं उसकी असफलता उस पर हावी होती जा रही थी। और इधर सौम्या अपने काम में परिपक्व होती जा रही थी । 3 सालों में सौम्या को 3 प्रोन्नत्ति मिल चुकी थी और कमल अब भी वही था।
दफ्तर का बोझ अब घर पर आने लगा था। कमल खुद को सौम्या का जूनियर मानने को तैयार नहीं हो पा रहा था। अपनी क्षमता और अपनी सफलता को याद कर के कमल के बार रो पड़ता था। सौम्या,कमल की स्थिति भली-भाँति समझती थी लेकिन ज्यादा कुछ बोल नहीं पाती थी। कहीं न कहीं कमल का पौरुष सौम्या पर हावी हो जाता था। पहले जो बातें प्यार से हो जाती थी ,अब उन्हीं बातों पर कमल चिल्लाने लगता था और सौम्या चुपचाप रोटी रहती क्योंकि वो कमल को क्षमता को जानती थी। इसलिए उसे और भी बुरा लगता था।
दफ़्तर में अब ये हवा भी चली कि कमल कभी सौम्या के लायक था ही नहीं। सौम्या कहाँ ऊँचे जाट की और कमल किस जाट का है पता भी नहीं। आज कमल यहां तक भी पहुँचा है रो सिर्फ सौम्या की बदौलत।
अब यह रोज़ की बात हो चली थी। कमल अवसाद से घिरता जा रहा था। एक अदद बड़ी नौकरी के लिए उसकी जिंदगी तबाह होती जा रही थी और जो लड़की उसकी जान थी और आज बीवी आंखों की किरकिरी बन चुकी थी।
सौम्या से ये सब अब बर्दाश्त से बाहर हो चुका था। आज ऑफिस निकलने से पहले सौम्या ने कमाल से बात करने की कोशिश की।
"कमल,हम पूरी ज़िंदगी किसी एक चीज़ न मिलने के ग़म में इस तरह से नहीं जी सकते। तुमने मेहनत की है और आज भी कर रहे हो। समय से पहले और भाग्य से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता। अपनी ज़िंदगी में खुश और सकारात्मक रहना सीखो,सब मिल जाएगा।"
पहले यही सारी सौम्या की बातें कमल को उसकी तरफ खींचती थी लेकिन आज ये बातें उसे उपदेश और ताना लग रहा था। कमल ने आवेश में आकर बोला"सौम्या,तुमने जो छह,तुम्हें मिल गया । अतः तुम्हारे लिए ऐसा बोलना बहुत आसान है। तुम ऑफिस में मेरी बॉस हो,यहां बनने की कोशिश मत करो।"
"क्या कहा तुमने, मैंने जो चाहा मुझे मिल गया। मैंने तुम्हें आई ए एस देखना चाहता था। और जितनी मेहनत तुमने की है,उतनी ही कुर्बानियाँ मैंने भी दी हैं। तुम्हारे हिसाब से जागना,सोना,खाना पीना,पहनना -ओढ़ना सब किया। में वो सौम्या रही ही नहीं जो तुम्हें मिली थी। में अब कगुड को भी नहीं पहचान पाती। तुम्हारी पहचान बनाने के लिए मैंने अपनी ही पहचान मिटा दी। और तुम इस तरह मुझे ज़लील कर रहे हो।" सौम्या रोती हुई बोली।
"नहीं चाहिए मुझे तुम्हारी बनाई हुई पहचान। तुम रखो ये तमगा अपने पर्स। जिस दिन में अपनी पहचान बना लूँगा, वापस आ जाऊँगा" और यह कहता है कमल घर से चला गया।
सौम्या सूने घर को निहारती रही और सोचती रही कि उसकी गलती थी कहाँ-प्यार करने में,मदद करने में या किसी के लिए अपना वजूद खोने में ।
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लेखक परिचय:
नाम:- सलिल सरोज
जन्म: 3 मार्च,1987,बेगूसराय जिले के नौलागढ़ गाँव में(बिहार)।
शिक्षा: आरंभिक शिक्षा सैनिक स्कूल, तिलैया, कोडरमा,झारखंड से। जी.डी. कॉलेज,बेगूसराय, बिहार (इग्नू)से अंग्रेजी में बी.ए(2007),जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय , नई दिल्ली से रूसी भाषा में बी.ए(2011), जीजस एन्ड मेरी कॉलेज,चाणक्यपुरी(इग्नू)से समाजशास्त्र में एम.ए(2015)।
प्रयास: Remember Complete Dictionary का सह-अनुवादन,Splendid World Infermatica Study का सह-सम्पादन, स्थानीय पत्रिका"कोशिश" का संपादन एवं प्रकाशन, "मित्र-मधुर"पत्रिका में कविताओं का चुनाव। सम्प्रति: सामाजिक मुद्दों पर स्वतंत्र विचार एवं ज्वलन्त विषयों पर पैनी नज़र। सोशल मीडिया पर साहित्यिक धरोहर को जीवित रखने की अनवरत कोशिश। पंजाब केसरी ई अखबार ,वेब दुनिया ई अखबार, नवभारत टाइम्स ब्लॉग्स, दैनिक भास्कर ब्लॉग्स, दैनिक जागरण ब्लॉग्स, जय विजय पत्रिका, हिंदुस्तान पटनानामा, सरिता पत्रिका, अमर उजाला काव्य डेस्क समेत 30 से अधिक पत्रिकाओं व अखबारों में मेरी रचनाओं का निरंतर प्रकाशन। भोपाल स्थित आरुषि फॉउंडेशन के द्वारा अखिल भारतीय काव्य लेखन में गुलज़ार द्वारा चयनित प्रथम 20 में स्थान। कार्यालय की वार्षिक हिंदी पत्रिका में रचनाएँ प्रकाशित।
ई-मेल:salilmumtaz@gmail.com



































































































































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रचनाकार: लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 06 से 10 // सलिल सरोज की लघुकथाएँ
लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 06 से 10 // सलिल सरोज की लघुकथाएँ
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