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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 22 // श्रवण कुमार लघुकथा धर्मेन्द्र कुमार त्रिपाठी

 

प्रविष्टि क्रमांक - 22


श्रवण कुमार

लघुकथा धर्मेन्द्र कुमार त्रिपाठी

जयराम मामा से मिलते ही हंसी छूट जाती थी.....। साधारण सी बात को भी वह इस लहजे में बोलते कि अच्छा-खासा रोता हुआ आदमी भी हंसने लगे....। उनके पास गांव भर के लड़कों का जमघट लगा रहता.....। कई लड़कों की उनके पास आकर ही हंसी छूट जाती थी.....। हर दूसरे शब्द के बाद गालियों का मिश्रण होता उनकी बातों में, किन्तु उनकी गालियों में जरा भी अश्लीलता नहीं झलकती थी...। लहजे के सम्मिश्रण से वे उन गालियों से निर्मल हास्य की गंगा बहा देते.....। पढ़े लिखे नहीं थे जयराम मामा, लेकिन उनका सेंस ऑफ ह्यूमर अच्छे पढ़े लिखे की खोपड़ी घुमाने के लिए काफी होता था....।

उनकी मॉं की बीमारी में आंखें चली गयी थी.....। फिर भी वे अंधेपन को स्वीकार न करते हुए खत्म हो चुकी आंखों में दवाई डाला करती थीं.....। जो भी उनके पास बैठता उसे अपनी आंखें दिखातीं....। दिन में दस बार कोई आता तो दस बार वह उनकी आंख देखता़......। उन पर किसी के समझाने का कोई असर न होता था......। मायके से बुलावा आता तो बड़े चाव से मायके जातीं......। जयराम मामा तीन-तीन बसें बदलकर उन्हें ले जाते....। बस स्टैंड से उनका मायका तीन किलोमीटर अंदर था, जहां पैदल जाने के अलावा कोई साधन न होता था, पर वे मायके का मोह न छोड़ पातीं थी.....। कोई भी मिलता तो उनकी आंख के बारे में पूछता और वे आह्लादित हो अपनी आंखें पास में ला लाकर दिखातीं और पूछतीं कि क्या दिखता है....? देखने वाला जानता था और देखता था कि वहां गढ्ढे के सिवा कुछ नहीं है और न ऑंख की रोशनी आने वाली है, फिर भी वह उन्हें झूठी दिलासा देता और दवाई डालते रहने की सलाह देता.....। जयराम मामा को कोफ्त होती, तो उन्हें वे झिड़क देतीं और बोलतीं-’तैं का जानें, फलाने झूठ थोड़ी बोली, वा ज्यादा जानत है’....। और जयराम मामा चुप हो जाते.....।

जयराम मामा की शादी हो चुकी थी....। पत्नी दिमाग से कमतर होने के साथ, क्या बोलती कोई कुछ समझ न पाता....। पत्नी मायके में ही पड़ी रहती अपने बच्चों के साथ....। अंधी मॉं की सेवा की पूरी जिम्मेदारी जयराम मामा पर ही थी.....। आय का कोई निश्चित जरिया नहीं था.....। बीड़ी बनाकर जयराम मामा किसी तरह गुजर बसर कर रहे थे.....। नौकरी लगी थी शासन के उन्नत चूल्हे बनाने की योजना में...। पिछड़े गांवों में जाकर उन्नत चूल्हा बनाते थे, लेकिन मां की आंखें जाने के बाद उन्हें वापस आना पड़ा था...। कच्चे तीन छोटे-छोटे कमरे और परछी वाले पुश्तैनी घर में वे किसी तरह गुजर बसर कर रहे थे......। मॉं की आंखें जाने के बाद जो सबसे बड़ी दिक्कत पेश आ रही थी, वह थी शौचालय की.....। अंधी मां लाठी टेकती हुयी गांव के बाहर लगभग आधा किलोमीटर जाकर दिश फराकत से फारिग हुआ करती थी....। जयराम मामा के मन में था कि घर में मॉं के लिए एक शौचालय बनाना है, लेकिन उनके पास साधनों का नितान्त अभाव था....। आखिरकार एक दिन जयराम मामा ने खुद कुदाल फावड़ा उठाया और जुट गये शौचालय के लिए गढ्ढा खोदने....। शौचालय का गढ्ढा कोई छोटा मोटा तो होता नहीं....। जान परिचित के लोग उनकी इस सनक से हतप्रभ रह गये.....। लेकिन उनने अपनी जिद नहीं छोड़ी और गढ्ढा खोद कर ही माने....। गांव में किसी के पास अपना शौचालय नहीं था....। गढ्ढा खुद गया तो लोगों का मजमा लगने लगा गढ्ढा देखने के लिए....। जयराम मामा गढ्ढा खोदने के बाद एक मिस्त्री को लेकर गढ्ढे को पक्का कराने लगे....। गॉंव वालों की उत्सुकता चरम पर थी....। शहर जाकर शौचालय का सामान ले आये और एक शौचालय तैयार कर दिया....। जब शौचालय तैयार हो गया तो गॉंव के वे लोग जो गांव के बाहर नहीं गये थे और शौचालय नहीं देखा था वे ये देखने आने लगे कि क्या बंद कमरे में भी और घर में ही शौच की जा सकती है.....। जयराम मामा अपनी शैली में विस्तार पूर्वक उन्हें शौचालय के अंदर ले जाकर बताते थे.....। जब उनकी मॉं ने प्रथम बार शौचालय का उपयोग किया तो हठात् उनके मुंह से अपने श्रवण कुमार जैसे पुत्र के लिए ढेरों आशीष निकल आये थे......।

उनकी मां की मृत्यु हुए आज दस साल हो गये हैं और उनकी पत्नी और बच्चे साथ में रहने लगे हैं......। वह शौचालय जो उनने अपनी मां के लिए बनाया था अब उनकी पत्नी उपयोग कर रही है और वे उस शौचालय को कभी कभी एकटक देखते हुए पुरानी यादों में खो से जाते हैं.....।

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धर्मेंन्द्र कुमार त्रिपाठी

रोशन नगर, वार्ड नं. 18,

मरकज मस्जिद के पास, साइंस कॉलेज डाकघर,

कटनी म.प्र.

पिन-483501

ई-मेल -tripathidharmendra.1978@gmail.com

1 टिप्पणियाँ

  1. विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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