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महाकाव्य 'जय मालव' के कुछ चुनिंदा अंश // मिहिर

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ऐतिहासिक महाकाव्य 'जय मालव' की प्रस्तावना के कुछ चुनिंदा अंश।
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  जय मालव: एक परिचय

इस महाकाव्य की सीमा में जीवन का सांगोपांग परिचय ऐतिहासिकता की सीमा में बँध नहीं पाया है। यहां सर्वकालिक जीवन वृत्तियाँ स्थापित हैं। किसी भी युग का मनुष्य, ऐतिहासिकता की काल-सीमा में रचे बसे इस काव्य से अपना परिचय गाँठ सकता है।

अपने विस्तार में इसमें इतनी प्रवृत्तियों का परिचय दिया और इतनी वृत्तियों को बाँधा समेटा है कि शुरू से बात करने लगूँ तो सूझता ही नहीं कि शुरू कहाँ से करूँ।

"हम संशय की भाव-भूमि में, सत्य खोजते रहते हैं
आधी रात थके सोते सब, तब हम चिंतन करते हैं
  मुक्ताकाश मनुज मेधा का, यह विराटता मेरा मन
जिसमें सारे पथ मिलते हैं, जुड़ जाते सब घट चिंतन"
('जय मालव' से)

मालव की संपृक्त चेतना
में गहराते लाल समन्दर
ध्वजा-पट्टिका फडक रही थी
मँडराते थे गहरे बादल।
लौह अंश मिटटी में गहरा
जौ,चावल मिलते खेतों पर
पूर्ववर्त की ओर धरा पर
गहरी धूसर गंध जहाँ पर
बडे बडे साम्राज्य खडे हैं
मगध, वत्स, कौशाम्बी, कोशल
वहाँ चेतना का निर्मल आकाश अभी तक
सुंदर गहरी नील कांति से आवेष्टित था।
('जय मालव' से)

जय मालव में प्रकृति चित्रण

प्रकृति प्रेम और चित्रण के इतने विविध दृश्य यहाँ हैं कि हर सुबह सूरज का उगना और दिन का ढलना ही इतने अलग अलग तरीकों से इतने विविध रूपों में सामने आता है कि लगता है अब इसके बाद तो कुछ बचा ही नहीं। उदाहरण -
1
गिरा रही हो झिलमिलिका, सुंदर आरोहण ढँकने को
संध्या की बाला, दूर कुटी की एक खुली अट्टालिक से
या बिखरा दीं अलकें अपनी सघन छिटककर अँधियाली
पश्चिम के नभ की दूर कहीं, ऊँची एक अटारी से।

स्तब्ध हवा, ठिठका परिमंडल, सोने को जाती बनमाली
सिमट रहा चादर में पूरा गाँव, जहाँ पलकें अँधियाली।

2
मालव के विद्याधर पर्वत अंधियाले में नहा रहे
प्रथम किरण जो फूट रही,उससे अविचल मुख छिपा रहे।

इस पर्वत पर लोग बताते यक्ष-यक्षिणियों का डेरा है
विद्याधर भी सुने गऐ हैं - यहाँ प्रश्निकों का फेरा है।

यह गतिमयता, एक रहस्य सी साँझ-सुबह पर्वत पर होती।
फिर भी अपनी निर्मलता में, प्रातः यहाँ सुंदर होती।

3
मेखला हरितिम सुहाती, गगन नीला आभरण
हाथ में वे हाथ ले, ज्यों मिलन का गीत गाते
दूर पर्वत के शिखर या दो युगों के संधिपथ पर।

4
  इन उजले आदानों में जो धूप खिली है
  कहना मत अलसाई है या मूक खडी है
  ज्यों तितली हो पंख डुलाती हौले से
  एक डाल पर बैठी हो, चुपचाप पडी हो
5
ये बरखा में भीग चुके, जप तप सब इनका पूर्ण हुआ
ये जेठ मास में तपे, बरस भर का सारा श्रम चूर हुआ
अब भादों के बाद क्वार तक इनके पथ उजले होंगे
सौंधी धरती, महक गुलाबी, चितवन का पथ रोक रहेंगे।
(अम्बष्ठ गण के रास्ते)

6
साँझ पडी, अंबर-पथ सूना
झूल रही परिमल की लहरी
वह शर्मीली हवा, लरजती
लाज-भरी चुप ठहरी ठहरी।

गिरि शिखरों की रात, वही
कौमार्य कली का नहीं छूटता
बिन खोजे यह छटा न मिलती
बिन खोले अवगुण्ठ न खुलता।

भारत वर्णन

इस काव्य की भाव भूमि में राष्ट्र का विचार कण-कण में भासमान है। शायद ही काव्य का कोई  पृष्ठ हो जहाँ राष्ट्र-भाव और उसके प्रति एक अनोखी भावाभिव्यक्ति गतिमान न हो। कहीं तो वह सूक्ष्म है-

"मायापुरी बसी हुई इन दृढ़ ऊँची चटटानों में
गंगा लहरें घिरी हुई, कलशों से घिरी अटारी में
कुछ तो है सौभाग्य मिला है इस राष्ट्रभूमि के घाटों में
पथ के कण कण, बिंदु बिंदु में उभरा जो इन बाटों में।"
(चाणक्य का स्रुघ्न नगरी से मायापुरी आना)

और कहीं तो बात सीधे ही कह दी गई है-

"सबका परिमार्जन करतीं ये श्रांत वादियां इसकी थाती
यह भूगोल उभरता है ज्यों विश्व-बाट से भारतवासी।"

चरित्र चित्रण

इस महाकाव्य के सभी पात्र बडे गतिशील बन पड़े हैं। कोई भी रुढ़ पात्र नहीं। जैसा वे काव्य के आरंभ में नजर आते हैं, काव्य के अंत तक वे वैसा नजर नहीं आते। यह गतिशीलता स्वाभाविक है, धीमे धीमे आती है। चाणक्य आरंभ से अंत तक वही कुटिल देशाभिमानी क्रूर ब्राह्मण नजर नहीं आता अपितु वह भी धीरे धीरे अपनी गल्तियों से सीखते अंत तक चरित्र का निर्माण करते दीखता है -

1
"मगध भले ही कैसा भी हो, एक बात तो निश्चित है
इसे विधाता से अप्रतिम वरदान मिला है
बिंबिसार, शिशुनाग, उदायिन, कालाशोक या अजातशत्रु ने
इसे राष्ट्र बन जाने का गौरव इस युग में समझाया
शीश काटकर एक दूसरे का इतना तो जता दिया
राजा मरता है लेकिन, यह राष्ट्र नहीं मर सकता है
इसीलिये हर मागध तत्पर राष्ट्र के लिये रहता है
और सिंधु के जनपद को भी, अपना-सा वह कहता है
यह गौरव निश्चित ही इन, राजाओं को देना होगा
पृथक् जनों औ‘ कुलपतियों से, एक राष्ट्र यह बना गये।"

(चाणक्य सर्ग : मगध के बारे में अपने शिष्यों से चर्चा करते हुए चाणक्य)

2
"इतिहास क्षमा कर दे हमको या नहीं समझ सकता है कौन
किंतु मगध की प्रजा हमें बस अपराधी ही समझी है।"

(मगध पर पहला असफल आक्रमण करने के बाद आत्मचिंतन करते चाणक्य)

चाणक्य का हृदय परिवर्तन यों ही अचानक नहीं होता। पूरे काव्य में वह समानांतर एक उपकथा की भाँति चलता रहता है। और अंत में  -

अग्रोदक की राख हो चुकी नगरी देखी-
भस्मसात् हो चुके महल
अब भी इन दीवारों में ज्यों गूँज रही थी कहीं चुहल।
XXX
अब भी जैसे राख कहीं पर गर्म पडी थी
इसी राख में शेष अभी तक चीत्कारें
XXX
सूनी पडी हुई गलियों का वह कोलाहल, वह स्पंदन
टूटे-फूटे स्तम्भों में अब शेष बचा केवल क्रंदन।
XXX

 अलक्षेन्द्र

संभवतः किसी भारतीय काव्य में किसी यूनानी, विशेषकर सिकंदर का यह पहला अवतरण है। इसीलिये सिकंदर का प्रथम परिचय भी वसंत में सिंधु को पार करते हुए अपनी नीली आंखों से अपने सपनों के इस वृहत् देश को देखते हुए है -

"वासंत की भीगी कुटी से
वे सुरस भीगी हवाऐं
डोलती थीं विजन वादी में
चन्द्रभागा के तटों को चल पडीं।

अतिथि कैसा ? कौन है वह
नयन नीलम के उठाकर
दूरतक की खेतियों को देखकर मन में मचलता ?"

और सिकंदर के चरण जिस जगह भी पडे, वहाँ से गुजरने का दृश्य इसके ठीक विपरीत बडा ही विकट है -

"डूब रहा था सूर्य उधर आसीर-ध्वजा के बाटों पर
लटक रखे थे शव पेडों पर, उलझ रखे ध्वज काँटों पर।
कहीं किसी की भुजा पडी थी, कहीं किसी के शस्त्र पडे
कहीं सूखते हुए शवों पर गिद्धों के थे झुंड अडे।
कहीं श्यान या श्याल उठाऐ मांस-लोथ, जकडे दांतों को
कहीं झगड पड़ते आपस में, खींच रहे निर्दय आंतों को।"
(युद्ध सर्ग, ब्राह्मणावाट का नरमेध)

युद्ध के पहर: जीवटता का स्वर

संभवतः भारतीय जीवन दर्शन मे इतने कठिन कोमल स्वर और कहीं नहीं मिलेंगे, जितने कि इस काव्य के युद्ध वर्णनों में हैं। युद्ध केवल दो सेनाओं का परस्पर टकराना और उस की हार जीत ही नहीं: बल्कि एक पूरा जीवन दर्शन है। बिना इस काव्य को पढे इस बात को समझा नहीं जा सकता। तो प्रस्तुत है युद्धकाल के कुछ सजीव वर्णन:-
1
युद्ध पूर्व मालव गण का पूरा अस्तित्व दाँव पर लगा है। नगर खाली किये जा रहे हैं। खडी फसलों को आग लगाई जा रही है। वार्ताशस्त्रोपजीविः (वार्ता - व्यापार एवं कृषि ; शस्त्र - हथियार, से आजीविका कमाने वाले) गणराज्य के लिये यों तो ये कोई नई बात नहीं किंतु जिन हाथों ने इन्हें बोया है, उन हाथों आग लगाना कितना दुखद हो सकता है -

"छनछनाती गूँजती गलियाँ नगर की
राज्य की सेना शिविर डाले पडी है
जल रही धू धू फसल उठता धुआ है
जो जरा तैयार उसको ही छुआ है।
इन्हीं खेतों में गडा धन स्वेद का
आज छोडे जा रहे अंबर अवनि को
कल उन्हें तलवार लेकर यहीं आना
रक्त से भी सींचना इस मेदिनी को।"

2
युद्ध के व्यापार में भी मालवों का जीवन दर्शन बडा विचित्र था। युद्ध के बीच का यह एक मार्मिक सा दृश्य किसी के भी होंठों पर एक स्मित हास्य का भाव ला देता है जब शालिटंक जैसा मसखरा भी अपने जीवन के चालीस बसंत पार कर अंतिम समय इस युद्ध में भाग लेने को तत्पर है, और सेना की एक टुकडी के साथ चलते हुए किसी अनजान युवती को देख न जाने क्यों जीवन के अंतिम सोपान  पर अपने जीवन की व्यर्थता का क्षणिक एहसास करता है-

  "विदा समय कुछ मंद-स्मित अनुभूति से गले
  भर आये - अवरुद्ध कंठ से उन्हें मिले।
  धनुष ढो रही छकडा गाडी पर बैठी जो
  वह भी क्या मालूम संकुचित शरमाई क्यों ?
  शालिटंक ने देखा तो यों बोल पडा वो -
  ’तुम बहुत भली हो, सच तुम प्यारी सी लगती हो’
  दुस्साहस के साथ हथेली हाथों में ले
  आँखों में झांक पडा - समय तो छूट रहा था
  फिर अपने दुस्साहस पर ज्यों तनिक झेंपकर
जाने के पहले विचित्रता से हँस बैठा।
उसकी अप्रत्याशित इस मासूम हँसी पर
युवती वह मुस्काई पथ से दूर हो गई।
इतने में चालीस बरस जो छूट गऐ थे
उसके जीवन की देहरी पर लौट रहे थे।
वह जीतेगा, हाँ जीतेगा, उस अनदेखी मुस्कान के लिए
मालव की मुस्कान न यों नत हो पायेगी
और युद्ध के बाद उसे जाकर  खोजेगा।

अगले पल ही जीवन की रस बूँद छलक जो उमगाई
लेकिन अब तक छूट गई थी जीवन की सारी तरुणाई।"

3
कारवाँ का नायक घोडे पर उधर से आ निकला जहाँ सेना की वह टुकडी बात बात पर ठठाकर हँस देती थी। नायक को सामने पाकर सब सहम गए, पर तभी नायक की दृष्टि समूह का केन्द्र बने शालिटंक पर जा पडी। हँसता हुआ नायक बोल पडा - ’अच्छा तो यह तुम हो शालि। तुम्हारे रहते मालवों की आत्मा अमर है।’

4
दूर नगर के नक्कारों में शोर कहीं रह रहकर होता
अरुणिम थी वह प्रातः, कहीं ठिठुरन का कोई ठौर न था।
एक तरफ थे उमड़ रहे वे बादल नभ भर
एक तरफ था चिराकाश निःशब्द अधर तक
मालव का जनमानस ऐसे युद्धभाव में पगा हुआ था
बच्चा बच्चा युद्धभूमि के नक्कारों में बडा हुआ था।

यहाँ दुर्ग की ऊँचाई पर हवा इस तरह लहराती ज्यों
एक ललकता महासिंधु ज्यों लहराता।

-क्रमशः
©®मिहिर

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