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दीपावली विशेष आलेख // दीपकों का होता लोप // चंद्रशेखर प्रजापति

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दीपावली पर दीपों का होता लोप : चिंताजनक

- चंद्रशेखर प्रजापति

दीपावली अर्थात दीप + आवली। दीपों की माला से तात्पर्य प्रकाशोत्सव। शरद ऋतु में प्रत्येक वर्ष मनाया जाने वाला एक प्राचीन भारतीय त्यौहार हैं। यह पर्व आध्यात्मिक रूप से अंधकार रूपी बुराई पर अच्छाई रूपी प्रकाश पर विजय को दर्शाता है। माना जाता है कि दीपावली के दिन अयोध्या के राजा मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने चौदह वर्ष वनवास के समय अंधकार रूपी बृहत बुराई पर विजय के पश्चात अयोध्या वापस लौटने पर अयोध्या वासियों के द्वारा घी के दीपक जलाने की रूप में दीपावली। जैन धर्म के लोग इसे महावीर के मोक्ष दिवस के रूप में एवं सिख समुदाय बंदी छोड़ दिवस के रूप में हर्षोल्लास के साथ दीपावली त्यौहार मनाने है। दीपावली ज्योति से ज्योति प्रज्वलित करने का पर्व है।

        दीपक का संदेश है : हम सभी के लिए ईश्वर को प्रकाश रूप माना गया है। अतः दीपक की ज्योति ज्ञान एवं विवेक और  ईश्वरीय गुणों को प्रकट करती है। दीप पात्रता लगन स्नेह और प्रकाश समन्वय है। दीपक का पात्र, पात्रता का प्रतीक है पात्रता प्रामाणिकता की द्योतक है। घृत अर्थात घी - तेल जिसे स्नेह के रूप में अंगीकृत करते हैं । पात्र में इसे भरने का अर्थ है , प्रामाणिक  व्यक्ति अपने अंदर संपूर्ण मानवता के प्रति स्नेह धारण वर्तिका अर्थात दीप की बत्ती का अर्थ है - लगन। इसका अर्थ है बिना लगन कर्मठता के ईश्वरीय अनुराग संभव नहीं। पात्र स्नेह और लगन को धारण करने के उपरांत ही दीपक ज्योति को धारण करता है अर्थात पात्रता स्नेह और  कर्मठता के गुणों को धारण करने वाले व्यक्ति के अंतर्मन में ईश्वरीय प्रभा आलोकित होती है। इस कारण दीप प्रज्वलन होता जाता है।

         दीपावली के इस पर्व का प्रत्येक भारतीय उल्लास और उमंग से स्वागत करता है यह पर्व हमारी सभ्यता एवं संस्कृति की गौरव गाथा है। यही नहीं इतिहासकार कहते हैं कि जिस दिन ज्ञान की ज्योति लेकर नचिकेता यमलोक से मृत्यु लोक में अवतरित हुए वह दिन भी दीपावली का दिन था। यद्यपि दीपावली लोकमानस में एक सांस्कृतिक पर्व के रूप में अपनी व्यापकता सिद्ध कर चुका है। फिर भी यह तो मानना ही होगा कि जिस ऐतिहासिक महापुरुषों के घटना प्रसंगों से इस पर्व का महत्व जुड़ा है , वे अध्यात्म जगत के शिखर पुरुष थे। इस दृष्टि से दीपावली पर्व लौकिकता के साथ आध्यात्मिकता का अनूठा संगम है।

              लेकिन आज आधुनिकता के दौर में दीपावली मनाने का ढंग कुछ इस तरह परिवर्तित हो गया है  जिसके चलते पर्यावरण जहाँ एक ओर प्रदूषित हो रहा है वही दूसरी तरफ मिट्टी के बने दीपों की महक का अस्तित्व खतरे में दिख रहा है। भारतीय पूर्वजों के द्वारा मिट्टी के दीपक जलाकर घरों में दीपावली मनाने की परंपरा आज के समय में बाजार में चाइना के दीपक ने भारतीय मिट्टी की सुगंध खराब करता दिख रहा है। और प्राचीन काल से मिट्टी को सोना रुप में गढ़ने वाले कुंभकारों को अपने उद्योग के प्रति आकर्षण कम होता जा रहा है।

    जिस तरह से मौजूदा दौर में दीपावली मनाने का चलन चल रहा है इससे यह महसूस हो रहा है कि हम विदेशों को अप्रत्यक्ष रूप से मालामाल करते जा रहे है और हम स्वयं विपन्न होते जा रहे है क्योंकि मिट्टी के दीपों के स्थान पर चाइना झालरें रोशनी करने लगी है जो कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए शुभ शगुन नहीं है। मानव विकास की बुनियाद में पहिए की भूमिका महत्वपूर्ण रही है उसे बखूबी तरीके से कुंभकारों ने अनेक जीवन उपयोगी वस्तुएं बनाकर भारत का मान विश्व क्षितिज पर पहुंचाया है  लेकिन आज दैनिक जीवन को तो छोड़िए दीपावली में ही दीपों का लोप होता रहा है जो कि भारत के लिए चिंता का विषय है।

आलेख

लेखक - परिचय

नाम - चंद्रशेखर प्रजापति

ग्राम - सरौरा खुर्द

पोस्ट - सरौरा कलां 

थाना कमलापुर

तहसील - सिधौली

जिला सीतापुर उत्तर प्रदेश

पिन कोड 261302

2 टिप्पणियाँ

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