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नक्सलाईट------ कहानी // डॉ.अविनाश कुमार झा

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"आज मोहन बाबू के पोते का मुंडन है ना! अरे! चंदर के बेटे का! बहुत मनौती से तो उसका जनम हुआ है।"

बिहारी काका काफी खुश थे और तेजी में धड़फड़ाये हजमा टोली में जा रहे थे।

"ई जो कमेसरा  हज्जाम का बेटा है न! अब तो सैलुन खोल लिया है! बड़का हज्जाम का लंगड़ी बनता है। कल्हे से तीन बार समाध ( संदेश) दे दिया पर आने का नामे नहीं ले रहा है। हां! बाप का जीवन तो खेते- खेते  अगंव (उपज में हिस्सा) मांगते बीत गया और इसका  आजकल भैलू बढ़ गया है!"

" का करेंगे ! काका! पहिले का समय अब नही न रहा! सब का स्टैंडर्ड बढ़ गया है। और आब इतना धूमधाम से मुंडन और जनेऊ कौन कराता है? इस संस्कार को लेकर कोई चाटेगा क्या? शहर बाजार मे इसको लो ओल्ड फैशन मानते हैं। नवका लड़का लोगन के नजर मे इसका कोनो भैलू है? काहे इतना पैसा बर्बाद करते हैं! " बिरजुआ का बेटा हंसते हुए बोला! "आपलोग!" ऊपर से गांव में हजाम, लोहार, बढई, पंडित ,ढोल पीपही वला के आगे पीछे घुमते रहिए!

" देखो बबुआ! हमरा जेनरेशन तो ये धरम निभायेगा ही! बाप दादा सीखे हैं तो उस संस्कार को आगे बढायेंगे ही अब तुम लोग भले ही सब छोड़छाड़ दो।" और गांव के फंक्शन में तो छुट्टी लेने के लिए जान लगा देते हैं। बड़ी मुश्किल से मिला है।

" हजमा रे! धीरे धीरे कटिहे बबुआ के केस! बबुआ छथि सुकुमार रे!"

गाने के लय के बीच जब सुरजा ने जब बबुआ के बालों पर कैंची चलाई तो वो ऐसे चिल्लाया जैसे कान कट गया हो। सुरजा भी सहम गया। बिहारी काका चिल्लाते हुए दौड़े।

" कान पर कैंची चला दिया का रे? केस काटने आता नहीं और सैलून खोल के बैठ गया है। आराम से काटो।

मोहन बाबू भी मारने को झपटे। सुरजा बोला" बाबूजी पहिले बचबा को संभालिए न! अम्मा से तो ठीक से पकड़ा ही नहीं रहा है और हमको दोष देते हैं। नहीं कटवाना है तो हमको छोड़िए। किसी और से कटवा लीजिए। "! बिहारी काका चिल्लाये

" देखिए समय का फेर होता है। इसका बाप शादी  ब्याह ,मुंडन, जनेऊ में चौबीसों घंटा बैठकी लगाये रहता था कि कहीं कोई  दूसरा बाजी न मार ले जाये और एक ये है जो इतरा रहा है।"

सुरजा एकदम्मे उखड़ गया" यही तो चाहते हैं आप बाबू साहब लोग! कि हमलोग तरक्की न करें। हमेशा आपलोगों की जी हजूरी करें और आपके आगे हाथ पसारे रहें। वो जमाना बीत गया जब धान/ गेहूं मे थोड़ा हिस्सा देकर सालभर हमसे पमौजी कराते थे, बेगारी कराते थे। आपलोग शहर में जाकर सैलून मे सौ दो सौ दे आयेंगे पर यहाँ चाहते हैं कि एग्यारह और इक्यावन रुपया में काम चल जाये।! आपलोगों ने बहुत शोषण किया हमारे बाप दादाओं का ! अब नहीं होगा। यदि ठीक से बच्चे का मुंडन कराना है तो कराईये, वरना हम चलते हैं"!

उधर महिलाएं गाना गाये जा रही थी

" हजमा रे धीरे धीरे कटिहे बऊआ के केस, बऊआ के मामी तोरे देबऊ रे"! 

मामी के नाम पर भी सुरजा का दिल नही डोला। वो अपना कैंची छुरी समेटने लगा। बिहारी काका की बोलती बंद!

ई सुरजा तो निश्चित रुप से नक्सलाइट हो गया है! उसी की तरह भाषा बोलने लगा है! ई मंडल कमीशन और ललुआ ने तो छोटका लोगन के भाव ही बढ़ा दिया है। सीधे मुंह कोई बात ही नही करता है।

अब क्या करें?  मोहन बाबू किसी अपने गुस्से पर काबू करते हुए समय की नजाकत समझते हुए बोले

" क्या बिहारी! तुम भी क्या बवाल मचाते रहते हो! गांव में नहीं रहते हो तो गांव के मामले में मत बोलो!

चलो सुरजा! काटो! देखो बऊआ रो रहा है! जो मांगोगे दूंगा!"

सुरजा ने बिहारी काका की तरफ हिकारत भरी नजरों से देखा! मानो कह रहा हो !

आये थे बड़े" दाल भात मे मूसलचंद"!

बिहारी काका ने ठान लिया ! अब गांव के किसी फंक्शन में नहीं आना है। वैसे भी छुट्टी तो बड़ी मुश्किल से मिलता है। इससे तो अच्छा है कि वहीं जैसे तैसे शहर में कार्यक्रम करा लें। कौन गांव में आये, इस तरह से मान मनौव्वल करने।  नये लड़कों  में वो संस्कार कहाँ रह गया ,जो इनके बाप दादों में था! लेकिन क्या हम वाकई में ये नक्सलाईट हो गये हैं?

अंदर कहीं से आवाज आयी" क्या अपना हक मांगना, नक्सलाइट हो जाना है!"

बिहारी काका मौन होकर सोचने लगे।

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डा.अविनाश कुमार झा

जिला खाद्य विपणन अधिकारी

पीलीभीत, उतरप्रदेश

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