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कहानी // उजाले के अक़्स // आशीष दशोत्तर

यारों बाहम गुंथे हुए हैं कायनात के बिखरे टुकडे ,

एक फूल को जुंबिश दोगे तो इक तारा कांप उठेगा।-

-फिराक गोरखपुरी


थानेदार हैरान था। वह ऐसी रिपोर्ट लिखना नहीं चाहता था। उसे लगा कि यह कोई मामूली नहीं बडा विवाद है। हो सकता है आज यह विवाद न भी हो पर कल को पता चले तो काफी मुश्किल हो जाएगी।

फरियादी उसी मुद्रा में खड़ा था। उसे उम्मीद थी कि उसकी रिपोर्ट दर्ज कर ली जाएगी। वह रोज-रोज के झगड़ो से परेशान हो गया था। थानेदार उसकी बात को समझ रहा था पर उसके नाम पर उसे संदेह हो रहा था। नाम भी अजीब नहीं था पर आज के दौर के मुताबिक अचरजभरा अवश्य था। थानेदार ने फरियादी से नाम पूछा तो उसने मांगीलाल बताया। यहां तक भी थानेदार को आपत्ति नहीं थी मगर जब उसने वल्दियत जानी तो मांगीलाल ने पिता का नाम हकरू खां बताया। यह सुनते ही थानेदार की कलम रूक गई। वह बोला अभी शहर शांत हुआ है। बडी मुश्किल से इस आग पर काबू पाया जा सका और तुम इसे फिर बढाना चाहते हो?

मांगीलाल ने कहा ‘‘इसमें कुछ गलत नहीं है। मेरा नाम मांगीलाल ही है और मेरे वालिद मरहूम हकरू खां ही। मैं सच कह रहा हूं।

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थानेदार को विश्वास नहीं हो रहा था। वह समझा यह फितरतियों की कोई चाल हैं। हो सकता है उसे मोहरा बनाकर भेजा हो। अगर इसकी शिकायत दर्ज कर ली जाएगी तो यही फितरती थाने को घेर लेंगे। हो सकता है यहाँ उपद्रव कर दें। फिर यह आग शहर में फैले और .........‘‘ना बाबा ना’। वह बोला ‘‘मैं तुम्हारी शिकायत दर्ज नहीं कर सकता। और फिर तुम्हारी शिकायत है भी ऐसी नहीं जिसे दर्ज किया जाए। आपसी विवाद है, मिलजुल कर सुलझा लो। कहाँ थाने के चक्कर में पडते हो।’’

मांगीलाल बोला‘‘ यह आपसी विवाद जरूर है मगर मैं तंग आ चुका हूँ। रोज़-रोज़ पड़ोसी को समझाता आ रहा हूँ पर वह मानता ही नहीं। अब तो मेरी दीवार पर उसने दीवार उठा ली है। मेरी घर में कचरा फेंकता है। बस आप यकीन मानिए, रोज इस तरह की हरकतों से मै और मेरा परिवार परेशान हो गए है।’’ वह अपनी शिकायत के साथ काफी उम्मीद लेकर थाने आया था। उसे यकीन था कि थाने में उसकी शिकायत दर्ज कर ली जाएगी और पुलिस पड़ोसी के खिलाफ कार्रवाही करेगी। मगर यहाँ तो नज़ारा उल्टा ही हो गया। पुलिस उसकी सुनने को तैयार नहीं थी। मांगीलाल को लगा यह थानेदार या तो पड़ोसी से मिला हुआ है या फिर मेरी परेशानी समझना नहीं चाहता। उसने एक बार फिर कोशिश की। बोला ‘‘साहब’ समझने की कोशिश कीजिए। मैं बहुत परेशान हूं। दिन निकलते ही पड़ोसी की हरकतें शुरू हो जाती है। दिन भर कुछ न कुछ कुचमात करता रहता है अब तो हम घर वाले आज़िज आ चुके हैं।’’

थानेदार अब थानेदार की तरह बोला ‘‘तुझे समझाया न, हम तेरी कुछ मदद नहीं कर सकते। साले, खुद तो मज़े करेगा और हमें मार देगा’’।

थानेदार की झिड़की सुनने के बाद मांगीलाल के स्वाभिमान ने उसे वहाँ रहने नहीं दिया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि थानेदार चाहता क्या है? क्या उसे यह परेशानी छोटी लग रही है? भले ही छोटी लगे मगर कल को पड़ोसी ने झगड़ा किया, मारपीट की तो भी रिपोर्ट तो थाने में ही लिखी जाएगी न। मगर किसे समझाएं।

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मांगीलाल वल्द हकरू खां निवासी कुज़डों का वास, यही नाम और पता वह बरसों से लिखवाता आ रहा है और उसके ज्ञान और समझ के अनुसार उसका नाम भी ठीक है और यह पता भी ठीक। पता नहीं थानेदार को इसमें कौन सी आग नज़र आ रही है? उसका नाम तो खुदा की देन है। अब्बा मरहूम हकरू खां बताया करते थे जब वे दूसरे मोहल्ले में रहा करते थे, वहां एक बाड़ा था। कई लोग रहते थे। उनका मकान शंकर बा के मकान के ठीक पास में था।

शंकर बा और हकरू खां का परिवार उसी तरह घुला-मिला था जैसे पानी में नमक। दौर चाहे जो हो नमक पानी में घुलते ही अपना अस्तित्व खो देता है और नमक से मिलने ही पानी नमकीन हो जाता है। इस मिलन के बाद कोई लाख कोशिश करे, वह दोनों को जुदा नहीं कर सकता। ये दोनों परिवार भी इसी तरह अपनत्व की डोर में बंधे हुए थे। इनके सुख-दुख साझे थे। तीज त्यौहार एक से। कोई त्यौहार हो दोनों घरों में रौनक रहती। दोनों ही क्या बाडे के सभी मकानों में एक सी रौनक थी। यह आज़ादी के थोडा पहले की बात होगी तब देश में हिन्दू-मुस्लिम अलगाव की कोशिशें जारी थी, मगर इस बाडे़ के अहाते में यह तरह की कोशिशों के नापाक कदम अब तक नहीं पड़े़ थे।

बस इसी दौर में जन्म हुआ था मांगीलाल का, मांगीलाल जन्म से ही मांगीलाल हो गया ऐसा भी नहीं था। बल्कि जन्म के वक्त तो किसी को यह सुध ही नहीं थी कि बच्चे को कुछ नाम देकर पुकारा जाए। पैदा होते ही बच्चे की हालत नाजुक बताई गई। बच्चे की हालत बिगड़ती जा रही थी। तमाम तरह के उपायों के बाद भी बच्चे की हालत नहीं सुधरी तो शंकर बा सीधे पास के मंदिर जा पहुंचे। वहां बैठ घंटों तक ईश्वर से प्रार्थना करते रहे।

इसे दवा का असर कहें या दुआओं का असर ,बच्चा खतरे से बाहर हो गया। कुछ दिनों में बच्चे की स्थिति सामान्य हो गई। एक दिन शंकर बा ने हकरू खां से कहा कि जब बच्चे की हालत नाजुक थी, तब उन्होंने मंदिर जाकर ईश्वर से प्रार्थना की थी। ईश्वर से उन्होंने बच्चे की जान बचाने की गुहार की। बच्चे को ईश्वर से मांगा और यही प्रार्थना कुबूल हुई। बच्चे को ईश्वर से माँगा इसलिए इसका नाम मांगीलाल ही रखेंगे। हकरू खां को ना तो बोलना ही नहीं था, तुरन्त हाँ कर दी। तभी से बच्चे का नाम मांगीलाल हो गया।

कितनी अजीब बात है। वह दौर अजीब ही रहा होगा जब अपने बच्चे का नाम कोई दूसरा रख दे और उसे बच्चे के माँ-बाप स्वीकार ले। आज तो बच्चे का नाम उसे दादा-नाना भी नहीं रख पाते हैं। यहाँ तक कि बच्चे को लाड़ से कुछ और पुकारें तो माँ-बाप कह देते हैं बच्चे का नाम मत बिगाडो।

मगर हकरू खां के यहाँ ऐसा नहीं था। उसके बच्चे का नाम मांगीलाल तय हो गया था और उसे बाड़े के अधिकांश लोग मांगू कहकर ही पुकारते थे। बच्चे का यह संबोधन सुन हकरू खां भी प्रसन्न होते।

मांगीलाल के जन्म के सालभर बाद ही शंकर बा के यहाँ भी खुशी का अवसर आया। उनकी पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया। यह पुत्र भी काफी कमजोर था इसकी स्थिति भी मांगीलाल की तरह ही थी। इसके लिए भी दवाओं का सिलसिला शुरू हो गया। बेटे की चिन्ता में शंकर बा को दुआओं का खयाल न रहा। हकरू खां को वह वाकया याद था। आखिर उसने मांगीलाल की जान बख्शी थी।

हकरू ने शंकर बा को बोला, ‘‘याद है जब मांगू की तबीयत खराब थी तुमने मंदिर में जाकर प्रार्थना की थी। आज फिर हमारे बच्चे की जान खतरे में है। हम मिलकर कोशिश करें। हो सकता है हमारी दुआ फिर कुबूल हो।

दवाओं के नित नए प्रयोगों के बावजूद दुआओं का अपना महत्व है। इंसान जब परेशानियों में घिर जाता है, तो दुआएं ही उसके लिए आशा की किरण होती है। अपने इलाज पर भरोसा रखने वाला डॉक्टर भी एक वक्त तो यह कह ही देती है, अब ऊपर वाले से दुआ करो वही कुछ कर सकता है।

यहाँ भी हकरू खां और शंकर बा बच्चे की सलामती के लिए दुआ कर रहे थे। उनकी दुआओं का ही असर समझे कि बच्चे की हालत में सुधार आने लगा। धीरे-धीरे बच्चा स्वस्थ हो गया। इस बार बच्चे का नाम हकरू खां ने रखा और नाम वही मांगीलाल। इस बच्चे की जान भी ऊपर वाले से माँगने पर ही मिली थी इसलिए यह भी मांगीलाल हो गया।

अब दोनों घरों में मांगीलाल थे। एक दुआओं से माँगा गया मांगीलाल और दूसरा प्रार्थना से माँगा हुआ मांगीलाल।

इस बाड़े में अब हर कही मांगू की ही गूँज थी। दिन हो या रात शायद ही कभी यह अहाता माँगू की किलकारी से रिक्त रहता हो। कौन सी किलकारी कौन से माँगू की है यह कोई नहीं बता पाता। मगर जैसे ही बच्चे के रोने की आवाज आती बाडे़ में हर कोई कह उठता मांगू रो रहा है।

किलकारियां किसी धर्म या महजब में कैद नहीं होती। ये तो उसी तरह निश्छल निस्वार्थ रहती है जैसे कि खुश्बू। दोनों बच्चों की किलकारियां इस बाड़े में जो महक बिखेर रही थी उसमें समूची मानवता भी डूबने को आतुर रहती होगी। विकृत मानवीय इरादे आखिर मानवता को ऐसे मौके देते की कहाँ हैं ? दोनों मांगू एक साथ खेलते बडे हो रहे थे। किसी में कोई भेद नहीं। भेद था तो बस वही कि एक मांगीलाल वल्द हकरू खां और दूसरा मांगीलाल पिता शंकर बा। यह भेद इन दोनों परिवारों की नजर में कोई भेद नहीं था अलबत्ता दूसरों को इसमें कई भेद नज़र आते थे, और वे इस कोशिश में भी रहते थे कि इस भेद की ओर चैडा करें मगर यह कोशिश कभी सफल नहीं हो पाई।

आजादी के दौर में जब पूरे देश में हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्यता का वातावरण था तब भी इस बाडे में पूरा हिंदुस्तान था। इस हिन्दुस्तान में भेद के कीटाणु प्रवेश नहीं कर पाए थे मांगीलाल को याद है कि देश के बॅटवारे के वक्त बाडे के पास ही में मौजूद एक मस्जिद में कुछ लोगों के द्वारा शिवलिंग स्थापित करने की कोशिश की गई थी तब मस्जिद के एक द्वार पर हकरू खां थे तो दूसरे पर शंकर बा। मजाल था कि कोई नापाक इरादों से भीतर घुस आए। महीनों तक वे मस्जिद की इसी तरह चैकीदारी करते रहे और नापाक इरादे रखने वालों को मुँह की खानी पडी। तभी से यह माना जाने लगा था कि देश में कही भी साम्प्रदायिक तनाव हो सकता है मगर इस शहर में नहीं हो सकता, जहाँ ऐसे लोग रहते है।

आजा़दी के बाद शहर का विकास हुआ। गली, मोहल्ले बनते और बनते गए। वक्त की जरूरत के मुताबिक हकरू खां और शंकर बा के परिवार भी दूर दूर रहने लगे। दोनों के अपने मकान थे, बाल बच्चे। दूरियां घरों में जरूर आई थी मगर दिलों में नहीं। अब भी ईद की शीर-खुरमा पर पहला हक शंकर बा के परिवार का होता था और दीपावली की मिठाई हकरू खां के परिवार से ही आती थी। उम्रदराज हकरू खां और शंकर बा तो ज्यादा दिनों तक इन परिवारों के जीवित अंग न रह सके मगर उनकी सीख और परम्परा बाद में भी इन लोगों में ज़िन्दा रही। दोनों ही परिवारों में मेल मिलाप, प्रेम भाव बना रहा।

इस बीच यह कीचड़ कहाँ से आ गया किसी को पता नहीं। कीचड़ भी आया तो आया, वह शहर की एक मस्जिद पर इस तरह लगा हुआ पाया गया, जैसे किसी ने इरादतन मस्जिद पर फेंका हो। कीचड़ देखकर बहुत से समझदार किस्म के लोगों ने नज़र अंदाज भी किया मगर अनपढों से खतरनाक कम पढे-लिखे लोगों ने इसे एक मुद्दा बना दिया। शहर में देखते ही देखते यह बात फैल गई और शांति का टापू बना शहर कुछ ही पलों में आगजनी का ताण्डव पेश करने लगा। हर तरफ मारपीट, झगड़ा और उपद्रव। नारे, उद्घोष ने इसे बारूदी बना दिया। पुलिस ने एहतियातन शहर में कर्फ्यू लगा दिया। इस शहर को पहली बार पता चला कि कर्फ्यू होता क्या है।

काफी दिनों बाद हालात सामान्य हो पाए। हालात तो सामान्य हो गए मगर लोगों के दिल दिमाग सामान्य नहीं हो सके। अमन पसन्द नागरिक यह सोचते ही रहे कि आखिर क्या वजह थी जो इस वक्त शांत शहर को अशांति का वातावरण देखना पड़ा। पुराने लोग बताते रहे कि जब पूरे देश में दंगे होते थे तब भी यह शहर शांत बना रहता था। कई बार तो देश के कई शहरों में कर्फ्यू भी लगाने पडे मगर इस शहर में कभी ऐसी नौबत नहीं आई। हालात यह होते थे कि इस शहर की पुलिस को दूसरे सामान्य शहरों की तरफ इस यकीन के साथ भेज दिया जाता था कि वहाँ तो कुछ अप्रिय होना ही नहीं है। कई पीरों की मजारों पर होने वाले सालाना उर्स का हिस्सा हिन्दू नौजवान सम्भालते आ रहे थे। दुर्गा पूजा में होने वाली नौ दिवसीय आराधना में अहम जिम्मेदारियां मुस्लिम भाई निभाते रहे और अब तक यही परम्परा कायम थी। पता नहीं किसने और किस वजह से नफरत का यह बीज इस प्रेम की उर्वरा भूमि पर फेंक दिया। लोगों के दिलों में अब अजाना भय स्थान ले चुका था। इस भय का न कोई आरंभ और न ही अंत। जब से शहर के हालात बिगडे लोगों ने अपने बच्चों को समय रहते घर लौट आने की हिदायत दे डाली। जिन गली मुहल्लों में रात के दूसरे या तीसरे पहर में भी काफी चहल पहल रहा करती थी अब वहाँ शाम से ही सन्नाटा पसरने लगा था। लोग अपने काम से काम रखने लगे। न किसी से ज्यादा बात और न किसी से दुआ-सलाम। सब भीतर ही भीतर जल रहे थे।

इस वातावरण में सबसे अधिक तकलीफ उन परिवारों पर आन पडी थी, जो दहशतगर्दों के आस-पास रहते थे। पुलिस की तलाशी, अवसर परस्त नेताओं की बयानबाजी, झूठी हमदर्दी दिखाने वाले नुमाइन्दों के दौरे आदि ने इन बेकसूर लोगों का जीना मुहाल कर दिया था। कुछ लोग तो हालात संभलने तक आस-पड़ोस के शहरों में अपने रिश्तेदारों के यहाँ जा चुके थे। प्रशासन अपनी नज़रें और सख्त करने में लगा था। इस शहर में दंगा होने से हर तरफ अचरज था। जहाँ कभी साम्प्रदायिक तनाव न हुआ हो वहाँ ऐसा हो जाए तो अफसरों के भी गले में आ जाती है। यह समझा जाने लगा कि प्रशासनिक अधिकारियों ने ध्यान नहीं दिया। अगर समय रखते ध्यान दिया जाता तो हो सकता था, इस मामूली विवाद को साम्प्रदायिक तनाव में बदलने से रोका जा सकता था।

तो ऐसे संवेदनशील समय में मांगीलाल वल्द हकरू खां को सामने पाकर थानेदार चक्कर में पड गया। वह समझ नहीं पा रहा था कि यह सही है भी या नहीं। यदि यह सही है भी तो वक्त का तकाज़ा है कि इसे सही न माना जाए। फरियादी का नाम हिन्दू और पिता का नाम मुस्लिम। ऐसे में पड़ोसी हिन्दू हो या मुसलमान दोनों स्थिति में अप्रिय संदेश जाना ही है। यदि ऐसा हुआ तो अनर्थ हो जाएगा।

मांगीलाल वल्द हकरू खां पसोपेश में थे। अब उन्हें यह पता नहीं था कि कभी इस तरह का भी दिन आएगा जब उसका नाम ही उसके लिए मुसीबत बन जाएगा। अगर शुरू से ऐसा होता तो संभव था कि उसके पिता ही उसका नाम बदल देते। कुछ और रख देते मगर यह नाम कभी नहीं रखते। इस शहर में कभी उसे नाम को लेकर परेशानी नहीं आई। किसी ने उसके नाम को सुनकर वैसा आश्चर्य नहीं जताया, जिस तरह आज थानेदार जता रहा था। यही नहीं थानेदार ने दो सिपाही भी भेजे थे मांगीलाल के पीछे जो यह तफ्तीश कर गए थे कि यह मांगीलाल है और इसके वलिद का नाम हकरू खां ही है। आस-पड़ोस वालों ने इस पर मुहर लगाई और उनकी बातों से संतुष्ट सिपाहियों की बात पर थानेदार को यकीन आया तब यह माना गया कि थाने में रिपोर्ट लिखवाने आया व्यक्ति मांगीलाल ही था और उसकी वल्दियत हकरू खां के नाम से ही है। हालांकि थानेदार को सिपाहियों की तफ्तीश के बाद इस बात पर यकीन हो गया कि मांगीलाल वल्द हकरू खां सही व्यक्ति है और इसमें किसी तरह की फितरत नहीं है, फिर भी थानेदार रिपोर्ट नहीं लिखना चाहता था। वह अब भी इस नाम को संदेह की नज़र से देख रहा था। वैसे मांगीलाल वल्द हकरू खां के पक्ष में मांगीलाल पिता शंकर बा ही नहीं शहर के कई परिचित लोग थे और सभी ने यह बताया भी था कि मांगीलाल नेक और अमन पसंद आदमी है मगर संशय के बादल बार-बार थानेदार के मन में घुमड़ रह थे।

इस घटना को काफी वक्त हो गया है। मांगीलाल वल्द हकरू खां आज भी अपने पड़ोसी के हरकतों से परेशान हैं रोज़ पड़ोसी के साथ स्थायी दुश्मनी का भाव नहीं रखते थोड़ी देर लड़-झगड़कर वापस पड़ोसी के साथ खुशनुमा अंदाज में पेश आते है। उन्हें लगता है कि जैसा भी है यह पड़ोसी उस थानेदार से तो बेहतर है जो भले ही रोज़ परेशान करे मगर उसके नाम, उनके अस्तित्व को स्वीकार तो करता है। आज के दौर में ऐसे पड़ोसी को पा कर मांगीलाल वल्द हकरू खां खुद को नसीबवाला समझते हैं। मांगीलाल को देख भीतर से ज़ख्मी यह शहर अपने पुराने दिनों के लौटने की उम्मीद करता है।

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संक्षिप्त परिचय

नाम - आशीष दशोत्तर

जन्म - 05 अक्टूबर 1972

शिक्षा - 1. एम.एस.सी. (भौतिक शास्त्र)

2. एम.ए. (हिन्दी)

3. एल-एल.बी.

4. बी.एड

5. बी.जे.एम.सी.

6. स्नातकोत्तर में हिन्दी पत्रकारिता पर विशेष अध्ययन।

प्रकाशन - 1 मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा काव्य संग्रह-खुशियाँ कैद नहीं होती-का प्रकाशन।

2 ग़ज़ल संग्रह 'लकीरें',

3 भगतसिंह की पत्रकारिता पर केंद्रित पुस्तक-समर में शब्द-प्रकाशित

4 नवसाक्षर लेखन के तहत पांच कहानी पुस्तकें प्रकाशित। आठ वृत्तचित्रों में संवाद लेखन एवं पार्श्व स्वर।

5. कहानी संग्रह 'चे पा और टिहिया' प्रकाशित।

पुरस्कार - 1. साहित्य अकादमी म.प्र. द्वारा युवा लेखन के तहत पुरस्कार।

2. साहित्य अमृत द्वारा युवा व्यंग्य लेखन पुरस्कार।

3. म.प्र. शासन द्वारा आयोजित अस्पृश्यता निवारणार्थ गीत लेखन स्पर्धा में पुरस्कृत।

4. साहित्य गौरव पुरस्कार।

5, किताबघर प्रकाशन के आर्य स्मृति सम्मान के तहत

कहानी, संकलन हेतु चयनित एवं प्रकाशित।

6. साक्षरता मित्र राज्य स्तरीय सम्मान

सम्प्रति - आठ वर्षों तक पत्रकारिता के उपरान्त अब शासकीय सेवा में।

संपर्क - 12@2,कोमल नगर,बरबड़ रोड

रतलाम (म.प्र.) 457001

E-mail- ashish.dashottar@yahoo.com

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