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कहानी // भीगकर न भीगने सा कुछ // आशीष दशोत्तर

बारिश बहुत तेज़ थी। अचानक आई इस बारिश का अंदाज़ भी अलग ही था। अभी तो तेज़ धूप थी। चेहरों पर पसीने टपक रहे थे। देखते ही देखते आसमान में बादल घिर आए और हल्की बूदाबांदी होने लगी। अचानक ही बड़ी-बड़ी बूंदे और फिर तो मूसलधार का रूप ले चुकी थी बारिश। इस तरह अकस्मात कोई मौसम हम पर मेहरबान हो जाए तो आनंद आ जाता है। वैसे भी बारिश अब होती ही कहाँ है? होती भी है तो उस तरह जैसे औपचारिकता पूरी कर रही हों। वर्षा का मौसम आते ही लोग पुरानी यादें ताज़ा करने लग जाते हैं। पहले तो चार-पाँच दिन की झड़ी लगती थी। इतनी बारिश होती थी कि सूरज के साप्ताहिक दर्शन हुआ करते थे। लोग घरों से निकलने को बैचेन हो जाते थे। और फिर यादें कहाँ से कहाँ पहुँच जाती है।

इस बार यह सुकून देने वाला है कि वर्षा शाहाना अंदाज में हो रही है। यानी अचानक बरस जाए और घण्टे भर बाद सब कुछ सामान्य हो जाए। इस मौसम का भी अपना ही मज़ा होता है। सुबह जब घर से निकला था तो आसमान बिल्कुल साफ था। पत्नी ने घर से निकलते वक्त कहा भी था रेनकोट साथ में रख लो। मौसम का पता नहीं कब पलट जाए, कम से कम थोड़ा बचाव तो होगा ही। मग़र मैंने हर बार की तरह इंकार कर दिया था। मुझे इस तरह की झंझटों से चिढ़ भी है। यानी जब बारिश न हो तो रेनकोट या छतरी साथ लिये घूमते रहो। जब ठण्ड न लगे तो भी एहतियातन सफर में गर्म कपड़े रखकर चलो। ये सब मुझे परेशान करता है। इसीलिए मैं खाली हाथ ही सफर करना पसंद करता हूँ। न कोई बैग न टिफिन। न भूलने का डर न याद रखने का संकट। और फिर यह सफर भी कोई लम्बा नहीं था। सुबह जाकर शाम को लौटना ही था। इस दौरान भी छह घण्टे तो ट्रेन में ही गुज़रना थे। घण्टा भर रिक्शा या बस में और बाकी समय शहर में। यह शहर का समय ही ऐसा था जहाँ के लिए पत्नी चिंतित थी कि बारिश आ गई तो भीगना पड़ेगा। इससे पहले दो दिनों तक वैसे ही मैं भीग चुका था, इसलिए पत्नी की चिंता जायज थी । मग़र मैं अपनी आदत के मुताबिक खाली हाथ ही घर से निकला था।

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संयोग देखिए बारिश को भी यहीं आना था। बीच शहर में, जहाँ न छिपने की कोई जगह और न ही कहीं आश्रय स्थल। तेज़ी से कदम बढ़ाता हुआ मैं सोच रहा था कि मंजिल तक पहुँचने में बमुश्किल पाँच मिनट लगना है, और इस दौरान हल्की बूंदाबांदी ही आती रहे तो मैं अपनी मंज़िल तक पहुँच जाऊँगा। रास्ते में साथ चल रहे एक व्यक्ति से पूछा ही लिया था ‘‘यूनिवर्सिटी अभी कितनी दूर होगी?’’

उसने हाथ ऊँचा कर बताया, ‘‘ये रही सामने।’’ उसके इतना कहते ही मैं आश्वस्त हो गया था कि अब वहाँ तक पहुँचा जा सकेगा। राह बताने वाले अक्सर मंज़िल को अधिक दूर इसलिए नहीं बताते हैं कि चलने वाला भीतर से थक न जाए। हमेशा राह बताने वाला यही कहता है, ‘‘फलाँ जगह पास ही है। पैदल जाया जा सकता है। आदि.............’’

साथ चलते व्यक्ति ने भी यही सोचते हुए मुझे हाथ के इशारे से बताया होगा। उसने बारिश बढ़ती देख दौड़ लगा ली और पास ही कहीं इमारत में गुम हो गया। शायद उसे वहीं जाना होगा। उसने जिस तरफ हाथ से इशारा किया था, उधर देखते हुए मैं आगे बढ़ रहा था। उस तरफ बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल नज़र आ रहे थे। मैंने तेज़ी से सड़क पार की। दूसरी तरफ भी मॉल ही दिखाई दे रहे थे। मॉल के गेट पर सुरक्षाकर्मी इस तैयारी से खड़ा था कि कोई बारिश से बचने के लिए मॉल की शरण न ले लें।

मेरे तेज़ी से बढ़ते कदम बारिश से होड़ नहीं कर पा रहे थे। बारिश और तेज़ हो गई। अब मुझे लगने लगा कि आगे चला तो पूरा ही भीग जाऊँगा। लिहाजा वहीं एक पेड़ दिखते ही उसके नीचे आ गया। पेड़ भी औपचारिक पेड़ ही था। यानी एक डाली का पेड़ जिसे तना भी कहा जा सकता था। हालांकि इसका तना काफी मोटा था और इससे प्रतीत हो रहा था कि यह कभी घना पेड़ रहा होगा। पीछे शॉंपिंग मॉल वालों ने इसको अपनी शान में बाधा मानते हुए मुंडवा दिया होगा। बड़े शहरों में हरियाली इसी बाज़ारियत के कारण खत्म होती जा रही है। मग़र किया क्या जाए जब पेड़ों से ज़्यादा ज़रूरत बाज़ार की महसूस की जा रही हो।

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बहरहाल, मैं उस पेड़ के तने के नीचे खड़ा होकर अपने आप को भीगने से बचाने की कोशिश कर रहा था। वहीं पास में एक युवक अपनी थैली से रेनकोट निकालकर पहनने का प्रयास कर रहा था। हालांकि इस प्रक्रिया में वह लगभग पूरा भीग चुका था मग़र रेनकोट होने का लाभ लेना चाहता था। मुझे लगा, अगर मैं भी रेनकोट साथ में लाता तो इसी स्थिति से गुज़र रहा होता। यहाँ खड़ा-खड़ा मैं भी रेनकोट पहनता और भीगने के बावजूद रेनकोट साथ लाने की समझधारी पर अपनी पीठ थपथपा रहा होगा। मग़र मुझे ऐसी समझधारी पर शाबासी पाने की कोई आदत नहीं थी। बारिश तेज़ होती जा रही थी। युवक रेनकोट पहनकर जा चुका था। पेड़ के ठीक पीछे बने शॉपिंग मॉल का सुरक्षागाई मुझ पर नज़र रखे हुए था कि कहीं पेड़ की आस छोड़कर मैं उसके मॉल में न घुस जाऊँ। मॉल के भीतर से लोग बारिश का आनंद ले रहे थे और बाहर लोगों को भीगते देखना अच्छा लग रहा था।

मैं इस उम्मीद में अपने शरीर के सूखे बचे भाग को बारिश से बचाने में प्रयत्नशील था कि वर्षा रूकती ही होगी। पेड़ की एक डाल भी कब तक मेरा साथ देती। मैं मोटे तने के नीचे था। मग़र वह तना भी भीग चुका था। उसके सहारे पानी उतरने लगा था। बहुत कुछ भीगने के बाद मुझे लगने लगा था कि मुझ पर पानी गिर ही नहीं रहा है। मेरी निगाह ऊपर की ओर थी जहाँ बारिश की बड़ी-बड़ी बून्दें साफ दिखाई दे रही थी।

तभी अचानक उसका आगमन हुआ। बारिश की ही तरह वह वहाँ आई और मेरे नज़दीक आकर खड़ी हो गई। अब पेड़ का एक तना और बारिश से बचने का प्रयास करते दो तन। स्वभाववश मैं काफी देर से खड़े स्थान से एक इंच पीछे को हुआ ताकि वह भी बारिश से थोड़ा बच सके। वह मेरे नज़दीक आकर खड़ी हो गई। मैं पीछे की तरफ से अब पूरा भीग रहा था क्योंकि मेरा पृष्ठ भाग पेड़ के तने के साये से बाहर जा चुका था। उसकी भी वही स्थिति थी। वह एक इंच आगे खिसकी। अब वह और मैं दोनों ही इस कदर खड़े थे कि थोड़ी भी हलचल होती तो हमारा स्पर्श हो सकता था।

मैंने फिर ऊपर की ओर देखा। बारिश उसी तेज़ी से हो रही थी। पीछे की तरफ नज़र घुमाई तो मॉल का सुरक्षागार्ड अपने कैबिन में बैठ चुका था। शायद उसे अब यह विश्वास हो गया था कि पूरी तरह भीग चुका मैं या मेरे जैसा कोई अन्य व्यक्ति अब कम से कम बारिश से बचने के लिए तो मॉल में नहीं आएगा। दूसरी तरफ देखा तो भीगते हुए कुछ बच्चे इत्मीनान से चले आ रहे थे। न बस्ता भीगने की चिंता न बीमार होने का डर। उनका बस्ता देख मुझे याद आया कि आगे की जेब में कुछ कागज़ात रखे थे, कहीं वे भीगे तो नहीं। हाथ लगाकर देखा तो कुछ पता नहीं चला। हाथ भी गीले, शर्ट भी भीगा हुआ। कैसे समझें कि कागज़ बचे होंगे।

इसी बीच उसने मेरी तरफ एक इंच कदम और बढ़ाया और हम तकरीबन स्पर्श होने के करीब ही थे। पेड़ के तने को वह भी देख रही थी और मैं भी। उसकी साँसों का आभास मेरी बाहों पर हो रहा था और इससे पता चल रहा था कि उसकी धड़कन तेज़ी से चल रही है। वह तेज़ी से चलकर या शायद दौड़कर यहाँ तक आई थी, इसकी वजह से उसकी धड़कन का रफ्तार से चलना स्वाभाविक था। मग़र सच जानते हुए भी मुझे यह गलतफहमी हो रही थी कि मेरे नज़दीक आने से उसकी धड़कन तेज़ होती जा रही है। देखा, अभी एक इंच जब उसने अपना पैर मेरी तरफ बढ़ाया था, तब उसकी धड़कन और बढ़ी थी न। इस मौसम में और ऐसी परिस्थिति में इस तरह की गलतफहमियाँ स्वाभाविक है। गलतफहमियाँ भी ऐसी कि जाने कहाँ तक ले जाए और क्या-क्या करवा दे। कभी यह, कभी ऐसा, कभी-कभी तो वैसा भी आदि इत्यादि। अचानक उसने रिक्शा को हाथ दिया और मैं सारी गलतफहमियों से सीधे हकीकत में लौट आया। वह दौड़कर रिक्शा के पास गई। कुछ देर बात की और फिर से मेरे करीब दौड़ी चली आई। मुझे लगा कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है और मेरी तलाश में शायद बहार अब भी आ सकती है। वह इस बार इत्मीनान से मेरे करीब खड़ी थी। उसकी धड़कन अब सामान्य थी। हालांकि हमारे बीच का फासला बहुत कम था, पहले की तरह ही, मग़र अब उसकी साँसों में वह तेजी नहीं थी। मेरी एक गलतफहमी तो वहीं ध्वस्त हो गई कि मेरे नज़दीक होने से उसकी धड़कन तेज़ थी।

वह इस बार अधिक निश्चिंत थी। इधर-उधर देखने के बाद मेरी तरफ चेहरा उठाकर बोली ‘‘तीस रूपए मांग रहा था।’’

‘‘हाँ ...............!, मैं चौंका।’’

वह बोल रही थी, ‘‘मुझे यूनिवर्सिटी जाना है। यहीं पास में तो है। वह जो गेट दिख रहा है, यूनिवर्सिटी का ही है। इतनी सी दूर के तीस रूपए कौन दे?’’ चाहता तो मैं भी यही था कि इतनी सी दूर के तीस रूपए देना ठीक नहीं, मग़र उसे समझाना उचित नहीं लगा। वह अपना चेहरा मेरे चेहरे की तरफ कर देख रही थी। शायद इस इंतजार में कि मैं कुछ बोलूंगा। मग़र मैं अभी उसके चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रहा था। गोल चेहरा, साधारण सा। बाल मुँह पर बारिश से चिपक गए थे। ऊपर से गिरती बूंदों से उसकी पलकें बार-बार बंद हो रही थी। होंठ कोमल पाँखुरी की तरह। ठोढ़ी पर पड़ते सल। गले से उतरती पानी की बून्दें। और वर्षा में भीगे वस्त्र के बीच आदि-इत्यदि।

‘‘अच्छा हुआ मैं नहीं बैठी,’’ वह बोल रही थी।

अचानक मेरे मुँह से निकला, ‘‘बिल्कुल ठीक किया।’’

‘‘कैसे? उसने सवाल दाग दिया।’’

इस सवाल के लिए न तो मैं तैयार था, और न ही आदि-इत्यादि से आगे बढ़ पाया था। मग़र जवाब देना ज़रूरी था। मैं बोला, ‘‘रिक्शावाला तो यूनिवर्सिटी के गेट पर ही छोड देता न। फिर भीतर जाने के लिए खुले में भीगते हुए ही जाना पड़ता।’’

‘‘ठीक.............ठीक’’ वह बोली। शायद मेरे जवाब से संतुष्ट थी। ‘‘मुझे भी यूनिवार्सिटी ही जाना है।’’ मेरी इस जानकारी पर उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। शायद वह समझ रही होगी कि इस तरह की जानकारी देकर मैं उसका हमसफर बनने की कोशिश कर रहा हूँ। हालांकि मेरी ऐसी मंशा नहीं थी। अलबत्ता इस वक्त मैं यह चाह ही नहीं रहा था कि बारिश बन्द हो और इस पेड़ के साये को छोड़ना पड़े।

उसकी नज़र सड़क पर थी। जहाँ एक मोपेड पर सवार कुछ लोग सड़क पर गिरे पड़े थे। वह उन लोगों को देख हँस पड़ी। बात हँसने जैसी ही थी। एक मोपेड पर छह लोग जो सवार थे। बारिश में गाड़ी फिसली और सभी सड़क पर थे। बारिश का आनंद लेते लोगों की नज़रे उन पर ही थीं। वे तत्काल उठ गए और गाड़ी पर बैठने लगे। उसी तरह एक मोपेड पर छह लोग, फिर रवाना हो गए।

हँसते वक्त उसका हाथ मुँह पर था। मुँह से हाथ कांधे पर गया। जहाँ उसका कुर्ता कुछ खिसक गया था और काली स्ट्रिप दिखाई देने लगी थी। यह अनायास ही मेरी नज़र में आ गई और मैं पुनः आदि-इत्यादि तक न पहुँचते हुए आसमान की तरफ देखने लगा।

बारिश उसी तरह जारी थी। बड़ी-बड़ी बून्दों गिर रही थी। सड़क पर पानी भराने लगा था। भीग चुके लोग अब आराम से चलते हुए आ जा रहे थे। अब बारिश से बचने का प्रयत्न करना खुद को दिलासा देने के समान था। सड़क से गुज़रते चौपहिया वाहन पानी उड़ाते हुए गुज़र रहे थे।

एक जैसी बारिश होते करीब आधा घंटा बीत चुका था। वह और मैं तकरीबन पच्चीस मिनट से यूँ ही पास-पास थे। पेड़ के तने के साये में खड़ी वह अब भी कोशिश कर रही थी कि किसी तरह खुद को भीगने से बचाए। हालांकि वह पूरी भीग चुकी थी। उसके बालों से अब पानी टपकने लगा था। मुझे इस वक्त वह ‘शहनाई’ फिल्म की हीरोईन राजश्री की तरह लग रही थी जबकि विश्वजीत यह गाना गा रहे होते हैं, ‘’न झटको ज़ुल्फ से पानी, ये मोती फूट जाएंगे ............।’’ मग़र वह अपने बालों पर बार-बार हाथ फेरकर इन मोतियों को तोड़े जा रही थी। इसमें उसका तो कुछ नहीं बिगड़ रहा था मग़र मुझे ठीक नहीं लग रहा था। मैं भी पूरा भीग चुका था और अब भीतर के वस्त्रों तक पानी उतरने लगा था। इस पानी को मैं आसानी से महसूस कर रहा था। शायद वह भी अपने भीतर ऐसा ही अहसास कर रही होगी।

मैंने ऊपर की ओर देखा। बारिश की बड़ी बून्दें अब भी साफ दिखाई दे रही थी। आसमान में बादल होने से दिन के उजाले में भी कुछ धुंधलाहट दिखाने लगी थी। मॉल के बाहर नज़र डाली जहाँ सुरक्षागार्ड अपने कैबिन में इत्मीनान से बैठा हुआ था। मॉल के भीतर खड़े लोग अब बारिश का आनंद लेने के बजाए या तो खरीदी में व्यस्त हो चुके थे या अपनी गाड़ियों में बैठकर जा रहे थे। मॉल की ओर से आती नज़र फिर उसी पर आकर टिक गई। वह पूरी तरह भीग गई थी। उसके वस्त्र भीगकर शरीर से चिपक गए थे और जहाँ तक मेरी नज़र जा रही थी वहाँ तक वह पानी से तरबतर नज़र आ रही थी। इतनी पास से सब कुछ साफ नज़र आ रहा था। उसके चेहरे के हाव-भाव। किसी परिचित को खोजती उसकी निगाहें। उसके चेहरे से उतरती पानी की बून्दें और आदि-इत्यादि। सभी कुछ मैं महसूस कर रहा था।

अचानक उसने मेरी ओर देखा तो मैं चौंक गया। शायद उसने इस तरह अपना निरीक्षण करते मुझे देख लिया होगा तभी उसे आँखों से मुझे टोकना पड़ा। मैं खुद के भीतर शर्मसार था। न यह वक्त था और न ही कोई वजह कि उसे इस तरह देखा जाता। इतनी बारिश में किसी का भी अस्त-व्यस्त हो जाना स्वाभाविक है। मैं खुद इतना अस्त-व्यस्त हो गया था कि अगर मोबाइल पर कोई कॉल आ जाता तो मोबाइल जेब से निकालने की कोशिश भी नहीं करता। फिर यह महानगर है। यहाँ इन बातों के लिए किसको समय है? न कोई किसी को इतनी ग़ौर से देखता है और न ही अपना वक्त जाया करता। सामने ही सड़क पर देखों ना। किस तरह लड़कियाँ बेखौफ और बेलौस घूम रही हैं। बारिश में भीगतीं वे किसी अप्सराओं से कम नहीं लग रही थीं। उनके भीगे वस्त्रों से शरीर के हर अंग को नापा जा सकता था। मग़र यहाँ किसे फुर्सत है इसे देखने की। लोग आ-जा रहे थे। अपनी ही धुन में गुज़र रहे थे। बारिश से बचकर हार चुके लोग अब आनन्द ले रहे थे। सड़कों पर पानी भराने से सड़क किसी नदी की तरह लगने लगी थी।

एक पल को इच्छा हुई कि किसी बच्चे की तरह इस पानी में कागज़ की एक नाव छोड़ दी जाए तो वह यूनिवर्सिटी तक पाँच मिनट में ही पहुँच जाएगी। इस तरह की नाव हम बचपन में खूब तैराया करते थे। बारिश हुई नहीं कि हमारी नौका रेस घर के आंगन में ही शुरू हो जाती थी। मग़र जैसे-जैसे बड़े होते गए कागज़ की नावों की रेस के बजाए ज़िन्दगी की रेस में शामिल हो गए, और सारी नावें स्मृतियों की कोठरी में कैद हो गई।

बरिश के बीच जोर की बिजली कड़की और मैं पुनः इस नदी के किनारे आ खड़ा हुआ। वह उसी तरह खड़ी थी। अपने आप को उसने व्यवस्थित कर लिया था। शायद उसे मेरा व्यवहार ठीक नहीं लगा होगा। उसने अपने हाथों में रखी पॉलीथीन को दोनों हाथों में पकड़कर उसे छाती से लगा लिया था। यह मौसम में आई ठण्डक की वजह से था या आदि इत्यादि .................. मैं समझ नहीं सका। मैं समझना भी नहीं चाहता था।

दरअसल मैं यह मान चुका था कि उसने मुझे चोरी से देखते हुए यह समझ लिया था कि मैं ठीक व्यक्ति नहीं हूँ, और इस तरह मेरे पास खड़े होकर उसने कोई गलती की है।

मेरे मन के भीतर ही भीतर भार बढ़ता जा रहा था। मुझे लगा कि अनजाने ही मैं कहाँ से कहाँ तक पहुँच गया। यह मुझे शोभा नहीं देता। मुझे ही क्या किसी भी व्यक्ति को नहीं। और ऐसे वक्त जबकि तेज़ बारिश हो रही हो और बारिश से बचने के लिए कोई लड़की मेरे पास खड़ी हो। पास भी इतनी कि कहा नहीं जा सकता। दूर के दृश्य को देखकर नज़रें पलटना आसान है मग़र पास में इस तरह की चोरी आसान नहीं।

मैं अब दूसरी तरफ नज़र घुमा चुका था, और उसकी तरफ देखने की हिम्मत मेरी हो भी नहीं रही थी।

‘‘आप कह रहे थे कि आपको भी यूनिवर्सिटी जाना है।’’ उसके इतना कहते ही मेरे भीतर घुमड रहे सारे विचार धुल गए। मुझे लगा अचानक मेरे भीतर का वजन कम हो गया है। मैं प्रसन्न होकर बोला, ‘‘हाँ...... हाँ। मुझे भी यूनिवर्सिटी ही जाना है।’’ उसके बोलने से मैं राहत महसूस कर रहा था। मुझे यह विश्वास हो गया था कि मेरे बारे में उसके विचार ऐसे नहीं हैं जैसा मैं मान रहा हूँ। वह कहने लगी, ‘‘कितनी नज़दीक आ कर हम इस मुश्किल में पड़ गए न।’’

मैंने कहा, ‘‘अक्सर यही होता है।’’

उसने मेरी, ओर देखा, और आश्चर्य से पूछा, ‘‘कैसे?’’

मैंने कहा, ‘‘अक्सर मंज़िल करीब होती है, तभी कुछ ऐसा हो जाता है, कि मंज़िल तक पहुँचना मुश्किल हो जाता है।’’

‘‘मग़र ऐसा हर वक्त नहीं होता।’’ वह यकीन के साथ बोली।

‘‘ इसका अहसास तो तभी होता है न, जब ऐसा कुछ हो।’’ मैने उसके यकीन को डिगाने की कोशिश की।

‘‘हो सकता है। मग़र मैं ऐसा नहीं मानती। सोचिये अगर आप यहाँ से काफी दूर होते तो क्या बारिश नहीं आती।’’ उसने पूछा।

मैं बोला, ‘‘बारिश को आना था तो आती ही, लेकिन तब यह ग़म तो नहीं होता कि इतनी पास आकर भी हम वहाँ तक नहीं पहुँच पाए।’’

‘‘यह तो मन को समझाने वाली बात हुई।’’ वह बोली। बातें करते हुए हम पड़े के तने की छाँव से बाहर आ गए थे। भीगते हुए अब बुरा नहीं लग रहा था। वह बोले जा रही थी, ‘‘यह भी तो सोचिए कि जब बारिश खत्म होगी तो हम ही सबसे पहले अपनी मंज़िल तक पहुँचेंगें।’’

‘‘यह तो है।’’

‘‘इसे मंजिल से पहले आने वाली मुश्किल कहते हैं। आपने सांप-सीढ़ी का खेल खेला है?’’

इस बार उसका सवाल अजीब सा था। मैंने कहा, ‘‘हाँ .......... शायद बचपन में कभी ........’’

‘‘इस खेल में जब जीतने के करीब होते हैं तब एक बड़ा साँप आता है। इस साॅप से जो डर जाता है, वह सीधा नीचे गिर पड़ता है। मग़र जो नहीं डरता वह सांप को पार कर जीत जाता है।’’ बोलते हुए वह किसी लेक्चरर से कम नहीं लग रही थी। उसके हाव-भाव, उसके चेहरे पर फैला संतोष का भाव, प्रभावी था।

‘‘ऐसी मुश्किल से घबराने वाला कभी मंज़िल तक नहीं पहुँच सकता है।’’ वह बोली

‘‘शायद ...................’’

‘‘शायद नहीं यकीनन’’ वह बोलने लगी। ‘‘अब देखिए, हम इस बारिश से न डरते तो कभी से अपनी मंज़िल तक पहुँच गए होते। यहाँ ठहरकर भी हमें क्या मिला। भीगे तो यहाँ भी। इससे तो बेहतर था कि इस भीगते हुए यूनिवर्सिटी पहुँच जाते।’’

‘‘मग़र ऐसा अब महसूस कर रहे हैं। उस वक्त यह उम्मीद किसे थी कि बारिश जम ही जाएगी।’’ मैंने अपनी पराजय होती देख यह पक्ष रखा।

‘‘चलिए, तब ऐसा था तो अब क्या सोचते हैं?’’

‘‘मतलब?’’

‘‘मतलब यही कि तब तो पता नहीं था। अब तो बारिश जारी है। हम भीग भी चुके हैं। अब बचाने को कुछ रहा नहीं है। तो क्यों न इसी तरह भीगते हुए यूनिवर्सिटी चलें।’’ वह एकसाथ इतनी बातें बोल गई।

‘‘जी ............’’ मैं सोच में पड़ गया।

‘‘अरे, सोच क्या रहे है। चलिए भी। बारिश इतनी भी तेज़ नहीं है कि हमें गला दे।’’

इतना कहते हुए वह पेड़ के तने के साये से खुद को मुक्त कर चुकी थी। बारिश में उसका तन-बदन अब पूरी तरह भीग गया था। बाल, चेहरा, आँखें ...... आदि-इत्यादि सभी कुछ। म़गर मेरा ध्यान उसके आग्रह पर ही था। मुझे लगा पेड़ के साये में मैं उसके आने के पहले से खड़ा था। अब जबकि वह पेड़ के साये से मुक्त हो चुकी है तब भी खड़ा हूँ। मैं अपनी पराजय के इस रूप को अधिक देर सहन नहीं करना चाहता था। उसके साथ कदम से कदम मिलाते हुए यूनिवर्सिटी की तरफ चल पड़ा।

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संक्षिप्त परिचय

नाम - आशीष दशोत्तर

जन्म - 05 अक्टूबर 1972

शिक्षा - 1. एम.एस.सी. (भौतिक शास्त्र)

2. एम.ए. (हिन्दी)

3. एल-एल.बी.

4. बी.एड

5. बी.जे.एम.सी.

6. स्नातकोत्तर में हिन्दी पत्रकारिता पर विशेष अध्ययन।

प्रकाशन - 1 मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा काव्य संग्रह-खुशियाँ कैद नहीं होती-का प्रकाशन।

2 ग़ज़ल संग्रह 'लकीरें',

3 भगतसिंह की पत्रकारिता पर केंद्रित पुस्तक-समर में शब्द-प्रकाशित

4 नवसाक्षर लेखन के तहत पांच कहानी पुस्तकें प्रकाशित। आठ वृत्तचित्रों में संवाद लेखन एवं पार्श्व स्वर।

5. कहानी संग्रह 'चे पा और टिहिया' प्रकाशित।

पुरस्कार - 1. साहित्य अकादमी म.प्र. द्वारा युवा लेखन के तहत पुरस्कार।

2. साहित्य अमृत द्वारा युवा व्यंग्य लेखन पुरस्कार।

3. म.प्र. शासन द्वारा आयोजित अस्पृश्यता निवारणार्थ गीत लेखन स्पर्धा में पुरस्कृत।

4. साहित्य गौरव पुरस्कार।

5, किताबघर प्रकाशन के आर्य स्मृति सम्मान के तहत

कहानी, संकलन हेतु चयनित एवं प्रकाशित।

6. साक्षरता मित्र राज्य स्तरीय सम्मान

सम्प्रति - आठ वर्षों तक पत्रकारिता के उपरान्त अब शासकीय सेवा में।

संपर्क - 12@2,कोमल नगर,बरबड़ रोड

रतलाम (म.प्र.) 457001

E-mail- ashish.dashottar@yahoo.com

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