कहानी // भीगकर न भीगने सा कुछ // आशीष दशोत्तर

SHARE:

बारिश बहुत तेज़ थी। अचानक आई इस बारिश का अंदाज़ भी अलग ही था। अभी तो तेज़ धूप थी। चेहरों पर पसीने टपक रहे थे। देखते ही देखते आसमान में बादल घि...

बारिश बहुत तेज़ थी। अचानक आई इस बारिश का अंदाज़ भी अलग ही था। अभी तो तेज़ धूप थी। चेहरों पर पसीने टपक रहे थे। देखते ही देखते आसमान में बादल घिर आए और हल्की बूदाबांदी होने लगी। अचानक ही बड़ी-बड़ी बूंदे और फिर तो मूसलधार का रूप ले चुकी थी बारिश। इस तरह अकस्मात कोई मौसम हम पर मेहरबान हो जाए तो आनंद आ जाता है। वैसे भी बारिश अब होती ही कहाँ है? होती भी है तो उस तरह जैसे औपचारिकता पूरी कर रही हों। वर्षा का मौसम आते ही लोग पुरानी यादें ताज़ा करने लग जाते हैं। पहले तो चार-पाँच दिन की झड़ी लगती थी। इतनी बारिश होती थी कि सूरज के साप्ताहिक दर्शन हुआ करते थे। लोग घरों से निकलने को बैचेन हो जाते थे। और फिर यादें कहाँ से कहाँ पहुँच जाती है।

इस बार यह सुकून देने वाला है कि वर्षा शाहाना अंदाज में हो रही है। यानी अचानक बरस जाए और घण्टे भर बाद सब कुछ सामान्य हो जाए। इस मौसम का भी अपना ही मज़ा होता है। सुबह जब घर से निकला था तो आसमान बिल्कुल साफ था। पत्नी ने घर से निकलते वक्त कहा भी था रेनकोट साथ में रख लो। मौसम का पता नहीं कब पलट जाए, कम से कम थोड़ा बचाव तो होगा ही। मग़र मैंने हर बार की तरह इंकार कर दिया था। मुझे इस तरह की झंझटों से चिढ़ भी है। यानी जब बारिश न हो तो रेनकोट या छतरी साथ लिये घूमते रहो। जब ठण्ड न लगे तो भी एहतियातन सफर में गर्म कपड़े रखकर चलो। ये सब मुझे परेशान करता है। इसीलिए मैं खाली हाथ ही सफर करना पसंद करता हूँ। न कोई बैग न टिफिन। न भूलने का डर न याद रखने का संकट। और फिर यह सफर भी कोई लम्बा नहीं था। सुबह जाकर शाम को लौटना ही था। इस दौरान भी छह घण्टे तो ट्रेन में ही गुज़रना थे। घण्टा भर रिक्शा या बस में और बाकी समय शहर में। यह शहर का समय ही ऐसा था जहाँ के लिए पत्नी चिंतित थी कि बारिश आ गई तो भीगना पड़ेगा। इससे पहले दो दिनों तक वैसे ही मैं भीग चुका था, इसलिए पत्नी की चिंता जायज थी । मग़र मैं अपनी आदत के मुताबिक खाली हाथ ही घर से निकला था।

[post_ads]

संयोग देखिए बारिश को भी यहीं आना था। बीच शहर में, जहाँ न छिपने की कोई जगह और न ही कहीं आश्रय स्थल। तेज़ी से कदम बढ़ाता हुआ मैं सोच रहा था कि मंजिल तक पहुँचने में बमुश्किल पाँच मिनट लगना है, और इस दौरान हल्की बूंदाबांदी ही आती रहे तो मैं अपनी मंज़िल तक पहुँच जाऊँगा। रास्ते में साथ चल रहे एक व्यक्ति से पूछा ही लिया था ‘‘यूनिवर्सिटी अभी कितनी दूर होगी?’’

उसने हाथ ऊँचा कर बताया, ‘‘ये रही सामने।’’ उसके इतना कहते ही मैं आश्वस्त हो गया था कि अब वहाँ तक पहुँचा जा सकेगा। राह बताने वाले अक्सर मंज़िल को अधिक दूर इसलिए नहीं बताते हैं कि चलने वाला भीतर से थक न जाए। हमेशा राह बताने वाला यही कहता है, ‘‘फलाँ जगह पास ही है। पैदल जाया जा सकता है। आदि.............’’

साथ चलते व्यक्ति ने भी यही सोचते हुए मुझे हाथ के इशारे से बताया होगा। उसने बारिश बढ़ती देख दौड़ लगा ली और पास ही कहीं इमारत में गुम हो गया। शायद उसे वहीं जाना होगा। उसने जिस तरफ हाथ से इशारा किया था, उधर देखते हुए मैं आगे बढ़ रहा था। उस तरफ बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल नज़र आ रहे थे। मैंने तेज़ी से सड़क पार की। दूसरी तरफ भी मॉल ही दिखाई दे रहे थे। मॉल के गेट पर सुरक्षाकर्मी इस तैयारी से खड़ा था कि कोई बारिश से बचने के लिए मॉल की शरण न ले लें।

मेरे तेज़ी से बढ़ते कदम बारिश से होड़ नहीं कर पा रहे थे। बारिश और तेज़ हो गई। अब मुझे लगने लगा कि आगे चला तो पूरा ही भीग जाऊँगा। लिहाजा वहीं एक पेड़ दिखते ही उसके नीचे आ गया। पेड़ भी औपचारिक पेड़ ही था। यानी एक डाली का पेड़ जिसे तना भी कहा जा सकता था। हालांकि इसका तना काफी मोटा था और इससे प्रतीत हो रहा था कि यह कभी घना पेड़ रहा होगा। पीछे शॉंपिंग मॉल वालों ने इसको अपनी शान में बाधा मानते हुए मुंडवा दिया होगा। बड़े शहरों में हरियाली इसी बाज़ारियत के कारण खत्म होती जा रही है। मग़र किया क्या जाए जब पेड़ों से ज़्यादा ज़रूरत बाज़ार की महसूस की जा रही हो।

[post_ads_2]

बहरहाल, मैं उस पेड़ के तने के नीचे खड़ा होकर अपने आप को भीगने से बचाने की कोशिश कर रहा था। वहीं पास में एक युवक अपनी थैली से रेनकोट निकालकर पहनने का प्रयास कर रहा था। हालांकि इस प्रक्रिया में वह लगभग पूरा भीग चुका था मग़र रेनकोट होने का लाभ लेना चाहता था। मुझे लगा, अगर मैं भी रेनकोट साथ में लाता तो इसी स्थिति से गुज़र रहा होता। यहाँ खड़ा-खड़ा मैं भी रेनकोट पहनता और भीगने के बावजूद रेनकोट साथ लाने की समझधारी पर अपनी पीठ थपथपा रहा होगा। मग़र मुझे ऐसी समझधारी पर शाबासी पाने की कोई आदत नहीं थी। बारिश तेज़ होती जा रही थी। युवक रेनकोट पहनकर जा चुका था। पेड़ के ठीक पीछे बने शॉपिंग मॉल का सुरक्षागाई मुझ पर नज़र रखे हुए था कि कहीं पेड़ की आस छोड़कर मैं उसके मॉल में न घुस जाऊँ। मॉल के भीतर से लोग बारिश का आनंद ले रहे थे और बाहर लोगों को भीगते देखना अच्छा लग रहा था।

मैं इस उम्मीद में अपने शरीर के सूखे बचे भाग को बारिश से बचाने में प्रयत्नशील था कि वर्षा रूकती ही होगी। पेड़ की एक डाल भी कब तक मेरा साथ देती। मैं मोटे तने के नीचे था। मग़र वह तना भी भीग चुका था। उसके सहारे पानी उतरने लगा था। बहुत कुछ भीगने के बाद मुझे लगने लगा था कि मुझ पर पानी गिर ही नहीं रहा है। मेरी निगाह ऊपर की ओर थी जहाँ बारिश की बड़ी-बड़ी बून्दें साफ दिखाई दे रही थी।

तभी अचानक उसका आगमन हुआ। बारिश की ही तरह वह वहाँ आई और मेरे नज़दीक आकर खड़ी हो गई। अब पेड़ का एक तना और बारिश से बचने का प्रयास करते दो तन। स्वभाववश मैं काफी देर से खड़े स्थान से एक इंच पीछे को हुआ ताकि वह भी बारिश से थोड़ा बच सके। वह मेरे नज़दीक आकर खड़ी हो गई। मैं पीछे की तरफ से अब पूरा भीग रहा था क्योंकि मेरा पृष्ठ भाग पेड़ के तने के साये से बाहर जा चुका था। उसकी भी वही स्थिति थी। वह एक इंच आगे खिसकी। अब वह और मैं दोनों ही इस कदर खड़े थे कि थोड़ी भी हलचल होती तो हमारा स्पर्श हो सकता था।

मैंने फिर ऊपर की ओर देखा। बारिश उसी तेज़ी से हो रही थी। पीछे की तरफ नज़र घुमाई तो मॉल का सुरक्षागार्ड अपने कैबिन में बैठ चुका था। शायद उसे अब यह विश्वास हो गया था कि पूरी तरह भीग चुका मैं या मेरे जैसा कोई अन्य व्यक्ति अब कम से कम बारिश से बचने के लिए तो मॉल में नहीं आएगा। दूसरी तरफ देखा तो भीगते हुए कुछ बच्चे इत्मीनान से चले आ रहे थे। न बस्ता भीगने की चिंता न बीमार होने का डर। उनका बस्ता देख मुझे याद आया कि आगे की जेब में कुछ कागज़ात रखे थे, कहीं वे भीगे तो नहीं। हाथ लगाकर देखा तो कुछ पता नहीं चला। हाथ भी गीले, शर्ट भी भीगा हुआ। कैसे समझें कि कागज़ बचे होंगे।

इसी बीच उसने मेरी तरफ एक इंच कदम और बढ़ाया और हम तकरीबन स्पर्श होने के करीब ही थे। पेड़ के तने को वह भी देख रही थी और मैं भी। उसकी साँसों का आभास मेरी बाहों पर हो रहा था और इससे पता चल रहा था कि उसकी धड़कन तेज़ी से चल रही है। वह तेज़ी से चलकर या शायद दौड़कर यहाँ तक आई थी, इसकी वजह से उसकी धड़कन का रफ्तार से चलना स्वाभाविक था। मग़र सच जानते हुए भी मुझे यह गलतफहमी हो रही थी कि मेरे नज़दीक आने से उसकी धड़कन तेज़ होती जा रही है। देखा, अभी एक इंच जब उसने अपना पैर मेरी तरफ बढ़ाया था, तब उसकी धड़कन और बढ़ी थी न। इस मौसम में और ऐसी परिस्थिति में इस तरह की गलतफहमियाँ स्वाभाविक है। गलतफहमियाँ भी ऐसी कि जाने कहाँ तक ले जाए और क्या-क्या करवा दे। कभी यह, कभी ऐसा, कभी-कभी तो वैसा भी आदि इत्यादि। अचानक उसने रिक्शा को हाथ दिया और मैं सारी गलतफहमियों से सीधे हकीकत में लौट आया। वह दौड़कर रिक्शा के पास गई। कुछ देर बात की और फिर से मेरे करीब दौड़ी चली आई। मुझे लगा कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है और मेरी तलाश में शायद बहार अब भी आ सकती है। वह इस बार इत्मीनान से मेरे करीब खड़ी थी। उसकी धड़कन अब सामान्य थी। हालांकि हमारे बीच का फासला बहुत कम था, पहले की तरह ही, मग़र अब उसकी साँसों में वह तेजी नहीं थी। मेरी एक गलतफहमी तो वहीं ध्वस्त हो गई कि मेरे नज़दीक होने से उसकी धड़कन तेज़ थी।

वह इस बार अधिक निश्चिंत थी। इधर-उधर देखने के बाद मेरी तरफ चेहरा उठाकर बोली ‘‘तीस रूपए मांग रहा था।’’

‘‘हाँ ...............!, मैं चौंका।’’

वह बोल रही थी, ‘‘मुझे यूनिवर्सिटी जाना है। यहीं पास में तो है। वह जो गेट दिख रहा है, यूनिवर्सिटी का ही है। इतनी सी दूर के तीस रूपए कौन दे?’’ चाहता तो मैं भी यही था कि इतनी सी दूर के तीस रूपए देना ठीक नहीं, मग़र उसे समझाना उचित नहीं लगा। वह अपना चेहरा मेरे चेहरे की तरफ कर देख रही थी। शायद इस इंतजार में कि मैं कुछ बोलूंगा। मग़र मैं अभी उसके चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रहा था। गोल चेहरा, साधारण सा। बाल मुँह पर बारिश से चिपक गए थे। ऊपर से गिरती बूंदों से उसकी पलकें बार-बार बंद हो रही थी। होंठ कोमल पाँखुरी की तरह। ठोढ़ी पर पड़ते सल। गले से उतरती पानी की बून्दें। और वर्षा में भीगे वस्त्र के बीच आदि-इत्यदि।

‘‘अच्छा हुआ मैं नहीं बैठी,’’ वह बोल रही थी।

अचानक मेरे मुँह से निकला, ‘‘बिल्कुल ठीक किया।’’

‘‘कैसे? उसने सवाल दाग दिया।’’

इस सवाल के लिए न तो मैं तैयार था, और न ही आदि-इत्यादि से आगे बढ़ पाया था। मग़र जवाब देना ज़रूरी था। मैं बोला, ‘‘रिक्शावाला तो यूनिवर्सिटी के गेट पर ही छोड देता न। फिर भीतर जाने के लिए खुले में भीगते हुए ही जाना पड़ता।’’

‘‘ठीक.............ठीक’’ वह बोली। शायद मेरे जवाब से संतुष्ट थी। ‘‘मुझे भी यूनिवार्सिटी ही जाना है।’’ मेरी इस जानकारी पर उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। शायद वह समझ रही होगी कि इस तरह की जानकारी देकर मैं उसका हमसफर बनने की कोशिश कर रहा हूँ। हालांकि मेरी ऐसी मंशा नहीं थी। अलबत्ता इस वक्त मैं यह चाह ही नहीं रहा था कि बारिश बन्द हो और इस पेड़ के साये को छोड़ना पड़े।

उसकी नज़र सड़क पर थी। जहाँ एक मोपेड पर सवार कुछ लोग सड़क पर गिरे पड़े थे। वह उन लोगों को देख हँस पड़ी। बात हँसने जैसी ही थी। एक मोपेड पर छह लोग जो सवार थे। बारिश में गाड़ी फिसली और सभी सड़क पर थे। बारिश का आनंद लेते लोगों की नज़रे उन पर ही थीं। वे तत्काल उठ गए और गाड़ी पर बैठने लगे। उसी तरह एक मोपेड पर छह लोग, फिर रवाना हो गए।

हँसते वक्त उसका हाथ मुँह पर था। मुँह से हाथ कांधे पर गया। जहाँ उसका कुर्ता कुछ खिसक गया था और काली स्ट्रिप दिखाई देने लगी थी। यह अनायास ही मेरी नज़र में आ गई और मैं पुनः आदि-इत्यादि तक न पहुँचते हुए आसमान की तरफ देखने लगा।

बारिश उसी तरह जारी थी। बड़ी-बड़ी बून्दों गिर रही थी। सड़क पर पानी भराने लगा था। भीग चुके लोग अब आराम से चलते हुए आ जा रहे थे। अब बारिश से बचने का प्रयत्न करना खुद को दिलासा देने के समान था। सड़क से गुज़रते चौपहिया वाहन पानी उड़ाते हुए गुज़र रहे थे।

एक जैसी बारिश होते करीब आधा घंटा बीत चुका था। वह और मैं तकरीबन पच्चीस मिनट से यूँ ही पास-पास थे। पेड़ के तने के साये में खड़ी वह अब भी कोशिश कर रही थी कि किसी तरह खुद को भीगने से बचाए। हालांकि वह पूरी भीग चुकी थी। उसके बालों से अब पानी टपकने लगा था। मुझे इस वक्त वह ‘शहनाई’ फिल्म की हीरोईन राजश्री की तरह लग रही थी जबकि विश्वजीत यह गाना गा रहे होते हैं, ‘’न झटको ज़ुल्फ से पानी, ये मोती फूट जाएंगे ............।’’ मग़र वह अपने बालों पर बार-बार हाथ फेरकर इन मोतियों को तोड़े जा रही थी। इसमें उसका तो कुछ नहीं बिगड़ रहा था मग़र मुझे ठीक नहीं लग रहा था। मैं भी पूरा भीग चुका था और अब भीतर के वस्त्रों तक पानी उतरने लगा था। इस पानी को मैं आसानी से महसूस कर रहा था। शायद वह भी अपने भीतर ऐसा ही अहसास कर रही होगी।

मैंने ऊपर की ओर देखा। बारिश की बड़ी बून्दें अब भी साफ दिखाई दे रही थी। आसमान में बादल होने से दिन के उजाले में भी कुछ धुंधलाहट दिखाने लगी थी। मॉल के बाहर नज़र डाली जहाँ सुरक्षागार्ड अपने कैबिन में इत्मीनान से बैठा हुआ था। मॉल के भीतर खड़े लोग अब बारिश का आनंद लेने के बजाए या तो खरीदी में व्यस्त हो चुके थे या अपनी गाड़ियों में बैठकर जा रहे थे। मॉल की ओर से आती नज़र फिर उसी पर आकर टिक गई। वह पूरी तरह भीग गई थी। उसके वस्त्र भीगकर शरीर से चिपक गए थे और जहाँ तक मेरी नज़र जा रही थी वहाँ तक वह पानी से तरबतर नज़र आ रही थी। इतनी पास से सब कुछ साफ नज़र आ रहा था। उसके चेहरे के हाव-भाव। किसी परिचित को खोजती उसकी निगाहें। उसके चेहरे से उतरती पानी की बून्दें और आदि-इत्यादि। सभी कुछ मैं महसूस कर रहा था।

अचानक उसने मेरी ओर देखा तो मैं चौंक गया। शायद उसने इस तरह अपना निरीक्षण करते मुझे देख लिया होगा तभी उसे आँखों से मुझे टोकना पड़ा। मैं खुद के भीतर शर्मसार था। न यह वक्त था और न ही कोई वजह कि उसे इस तरह देखा जाता। इतनी बारिश में किसी का भी अस्त-व्यस्त हो जाना स्वाभाविक है। मैं खुद इतना अस्त-व्यस्त हो गया था कि अगर मोबाइल पर कोई कॉल आ जाता तो मोबाइल जेब से निकालने की कोशिश भी नहीं करता। फिर यह महानगर है। यहाँ इन बातों के लिए किसको समय है? न कोई किसी को इतनी ग़ौर से देखता है और न ही अपना वक्त जाया करता। सामने ही सड़क पर देखों ना। किस तरह लड़कियाँ बेखौफ और बेलौस घूम रही हैं। बारिश में भीगतीं वे किसी अप्सराओं से कम नहीं लग रही थीं। उनके भीगे वस्त्रों से शरीर के हर अंग को नापा जा सकता था। मग़र यहाँ किसे फुर्सत है इसे देखने की। लोग आ-जा रहे थे। अपनी ही धुन में गुज़र रहे थे। बारिश से बचकर हार चुके लोग अब आनन्द ले रहे थे। सड़कों पर पानी भराने से सड़क किसी नदी की तरह लगने लगी थी।

एक पल को इच्छा हुई कि किसी बच्चे की तरह इस पानी में कागज़ की एक नाव छोड़ दी जाए तो वह यूनिवर्सिटी तक पाँच मिनट में ही पहुँच जाएगी। इस तरह की नाव हम बचपन में खूब तैराया करते थे। बारिश हुई नहीं कि हमारी नौका रेस घर के आंगन में ही शुरू हो जाती थी। मग़र जैसे-जैसे बड़े होते गए कागज़ की नावों की रेस के बजाए ज़िन्दगी की रेस में शामिल हो गए, और सारी नावें स्मृतियों की कोठरी में कैद हो गई।

बरिश के बीच जोर की बिजली कड़की और मैं पुनः इस नदी के किनारे आ खड़ा हुआ। वह उसी तरह खड़ी थी। अपने आप को उसने व्यवस्थित कर लिया था। शायद उसे मेरा व्यवहार ठीक नहीं लगा होगा। उसने अपने हाथों में रखी पॉलीथीन को दोनों हाथों में पकड़कर उसे छाती से लगा लिया था। यह मौसम में आई ठण्डक की वजह से था या आदि इत्यादि .................. मैं समझ नहीं सका। मैं समझना भी नहीं चाहता था।

दरअसल मैं यह मान चुका था कि उसने मुझे चोरी से देखते हुए यह समझ लिया था कि मैं ठीक व्यक्ति नहीं हूँ, और इस तरह मेरे पास खड़े होकर उसने कोई गलती की है।

मेरे मन के भीतर ही भीतर भार बढ़ता जा रहा था। मुझे लगा कि अनजाने ही मैं कहाँ से कहाँ तक पहुँच गया। यह मुझे शोभा नहीं देता। मुझे ही क्या किसी भी व्यक्ति को नहीं। और ऐसे वक्त जबकि तेज़ बारिश हो रही हो और बारिश से बचने के लिए कोई लड़की मेरे पास खड़ी हो। पास भी इतनी कि कहा नहीं जा सकता। दूर के दृश्य को देखकर नज़रें पलटना आसान है मग़र पास में इस तरह की चोरी आसान नहीं।

मैं अब दूसरी तरफ नज़र घुमा चुका था, और उसकी तरफ देखने की हिम्मत मेरी हो भी नहीं रही थी।

‘‘आप कह रहे थे कि आपको भी यूनिवर्सिटी जाना है।’’ उसके इतना कहते ही मेरे भीतर घुमड रहे सारे विचार धुल गए। मुझे लगा अचानक मेरे भीतर का वजन कम हो गया है। मैं प्रसन्न होकर बोला, ‘‘हाँ...... हाँ। मुझे भी यूनिवर्सिटी ही जाना है।’’ उसके बोलने से मैं राहत महसूस कर रहा था। मुझे यह विश्वास हो गया था कि मेरे बारे में उसके विचार ऐसे नहीं हैं जैसा मैं मान रहा हूँ। वह कहने लगी, ‘‘कितनी नज़दीक आ कर हम इस मुश्किल में पड़ गए न।’’

मैंने कहा, ‘‘अक्सर यही होता है।’’

उसने मेरी, ओर देखा, और आश्चर्य से पूछा, ‘‘कैसे?’’

मैंने कहा, ‘‘अक्सर मंज़िल करीब होती है, तभी कुछ ऐसा हो जाता है, कि मंज़िल तक पहुँचना मुश्किल हो जाता है।’’

‘‘मग़र ऐसा हर वक्त नहीं होता।’’ वह यकीन के साथ बोली।

‘‘ इसका अहसास तो तभी होता है न, जब ऐसा कुछ हो।’’ मैने उसके यकीन को डिगाने की कोशिश की।

‘‘हो सकता है। मग़र मैं ऐसा नहीं मानती। सोचिये अगर आप यहाँ से काफी दूर होते तो क्या बारिश नहीं आती।’’ उसने पूछा।

मैं बोला, ‘‘बारिश को आना था तो आती ही, लेकिन तब यह ग़म तो नहीं होता कि इतनी पास आकर भी हम वहाँ तक नहीं पहुँच पाए।’’

‘‘यह तो मन को समझाने वाली बात हुई।’’ वह बोली। बातें करते हुए हम पड़े के तने की छाँव से बाहर आ गए थे। भीगते हुए अब बुरा नहीं लग रहा था। वह बोले जा रही थी, ‘‘यह भी तो सोचिए कि जब बारिश खत्म होगी तो हम ही सबसे पहले अपनी मंज़िल तक पहुँचेंगें।’’

‘‘यह तो है।’’

‘‘इसे मंजिल से पहले आने वाली मुश्किल कहते हैं। आपने सांप-सीढ़ी का खेल खेला है?’’

इस बार उसका सवाल अजीब सा था। मैंने कहा, ‘‘हाँ .......... शायद बचपन में कभी ........’’

‘‘इस खेल में जब जीतने के करीब होते हैं तब एक बड़ा साँप आता है। इस साॅप से जो डर जाता है, वह सीधा नीचे गिर पड़ता है। मग़र जो नहीं डरता वह सांप को पार कर जीत जाता है।’’ बोलते हुए वह किसी लेक्चरर से कम नहीं लग रही थी। उसके हाव-भाव, उसके चेहरे पर फैला संतोष का भाव, प्रभावी था।

‘‘ऐसी मुश्किल से घबराने वाला कभी मंज़िल तक नहीं पहुँच सकता है।’’ वह बोली

‘‘शायद ...................’’

‘‘शायद नहीं यकीनन’’ वह बोलने लगी। ‘‘अब देखिए, हम इस बारिश से न डरते तो कभी से अपनी मंज़िल तक पहुँच गए होते। यहाँ ठहरकर भी हमें क्या मिला। भीगे तो यहाँ भी। इससे तो बेहतर था कि इस भीगते हुए यूनिवर्सिटी पहुँच जाते।’’

‘‘मग़र ऐसा अब महसूस कर रहे हैं। उस वक्त यह उम्मीद किसे थी कि बारिश जम ही जाएगी।’’ मैंने अपनी पराजय होती देख यह पक्ष रखा।

‘‘चलिए, तब ऐसा था तो अब क्या सोचते हैं?’’

‘‘मतलब?’’

‘‘मतलब यही कि तब तो पता नहीं था। अब तो बारिश जारी है। हम भीग भी चुके हैं। अब बचाने को कुछ रहा नहीं है। तो क्यों न इसी तरह भीगते हुए यूनिवर्सिटी चलें।’’ वह एकसाथ इतनी बातें बोल गई।

‘‘जी ............’’ मैं सोच में पड़ गया।

‘‘अरे, सोच क्या रहे है। चलिए भी। बारिश इतनी भी तेज़ नहीं है कि हमें गला दे।’’

इतना कहते हुए वह पेड़ के तने के साये से खुद को मुक्त कर चुकी थी। बारिश में उसका तन-बदन अब पूरी तरह भीग गया था। बाल, चेहरा, आँखें ...... आदि-इत्यादि सभी कुछ। म़गर मेरा ध्यान उसके आग्रह पर ही था। मुझे लगा पेड़ के साये में मैं उसके आने के पहले से खड़ा था। अब जबकि वह पेड़ के साये से मुक्त हो चुकी है तब भी खड़ा हूँ। मैं अपनी पराजय के इस रूप को अधिक देर सहन नहीं करना चाहता था। उसके साथ कदम से कदम मिलाते हुए यूनिवर्सिटी की तरफ चल पड़ा।

----


संक्षिप्त परिचय

नाम - आशीष दशोत्तर

जन्म - 05 अक्टूबर 1972

शिक्षा - 1. एम.एस.सी. (भौतिक शास्त्र)

2. एम.ए. (हिन्दी)

3. एल-एल.बी.

4. बी.एड

5. बी.जे.एम.सी.

6. स्नातकोत्तर में हिन्दी पत्रकारिता पर विशेष अध्ययन।

प्रकाशन - 1 मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा काव्य संग्रह-खुशियाँ कैद नहीं होती-का प्रकाशन।

2 ग़ज़ल संग्रह 'लकीरें',

3 भगतसिंह की पत्रकारिता पर केंद्रित पुस्तक-समर में शब्द-प्रकाशित

4 नवसाक्षर लेखन के तहत पांच कहानी पुस्तकें प्रकाशित। आठ वृत्तचित्रों में संवाद लेखन एवं पार्श्व स्वर।

5. कहानी संग्रह 'चे पा और टिहिया' प्रकाशित।

पुरस्कार - 1. साहित्य अकादमी म.प्र. द्वारा युवा लेखन के तहत पुरस्कार।

2. साहित्य अमृत द्वारा युवा व्यंग्य लेखन पुरस्कार।

3. म.प्र. शासन द्वारा आयोजित अस्पृश्यता निवारणार्थ गीत लेखन स्पर्धा में पुरस्कृत।

4. साहित्य गौरव पुरस्कार।

5, किताबघर प्रकाशन के आर्य स्मृति सम्मान के तहत

कहानी, संकलन हेतु चयनित एवं प्रकाशित।

6. साक्षरता मित्र राज्य स्तरीय सम्मान

सम्प्रति - आठ वर्षों तक पत्रकारिता के उपरान्त अब शासकीय सेवा में।

संपर्क - 12@2,कोमल नगर,बरबड़ रोड

रतलाम (म.प्र.) 457001

E-mail- ashish.dashottar@yahoo.com

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: कहानी // भीगकर न भीगने सा कुछ // आशीष दशोत्तर
कहानी // भीगकर न भीगने सा कुछ // आशीष दशोत्तर
https://lh3.googleusercontent.com/-4Vrzv0mLOzk/W9vieHm8YQI/AAAAAAABFBE/Ww6PF9DJ7nAKHsKadn2oPkWTdGdB6kMiACHMYCw/ASHISH%2BDASHOTTAR%2B%25282%2529_thumb%255B1%255D?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-4Vrzv0mLOzk/W9vieHm8YQI/AAAAAAABFBE/Ww6PF9DJ7nAKHsKadn2oPkWTdGdB6kMiACHMYCw/s72-c/ASHISH%2BDASHOTTAR%2B%25282%2529_thumb%255B1%255D?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2018/11/blog-post_72.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2018/11/blog-post_72.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content