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डॉ. शैल चन्द्रा की लघुकथाएँ

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लघुकथा- "अनुत्तरित प्रश्न"

आराधना और उसकी सास आज सुबह से ही करवा चौथ की तैयारी में लगी हुईं थीं। तभी आठ वर्षीय स्वीटी करवा सजाने की जिद्द करने लगी।

आराधना ने कहा," बेटा, तुमसे नहीं होगा। कहीं करवा फुट गया तो?"

यह सुनकर स्वीटी मायूस हो गई। तभी आराधना की सासु माँ ने कहा,"बहु,लड़की है, करने दो। आज नहीं तो कल इसे सब करना ही पड़ेगा। क्या है हमारे समाज में हम महिलाएं पति और बेटे की मंगल कामना हेतु व्रत उपवास करती हैं। सारे संस्कार और परम्पराएं इसे अभी से सीखने दो।"

यह सुनकर स्वीटी ने पूछा," दादी, क्या हमारे धर्म में सारे व्रत उपवास केवल बेटों के लिए होते हैं ? बेटियों के लिये क्यों नहीं?"

तभी दादी का ध्यान टी.वी. में आ रहे समाचार पर गया। समाचार वाचिका समाचार पढ़ रही थी--"आज सुबह कचरे के ढेर में नवजात कन्या शिशु का क्षत-विक्षत शव मिला।"

यह सुनकर दादी ने एक गहरी साँस ली।

स्वीटी पूछ रही थी - "

"बताओ न दादी क्या बेटियों के लिए भी कोई व्रत उपवास करता है क्या?"

स्वीटी के इस प्रश्न पर दादी निरुत्तर रह गईं।

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लघुकथा- " दीपावली का बोनस"

घरेलू नौकरानी सुखिया दीपावली पर बोनस लेने की बात पर अड़ी थी। मिसेज शर्मा कह रहीं थीं -" भई तू क्या कोई सरकारी कर्मचारी है जो तुझे बोनस मिलेगा?अरे, मैं तुझे पूरे पंद्रह सौ रुपए महीना देती हूँ और बोनस क्यों दूँ?"

सुखिया कह रही थी -" मालकिन आप ही तो हमारी सरकार हैं। सरकार तो त्योहारों पर बोनस देती हैं न?  अगर आप इस दीवाली बोनस पर कुछ पैसे दे देंगी तो मैं अपनी मुनिया को इस बार की दीपावली पर एक बढ़िया सी फ्रॉक गिफ्ट देना चाहती हूँ। क्या है उसकी फ्रॉक फट गई है ।कई दिनों से नई फ्रॉक के लिए वह जिद्द कर रही है। बेटा भी अपने जन्म दिन पर बेट बॉल लेने की जिद्द कर रहा था पर उसे दे नहीं पाई।"

यह कहते हुये सुखिया की आँखे गीली हो गई।

मिसेज शर्मा ने उसकी बातों को अनसुना करते हुए उपेक्षा से कहा," देख हर दीपावली तुझे साड़ी तो देती ही हूँ। अब और क्या दूँ ? चल ठीक है जाकर मुन्ने को नहला ।" यह कहती हुई वह आफिस जाने के लिए तैयार होने लगी।

जैसे ही वह आफिस पहुंची। पता चला कि सारे कर्मचारियों की एक अर्जेन्ट बैठक है। बैठक में बोनस बढ़ाने के लिए हड़ताल पर जाने का निर्णय लिया गया।

अभी वह आफिस से लौट रही थी कि उनकी सहेली का फोन आ गया। मिसेज शर्मा खुश होकर बता रही थी कि उनके आफिस के सारे कर्मचारी कल से हड़ताल पर जा रहे हैं। अब तो बोनस बढ़ना तय है। उधर मोबाईल पर सहेली उनसे कह रही थी-",  वाह जी तुम सरकारी कर्मचारियों की तो चांदी ही चांदी है। वेतन और बोनस दोनों की बढ़ोतरी हो रही है। बधाई हो । अब तो जरूर तुम दीपावली पर सोने के जेवर खरीद लोगी।"

तभी अचानक उन्हें अपनी नौकरानी की याद आ गई।उन्हें उसका रोता हुआ चेहरा आँखों के सामने दिखने लगा। वे कल्पना करने लगीं। कि अगर उसकी नौकरानी बोनस की मांग के लिए हड़ताल पर चली जाए तो उसका क्या होगा? उनकी नौकरानी सुबह सात बजे से रात्रि तक उसका घर और बच्चा दोनों संभालती है। वह न आये तो यह पचास हजार की नौकरी कभी नहीं कर सकती। यह सोचते हुये उसका मन अचानक अपनी नौकरानी के प्रति सवेंदना से भर उठा।

उसने जल्दी से अपनी स्कूटी स्टार्ट की और बाजार की ओर चली गई। उसने एक सुंदर सा फ्रॉक लिया। एक बढ़िया सा बेट बॉल लिया और मिठाई का डिब्बा लिए वह सुखिया को देने प्रसन्न मन से जाने लगी।

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लघुकथा

            "अनोखा रिश्ता"

फोन की घण्टी घनघना उठी। रानू ने फोन उठाया ।उधर से आवाज आई। हेलो बेटे मैं बोल रही हूँ । तुम्हारे पापा की तबीयत बहुत बिगड़ गई है। अकेले क्या करूँ? मुझे समझ नहीं आ रहा है। तुम कहाँ हो ? जल्द आ जाओ।"

रानू को समझते देर नहीं लगी की कोई बुजुर्ग आंटी हैं ।हड़बड़ी में उन्होंने गलत नम्बर डायल किया है पर उसने रांग नम्बर कह कर न जाने फोन क्यों नहीं रखा । वह उस बुजुर्ग महिला की बात ध्यान से सुनती रही ।उनकी आवाज में डर करुणा और बेबसी थी।

उसने उस बुजुर्ग महिला से कहा," मांजी ,आप घबराये नहीं अपने घर का पता जल्द बताएं।"

यह सुनकर उस बुजुर्ग महिला ने आश्चर्य से कहा," अरे बेटी,  तुम्हें अब अपने ही घर का पता भी बताना पड़ेगा ?"

हाँ मांजी, मैं रानू हूँ ।आप नहीं जानती ।ख़ैर समय कम है ।आप अपना पता बताएं । मैंडॉक्टर लेकर आती हूँ। "

फोन पर उस बुजुर्ग महिला ने पता बता कर उसे धन्यवाद कहा।

भगवान की कृपा से उस बुजुर्ग महिला का घर पास ही में था। रानू डॉक्टर को लेकर पंद्रह मिनट में पहुँच गई। बुजुर्ग महिला रोये जा रहीं थीं। डॉक्टर ने उनके पति को देखते ही उन्हें आई सी यू में भर्ती करने को कहा। उन्हें दिल का दौरा पड़ा था।

रानू ने अपनी कार से उन्हें अस्पताल पहुँचाया। तब तक उनकी बेटी भी आ चुकीं थीं। समय पर इलाज होने से ।उस बुजुर्ग की जान बच गई।

आज इस घटना को कई वर्ष बीत चुके हैं पर आज भी वो बुजुर्ग महिला रानू को बड़ी बेटी मानती हैं। अब रानू उन्हें आंटी न कहकर मांजी ही कहती है। उनकी बेटी भी रानू को बड़ी दीदी ही कहती है।

यह अनोखा सा रिश्ता अनजाने ही सही है बड़ा प्यारा सा है।

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लघुकथा---

              "अनुशासित"

मिसेज आहूजा के घर किटी पार्टी चल रही थी। डायनिंग टेबल देशी - विदेशी पकवानों से सुसज्जित था। तभी किसी की नजर सोफे के नीचे दुबके कुत्ते पर पड़ी। उसने कहा," अरे, यह कुत्ता यहां सोफे के नीचे पड़ा हुआ क्या कर रहा है?"

उत्तर में मिसेज आहूजा ने कहा,-"अरे, डरो नहीं। यह हमारा डॉगी है जैकी। यह उसकी मनपसंद जगह है।"

क्या कभी यह डायनिंग टेबल पर खाने के लिए झपटता है?" मिसेज सोनी ने पूछा।

      " नहीं कभी नहीं। यह बड़ा अनुशासित है। यह मेरी हर बात मानता है। मेरी हर बात समझता है। मैंने इसे कड़े अनुशासन में रखा है।" यह कहते हुए मिसेज आहूजा स्वयं को गौरवान्वित महसूस करने लगी।

तत्काल उन्होंने अपने कुत्ते को आदेशित किया--"जैकी अपने कमरे में जाओ।"

यह सुनते ही कुत्ता तुरन्त वहां से उठकर दूसरे कमरे में चला गया। कुत्ते के पीछे- पीछे मिसेज आहूजा और उनकी सहेलियां भी पहुँच गईं।

मिसेज आहूजा ने पुनः कुत्ते को आज्ञा दी-" चलो जैकी अपने बॉल से खेलो।"

कुत्ता मालकिन की बात मानकर तुरन्त बॉल को इधर-उधर अपने पंजों से लुढ़काने लगा।

मिसेज आहूजा की सहेलियां उनकी प्रशंसा के पुल बांधने लगीं।

एक कह रही थी-"वाह, मिसेज आहूजा, आपको तो मान गए। आपने तो वाकई अपने कुत्ते तक को अनुशासन में रखा हुआ है। बहुत खूब ।"

तभी मिसेज आहूजा की किशोर बेटी को उनका ड्राइवर कंधे के सहारे लिए कमरे में दाखिल हुआ।

" क्या हुआ बेबी को?" मिसेज आहूजा ने चिंतित स्वर में पूछा।

     "कुछ नहीं मालकिन, आज बेबी ने फिर से पी रखी है।" ड्राइवर ने जवाब दिया।

यह सुनते ही मिसेज आहूजा आपे से बाहर हो गईं। उन्होंने बेबी को झिंझोड़ते हुए कहा,-"कितनी बार तुझसे कहा है कि कॉलेज जाकर पढ़ाई किया करो पर तुम तो पब क्लब में जाकर रोज -रोज शराब पीकर चली आती हो। मेरी बात आखिर तुम कब मानोगी?"

उत्तर में लड़खड़ाती आवाज में बेबी कह रही थी-"क्यों मानूँ मेँ आपकी बात?भाई आपकी बात कहाँ मानता है?वो कई-कई दिन घर भी नहीं आता है पर आप उसे क्यों कुछ नहीं कहतीं?"

यह सुनकर मिसेज आहूजा की सहेलियां कुत्ते की ओर देखने लगीं।

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लघुकथा

बड़ा फायदा

आज सिन्हा जी बहुत खुश थे। ऑफिस में उनके विरोधी और प्रतिद्वंदी सक्सेना जी का रिश्वत लेते हुए एक फोटो उन्होंने अपने ख़ुफ़िया कैमरे से हासिल कर लिया था। सिन्हा जी का सक्सेना जी से कभी पटी नहीं। वे एक दूसरे पर जब-तब छीटाकशी करते रहते थे।

आज सिन्हा जी को अच्छा मौका मिला था। उनका एक बड़े पत्रकार से अच्छी जान-पहचान थी। वे शाम को उनके घर पहुँच गये। उन्होंने सक्सेना जी की घूस लेते हुए फोटो पत्रकार को दिखाते हुए कहा,"महोदय, यह समाचार और फोटो कल के अख़बार में छप जानी चाहिए। यह समाचार सौ फीसदी सत्य है। चाहें तो तफ़्तीश कर सकते हैं। इसके एवज में मैं आपको बीस से पच्चीस हजार रूपये दूंगा।"

पत्रकार ने उन्हें आश्चर्य से देखते हुए पूछा," भैया जी, इससे आपको फायदा क्या होगा?"

सिन्हा जी ने कहा," फायदा तो कुछ नहीं होगा ।बस मेरी आत्मा को चैन मिलेगा क्यों कि सक्सेना मुझे हमेशा नीचा दिखाने की कोशिश करता रहता है।"

यह सुनकर पत्रकार महोदय ने सिन्हा जी को आश्वश्त करते हुए कहा,"आप चिंता न करें।कल यह समाचार अख़बार में छप जायेगा।"

सिन्हा जी आज बड़े सवेरे जाग कर समाचार पत्र का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे।जैसे ही समाचार पत्र आया उन्होंने पूरा अख़बार पढ़ डाला पर सक्सेना जी का रिश्वत वाला समाचार कहीं नहीं छपा था।

उन्होंने तुरंत पत्रकार महोदय को फोन लगाया। उधर फोन पर पत्रकार महोदय कह रहे थे--" अरे सिन्हा जी ,आप तो छापने के केवल बीस से पच्चीस हजार दे रहे थे परंतु सक्सेना जी इस समाचार को नहीं छापने के लिए पूरे पचास हजार देने को तैयार हो गए। अब बताओ इतना बड़ा फायदा भला कौन छोड़ता है ?"                   

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लघुकथा

थर्ड क्लास

कई वर्षों के बाद बड़ी दीदी अपने छोटे भाई राकेश से मिलने आईं थीं। राकेश और शालिनी दोनों में उन्हें काफी बदलाव दिखा। घर अब बँगले में तब्दील हो चुका था। शालिनी साड़ी से अब गाउन पहनने लगी थी। घर में गाय की जगह कुत्ते बँधे दिख रहे थे। अम्मा- बाबूजी के लिए अलग क्वार्टर की व्यवस्था की गई थी। दोनों भतीजे और भतीजी अब हिंदी के स्थान पर अंग्रेजी में बातें करने लगे थे।घर में खाना होटल से मंगाया जाने लगा था।

यह सब देख सुनकर दीदी अचम्भित थी। अम्मा- बाबूजी तो अब बिल्कुल मौन ही रहने लगे थे जैसे वे गूंगे हों।

आज शाम दीदी ने बाजार से करेले मंगवाए थे। अम्मा- बाबूजी को भरवां करेले बहुत पसंद थे। होटल का खाना खाकर वे अब ऊब चुके थे। अभी दीदी करेले छिल ही रही थी कि शालिनी आ गई। उसने दीदी को करेले छीलते देखा तो चौकती हुई बोली-"अरे दीदी, आपको यह सब करने की क्या जरूरत है? नौकर हैं न बना देंगें या फिर होटल में ऑर्डर कर देती। वैसे हम लोग तो आज घर पर खाएंगे नहीं। एक बिज़नेस पार्टी में जाना है। आप भी हमारे साथ चलिये न दीदी। देखिएगा वहां पार्टी कितनी शानदार होती है। बड़ा मजा आएगा।"

शालिनी ने जिद करके दीदी को पार्टी में जाने के लिए राजी कर लिया।

शाम को खूब सजी- धजी शालिनी ने जब दीदी को सादे कपड़ों में देखा तो मुँह बिचकाते हुए कहा,"दीदी, यह क्या पहन लिया है आपने। अरे, वहाँ इलिट क्लास के लोग रहेंगे। थोड़ी अच्छी और ढंग की साड़ी तो पहनी होतीं?"

दीदी ने कुछ नहीं कहा। चुपचाप साड़ी बदलने चली गईं।

पार्टी में पहुंचते ही राकेश भैया और शालिनी सबसे बड़े रुतबे से मिलने लगे। दीदी एक कोने में उपेक्षित सी खड़ी रहीं। तभी शालिनी ने दीदी से कहा," दीदी ,चलिये डिनर शुरू करते हैं।"

दीदी ने देखा वहां सचमुच देशी - विदेशी व्यंजनों की बगिया थी। उन्होंने प्लेट उठाई और हरेक डिश को अपनी प्लेट में रखने लगीं। तभी शालिनी की नजर दीदी की प्लेट पर पड़ी। वे लगभग दौड़ती हुई सी उनके पास पहुंची और फुसफुसाते हुए बोली -"दीदी, ये आप क्या कर रही हैं? इतनी प्लेट क्यों भर रही हैं? आप अपना प्लेट डस्टबिन में डाल दीजिए। दूसरा खाली प्लेट चुपचाप ले लें।'

दीदी ने आश्चर्य से पूछा-" पर क्यों ?,क्या हुआ?मुझसे कोई गलती हो गई क्या? अरे भई खाने को ही तो सब रखा गया है?"

शालिनी ने क्रोधित स्वर से कहा-" दीदी, इलिट क्लास का मैनर्स है कि प्लेट में केवल सलाद या सब्जी नाम मात्र रखो । नहीं तो लोग आपको भुक्कड़ समझ कर मजाक उड़ाएंगे। आपको देखकर लोग पता नहीं क्या समझेंगे? दीदी समझ लो यह इलिट क्लास का स्टेटस है। आप तो थर्ड क्लास की तरह प्लेट भर - भर कर खा रही हैं। रह गईं न आप थर्ड क्लास की थर्ड क्लास।"

यह सुनकर दीदी के हाथों में रखा प्लेट गिरते- गिरते बचा। वे विस्मित सी शालिनी को देखने लगीं।

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परिचय

डॉ. शैल चन्द्रा

जन्म- 9.10.66

शिक्षा- एम्.ए. बी. एड.एम्. फिल. पी. एच. डी. (हिंदी)

उपलब्धियां- अब तक पांच किताबें प्रकाशित।1. इक्कीसवीं सदी में भी।(काव्य संग्रह)

2. विडम्बना(लघुकथा संग्रह)

3.जुनून तथा अन्य कहानियां( कहानी संग्रह)

4. गुड़ी ह अब सुन्ना होगे( छत्तीसगढ़ी लघुकथा संग्रह)

5.घोंसला और घर और अन्य लघुकथाएं।

6.पापा बिज़ी हैं(लघुकथा संग्रह) अति शीघ्र प्रकाशित।

घर और घोंसला को कादम्बरी सम्मान।

राष्ट्रीय स्तर की पत्र -पत्रिकाओं में लघुकथा, कहानियां ,कविताओं का निरंतर प्रकाशन। यथा-हंस, कादम्बनी, पाखी, नारी अस्मिता, नारी का सम्बल, साहित्य प्रभा , विकास संस्कृति परिन्दे, तथा अन्य बहुत सारी राष्ट्रीय पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। विभिन्न अखबारों में जैसे हरिभूमि, नई दुनिया, नवभारत, पत्रिका, दैनिक भास्कर अमृत सन्देश , देश बंधु आदि में लगातार रचनाएं प्रकाशित।

सम्मान एवं पुरस्कार-अनेक सम्मान प्राप्त अब तक लगभग 30-35 सम्मान प्राप्त।उल्लेखनीय - नारी अस्मिता गुजरात बड़ोदरा द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तर की लघुकथा प्रतियोगिता में सर्व प्रथम पुरस्कार प्राप्त।लघुकथा "विडम्बना "पर रविशंकर विश्व विद्यालय रायपुर छत्तीसगढ़ में लघु शोध प्रबंध एम् फिल में ।

'डॉ. शैल चन्द्रा की लघुकथाओं का सामाजिक अनुशीलन," विषय पर रविशंकर विश्व विद्यालय रायपुर छत्तीसगढ़ से पी एच डी । जारी ।शोध केंद्र बाबूछोटे लाल श्रीवास्तव महाविद्यालय, धमतरी से।

नारी अस्मिता बड़ोदरा गुजरात द्वारा आयोजित 2018 में अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में कहानी " नई चेतना" को प्रथम स्थान प्राप्त।

हिंदी सेवा संस्थान द्वारा आयोजित लघुकथा प्रतियोगिता में उत्कृष्ट स्थान प्राप्त।

सम्प्रति-प्राचार्य, शासकीय हाई स्कूल टांगापानी ,तहसील-नगरी, जिला धमतरी में छत्तीसगढ़ में कार्यरत

संपर्क- रावण भाठा, नगरी, जिला- धमतरी

छतीसगढ़

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