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रोचक आलेख // खबरें ही खबरें // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

पहले बड़ा आराम था। लोग इत्मीनान से अपनी अपनी खटिया पर पड़े रहते थे। खबरों से बेखबर। लेकिन इधर जब से मीडिया का विकास हुआ है, आप न चाहें तो भी खबरें आपका पीछा नहीं छोड़तीं। हर आदमी के चारों तरफ मंडराती रहती हैं। अच्छी और बुरी खबरें, ताज़ी और गई-बीती खबरें। राजनैतिक, आर्थिक, और खेलकूद की खबरें। उत्तर, पूर्व, दक्षिण और पश्चिम की खबरें। आखिर NEWS ठहरीं। चारों दिशाओं से आती हैं – नार्थ, ईस्ट, वेस्ट, साउथ; इसीलिए तो ‘न्यूज़’ कहलाती हैं। खूब खबर लेती हैं। बचकर जा नहीं सकते आप। कहिए, क्या समाचार हैं ? यह समाचार जानने के लिए कोई प्रश्न नहीं है। क्या हाल हैं, अभिवादन का एक स्वरूप बन गया है।

खबर सूचना है, जानकारी है। खबर हाल है, समाचार है। खबर संदेशा है। खबर दी जाती है, खबर ली भी जाती है। खबरों से लोग चेत जाते हैं। खबर पाकर लोगों के होश उड़ जाते हैं। कुछ लोगों का यह काम ही होता है – खोज खबर लेते रहना। ऐसे खबरगीर हर बात की देख-रेख करते रहते हैं। आपको खबरदार भी करते हैं। उनकी खबरदारी आपको होशियार कर देती है। समाचार-पत्रों में खबर देने वाले खबर नवीस कहलाते हैं।

बताने के लिए जब खबरें कम पड़ने लगती हैं, वे गढ़ ली जाती हैं। अत: खबरों के कारखाने विकसित हो गए हैं। वहां खबरें ‘बनाई’ जाने लगी हैं। खबरों के अभाव में, धोखा देने के लिए ही सही, खबरें गढ़ी जाती हैं। आखिर कुछ तो ख़बरें हों जिनकी खबर-कांक्षी लोगों में खपत हो सके। असल न होने पर गलत ही सही।

खबरों के कई प्रकार हो गए हैं। कुछ तो सही खबरें होती हैं। ऐसी बड़ी बड़ी खबरें इतिहास बन जाती हैं। लेकिन कुछ गलत खबरें भी उड़ा दी जाती हैं। पहले इन्हें अफवाहें कहते थे। इन्हें बाकायदा रोपा जाता था। फैलाया जाता था। अब ऐसी ही अफवाहों को “फेक-न्यूज़” कहने लगे हैं। फेक-न्यूज़, न्यूज़ तो होती है, लेकिन वास्तविक ‘न्यूज़’ नहीं होती। यह गढ़ी हुई, झूठी खबर होती है जिसे किसी स्वार्थ वश कोई फैला देता है। एक ही झूठ को बार बार कहें तो लोग उसे सच मानने लगते हैं। यही सिद्धांत ‘फेक न्यूज़’ पर भी लागू होता है। फेक-न्यूज़ को बढ़ावा देने में फेस-बुक, वाट्स-एप, ट्विटर जैसे उपकरणों ने बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

कुछ व्यक्तिनिष्ट खबरें इस लायक नहीं होती जिन्हें खबर कहा जा सके, या सार्वजनिक किया जा सके। लेकिन स्वार्थ वश लोग इन्हें भी खबर की तरह प्रसारित करवाना चाहते हैं। आखिर, ले-देकर इन्हें भी छपवा ही लिया जाता है। ये भी खबरों की किस्मों में इजाफा करती हैं। और इन्हें “पेड-न्यूज़’ कहा जाता है।

लोग चाहते हैं कि खबरें उन्हें जल्दी से जल्दी मिल सकें। अत: तुरंत मिली खबर को “ब्रेकिंग-न्यूज़’ की तरह प्रस्तुत किया जाता है। ऐसी ब्रेकिंक न्यूज़ कभी कभी खबर की कमर तक तोड़ देती हैं। जल्दबाजी में बताई गई खबरें बाद में ना-खबर सिद्ध होती हैं। लोगों का अच्छा मनोरंजन करती हैं।

यूं तो खबरें हर क्षेत्र से आती ही रहती हैं लेकिन हमारे भारत में दो क्षेत्र ऐसे हैं जिनकी खबरें पढ़ने में लोगों की ख़ास दिलचस्पी रहती है। इनमें से एक क्षेत्र है, सिनेमा। बालीवुड की खबरें बड़ी प्रमुखता से छापी जाती हैं; इसी प्रकार खेलकूद में क्रिकेट की खबरें भी हैं। इन्हें भी बड़ी तरजीह दी जाती है। हम क्रिकेट और उसके हर रूप के दीवाने हैं। लेकिन ट्वंटी-२० जैसी फटाफट क्रिकेट हो तो बस मज़ा ही आ जाता है। क्रिकेट कहीं भी हो रहा हो, उसकी खबरों के लिए हम लालायित रहते हैं।

ज़िंदा रहने के लिए, जाग्रत रहने के लिए, खबरें ज़रूरी हैं। कैदियों को बाहर की खबरें नहीं मिल पातीं। ज़रा सोचिए उनका क्या हाल होता होगा ! खबरें हैं तो जी है, जहान है। दुनिया उन्हीं की है जो दुनिया की खबर रखते हैं। जिन्हें दुनिया का कुछ पता ही नहीं, उनका क्या जीना और क्या मरना ! बेशक किसी को अपनी खबर नहीं कि कल क्या होगा, लेकिन यही बात ज़िंदगी को रोचक बनाती है। नाखबर रहने का यह एक फायदा भी है। खबरदार रहिए, नाखबर रहिए। दोनों ही स्थितियां लाभप्रद हैं।

-डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

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