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शब्दों के काफिले // कविताएँ // राजेश गोसाईं


1.  .अर्जुन ***

शब्दों के बाण
कलम के धनुष पर चढ़ा
निशाना कविता पर लगाता हूँ
मिला नहीं द्रोण कोई
प्रयत्न में एकलव्य बन जाता हूँ

साध कविता की आँख - अंगूठा
कलम प्रत्य्ंचा चढ़ा
श्रोताओं के वट वृक्ष पर
क्रिया ये दोहराता हूँ

कविता के स्वंयवर में
कमी नहीं कवियों की
छवि द्रोण की हृदय बसा
एकलव्य से
अर्जुन बन जाता हूँ

********
2...
कुसुम क्यारी

हमें रख लेना
अपने वट वृक्ष की छाँव में
हम अभी नये हैं
तुम्हारे साहित्य के गाँव में
इस गुल को भी
खिलने दो अपने गुलिस्तां में
लिखता है दिल की कलम से
अलफाज राजेश
रख देना अपनी
कुसुम क्यारी में
बड़ी खुशबु है रचना तुम्हारी में
ना जाने क्या क्या लिख देता हूँ
पर आ पहुँचा हूँ उम्मीदों की
वाह वाह में

*******

3....कागज का दर्द

इक दिन कागज मुझसे बोला
क्यों बना रहे हो मेरा गोला
कचरा कर के दिखा रहे हो शोला
लिखना तो खुद को आता नहीं
और गुस्सा मेरे पे उतार रहे हो

उठा कर कलम के चाकु
सीना मेरा चीरे जा रहे हो
उस पर भी मार के
शब्दों के पत्थर मुझे
घायल किये जा रहे हो

कभी विचारों की आँधियों में
मेरे टुकड़े उड़ा रहे हो
कल्पनाओं के सागर में मेरी
कश्तियां बहा रहे हो
अपनी रचनाओं के साम्राज्य पर
विजय प्राप्त करने के लिये
मेरी ही धरती पर विश्व युद्ध
बना रहे हो

इतिहास साक्षी है
पुरानी लिखावटों तले मेरी
लिखावट आज भी दबा रहे हो

मैं तो तुम्हारा प्रिय मित्र हूँ
हर भले बुरे का प्रमाण पत्र हूँ
जीवन की बगिया में मैं
तुम्हारा कुसुम इत्र हूँ
फिर भी तुमने मेरी कद्र न जानी
मेरे ऊपर की मनमानी
मैं तो तुम्हारा प्रतिबिम्ब हूँ न
पर तुम अपने दिल और दिमाग के
द्वंद्व में  शब्दों के कंकर मार
मेरा आईना तोड़े जा रहे हो

कागज ने यह दर्द अपना
रोशनाई में घोल कर
मुझे झकझोर दिया
मेरी कलम से मेरा ही
अंतर मन तोड़ दिया

*********
4.....
शब्दों के काफिले

शब्दों के काफिले में
उलझ कर रह गया हूं मैं
कागज के पथ पर
कल्पना के रथ पर
कलम के अश्व की
लगाम पकड़ कर
रह गया हूं मैं

कभी माथे की राह पर
कभी कागज की धरा पर
धीमी गति से आते हैं
कलम के पांव
दिल की आवाज से
मिल कर रह गया हूं मैं

जच्चा के दर्द की भांति
दिमाग के गर्भ में आती
कोई शिशु रचना बन जाती
प्रसूति काल में बेचैन सी
राह पर ठहर गया हूं मैं

साहित्य के गाँव में
रचना की छाँव में
लिख कर ये पंक्तियां
कागज की चौपाल पर आ
ठहर गया हूं मैं

********

5...   शुक्रिया

कलम तू चलती जा
शुक्रिया तू  करती जा
पहले शुक्रिया उसका करना
जिसने चलना सिखाया
एक प्रेरणा स्त्रोत बन के
जो जीवन में आया

फिर शुक्रिया उसका करना
जिसने हौसला बढ़ाया
हर रचना पढ़ कर
सुन कर
महफिल में मान बढ़ाया

कलम तू चलती जा
शुक्रिया तू करती जा

एक शुक्रिया लिखना
स्वर-विद्या दायनी माँ का
जिसकी दया से सब कुछ मिला
मुझको क्या था आता

शुक्रिया गुरूजनों का
जिनकी सर पे कृपा
कलम तू चलती जा
शुक्रिया तू करती जा
सब पढ़ने सुनने वालों का
हिम्मत बढ़ाने वालों का
कलम तू लिखती जा
शुक्रिया तू  लिखती जा

*********

6..  कलम के जादूगर

शब्दों के शहर में
कलम के जादूगरों को सलाम
ए कलम तुझे मेरी कलम का सलाम

लिखते है जो दिल से दिल की सदायें
आग उगलें फूल बरसायें
ए कलम तेरे जादूगरों को सलाम

ना कोई लालच ना कोई इनाम
शोहरत पाये मिलता है नाम
लिखने वाले हर पैगाम को सलाम

शब्दों के शहर में
ए कलम के जादूगरों
तुमको मेरा सलाम

*****


7... दुल्हन बनी रचना

भावनाओं के परिधान में
विचारों का घूंघट ओढ़
भाषा का कंठ हार पहन
शब्दों के आभूषण और
कला के कर्ण फूल धर
संस्कृति की मेहँदी रच कर
मांग में कलम से सिंदूर भर
नवश्रृंगार किये नव वर्णों से
मात्राओं की पायल बांध
दुल्हन बनी रचना  नई नवेली
बाबुल कवि को छोड़
पग बदन समेटे हुये
पंक्तियों की माला में
सुसज्जित कागज की सेज पर
अपने पिया के समक्ष है

*******


8... शहर से दूर

इस शहर से दूर ...बहुत दूर
मुझे जाना है वहाँ
मिल सके मुझे जहाँ
मेरी सही मंजिल
लघु वृहत् आकांक्षाओं के
सुन्दर सुगठित घरौंदे
मृगतृष्नायें/कल्पनायें
परिवर्तित हों विपरीत में
सतरंगे ख्वाब अतीत के
बन जाये वर्तमान जहाँ
मुझे जाना है वहाँ

कोई रोक सके ना मुझे
लिखने को मेरी आवाज
अन्त:मन की जहाँ
कोई काट सके ना मेरे
पंक्तिबद्ध शब्दों के वृक्ष
मात्राओं/वर्णों के सैकडों नीड़
बिखर सके ना जहाँ
मुझे जाना है वहाँ

यह शहर शहर नहीं लग रहा
एक मरघट सा बन रहा यहाँ
साहित्य का उजड़ा उपवन
कला लेख का हर सुमन
मुरझा रहा है आज यहाँ
प्रतिभाओं का हनन ऐसा
प्रतीत हो रहा है यहाँ
रक्तरंजित वीरान सा
लग रहा हर रंगमंच यहाँ
शून्य हुआ मैं भी पीठ का
पूछ रहा अपनी ही शवासों से
कहाँ है मेरे
शब्दों का शहर
कला साहित्य और संस्कृति जैसे
रत्नों का/ दीपों का द्वीप
कहाँ है मेरे जीवन का मधुबन
शब्दों का सहारा दे सुकून
लेखन का भी जहाँ
मुझे जाना है वहाँ

किसी जमीं या आसमां
दामन भर हों खामोशियां
श्वेत विकिरण हों चोटियां
पायल बन छनछनायें
चाँदी जैसी नदियां
जहाँ बहारों का हो जहां
शब्दों की कलियां बने
कुंतल ; निर्भय हो जहाँ
मुझे जाना है वहाँ
मुझे ले चलो वहाँ


*******
9.....बुलन्द हौसला

आसमानों से बढ़ना है आगे मुझको
ऊंचाइयों को छूना है और मुझको
ए जिन्दगी के सफल क्षणों
जरा पास आ के
हौसलों को मेरे
और बुलन्द कर दो
वक्त के नक्श ए कदम पर
चलना है बहुत आगे ...
और आगे.....
तमन्नाओं के जाल काट कर
सपनों के समन्दर से दूर
यथार्थ में.....
मंजिलों के महल बनाने हैं
अभी मुझको
वक्त ! जरा सा साथ और दे दे
आज तेरे सांचे में
जिन्दगी के
हर क्षण को जमाना है मुझको

10...
समय का पंछी

समय के पंछी को हर पल
तारीखों का दाना डाल कर
पाला है मैंने
जिन्दगी के पिंजरे में
दिनों का पानी
हफ्तों की कटोरी में डाल के
रात की रोटी से
महीनों का दुलार प्यार दे
पाला है मैंने
सालों साल
सदियों से
जीवन की कोठरी में
और नाम दिया है-- मौत--

*****

11....फसल
फसल उगाता हूँ मैं
खेतों में
अपनी कलम के हल चला कर
कभी ये रचना बन जाती है
तो कभी शायरी के फूल
खिलाता हूँ मैं

यूं तो मैं
कुछ भी नहीं
पर दिल की सदाओं से
भारत के साहित्य
और संस्कृति के हार
सजाता हूँ मैं

अपने शब्दों के बीज
डाल कर नई कल्पना की
खाद से
नई नई फसल
उगाता हूँ मैं

और भारत को विश्वगुरू
बनाने के लिये
प्रभु से दुआ कर
सीस झुकाता हूँ मैं

--
राजेश गोसाई

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