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अत्याधुनिक गीता सार // दीपक दीक्षित

dípak díkhchit

आज के टेक्नोलोजी से संचालित और भाग-दौड़ वाले दौर में हमारा अस्तित्व लगता है सिमट कर हमारे मोबाईल नंबर तक रह गया है।

बाजार के खिलाड़ी आपके मोबाईल नंबर पर गिद्ध की तरह नज़ारे जमाये बैठे हैं। वो बस आपसे आपका मोबाईल नंबर पूछते हैं और उनके कम्प्यूटर पर आपकी जन्म कुंडली खुल जाती है। आपका व्यवसाय क्या है, आप क्या पसंद करते हैं, कहाँ कहाँ जाते हैं और क्या कमाते हैं सब कुछ उनके सामने होता है। और अगर आप किसी कंपनी के उत्पाद के संभावित ग्राहक हो सकते हैं तो आपको कहीं भी जाने की जरूरत नहीं। जैसे डाक्टर ऍमआरआई /सीटी स्कैन से आपकी कमजोरी जान लेता है वैसे ही उस कंपनी के कम्प्यूटर विशेषज्ञ आपकी सोशल मीडिया प्रोफ़ाइल (अगर आप उस कंपनी के पंजीकृत ग्राहक सदस्य बन चुके हैं तो उन्हें और अच्छा मसाला मिल जाता है ) से आपकी कमजोरी पहचान कर आपको मेसेज, कॉल या ईमेल के जरिये इतने लुभावने प्रस्ताव देते हैं कि आप अक्सर उनके जाल में फंस ही जाते है। इन ताकतों ने आपको इस मकड़ जाल में कैदी बना के रखा हुआ है।

इस तरह के माहौल में भगवत-गीता में वर्णित शब्दों का सार समझ में आने लगता है-

“आत्मा अजर, अमर है। जिस तरह से शरीर एक कपड़ा बदल कर दूसरा पहन लेता है उसी तरह आत्मा एक शरीर छोड़ कर दूसरा धारण कर लेती है। तेरा यहां क्या है? सब कुछ तो मेरा (ईश्वर का) है और मेरी इच्छा से होता है । तू क्या लेकर आया है और क्या लेकर जायेगा ?जो कुछ करता हूँ मैं (ईश्वर) ही करता हूँ , तू तो बस निमित्त मात्र है।”

आज के परिपेक्ष्य में, अत्याधुनिक रूप में इसे इस तरह देखें –

“मोबाईल नंबर अजर, अमर है। जिस तरह से कोई उपभोक्ता एक डिवाइस बदल कर दूसरा उपयोग कर लेता है , उसी तरह मोबाईल नंबर एक उपभोक्ता छोड़ कर दूसरा उपभोक्ता धारण कर लेती है। तेरा यहां क्या है? सब कुछ तो मेरा (ईश्वर का) है और मेरी इच्छा से होता है। तू क्या लेकर आया है और क्या लेकर जायेगा ?जो कुछ करता हूँ मैं (ईश्वर) ही करता हूँ , तू तो बस निमित्त मात्र है।”

यहाँ ये भी लगता है कि ये ईश्वर कोई बिग बॉस है जो किसी को भी दिखाई नहीं देता पर सब कुछ उसकी इच्छा से ही होता है।

धन्य है नए ज़माने का यह दौर जिसने गीता का मतलब इतनी आसानी से समझा दिया।

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लेखक परिचय

रुड़की विश्विद्यालय (अब आई आई टी रुड़की) से इंजीयरिंग की और २२ साल तक भारतीय सेना की ई.ऍम.ई. कोर में कार्य करने के बाद ले. कर्नल के रैंक से रिटायरमेंट लिया . चार निजी क्षेत्र की कंपनियों में भी कुछ समय के लिए काम किया।

पढने के शौक ने धीरे धीरे लिखने की आदत लगा दी । कुछ रचनायें ‘पराग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘अमर उजाला’, ‘नवनीत’ आदि पत्रिकाओं में छपी हैं।

भाल्व पब्लिशिंग, भोपाल द्वारा 2016 में "योग मत करो,योगी बनो' नामक पुस्तक तथा एक साँझा संकलन ‘हिंदी की दुनिया,दुनियां में हिंदी’ (मिलिंद प्रकाशन ,हैदराबाद) प्रकाशित हुयी है।

कादम्बिनी शिक्षा एवं समाज कल्याण सेवा समिति , भोपाल तथा नई लक्ष्य सोशल एवं एन्वायरोमेन्टल सोसाइटी द्वारा वर्ष २०१६ में 'साहित्य सेवा सम्मान' से सम्मानित किया गया।

वर्ष 2009 से ‘मेरे घर आना जिंदगी​’ ​(http://meregharanajindagi.blogspot.in/ ​) ब्लॉग के माध्यम से लेख, कहानी , कविता का प्रकाशन। कई रचनाएँ प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं तथा वेबसाइट (प्रतिलिपि.कॉम, रचनाकार.ऑर्ग आदि) में प्रकाशित हुई हैं।

साहित्य के अनेको संस्थान में सक्रिय सहभागिता है । राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कई गोष्ठियों में भाग लिया है। अंग्रेजी में भी कुछ पुस्तक और लेख प्रकाशित हुए हैं।

निवास : सिकंदराबाद (तेलंगाना)

सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन

संपर्क​ : coldeepakdixit@gmail.com

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