समीक्षा // अनसुनी आवाज़ों और अनसुलझे सवालों की गूंजः ‘‘फ़िरोज़ी आंधियां‘‘ // डॉ. राजेन्द्र कुमार सेन

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सत्य केवल वही नहीं होता जिसे हम जानते है बल्कि सत्य के अनेक ऐसे पहलू होते हैं जो सामने नहीं आने दिए जाते। मीडिया जनमानस को जो सूचना देता है ...

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सत्य केवल वही नहीं होता जिसे हम जानते है बल्कि सत्य के अनेक ऐसे पहलू होते हैं जो सामने नहीं आने दिए जाते। मीडिया जनमानस को जो सूचना देता है वह तथ्यों पर आधारित होती है परंतु तथ्य केवल वास्तविक हों यह जरूरी नहीं, अनेक बार तथ्यों को गढ़ा जाता है, तोड़ा जाता है और नया रूप देकर जनमानस तक पहुँचाया जाता है। हमारे इतिहास में ऐसे अनेक प्रकरण उपलब्ध हैं जो तथ्यों के आधार पर निर्मित हुए हैं। परंतु साहित्यकार समाज का सजग प्रहरी होता है और वह अपने कर्त्तव्य के प्रति अपनी निष्ठा का अनुपालन प्रत्येक स्थिति में करता है। समाज की अनसुनी आवाज़ों और अनसुलझे सवालों को जनमानस तक वास्तविक रूप में पहुँचाने का कार्य साहित्यकार करता है। कुछ ऐसा ही प्रयास हुस्न तबस्सुम ‘निहाँ’ द्वारा रचित उपन्यास फ़िरोज़ी आँधियाँ है।

विवेच्य उपन्यास भारत के पड़ोसी देश नेपाल में फैली हुई आंतरिक अव्यवस्था की गहरी समीक्षा से संबंधित है। भ्रष्टाचार की समस्या का विकराल रूप नेपाल में देखा जा सकता है जिसके परिणामस्वरूप नेपाल के अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में अशिक्षा, बेरोजगारी और शोषण की समस्या विद्यमान है। विवेच्य उपन्यास का केन्द्र बिन्दु भारत-नेपाल की सीमा पर सटा गांव नरैनपुरा है। इस उपन्यास का मुख्य पात्र गांव का मेहनतकश युवक ललित है। गांव के लोग गरीब हैं जो जंगल से लकड़ियां काटकर उन्हें शहर में बेचकर अपना जीवनयापन करते हैं। अपने पिता की मृत्यु के पश्चात ललित भी अपने परिवार के भरणपोषण हेतु यही कार्य करने लगता है। नेपाल सरकार द्वारा देश के पिछड़े अंचलों के विकास के लिए योजनाओं की घोषणा को ललित रेडियो पर सुनता है जिसमें प्रत्येक गांव के विकास के लिए सरकार द्वारा 20 करोड़ रूपये का प्रावधान रखा जाता है। स्कूलों के जीर्णोद्धार तथा विद्यार्थियों को पुस्तकें, वर्दी आदि मुफ्त उपलब्ध करवाने का प्रावधान भी होता है। ललित अपने भाईयों के साथ-साथ पूरे गांव के बच्चों को स्कूल में दाखिल करवा देता है। स्कूल की अध्यापिका मधु श्री इस बात से प्रसन्न होती है कि किसी भी कारण से ही सही स्कूल में बच्चों का आगमन तो हुआ।

गांव का प्रधान विकास के आवंटित की गयी धनराशि का गबन कर जाता है। स्कूल को केवल 50 हजा़र रूपये ही देता है। इस धनराशि से स्कूल का थोड़ा बहुत जीर्णोद्धार ही संभव हो पाता है परिणामतः बच्चों को पुस्तकें तथा वर्दी आदि का प्रबंधन नहीं हो पाता। जब ललित और इसके साथियों को इस भ्रष्टाचार का पता लगता है तो उनके हाथों ग्राम प्रधान तथा उसके एक साथी की हत्या हो जाती है। वे सभी भगोड़े बन जाते हैं। इधर आर्मी वाले उनकी तलाशी के नाम पर गांव की औरतों से बलात्कार करते है, निर्दोष लोगों को उनका साथी कहकर मारते हैं। ललित और उसके साथियों को माओवादी कहकर उनके परिवारों पर अत्याचार करते हैं। दूसरी ओर ललित अपने साथियों के साथ काठमांडू चला जाता है जहां उसे मधेसी आंदोलन व उसकी आड़ में नेपाल में हो रहे षड़यंत्रों का पता चलता है और वह मधेसी नेता के घर को बम से उड़ा देता है। धीरे धीरे वे माओवादी आंदोलन को नेपाल के अलग अलग क्षेत्रों में फैला देते हैं। परंतु अंत में ललित थकहार कर मधु के समझाने पर समर्पण को तैयार हो जाता है और अंत में पुलिस और आर्मी के द्वारा मार दिया जाता है। इस उपन्यास ने कुछ महत्त्वपूर्ण पहलुओं को छुआ है। उपन्यास का आरंभ ही लेखिका ने गरीबी के चित्रण से किया है। ‘‘गाँव नरैनपुरा। भारत नेपाल की सीमा से जुड़ा हुआ अत्यंत पिछड़ा और विपन्न ग्राम। सामने बहती विशाल राप्ती। जैसे वहाँ विकास के सारे रास्ते राप्ती ने ही रोक रखे हों। .....

लोगों का मुख्य व्यवसाय लकड़ी काटकर बेचना है। वे भोर ही लकड़ियाँ काटने निकल जाते हैं। कुछ लोग काश्तकारों के यहाँ खेतों में मजदूरी भी करने जाते हैं। मगर वहाँ काश्तकार भी कितने हैं। बस गिनती के। कुछ भीख माँगने भी शहर जाते हैं।’’ (पृष्ठ संख्या 09)। नरैनापुर इस उपन्यास का केन्द्र बिन्दु है, कथा का आरंभ और अंत दोनों यहीं हैं। रचना का केन्द्रीय पात्र ललित कथा के आरंभ से अंत तक विद्यमान है। वह बगावत का प्रतीक है। ‘‘ललित एक असंतुष्ट और अवसादित नवयुवक है। उसे ग्राम की एक एक ईंट से शिकायत है। सारा ग्राम ही अशिक्षित क्यूं है, शापित क्यूं हैं।’ (पृष्ठ संख्या 10)। यह उपन्यास नेपाल की राजनीति और प्रशासन में नीचे से ऊपर तक फैले हुए भ्रष्टाचार की सपाट बयानी भी है। सरकार द्वारा प्रत्येक गांव के विकास के लिए 20 करोड़ रूपयों का प्रावधान ग्रामोन्मुख विकास कार्यों और विद्यालयों के नवीनीकरण के लिए किया जाता है। ‘‘किंतु छुटभैयों को तो अपनी टेंट गर्म करने की जल्दी है। प्रधान अध्यक्षों की बांछें खिली हैं सो अलग। आखिर सरकारी पैसा आएगा तो उनके ही खाते में ही। (पृष्ठ संख्या 12)। परंतु विकास राशि इसी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है। ‘हाकिमों और प्राधानाध्यक्षों के खाते सरकारी पैसों से भर गए। अलबत्ता बीस करोड़ घिसते घिसते 5 करोड़ ही रह गया। (पृष्ठ संख्या 12)। नरैनापुर की हालत भी इसी प्रकार की हुई।

ललित सरकार की विकास ग्रामोन्मुखी योजना से काफी आशावादी हो गया तथा गांव के सभी बच्चों को स्कूल में दाखिल भी करवा देता है जिन्हें सरकारी पैसों से किताबें, पेन तथा वर्दियां प्राप्त होंगी। परंतु जब उसे पता चलता है कि सारा पैसा प्रधान ने हजम कर लिया तो वह अपने साथियों के साथ प्रधान के पास पहुंच जाता है सरकारी पैसे का हिसाब लेने। प्रधान दो टूक शब्दों में मना कर देता है। ‘‘काहे का कयि लेहौ.... चलौ नाई दयित हय हिसाब... हमका जहां उचित लागा हुंवा खर्च किहा।’’(पृष्ठ संख्या 18)। यहीं से ललित अपने साथियों के साथ वह रास्ता अपना लेता है जो उसे संघर्ष के बीहड़ में ले जाता है। उपन्यास में लेखिका ने आम जनता पर आर्मी और पुलिस द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों का कच्चा चिट्ठा खोला है। तलाशी के बहाने जहां आर्मी वाले निर्दोष गांव वालों का अपहरण और हत्या करते हैं वहीं दूसरी ओर गांव की बहु बेटियों की अस्मत लूटते हैं। पुलिस, पुंजीपति और आर्मी की मिलीभगत से नेपाल बुरी तरह से कराह रहा है। ‘‘भई जब कानून कय रखवालेन गाम मां आतंक फैलाए रहे हैं त आम अदमीक समस्या को सुलझाई। ससुर उ मनै माओभादी आएं त तू का आव ? अउरत की इज्जत से खेलत... अदमीक हत्या कई देव ई सब का होए ... मनै कउनौ पूछे वाला हय?’’(पृष्ठ संख्या 26) आर्मी तथा पुलिस का यह उत्पीड़न भी कहीं न कहीं नेपाल के आम आदमी के माओवादी बनने का प्रमुख कारण बना है। नेपाल में मधेसी आंदोलन एक बड़ी चुनौती बन चुका है।

मधेसी आंदोलन के नाम पर कुछ शरारती तत्व नेपाल की आंतरिक सुरक्षा को भी चुनौती दे रहे हैं। लेखिका ने अपने उपन्यास में मधेसी आंदोलन को भी स्पर्श करने का प्रयास किया है। उपन्यास में कैलाश आनंद एक मधेसी नेता है। कैलाश आनंद के नेतृत्व में अवधी महोत्सव का आयोजन किया जाता है। इसमें नेपाल तथा भारत से मधेसी आंदोलन के पक्ष में लोग एकत्रित होते हैं। मधेसियों की कुछ मांगे प्रमुखता से उभारी जाती है। ‘‘ई हमार जन्म भूमि, करम भूमि तब्बौ हम अजनबीक अस हिंया रहित हय। हमार भाषा उपेक्षित, हमार संस्कृति उपेक्षित। इकै सबका नेपाल राष्ट्र मां जगह दियावै खत्ती हम सबका एकजुट होय कय संघर्ष करैक पड़ी।’’(पृष्ठ संख्या 46) मधेसी आंदोलन नेपाल में अवधी भाषा और मधेसियों की अस्मिता से संबंधित है। नेपाल में अपनी भाषा को स्थापित करने तथा नेपाल की सरकारी सेवाओं में मधेसियों को स्थापित करने हेतु यह आंदोलन काफी उग्र हो चला है। भारत और नेपाल के आपसी संबंध अति प्राचीन हैं। नेपाल के नए संविधान के मसौदे में कुछ महत्त्वपूर्ण पदों पर केवल नेपाली नागरिकों को ही दिए जाने से भी मधेसी परेशान हैं। ‘‘नए मसौदे के मुताबिक भारतीय से शादी करने वाले नेपाली नागरिकों की संतानें देश में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, मुख्यमंत्री और सेना प्रमुख सहित अन्य महत्त्वपूर्ण पदों पर काबिज नहीं हो सकती।’’(पृष्ठ संख्या 47) महोत्सव में इस से संबंधित अनेक तथ्यों का उल्लेख किया गया जो उपन्यास में वर्णित है। ललित धीरे धीरे मार्क्सवाद और लेनिन के माध्यम से धीरे धीरे मार्क्सवाद और माओवाद के सैद्धांतिक आधार को समझना आरंभ करता है। वह धीरे धीरे इस दार्शनिक विचारधारा को आत्मसात कर लेता है। रूस और चीन की भांति वह नेपाल में भी मार्क्सवादी व्यवस्था की स्थापना करने के लिए प्रयास करना आरंभ कर देता है। दौलतपुरा गांव में अपने साथियों के साथ जाकर लोगों को पुंजीपतियों के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए प्रेरित करता है। ‘‘ ... आप सब लोन हमरे संघे आओ औ हमरे संगठन मां सामिल होई जाव।

हम लोन ई पुंजीपतियन का जड़ से उखाड़ि फेंकिब औ उनकी काली संपत्ति प अपना अधिकार कई के अपन बेसहारा गरीब भाई बहिनिन का बांटि दईब। कारखानन प कब्जा करिब औ अपन गाँव वालेन का उमा रोजगार दयिब।’’ (पृष्ठ संख्या 65) ललित युवाओं के अलग अलग समूह बनाकर उन्हें पूरे नेपाल में फैलकर जनक्रांति करने के लिए प्रेरित करता है। ‘‘अब जाओ... पूरे नेपाल मां फईल जाओ। अपन जैसन लोगन का अपन उद्देस बताव। उनका अपन दल सनी जोड़ौ। (पृष्ठ संख्या 65) माओवादी पूरे नेपाल में तबाही मचाने लगे। ‘उन्हें तबाही में कुछ अधिक ही मजा आने लगा। नेपाल से लेकर सुर्खेत, चीसो पानी, कोहलापुर दांग और बर्दिया से लेक काठमांडो जैसे विभिन्न शहरों में अब विनाश ही विनाश नजर आ रहा था।...धीरे धीरे नेपाल के सुदूर पश्चिम जिले भी इसमें शामिल होने लगे। जैसे- रूकुम, आक्षाम, कालीकोट, प्यूठान, सल्यान, रोल्पा, मुगु इत्यादि।

नरैनपुरा से जो चिंगारी निकली थी वो पूरे नेपाल राष्ट्र में आग बन कर फैल गइ।’ (पृष्ठ संख्या 85)। उपन्यास के अंत में ललित की मृत्यु पर मधु श्री लाल सलाम के नारे के साथ कहती है ‘‘ललित मरा नहीं... वह मरेगा भी नहीं... कभी भी .... नहीं।’’ (पृष्ठ संख्या 112) इससे पता चलता है कि माओवादी आंदोलन किस प्रकार जनमानस में पैठ बना चुका है। उपन्यास में मधु श्री एक अध्यापिका तथा समाज सेविका है जो एन.जी.ओ. के साथ मिलकर नेपाल में मानवाधिकार कार्यक्रम चला रही है। वही ललित को समर्पण के लिए तैयार करती है। ‘‘सर मैं बताना चाहती हूं कि नरैनापुर के वे लड़के आत्मसमर्पण करना चाहते हैं जो पुलिस की नजर में हैं... वे पहले सा सामान्य जीवन जीना चाहते हैं।’’ (पृष्ठ संख्या 110)परंतु आर्मी और पुलिस वाले धोखे से ललित का एनकांउटर कर देते हैं।

उपन्यास अपने छोटे से फलक में नेपाल की पूरी समस्या को समेटे हुए है। नेपाल के सामाजिक ढांचे, वहां की गरीबी, जनमानस का शोषण, पुंजीपतियों की लूट, सरकारी योजनाओं का दुरूपयोग तथा शोषण और उत्पीड़न के शिकार सामान्य जन का माओवाद के रास्ते पर चल पड़ना आदि नेपाल की आंतरिक समस्याओं को उभारने का एक बेहतरीन दस्तावेज है। इस उपन्यास में जहां मधेसी आंदोलन के द्वारा अवधी भाषा और मधेसी अस्मिता का सवाल उभरता है वहीं वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बदलते भारत-नेपाल संबंधों की झलक भी देखी जा सकती है। नेपाल के साथ भारत के प्राचीन सांस्कृतिक संबंध हैं परंतु अब नेपाल में भारत विरोधी ताकतें केन्द्र में बलवती होती जा रही है। लेखिका ने जिस प्रकार उपन्यास के आरंभ में कृति को एक विस्तृत फलक प्रदान किया वह फलक उपन्यास के अंत में नदारद दिखता है। उपन्यास का अंत एक कारूणिक एवं व्यक्तिपरक रचना के रूप में कर दिया। भाषा की दृष्टि से उपन्यास एक अच्छी कृति है। यथा संभव अवधी और नेपाली के शब्दों ने उपन्यास को आंचलिक रंगत प्रदान की। उपन्यास में लेखिका ने अनेक स्थलों पर तथ्यों का विवरण प्रदान किया है जो रचना में उनकी शोधप्रवृत्ति का द्योतक है।

यह तथ्य कथा को बोझिल नहीं बनाते अपितु पाठकों को यथार्थ स्थिति से अवगत कराने का कार्य करते हैं। कथारस की दृष्टि से भी उपन्यास एक सफल कृति है। उपन्यास में आरंभ से लेकर अंत तक निरंतरता विद्यमान है। नेपाल के संबंध में पाठकों की अवधारणा अवश्य बदलेगी तथा पाठक वर्ग नेपाल की आंतरिक अव्यवस्था से अवगत हो पाएंगे वहीं दूसरी ओर अनसुनी आवाजों को सुन सकेंगे और अनसुलझे सवालों से अवगत हो पाएंगे तथा उन फिरोजी आंधियों को समझ पाने में सफल हो सकेंगे जिनसे नेपाल जूझ रहा है। निःसंदेह हिन्दी जगत में यह कृति अपना विशेष स्थान बनाएगी।

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पुस्तक का नामः फिरोजी आँधियाँ,

लेखकः हुस्न तबस्सुम ‘निहाँ’,

प्रकाशकः मनीष पब्लिकेशन्स, सोनिया विहार, दिल्ली। 110094

कुल पृष्ठः 112, मूल्यः 300 रूपये ISBN: 978-93-81435-35-9--



डॉ. राजेन्द्र कुमार सेन

सहायक प्रोफे़सर, हिन्दी विभाग

पंजाब केन्द्रीय विश्वविद्यालय, बठिण्डा

ईमेलः rajinderkumar@gmail.com

नाम

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रचनाकार: समीक्षा // अनसुनी आवाज़ों और अनसुलझे सवालों की गूंजः ‘‘फ़िरोज़ी आंधियां‘‘ // डॉ. राजेन्द्र कुमार सेन
समीक्षा // अनसुनी आवाज़ों और अनसुलझे सवालों की गूंजः ‘‘फ़िरोज़ी आंधियां‘‘ // डॉ. राजेन्द्र कुमार सेन
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