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पुस्तक समीक्षा // बालकों को परम्परा व वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़ती कविताएं : "पेड़ लगाओ" // समीक्षक : अनिला राखेचा, कोलकाता

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पुस्तक समीक्षा

बालकों को परम्परा व वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़ती कविताएं : "पेड़ लगाओ"

          समीक्षक : अनिला राखेचा, कोलकाता

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कृति : "पेड़ लगाओ" (बाल कविता संग्रह)

रचनाकार: राजकुमार जैन राजन

प्रकाशक: अयन प्रकाशन,

              1/20- महरौली, नई दिल्ली- 110030

पृष्ठ : 108 (सजिल्द) मूल्य : 250 रुपये,  संस्करण: 2018

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       “पेड़ लगाओ” बाल काव्य कृति “अयन प्रकाशन” द्वारा प्रकाशित 108 पृष्ठों का मनोहर सख्त जिल्द में लिपटा साहित्यकार राजकुमार जैन राजन द्वारा रचित नव्य काव्य संग्रह है। राजकुमार जैन राजन  किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। बाल साहित्य से वे वर्षों से जुड़े हैं और तन-मन-धन से उसके प्रति समर्पित हैं। बाल साहित्य की पत्रिकाओं में वे अपना  यथासंभव योगदान देते रहते हैं, चाहे वह बाल साहित्य के प्रकाशन का हो या संपादन का... लेखन का हो या चित्रकारिता का... या फिर बाल साहित्य के प्रति जनमानस में प्रेरणा देने और रुचि जगाने का हो। उनका बाल साहित्य गुजराती, मराठी, पंजाबी, उड़िया, असमिया, अंग्रेजी, नेपाली में भी प्रकाशित हुआ है।

       इस संग्रह की हर कविता नाना प्रकार के मनभावन चित्रों से सजी, बच्चों में अच्छे संस्कारों को जगाती, कविताओं का ऐसा गुलदस्ता है जो कि गेय, तुकांत और सुरीली तथा ग्रामीण संस्कृति को आधुनिक संस्कृति से जोड़ती कविताएं हैं।

        बच्चों को पर्यावरण को बचाने का संदेश देती है  यह कविता संग्रह । आज विश्व में प्रदूषण सुरसा के मुँह की तरह बढ़ता जा रहा है और जिसके लिए हम पृथ्वी वासी ही जिम्मेदार हैं और हम अपनी चेतना द्वारा इस समस्या से निजात पा सकते हैं, और इस कार्य को आने वाली पीढ़ियां बेहतरीन तरीके से कर सकती है।" पेड़ लगाओ" संग्रह की कविताएं बाल- मन को पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति जागृत कर इस धरती को हरा-भरा बनाए रखने की सीख देती है।

       सभी कविताओं में कवि का वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी नजर आता है। बाल सुलभ जिज्ञासाओं ,उनकी मासूम शिकायतें और मस्ती भरी बातों में जहाँ कवि की मौलिकता की झलक मिलती है वहीं इस बात का भी पता चलता है कि कवि बालकों की सहज मनो भावनाओं का सहयात्री- सहभागी भी रहा है उनकी परेशानियों को, पीड़ाओं को बखूबी बयाँ किया है राजन जी ने।

       “रोबोट एक दिला दो राम” कविता हो या “बस्ते का बोझ”... “मत छीनों बचपन” हो या “सर्दी के दिनों में” इन सभी कविताओं में बच्चा अपने बस्ते के बोझ से दुखी रहता है और अत्यधिक होमवर्क मिलने के कारण खेलने से वंचित रह जाता है उसकी मासूमियत, उसका बचपन छिन सा जाता है। वह अपनी माँ को भी काम करने नहीं देना चाहता है तो बरबस राजन जी के अंदर छिपा बालक बोल उठता है- " रोबोट एक दिला दो राम / सहज सरल हो सारे काम... रोबोट किया करेगा अब से/ मेरे घर का सारा काम / मम्मी को भी मिल जाएगा/ कुछ पल को थोड़ा आराम"...."तुम ही बताओ मुझको, कैसे विद्यालय मैं जाऊँ / बोझा बस्ते का है भारी, उठा नहीं मैं पाऊँ... थोड़ी समझ बड़ों को दे दो, ओ मेरे प्यारे भगवान / बस्ता हलका करवा दो तो पढ़ना हो जाए आसान"... और सर्दियों के दिनों में सुबह-सवेरे उठकर स्कूल जाना बच्चों को सबसे कष्टदायक काम लगता है तभी तो राजन जी की कलम बोल पड़ती है - "रोज सुबह स्कूल जाने में आती बहुत रुलाई / नरम-नरम बिस्तर से अच्छी लगती नहीं जुदाई"... आगे ‘मत छीनो बचपन” कविता में भारी भरकम बस्ते व मोटी किताबों के बोझ तले दबे बच्चे की व्यथा कहती है कि क्या रट-रट कर ही बच्चों में बुद्धि शीघ्र आती है... "डैडी कहते पढ़ने में तुम/ खूब लगाओ मन और/ मैं कहता पापा मुझसे /मत छीनो मेरा बचपन"... इसी क्रम में एक और कविता का जिक्र होना जरूरी है “कंप्यूटर भैया” जिसमें बच्चा अपनी बाल सुलभ जिज्ञासा स्वरूप पूछता है- "घंटों में जो सोच ना पाते/ तुम क्षण भर में कर जाते / कितना तेज दिमाग तुम्हारा /बतलाओ तुम क्या खाते"... या जादूगर भैया कंप्यूटर से बच्चों की इन पंक्तियों में गुजारिश- "ऐसे में कंप्यूटर भैया/ घर मेरे आओ ना / बटन दबाते ही सब प्रश्नों को/ हल करके तुम जाओ ना"...।

       गिलहरी कविता गिलहरी की शारीरिक संरचना इसके गुणों से बच्चों को रूबरू कराती कविता है- "घर आँगन में धूम मचाती/ आफत का नाम है गिलहरी / अम्मा की साड़ी को समझे /खो-खो का मैदान गिलहरी।"

इसी तरह “संन्यासिन बिल्ली”, “हाथी की सवारी”, “चुन्नू का घोड़ा” ,“जंगल दिवस” ,“चूहा बिल्ली” आदि  कविताएं बच्चों को हंसाती-गुदगुदाती मन को लुभाती हैं।

       सरल ,सहज शब्दों में सजे तुकांत सुरीले गीत भी बच्चों के मन में सहज चढ़ने वाले हैं। “नटखट चिड़ियाँ”, “मस्ताना चाँद”, “बादल गरजे”, “हरियल तोता” इन गीतों को बच्चे सरलता से याद कर सकते हैं ,गुनगुना सकते हैं।

       “गजब का मेला”, “प्यारा गाँव” दोनों कविताएं  में गजब का शब्द चित्र उकेरा गया है, जिसमें बचपन के गाँव के मेले की व गंवई संस्कृति, गांव का चित्रण मिलता है वहीं दूसरी और इंटरनेट कविता में बच्चों को आज के आधुनिक युग से जोड़ने की कवायद भी कवि ने की है।

         कवि ने सहज में बच्चों को जो अच्छे संस्कार, अच्छे संदेश दिए हैं उन कविताओं का जिक्र करना भी अतिरिक्त महत्व की बात है- “अच्छी लगती है बरसात” कविता में “नहीं देखती जाँत-पाँत / जल बरसाती है बरसात"... “नदिया -सी लहराती रेल” कविता में “रुको नहीं मंजिल से पहले / हमको है सिखलाती रेल”.. “अच्छी बात नहीं है” और “नाचो गाओ” कविता में.." पिचकारी के रंगों में सब प्यार अनूठा घोलो रे"... “भोले कबूतर” कविता में “अपना भोजन स्वयं बनाते / नहीं कभी अलसाते कबूतर" ... “नन्हीं चींटी” कविता के द्वारा परिश्रम की सीख “मानवता के दीप जले” राग-द्वेष भूलाकर दीपक की भांति जग में प्रेम-प्रकाश फैलाते हुए भारत के नवनिर्माण में बच्चों को सहायता देने की सीख कविता.. “ऐसा काम कभी न करना” और “खोलो प्याऊ” कविता में  छुट्टियों का सदुपयोग  सार्थक काम करने की सीख कवि ने बच्चों को दी है।

       बच्चों की शरारत भरी हरकतें भी  कई कविताओं में झलकती है  जैसे देखिए- "नकली दाँत लगाते हैं भुट्टे भी खा जाते हैं / गन्ना खाते आधा जी, मेरे प्यारे दादाजी"... "मम्मी अब तो दया करो / रूप लंच का नया करो".. यह कविता भी बच्चों की प्यारी मानसिकता को दर्शाती है तो "मीठी वाणी" के जादू में मीठी बातें करने के फायदों से भी रूबरू कराती है।

       अपनी अन्य कविताओं में राजन  ने खनिज पदार्थों, पर्यावरण, प्रकृति व पानी को बचाने की गुहार की है। “पेड़ की छाँव” कविता में कवि ने पेड़ की छाँव की तुलना माँ ममता से की है। "नीम के गुण" हो या "पेड़ लगाओ" कविता इनमें वृक्षों की महिमा का बखान व उनकी रक्षा की सीख दी गई है। कवि पर्यावरण को सँवारने-सुधारने तथा पानी की कीमत बताते हुए कहता है  कि अगर पर्यावरण, प्रकृति, पानी को नहीं बचा सके तो हमें इसके दुष्परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा।

        साहित्यकार राजकुमार जैन राजन जी पुस्तकों की उपयोगिता के  प्रति पूर्णत: निश्चिंत हैं और इसलिए तो वे अपनी कविता 'पुस्तक' में भी यही बात कहते हैं कि- "कथा कहानी और कविताएं, दादी जैसा प्यार है पुस्तक / महक उठे जिससे फुलवारी, मीठी शुद्ध व बयार है पुस्तक / नीले - पीले जिल्दों में तो, लगती राजकुमार है पुस्तक / ले लो, ले लो चुन्नू मुन्नू ,सब बच्चों की यार है पुस्तक".... साथ ही हिंदी वर्णमाला का छोटी छोटी शिक्षाप्रद बातों द्वारा लयात्मक और सहज-सरल तरीके से बच्चों का ज्ञान कराती कविता है "अक्षर की कहानी" जो राजकुमार जैन राजन जी द्वारा लिखी गई एक बेजोड़ और जरूरी कविता है।

       "पेड़ लगाओ"  बाल कविता संग्रह इसलिए भी महत्वपूर्ण बन पड़ा है कि यह मात्र एक बाल काव्य संग्रह ही नहीं है अपितु इसे बाल मनोविज्ञान की किताब के रूप में भी देखना जरूरी होगा। बाल मनोभावनाओं से जुड़ा कोई भी विषय ऐसा नहीं है जो इस संग्रह में शामिल नहीं हैं।   बच्चों के प्रति, प्रकृति के प्रति राजन जी की यही सोच जागरूकता एवम चिंता को दर्शाती है।

      अंत में आप सबसे एक छोटी सी गुजारिश- एक बार इस किताब को जरूर पढ़ें एवं अपने परिचित व आसपास के बच्चों को उपहार स्वरूप यह किताब प्रदान करें। बच्चों में अच्छे संस्कारों को भरने के लिए, पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाने के लिए।  इस बेहतरीन बाल कविता संग्रह के लिए राजकुमार जैन राजन जी को अनंत शुभकामनाएं एवं कोटिशः बधाई।■

समीक्षक-

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अनिला राखेचा

आशीर्वाद बिल्डिंग, फ्लेट न. 2-बी,

124-ए, मोतीलाल नेहरू रोड़, भवानी पुर

कोलकाता -700020 (पश्चिम बंगाल)

1 टिप्पणियाँ

  1. 'पेड़ लगाओ' बालकाव्य संग्रह की सुंदर समीक्षा। बालकों को यह कृति सचमुच प्रेरणादायी सिद्ध होगी। राजन जी और समीक्षिका अनिला जी को हार्दिक बधाइयाँ।

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