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कहानी // जीवनसाथी // डॉ .(श्रीमती) ललिता यादव

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जीवनसाथी

उम्र 12 वर्ष रुनझुन, हां यही नाम था उसका। जैसा नाम था वैसे ही शोख, चंचल, नटखट थी। बदकिस्मती थी तो बस इतनी कि उसका परिवार मेले में उससे बिछड़ गया था। मन्दिर में वह भगवान के सामने रो रही थी तभी एक महिला ने पूछा-"क्यों रो रही हो बेटी? रुनझुन ने कहा-"मैं अपने परिवार से बिछड़ गई हूं उन्हें ढूंढ-ढूंढ कर थक गई हूँ अब तो बस भगवान का ही सहारा है। तब से रुनझुन उसी महिला के साथ रहती है। उस महिला का नाम था सिरु। सिरु रुनझुन से बहुत प्यार करती थी और उसे अपनी बहन की तरह रखती थी। वह रुनझुन से इतना अधिक जुड़ गई थी कि वह अपनी विवाह की बात भी भूल गई थी। दरअसल 14 बरस की उम्र में सिरु का बाल विवाह हुआ था लेकिन वह वहाँ नहीं रह पाई और मात्र 17 वर्ष की आयु में ही उसका ससुराल से वापसी हो गया। कारण था उसका पति सन्तोष कुमार। सिरु का पति सन्तोष कुमार बस नाम का ही सन्तोष था अंदर से वह पूरा संकीर्ण दिमाग वाला था। वह सिरु को पत्नी बना कर नहीं बल्कि अपने चरणों की दासी बना कर रखना चाहता था।

उसको लगता था कि वह बहुत होशियार और चालक है पर वह था इसके विपरीत अवगुणों का बादशाह। मारपीट, लड़ाई-झगड़ा, सताना, जलील करना ये सब सन्तोष के लिए आम बात थी। इसके विपरीत सिरु का स्वभाव बहुत अच्छा था, वह सबसे मीठी बोली बोलती थी, सबसे हिलमिल कर रहती थी तथा काफी खूबसूरत थी यही उसकी जिंदगी के दर्द का कारण था। ये सभी गुण सन्तोष को बर्दाश्त नहीं होता था। सिरु सन्तोष को बहुत समझाने का प्रयास करती लेकिन वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आता था। सिरु सन्तोष के अत्याचार को सहन करती रहती थी और जब नहीं कर पाती तो भगवान से प्रार्थना करती भगवान मुझे ऐसी आत्मा से मुक्ति दे। सिरु कई बार मरने का प्रयास भी कर चुकी थी पर वह असफल रही थी। सिरु अंदर से बहुत टूट चुकी थी घरवाले भी उसका साथ नहीं दे पा रहे थे। एक दिन तो हद हो गई जब सन्तोष ने उसे आधी रात को चरित्रहीन कह कर जलील किया और उसे घर से निकाल दिया। सिरु बहुत बिलखती रही कि उसे घर से न निकाले पर सन्तोष तो क्रोध में अंधा हो चुका था। उसने अपने घर का दरवाजा सिरु के लिये हमेशा के लिए बंद कर लिया था।

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सिरु के सामने अब बिल्कुल अँधेरा ही अँधेरा था वह समझ ही नहीं पा रही थी कि क्या करे, कहाँ जाए। समाज के भय से सिरु के घरवालों ने भी उससे किनारा कर लिया था। वह इस संसार मे बिल्कुल अकेली हो गई थी। वह घर छोड़कर इस ख़ौफनाक संसार में रहने के लिए मजबूर हो गई जहाँ लोगों की नजरें हर पल सिरु को घूरा करती थी। खैर अब सिरु ने भी कमर कस लिया कि अब मुझे अकेले जीना है। वह बचपन में बहुत होशियार थी पढ़ने में भी तेज थी वह आगे बढ़ने के लिए पढ़ाई को ही अपना माध्यम बनाई। वह अब छोटे-छोटे बच्चों के टयूशन लेने लगी। वह स्वभाव से भी अच्छी थी और मेहनती भी थी। उसका फायदा यह हुआ कि बहुत ही जल्द उसे अच्छा काम मिल गया। साथ में वह अपनी पढ़ाई भी करने लगी। वह सारे काम निबटाने के बाद शाम को एक बार मन्दिर अवश्य जाती या यों कहें कि भगवान से शिकायत करने अवश्य जाती और अकेले में भगवान से जमकर बहस करती, शिकायत करती, रोती, अपनी किस्मत बदलने के लिए कहती और भगवान सिर्फ उसकी बातें सुनते। बोलते-बोलते जब थक जाती तो भगवान को एकटक चुपचाप देखने लगती और कहती कि आखिर कब तक मेरी बात नहीं सुनोगे एक न एक दिन तो तुम्हें मेरी बात सुननी ही पड़ेगी।

जिस दिन रुनझुन इस मन्दिर में सिरु से मिली उस दिन भी सिरु भगवान से लड़ने के लिए ही आई थी। लेकिन यहाँ रुनझुन को भगवान के सामने गिड़गिड़ाते देखकर उसे अपने साथ ले गई। सिरु को अब रुनझुन का साथ मिल गया था, एक लक्ष्य मिल गया था वह रुनझुन के लिए कुछ करना चाहती थी। अब सिरु स्वयं के लिए ही नहीं बल्कि रुनझुन के लिए भी जीना चाहती थी और उन दोनों का जीवन यापन ठीक चल रहा था। कई बार रुनझुन अपने परिवार को याद करके रोती। पर इस संसार में उन्हें ढूंढ़ना भी आसान काम नहीं था। वह भी सिरु की तरह आये दिन मन्दिर में जाती भगवान से लड़ती, शिकायत करती, रोती, अपनी किस्मत बदलने के लिए कहती और जब बोलते-बोलते थक जाती तब चुपचाप एकटक भगवान को देखने लगती और सिरु की तरह ही कहती कब तक मेरी बात नहीं सुनोगे एक न एक दिन तो तुम्हें मेरी बात सुननी ही पड़ेगी।

धीरे-धीरे रुनझुन भी बड़ी होने लगी। दोनों की पढ़ाई ठीक चल रही थी सिरु कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर चुकी थी और रुनझुन का अभी कॉलेज का प्रथम वर्ष था। सिरु को देखकर रुनझुन भी प्रोत्साहित होती रहती थी कि तभी उसके जीवन में एक बड़ा परिवर्तन आया जो अक्सर लड़कियों की जिंदगी में एक बार होता है हुआ यह कि उसके जीवन में ऋषभ नाम का लड़का कब आकर उसके दिल में अधिकार कर लिया उसे पता ही नहीं चला। ऋषभ का भरा पूरा परिवार देखकर रुनझुन भी कब उसकी ओर आकर्षित हो गई ये तो तब पता चला जब दोनों एक दूसरे को देखे बिना नहीं रह सकते थे। ऋषभ भी रुनझुन से मिलकर बहुत खुश था। दोनों मिलकर साथ सपने देखने लगे, जीने मरने की कसमें खाने लगे। अब रुनझुन पहले से ज्यादा खुश रहने लगी। कभी-कभी मन करता तो वह ऋषभ के घर घूमने चली जाती और अपने परिवार की छवि देखने का प्रयास करती। ऋषभ के घरवाले भी अपने बेटे की खुशी के कारण रुनझुन को पसंद करने लगे। लेकिन ऋषभ गाँव का रहने वाला था और वह ब्रजराज नगर पढ़ाई करने आया था उसका परिवेश गाँव वाला था और रुनझुन एक शहरी लड़की थी।

रुनझुन का व्यक्तित्व एक तरफ सुंदर सुशील और व्यवहार कुशल था , समय परिस्थिति को समझने की गंभीरता थी तो दूसरी तरफ उसके अंदर जवानी की अल्हड़ता के साथ चंचलता भी भरी थी। सिरु ने उसे बड़े लाड़-प्यार से पाल-पोस कर बड़ा किया था। उसके परिवार के बिछड़ जाने के कारण सिरु उसे हर पल खुश रखने का प्रयास करती थी । सिरु जिस तरह अपनी पहचान बनाने के लिए या अपने पैर पर खड़े होने के लिए संघर्ष कर रही थी उसका प्रभाव रुनझुन पर भी पड़ा था रुनझुन भी अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी वह चाहती थी कि उसकी भी एक पहचान बने। वह सिरु की कहानी सिरु की जुबानी कई बार सुन चुकी थी इसलिए वह अपने पैरों पर खड़े होना ज्यादा जरूरी समझती थी। अभी रुनझुन सिरु से ऋषभ के बारे में कोई बात नहीं करना चाहती थी उसने सिरु को कुछ भी नहीं बताया था लेकिन अनुभव भी कोई चीज होती है। सिरू की नजरें भी ताड़ गई थी आखिर जवानी के इस दौर का सामना सिरू भी कर चुकी थी। वह जान बूझकर रुनझुन की हरकतों से अनजान रही वह देखना चाहती थी कि उसे रुनझुन कब बताती है।

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इधर रुनझुन की पढ़ाई भी पूरी हो गई अब तो ऋषभ उस पर शादी के लिए दबाव बनाने लगा लेकिन रुनझुन अभी शादी के लिए तैयार नहीं थी क्योंकि अभी दोनों में से कोई भी अपने पैरों पर खड़ा नहीं था। ऋषभ के आगे रुनझुन मजबूर हो गई और उसे अपने प्यार के बारे में सिरू को बताना पड़ा। सिरु को इस रिश्ते से कोई परेशानी नहीं थी लेकिन वह बहुत चिंतित थी कि दोनों में से कोई भी अपने पैरों पर खड़े नही थे । आखिर इनकी जिंदगी की रेलगाड़ी कैसे चलेगी और दूसरा डर ये भी था कि रुनझुन गाँव के माहौल में रह पाएगी या नहीं। पर ऋषभ की दलील के आगे सिरु को घुटने टेकने पड़े। ऋषभ के द्वारा हर प्रकार की आशा भरी बातें सुनकर सिरु को भी ये लगा कि ये दोनों एक दूजे के लिए ही बने हैं अतः उसे देर नहीं करनी चाहिये। दुल्हन के वेश में बिना दहेज़ के कान्हा धर्मशाला में रुनझुन और ऋषभ का विवाह सादगीपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। पूरा ब्रजराज नगर इस आदर्श विवाह को देखने के लिए उमड़ पड़ा था। बिना दहेज के ऐसा विवाह दहेजलोलुप लोगों के मुँह पर एक करारा तमाचा से कम नहीं था। अब रुनझुन विदा होकर ससुराल चली आई। यहाँ ऋषभ के परिवार वाले सब उसे बहुत प्यार करते थे।

इधर सिरु का रुनझुन की विदाई के बाद से बुरा हाल था वह हर बात में रुनझुन को याद करती और रोती क्योंकि सिरू अब फिर से इस संसार मे अकेली हो गई थी। लेकिन अब सिरु की अलग पहचान बन गई थी जिस सिरू को सन्तोष ने अपने घर से धक्के मार कर निकाला था वही सिरु अब एक आदर्श मां बन गई थी। लोग उसे रुनझुन की मां व एक श्रद्धा की देवी के रूप में देखने लगे। लोग उनका अनुकरण करने लगे। वह ब्रजराजनगर की एक आदर्श नारी के रूप में पहचानी जाने लगी। इसका असर सन्तोष पर भी पड़ा। उसे एहसास हो गया था कि उसने बहुत बड़ी गलती कर दी है। वह सिरु के इस रूप को देखकर दंग रह गया, पश्चाताप की अग्नि में जलने लगा। सत्य बात तो यह है कि जिस दिन से सन्तोष ने सिरु को घर से निकाला था वह शान्ति से कभी नहीं रह पाया। वह सिरु से मिलना चाहता था, उसे अपनाना चाहता था, वह उससे अपने किये गए गलतियों की माफी मांगना चाहता था लेकिन करे तो कैसे। वह दिन रात बस इसी उधेड़बुन में लगा रहता था कि वह कैसे सिरू के पास जाए और अपने किये की माफी मांगे।

अपने समय में वह अवगुणों का बादशाह माना जाता था। अपने समय मे न जाने उसने कितनी लड़कियों को छेड़ा था, न जाने कितनी लड़कियों के साथ बदतमीजी की थी उसमें से एक लड़की थी रीति। रीति के साथ उसने बदतमीजी की थी। रीति आज थानेदार के पद पर थी और संयोगवश उसकी पोस्टिंग ब्रजराज नगर कर दी गई थी। वह अभी तक सन्तोष को भूली नहीं थी। वह पहले ही कसम खा चुकी थी कि वह अपने अपमान का बदला ले कर रहेगी। और समय भी उसका साथ दे रहा था। उसकी बदले की भावना प्रज्ज्वलित हो उठी वह सन्तोष को ढूंढने लगी। दो - तीन दिनों में ही उसका पता चल गया। उसको देखते ही वह अपने थाने में जेल के अंदर डालने के उपाय सोचने लगी। वह दिन भी आ गया जब वह ब्रजराज नगर के कुछ लोगों के लड़ाई-झगड़ों के मामले में सन्तोष को भी जेल आना पड़ा। रीति और क्या चाहती उसे तो बिन मांगें उसकी मुराद पूरी हो रही थी उसने सन्तोष को आड़े हाथों लिया। वह अपने पद का पूरा उपयोग कर रही थी वह उसे इतनी यातना देना चाहती थी कि वह एक लड़की नहीं बल्कि चुन-चुन कर उन सब लड़कियों का बदला लेना चाहती थी जिनके साथ सन्तोष ने बदतमीजी की थी। लेकिन यह क्या रीति जितना अधिक अधिकारों का उपयोग करती वह उतना ही नरम दिखता था इससे पहले की वह अपना बदला लेती सन्तोष स्वयं सिसक-सिसक कर कहता कि मुझे सजा दो मैं गुनाहगार हूँ। रीति सन्तोष के इस व्यवहार पर आश्चर्यचकित थी कि यह वही सन्तोष है जिसकी कभी इस इलाके में तूती बोलती थी। ये वही सन्तोष कुमार है जो कभी लड़कियों को देखते ही बड़ी-बड़ी आँखों से घूरने लगता था और अश्लील गाना गाने लगता था, फब्तियां कसने लगता था। आज रीति के सामने नजरें झुकाये, हाथ जोड़े अपनी गुनाहों की सजा की भीख मांग रहा था। रीति समझ नहीं पा रही थी कि आखिर उसके अंदर यह परिवर्तन आया कैसे? रीति को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे , क्या सजा दे। जब इसमें इतना बड़ा परिवर्तन आ चुका है तो इसे सजा देना उचित है या नहीं, यह तो स्वयं पश्चाताप की अग्नि में जल रहा है। अंत में उसने समझाइश के बाद उसे छोड़ दिया। रीति अब उस पर हर पल नजर रखने लगी। लगातार कई दिनों तक देखने के बाद उसे समझ आ गया था कि वास्तव में सन्तोष कुमार अब बदल गया है। रीति जानना चाहती थी कि उसके अंदर ये बदलाव आया कैसे?

रीति ने सन्तोष के घर के पड़ोसियों से बात की तो मुहल्ले के एक लड़के ने बताया कि-""मैडमजी ये तो बस सिरु से मिलना चाहता है अपने गलतियों की माफी मांगना चाहता है।"

रीति ने पूछा-"सिरु कोन है?

मुहल्ले के लड़के ने बताया-"सन्तोष की पत्नी है।" रीति ने फिर पूछा-कि "आखिर सिरु में ऐसा क्या है जो सन्तोष में ऐसा बदलाव आया , सन्तोष ने ऐसी कौन सी गलती कर दी है जिसकी वह सजा पाने के लिए तड़प रहा है। रीति जल्द से जल्द सन्तोष के बारे में जानना चाहती थी।

उस लड़के ने बताया-"सन्तोष अपनी पत्नी के साथ बहुत बुरा बर्ताव करता था, उसने उसे बहुत दुःख दिया है, उसे जलील करके घर से निकाल दिया है ।लगता है सन्तोष को उसकी पत्नी की आह लग गई । आज वह कैंसर से पीड़ित है वह मरने से पहले अपने किये गये पापों की सजा पाना चाहता है?" रीति ने कहा ये था तो इसी लायक पर फिर उसने सोचा नहीं मुझे सन्तोष की मदद करनी चाहिए। रीति ने थाने में हाजिरी देने के बहाने से उसे थाने बुलवाया और उसे मुखबिर के रूप में काम करने को कहा। अब सन्तोष प्रतिदिन शहर में होनेवाली घटनाओं की जानकारी देने लगा उनके बीच अब आपस में बातचीत होने लगी। एक दिन मजाक में रीति ने पूछा-" तुम शादी क्यों नहीं कर लेते?

सन्तोष-"मैडम मैं शादीशुदा हूँ।"

रीति-"कभी तुम्हारी पत्नी से मिलवाओ।"

पत्नी से मिलने की बात सुनकर सन्तोष का गला भर आया उसने अपनी पत्नी के साथ जैसा व्यवहार किया था सब रीति को बता दिया और कहा-कि "मैं अब जीना नहीं चाहता बस एक ही इच्छा है कि इस संसार से कोई भी बोझ लेकर न जाऊं। बस एक बार सिरू से माफी मांग लूँ।

रीति-"माफी मांगने के लायक तुम हो? तुमने अपने जीवन में लोगों को दुख देने के सिवाए और किया ही क्या है?

सन्तोष-अरे! ये तो मैंने सोचा ही नहीं बस पछतावे की आग में जलता रहा। मैं करूँगा, जरूर करूँगा मैं उसके लिए कुछ भी कर सकता हूँ।

रीति-"तुमने कुछ पढ़ाई-लिखाई की है?"

संतोष-"मैडम मैं पढा-लिखा गंवार हूँ। ग्रेजुएशन की पढ़ाई करके भी मैं अपने घर को नहीं बचा सका।"

रीति-"पुलिस की नौकरी करोगे? देश की रक्षा करोगे? ऐसा अवसर बार-बार नहीं आता।"

सन्तोष-"मेरी ऐसी किस्मत कहाँ की मैं देश के काम आ सकूँ।"

रीति-"बहुत खुशी हुई ये जानकर कि तुम एक अच्छा इंसान बनना चाहते हो, सन्तोष तुम सचमुच सुधर गए हो।

रीति के थोड़े से प्रयास से सन्तोष को पुलिस की नौकरी मिल गई। अब सन्तोष शान्ति का अनुभव कर रहा था। धीरे-धीरे वह रीति के दिल में जगह बना चुका था। रीति के कहने भर की देरी रहती थी वह हर काम करने को तैयार रहता था। वह किसी भी खतरे का सामना करने को तैयार रहता था लेकिन उसके जीवन का एक-एक क्षण कम होता जा रहा था। वह जल्द से जल्द बहुत कुछ कर लेना चाहता था। अब वह भी सिरु की तरह मन्दिर जाने लगा था, भगवान को मानने लगा था, सिरु की तरह शिकायत करने लगा था। भगवान से सिरु के साथ मिलाने की बात कहता था। उसकी बात भी भगवान चुपचाप सुनते रहते थे। अब सन्तोष भी वही बात दुहराने लगा था-"कि भगवान आखिर कब तक मेरी बात नहीं सुनोगे एक न एक दिन आपको मेरी बात सुननी ही पड़ेगी, अगर आज मैं पश्चाताप की अग्नि में जल रहा हूँ तो आपको एक मौका मुझे प्रायश्चित के लिए देना ही होगा।"

इधर रुनझुन ने शादी तो कर ली थी पर थे दोनों बेरोजगार। उनकी तो पढ़ाई ही पूरी हो पाई थी रुनझुन आत्मस्वाभिमानी लड़की थी पैसों के लिए परिवार वालों के आगे हाथ फैलाना उसे अच्छा नहीं लगता था। उसने ऋषभ से कहा-"यहाँ हमारे खाने-पीने की जरूरतें तो पूरी हो जाती है लेकिन हमें पैसों की भी तो जरुरत पड़ती है हम कितने दिन मम्मी- पापा के भरोसे रहेंगे हमें भी कुछ काम करना चाहिए। शादी के बाद 1 साल कैसे गुजर गया पता ही नहीं चल। ऋषभ भी बाहर जा कर पैसे कमाना चाहता था लेकिन उसे नौकरी पसंद नहीं थी वह व्यापार करना चाहता था। उसने अपनी माँ से बाहर जाने की बात कही तो शुरू में तो उसकी माँ ने मना कर दिया पर ऋषभ के जिद के आगे उसे झुकना पड़ा। माँ ने अपने हाथों में पहने हुए सोने के कड़े को निकालकर देते हुए बोली-" ये रख ले तेरे काम आएंगे।" ऋषभ लेना तो नहीं चाहता था किंतु व्यापार करने के लिये पैसों की जरूरत थी सो उसने माँ का आशीर्वाद समझ कर रख लिया। अब दोनों ब्रजराज नगर आ चुके थे। रुनझुन ने सिरु से अपने आने का कारण बताया ।ऋषभ ने माँ के द्वारा दिये गये कड़े बेचकर छोटी सी किराने की दुकान खोल ली। उसका दुकान चल निकला। रुनझुन नौकरी करना चाहती थी उसे शुरू से ही नौकरी पसन्द था वह भी नौकरी के लिये अपना हाथ-पाँव मारने लगी। बचपन में वह कई बार चोर-पुलिस का खेल खेलती जिसमें वह हमेशा पुलिस बनती थी। उसे पुलिस बनना अच्छा लगता था। कुछ दिनों बाद ब्रजराज नगर में महिला पुलिस की भर्ती की नौकरी निकली। रुनझुन का सपना जाग उठा जो कि मन के कोने में सुप्तावस्था में पड़ा हुआ था। उसने तैयारी शुरू कर दी। शारीरिक गठन ठीक होने के साथ-साथ वह होशियार भी थी। तकदीर ने उसका साथ दिया और उसे भी ब्रजराज नगर में पुलिस की नौकरी मिल गई। जब यहाँ थाने में आई तो रुनझुन की मुलाकात रीति से हुई। रुनझुन का व्यवहार मिलनसार होने के कारण बहुत जल्दी ही वह रीति से घुल-मिल गई।

और वहीं रीति के मुँह से बार-बार सन्तोष का नाम सुनकर वह सोचने लगी कहीं यह वही सन्तोष तो नहीं जिसके बारे में सिरु बताया करती थी। उसे ज्यादा देर तक संशय में नहीं रहना पड़ा। रीति ने स्वयं ही सारी बात रुनझुन को बता दिया। रुनझुन सिरु के दुःख को जानती थी क्योंकि वह सिरु के साथ रह रही थी। लेकिन अब सन्तोष को देखकर उसे आश्चर्य हो रहा था वह उसके इस रूप और उसकी बीमारी के बारे में जानकर सन्तोष के प्रति दया उमड़ रहा था। वह सोचने लगी अब जो भी हो इन्हें एक करना होगा सिरु तो जानती भी नहीं होगी कि सन्तोष कहाँ है और उसकी क्या हालत है? इधर सन्तोष सिरू से मिलने के लिए तड़प रहा था कहते हैं कि जब खुद में लगन हो तो सारी कायनात उसे मिलाने में जुट जाती है । यहाँ भी सन्तोष के साथ यही हो रहा था। सन्तोष अच्छा काम कर रहा था इसलिए सभी कड़ियां जो अलग हो गई थीं एक-एक करके जुड़ती जा रही थी। रीति जो उससे बदला लेना चाहती थी सन्तोष के इस बदले व्यवहार को देखकर अपना इरादा बदल चुकी थी। रुनझुन जिसने सिरू से उसके बारे में जाना था वह तो सन्तोष के इस रूप को देखकर सोच में पड़ गई थी। रुनझुन अब घर में जान-बूझकर सन्तोष की अच्छी बातें बढ़ा-चढ़ा कर बताने लगी पर सन्तोष का नाम नहीं बताया। उसे एक पुलिस वाला कहकर संबोधित करती। धीरे-धीरे सिरू भी अब उस पुलिस वाले के बारे में सुन-सुन कर उससे परिचित हो गई थी यह बिना जाने की यह वही सन्तोष है जिसने कभी उसे घर से निकाला था। अब सिरू को प्रतिदिन रुनझुन का इंतजार रहता कि वह आएगी और कुछ न कुछ अच्छी बातें उस पुलिस वाले के बारे में बतायेगी। रूनझुन प्रतिदिन बताती भी थी अब धीरे-धीरे सिरू के मन में उस पुलिस वाले के प्रति खास इज्जत बन गई थी। रुनझुन ने अब तक घर में सन्तोष के बारे में अपने पति ऋषभ को भी नहीं बताया था। पता नहीं ऋषभ की क्या प्रतिक्रिया हो लेकिन अब सन्तोष घर के सदस्यों के दिल में अपनी जगह बना चुका था। रुनझुन को अब लगने लगा कि ऋषभ को बता देना चाहिये। और जब उसने सन्तोष के बारे में ऋषभ को बताया तो ऋषभ भी सुनकर आश्चर्य चकित रह गया। ऋषभ ने रुनझुन से कहा कि यदि अब सन्तोष सुधर गया है और बीमारी के कारण समय भी कम है तो वास्तव में इन्हें मिला देना चाहिए। 15 अगस्त का समय नजदीक आ रहा था, सन्तोष कम समय में ही अपने कार्यों में उत्कृष्ट प्रदर्शन के कारण उसका नाम भी पुरस्कार प्राप्त करने वालों की सूची में था। महिला पुलिसकर्मी में रीति और रुनझुन का नाम भी था। रुनझुन 15 अगस्त में सिरू को अपने साथ ले जाने के लिए तैयार कर ली थी। दरअसल स्वयं सिरू भी उस पुलिस वाले से मिलने के लिए बहुत उत्सुक थी। ब्रजराज नगर को 15 अगस्त के दिन दुल्हन की तरह सजाया गया था। पूरा नगर , देशभक्तिमय हो गया था । चारों तरफ देशभक्ति के गीत गूँज रहे थे। ऐसा लग रहा था कि पूरा नगर देश पर मर मिटने को तैयार है। पुलिस ग्राउंड में कार्यक्रम होना था। पुलिस वालों की परेड देखने लायक थी। पुलिस वाले अपने - अपने तरीके से भारत की शक्ति का प्रदर्शन कर रहे थे। मुख्यमंत्री की उपस्थिति में यह कार्य सम्पन्न हो रहा था, साथ में वही के विधायक जी भी मौजूद थे। मुख्यमंत्री जी स्वतंत्रता दिवस पर भाषण प्रस्तुत कर रहे थे और सभी सेनाओं को देश की रक्षा करने पर प्रोत्साहित कर रहे थे तथा यह बात भी बखूबी बता रहे थे कि हमारी भारत की सेना बार्डर पर किस तरह से हमारे देश की सुरक्षा के लिए दिन-रात तैनात रहती है। और तभी न जाने एक नक्सलवादी कहाँ से घुस आया और मुख्यमंत्री जी पर अपना हथियार तान दिया और अपने साथियों को आवाज देने लगा देखते-देखते उनकी संख्या 5 हो गई। उपस्थित लोग थर -थर कांपने लगे। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें। वह नक्सलवादी एक हाथ से हथियार ताने मुख्यमंत्री जी को कवर किये था , दूसरे हाथ से उसने माईक ले लिया और देश की सरकार तथा मुख्यमंत्री के खिलाफ बोलने लगा। जनसमूह उसकी बात क्या सुनते सब भय और आतंक की मूर्ति बन कर खड़े थे। उसी समय सन्तोष ने सोचा यही वह समय है कि कुछ कर जाऊं, अभी नहीं तो कभी नहीं। व्यक्ति डर के कारण ही हमेशा हार जाता है अन्यथा डर के आगे तो जीत बसती है। सन्तोष के आगे पीछे कोई नहीं था उसे किसी बात की चिंता नहीं थी । वह मुख्यमंत्री जी को नक्सलवादियों से छुड़ाने के उपाय सोचने लगा। सर्वप्रथम उसने नक्सलियों का ध्यान भटकाने के लिये एक गोली ऐसे ही हवा में फायर की। पांचों नक्सली एक साथ जिधर से गोली की आवाज आई उधर देखने लगे और हथियार तान दिया। गुस्से में चिल्लाने लगे-"जान प्यारी नहीं है क्या? रीति और रुनझुन ने भी सन्तोष को गोली चलाते देख लिया था अब तक वे भी सँभल चुके थे। अब उनका दिमाग भी तेजी से काम करने लगा था। पांचों नक्सलवादी सन्तोष के पास आ गए और मुख्यमंत्री जी को भी घसीटते हुए लाए। मुख्यमंत्री जी ने सन्तोष को चिल्लाते हुए कहा-"भले इनकी गोलियां खाना है पर इनके आगे सर नहीं झुकाना है।" इतना कहते ही नक्सलवादी ने मुख्यमंत्री के घुटने पर एक गोली चला दी। गोली चलते ही न जाने सन्तोष को क्या सूझा कि उसने भी उस नक्सलवादी पर भी गोली चला दी। नक्सलवादी इस हमले के लिए तैयार नहीं थे वे समझ रहे थे कि दहशत से जनता डर जायेगी पर ऐसा नहीं हुआ।

रीति व रुनझुन भी तैयार थे उन्होंने भी नक्सलियों पर दो-दो गोलियां चलाई जो किसी के पैर पर लगा तो किसी की पीठ पर। दो नक्सलवादी हथियार से डराकर भागने का प्रयास कर रहे थे कि जनसमूह उन पर पत्थर फेंकने लगे। तभी भागते नक्सली को ऋषभ ने दौड़ कर दबोच लिया व दूसरे को रीति व रुनझुन ने। सन्तोष ने एक को पहले से ही पकड़ रखा था। ये घटना आधे घंटे के अंदर ही घटित हो गया। सब बदहवास से दिख रहे थे किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। तभी जनसमूह में से किसी ने एम्बुलेंस 108 को फोन कर दिया था। पुलिस फोर्स भी आ चुकी थी मुख्यमंत्री जी को अस्पताल पहुँचाया गया। नक्सली पकड़े जा चुके थे। जनसमूह सन्तोष जिन्दाबाद के नारे लगा रही थी और पुलिसवाले उसे अपने कंधे पर उठा रखे थे। उस समय सन्तोष अपने आप में शांति का अनुभव कर रहा था। इन सबसे अलग अगर किसी के मन में हलचल था तो वह थी सिरू। सिरू सन्तोष कुमार को देख चुकी थी, जान चुकी थी, समझ चुकी थी। वह रुनझुन की बातों से यह जान चुकी थी कि प्रतिदिन रुनझुन इसी पुलिसवाले के बारे में बताया करती थी।

उसे रह-रहकर पुरानी बातें याद आने लगी आँख से अश्रु की धारा बहने लगी। वह तुरंत उसी मन्दिर पर पहुंची और भगवान के सम्मुख खड़ी हो गई और भगवान को एकटक देखने लगी। ऐसा लग रहा था मानो भगवान स्वयं कह रहे हों कि क्या अब भी सन्तोष कुमार को माफ नहीं करोगी सिरू? तभी वहाँ सन्तोष कुमार भी आ पहुंचा और भगवान के सम्मुख हाथ जोड़े एकटक देखने लगा और भगवान से कहने लगा प्रभु-"आपने मेरे सारे अरमान पूरे कर दिए बस एक अंतिम इच्छा है कि एक बार सिरू से मिलवा दो । मैं उससे माफी मांग लूँ उसके बाद यदि मर भी जाऊं तो कोई गम नहीं।" सिरू ने जैसे ही अपना नाम सुना तो वह पीछे मुड़कर देखने लगी । सन्तोष कुमार खड़ा था। समझ में नहीं आ रहा था दोनों बहुत देर तक एक दूसरे को देखते रहे। सन्तोष ने भगवान को साक्षी मानकर अपने द्वारा किये गए व्यवहार पर माफी मांगी। माफ तो सिरू ने उस पुलिस वाले को उसी दिन कर दिया था जब वह रुनझुन से उसके बारे में सुनती थी। दोनों एक दूसरे से लिपट गए। लिपट कर दो आत्मा एक हो गई। आज भगवान ने दोनों की सुन ली थी। सावन का महीना था पानी जोर से बरस रहा था शायद उन दोनों के मिलने की खुशी में। सिरू को उसका जीवनसाथी मिल गया था और सन्तोष की जीने की इच्छा बलवती हो उठी थी।

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लेखिका

डॉ (श्रीमती) ललिता यादव

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