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काव्य संकलन "अपने पलों के अंतरिक्ष में" // शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव

 

     अपने पलों के अंतरिक्ष में
               1.
प्रिये ! प्राणाधिके !
आओ कुछ पल बैठें
कुछ बातें करें
बड़ी मुश्किल से मिले हैं ये पल
जीवन की उमस से छिटक कर.

आओ, कुछ अपने में
कुछ अपना-सा हो लें
संवेदना के परमाणुओं से
अपने पोरों को तर कर लें.

पृथ्वी के अंतरिक्ष में
हमने बहुत दौड़ लगा ली
दृश्य के पोरों को भेद कर
दृश्य के आकाश की थाह ले ली.

आओ, कुछ अपने ही भीतर के
अपने ही पलों के अंतरिक्ष में
प्रवेश करने के लिए
कुछ सूक्ष्म हो लें
फिर कोई पल मिले न मिले.

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जीवन की त्वरा में
फिर कभी थिर हों न हों
आओ,
समय की इस गति में
थोड़ा थिर हो लें.

कब तक टॅंगे रहेंगे
सृष्ट के इन रंध्रों में
अस्तित्व की घिसती प्रतीति के लिए.
             
आओ कुछ पल बैठें
और
इस प्रतीति को अनुभूति में सरकाएं
अनुभूति की करुणा से
भींग जाएं.

आओ बैठें
कुछ मौन साधें
ताकि हमारे पोर पोर में
निःशब्द की संवेदना
पुर जाए.
                                                    
                  2.
प्रिये !
ऐसा नहीं है कि
हम संवेदनशील नहीं हैं
पर हमारी संवेदनशीलता
सिमटी है, सहमी है.
यह
अपने सीमित आयामों में ही
पलती बढ़ती, करुण होती
जीवन के संघर्षों की मार से
भोथरी हो चली है.                                                      

जीवन की आपा धापी में
हम इसके फैलाव को ही
देखते रहे
उसी से जूझते रहे
और यह जूझ
इतनी सघन थी
कि हमें पता ही न चला
समय की नदी में
जीवन की कितनी ही लहरें
उठीं गिरीं और तिरोहित गईं.

अभी जब
हमारी ऑखें खुलीं हैं
अचानक
किसी बोध से सिहर कर
हमने कुछ पल छीने हैं
काल के प्रवाह से.

अभी हमें लगता है
हम अपने में हैं अपना होकर
हमारे होने में
अस्तित्व की कलियॉं
खिलने को हैं.

आओ, कुछ पल बैठें
कुछ और अपना हो लें.
                          
                 3.
केवल सोच लेने भर से
अथवा इरादा कर लेने भर से
हम अपना हो सकेंगे  
ऐसा नहीं लगता 
समझता भी नहीं मैं ऐसा.
 
अब देखो
हमें मौन और शांत बैठे
यहॉं कई पल बीत गए 
पर मैं अनुभव करता हूं
मेरी देह के आपाद परमाणुओं में
कोई लय नहीं सध रही
तेरे चेहरे पर खिंची
तेरी प्रतीतियों की लकीरों में भी
यही पढ़ रहा हूं मैं
मन में स्थिरता सधे बिना
हम अपना हो सकेंगे
मुझे नहीं लगता.

हमारे जीवन की शैली
कुछ ऐसी बन गई है कि
किसी बिंदु पर
कुछ पल ठहर लेने 
कुछ पल टिक रहने में
हमें उलझन महसूस होती है
उस बिंदु से जुड़ना
हमसे नहीं हो पाता.

एक पल इधर दृष्ट फेरो
देखो, उस बड़े गड्ढे में
पुरइन के पत्तों पर
प्रकृति विहॅंस रही है
कुमुदनी की उदग्र
कुछ बंद कुछ खुली पंखुरियों में
वह इठला बलखा रही है
मंद मंद बहता समीर भी
कैसे पुष्प-नाल से खेल रहा है
आस पास की लहरती हरियाली
नीले आकाश से
मानो मेल मिलाप कर रही है
उसमें सर उठाए कुछ पौधे
अपनी पत्तियों की तूलिका से
छितिज पर चित्रकारी कर रहे हैं.
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पर देखो न 
मन को लुभाता
यह अपना सा लगता दृश्य
लौ भर की दूरी पर होकर भी
कितनी दूर है हमसे 
जी करता है
हम झूमे, नाचें
हम वही होकर अपना हो लें
वह हमारी ही प्रकृति का
हिस्सा जो है
पर तनावों से भरा यह परिमंडल
हमें सरल होने नहीं देता.

प्रिये!
आओ कुछ पल ठहरें
अपने चित्त के आकाश में
लरजते अपद्रव्यों को
ध्यान से देखें, परखें
और बोध में ले लें.

                4.          
इसका बोध तुम्हें भी है कि
जीवन की उमस में
असबस होते रहकर भी
एक दूसरे को समझने की
हमारी समझ में
कभी व्यतिक्रम नहीं हुआ.

बीमारियॉं आईं
आर्थिक थपेड़े झेलने पड़े
कुछ उलझनों ने
हमारे बीच दरारें भी डालीं
हमारी अलग जीवन शैलियों ने
हमें किनारों पर डाल दिया
पर जीवन-प्रवाह की प्रचंड धाराओं की
अलग अलग चोटें सहते भी
परस्पर समझने की अपनी समझ को
हमने न टूटने दिया न बिखरने.

इस समझ से
अणुओं के अंतरस्थ आकाश की
दूरी पर स्थित
विकर्षण के तनावों को झेलते हमने 
अपने भीतर की
और एक दूसरे के भीतर की भी
करुणा को समझा.

मेरे अंतर्मन को समझकर
तुम्हारी करुणा ने
मेरे प्रति तुम्हारे बोध को
किस तरह कितना भिंगोया
मैं नहीं जानता, पर
तुम्हारे अस्तित्व की तरंगों में मैं
कुछ विधायी अवश्य अनुभव करता हूं
हॉं तुम्हारे अस्तित्वगत बोध से
मेरी करुणा
मेरे पोर पोर में जाग गई है
अणुओं के अंतराकाश के
तनाव का अवबोध
अब संसक्ति का बोध हो गया है.

फिर भी
समय के अपद्रव्यों ने
अभी हमें अपना नहीं होने दिया है
आओ, कुछ पल
समय के प्रवाह में तिरें
कुछ अपना हो लें.

                 5.
जब तुम मेरे ऑंगन में
फूल के जैसे खिली थी
मेरे अधर आतुर हो उठे थे
तेरी पंखुरियों को छूने को.
उस क्षण भर की छुअन ने
मुझे क्या दिया
उसे किस तरह कहूं
वह एक अतिंद्रिय बोध था
उस बोध में मेरी जानी अजानी
सारी ग्रंथियॉं तिरोहित हो गई थीं
क्षण भर के लिए
बस एक ही सूत्र था सुषुम्ना-सा
जिसमें सुमधुर किरणें-विकिरणें
गुंथी थीं
एक अद्भुत अनुभूति के
उद्बोध से, उस दिन
कदाचित एक क्षण के लिए
मैं अपने में, अपने को लिए
अपना हो सका था.

वह क्षणस्थायी
मेरी अतींद्रिय अनुभूति 
जब किसीके टोकने से टूटी
मैंने महसूस किया
मेरे रोमों में
अभी भी कुछ स्फुरित हो रहा है
तुम्हारे मुखमंडल पर भी
कुछ मौन मुखर है, और
तुम्हारे अधरों, कपोलों तथा
ऑखों में खेल रहा है.

आज तुम भी
कभी कभी फूट पड़ती हो
मैं भी अनुभव करता हूं
वह छूटा क्षण
फिर हमारी पकड़ में
कभी नहीं आया
समय की उड़ती खेहों ने
हमारी ऑंखों में किरकिरी भर दी
मन में खिन्नता
भरती चली गई
अपने अस्तित्व के संघर्ष में
हम इस कदर डूबे कि
अपने होने की अंतश्चेतना में
होने की कला से ही
विमुख हो गए.

आओ,
फिर से अपने होने के योग में
लग जाएं, और
पल पल का बोध लिए
हर पल को जीएं.
  
                   6.
वे थोड़े से जिए पल
आज फिर स्मरण हो आए हैं.
उस दिन
पलक भर के लिए
हमारी ईर्ष्याएँ
तिरोहित सी हो गईं थीं
कुछ पल के लिए
न तुम थीं न मैं
किसी की चुटकी से सिहर
जब मैं अपने में हुआ
लगा जैसे क्षितिज पर पसरी
चॉंदनी को
मैंने ऑंखों में डुबो दिया.


समय की गति
जैसे ठहर गई थी उस दिन
मेरी ऑंखों में
प्रेम के अॅंखुए उग आए थे
परिवेश की आहटों से विमुख
मैं विभोर हो गया था
अचानक मेरी ऑंखों में
समय जागा और
उस अतिंद्रिय अनुभूति को
मैंने खो दिया.

समय बीतने लगा
हवा में उड़ती खेहों की
उसपर परतें जमने लगीं
उलझन और तनाव
हमें जकड़ने लगे
और एक दिन हमारी जिंदगी
उमस से भर गई
हमारे मन
दुरूह घड़ियों में तपने लगे
किंतु जिंदगी की त्वरा कम नहीं हुई.

ये घड़ियॉं
बड़ी मुश्किल से हाथ लगी हैं
आओ इन घड़ियों को
भरपूर जिएं
कुछ पल के लिए
इन घड़ियों का ही हो लें.
               7.
उस दिन तुम्हारी कोख से
जब एक कली खिली
कोमल गोलमटोल
मार्च के अपराह्न का सूरज
गोधूली बेला की ओर अग्रसर था.

स्यात उसकी चाह थी
  कली के गिर्द की उष्मा
  कोख की उष्मा के समतुल रहे
  वह लोक की उष्मा भी झेल सके
  यह उसकी अंतःप्रकृति
  यह उसका स्वभाव भी है
  मेरे जाने.

डस क्षण
  जब तुम लेबर रूम से निकली
  तुम मेरी दृष्टि के पथ में थी
  तुम्हें देख मैंने अनुभव किया
  जहॉं आकाश इतना करुण है
  कोई विषाद जैसे तिर रहा है
  तुम्हारे चेहरे पर
  एक अपराधबोध-सा.

उसका हेतु क्या है
  अभी उसे समझ ही रहा था कि
  तुम्हारा विषाद मुखर हो उठा
  उदास, विषण्ण भाव से पूरित-
  ‘‘खेद, मैं आपको पुत्र नहीं दे पाई’’
  फिर तुम्हारी ऑंखें मुंदीं और
  एक मौन उतर आया
  तुम्हारे चेहरे पर.

तुम्हारे उस विगलित स्वर में
  जमाने का दंश था-
  ‘पुत्री’?
  पुत्री तो बोझस्वरूप है’’.

तुम्हारी वाणी में भासमान
  उस दर्द को
  मैंने समझा और गुना
  पर सच कहता हूं मेरे मन में
  कोई प्रतिक्रिया नहीं जगी
  उस क्षण
  न अनुकूल न प्रतिकूल
  तत्समय की हवा में तिरते
  उस दंश से
  मैं संवेदित अवश्य था
  पर मेरा मन
  आप्रवह संस्कार से आपूरित था
  पिता का उदाहरण सामने था
  मेरे लिए पुत्र पुत्री दोनों
  एक ही वृंत पर
  प्रकृति के एक ही आपूरण से खिले
  पुष्प-से थे
  और हैं भी.

मेरी प्रतिक्रियाविरत उस चुप्पी में
  करुणा से तरंगायित
  मेरे अंतर्मन को
  शायद तुम्हारे अंतर्मन ने समझा
  और हम दोनों ने
  उस कली को
  जतन से पाला, पोषा, खिलाया.
  आज फूल बन गई वह कली
  अपने पैरों के बल खड़ी है
  और अपना फूल सॅंवार रही है.

मैं समझता हूं
  इस क्षण इस चर्चा से
  तुम्हारा मन प्रश्नाकुल हो रहा होगा
  यह प्रसंग कैसे उभर आया
  अचानक?
  इससे पहले 
  जितनी भी अभिव्यक्तियॉं
  तुम्हारे प्रति मैंने कीं
  तुम बस उन्हें पीती रहीं
  मेरे हृदय से फूटी उस अंतर्धारा में
  अस्तित्व की स्रोतस्थ धारा से
  सम होने की ललक थी.

‘‘किंतु यह प्रसंग तो
  लोक की सीमा में है’’.

प्रिये!
  निस्संदेह इस प्रसंग की
  एक सीमा है
  पर यही सीमा हमारी समाई है
  उस सीमा को जिए बिना
  जीवन की लहरें
  अस्तित्व के विरल तट को
  नहीं छूती
  सीमा का स्मरण ही
  सीमा से पार हो जाना है स्यात.

इस प्रसंग का स्मरण
  न अनहोना है न अप्रत्याशित
  तुमने अक्सर मुझें
  उधेड़बुन में पड़ते देखा होगा
  मेरे ये उधेड़बुन
  कभी मेरे तनावों में होने
  कभी तनावों को घुलाने
  और कभी
  मेरे सृजनशीलता में होने के क्षणों के
  बाह्य प्रतिफलन होते थे
  आज भी हैं
  लोक की समाई में
  लोक के ढंग से जीने में
  लोक के उपद्रवों को तो
  झेलना ही होता है
  यह प्रसंग
  लोक का एक उपद्रव ही है
  आज के संदर्भ में.

इस फलक का रूप
  अब और व्यापक, विकृत हो गया है
  तब बेटियों को
  झेलना होता था यह दंश
  अब उन्हें घायल होना पड़ रहा है
  असुरक्षा के डंक स भी.
  इस स्मरण से
  मैं चाहता हूं टटोलना
  अपने निविड़ मन-अंतर को
  जो समाज के सोच से
  अनुकंपित और प्रक्षुब्ध हैं

समाज के सोच में संवेदन है
  पर विचार उलझे हैं, अस्थिर हैं
  संवेदना अंतर को करुण करती है
  और विचारों का उलझाव बेचैन
  बिचारों में परंपरित जड़ता है
  तो प्रगति का खुला आकाश भी
  पर मेरे देखे इनमें
  दोनों का अधूरापन ही
  अधिक मुखर है
  स्यात इसीलिए
  जब कोई घटना घट जाती है
  विरोध उन्माद की हदें लॉंघ जाता है
  किंतु समय बीतने के साथ
  जनाक्रोश और जनावेश का ज्वार
  समस्या के हल का दायित्व
  किनारों को सौंप
  यथास्थिति को प्राप्त हो लेता है.

आज आदमी का व्यक्तित्व
  खंडित है
  जहॉं समस्या की जड़ समाज में हो
  खंडित व्यक्तित्व का खंड चिंतन
  और क्या कर सकेगा.

--

शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव

गोरखपुर.

ई-मेल  sheshnath250@gmail.com

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