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उलझन // अविनाश तिवारी की कविताएँ

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उलझन
★★★★★★★★★★★★★★

मन मेरे बेचैन क्यूँ तू ,मंज़िल तेरी दूर नहीं।
क्यों भटके तू मोहजाल में, मंज़िल तेरी ये तो नहीं।

क्यों विकलित सा  सिमटा बैठा
छूने को आकाश है।
विस्तारित तेरी सम्भावना फलक में दिखा उजास है।

ये भटकन उलझन है तेरी बन्धन सारे तोड़ दो,
दिल की गहराई में झांक के देखो
अब सारे राज खोल दो।

जब हार मिले कहीं तू खोल विजय का द्वार
व्यथित हो न बैठ कभी
मानना न कभी हार।

असफलता से सीख लो सफलता की राह को
मन आस रखो तुम बुझने न दो
उज्ज्वलता की चाह को

होगी तेरी जयश्री सदा इरादे को  मजबूत करो
किन्तु परन्तु से हटकर विश्वास  की धीर रखो
वही छूता बुलन्दी जिसका अटल
विश्वास हो,
पाने को धरती और छूना आकाश हो।

@अवि
अविनाश तिवारी
अमोरा
जांजगीर चाम्पा

मेरी छुटकी
★★★★★★★★

छुटकी मेरी बड़ी होने लगी है,
  नसीहतें मुझे  अब देने लगी है।

कल तक कहती चॉकलेट लाना
अब लेपटॉप की डिमांड करने लगी है।

पुस्तक के पन्ने पलट के कहती
याद हो गयी अब मैं हूँ सोती,
वही मोबाइल से चिपकने लगी है
सेल्फी खींच के मुंह बिचकाने लगी है।

छुटकी मेरी बड़ी होने लगी है।
कपड़े मेरे प्रेस करकर वह कहती
साफ कपड़े पापा रखते नहीं है
आदत पापा की बिगड़ने लगी है।
मेरी नकचढ़ी बड़ी होने लगी है।

कभी कहती पापा कुछ ले के आना
आज वो कहती पापा टाइम से खाना,
खिलौनों को जमा के अब रखने लगी है
बिट्टी मेरी बड़ी होने लगी है।

कभी मुझसे लड़ती कभी है झगड़ती
मेरी नानी सी मुझको लगने लगी है
मेरी नकचढ़ी बड़ी होने लगी है।

संस्कारों से सजी मेरी बिट्टी
घर के आंगन में महकनी लगी है
बिट्टी से रौशन गुलिस्ता हमारा
चिड़िया सी बिट्टी चहकने लगी है।
@अवि
अविनाश तिवारी
अमोरा
जांजगीर चाम्पा


याराना
★★★★★★★★★

ये उन दिनों की बात है,
जब सैर सपाटे चलते थे।
एक थाली में बैठ के यार,
मज़े से दाना चुगते थे।।
अलबेला था तब रंग हमारा,
मस्तानों की थी टोली।
हुड़दंगी में भी पीछे न थे,
पर कहते प्रेम की बोली।।
तेरा मेरा कुछ नहीं वहां पर,
बस प्यार बसाए रखते।
यारों के यार हम हैं ,
तुम्हें दिलों में बसाए रखते।।
धूम धड़ाके मस्त ठहाके
चौपालों में लगते थे।
यारा अपनी यारी को
लोग बड़े तरसते थे।
कपड़े बदल के पहनते
नई शर्ट उड़ा ले जाते थे
तेरे जूते फाड़ के रौब से लौटाते थे।
एक सुरों में गाना गाते नित नए तराना।
आओ बैठे साथ में फिर से
बन जाये फिर याराना।।
@अवि
अविनाश तिवारी
अमोरा
जांजगीर चाम्पा


  लोकतंत्र की जय

ये लोकतंत्र है अमरबुटी
जन जन इसमें समाते हैं,

जो राज करे जन के हृदय में
ताज उसे ही पहनाते हैं।

छद्मवेश धर कोई भरम न
फैला पायेगा,
आज घिरा तमस कल अंधकार
छट जाएगा,

दल दल के चक्कर में फंसकर
सौहार्द न हम अपना भूलें,

लोकतंत्र की सफल बनायें
अपना भाईचारा न छोड़ें।

आओ मिलकर साथ चलें
जीवन खुशी से बिताएं
प्रजातन्त्र की खुशियों से
देश की बगिया महकाएं।
@अवि
अविनाश तिवारी


दोहा
★★★★★★★★★

सत्य आचरण धर्म तत्व है ,
प्रेम मानस का सार।
लाख छुपाय छिप न सके,
असत्य की होत हार ।।

घट घट ईश्वर वास है,
खोजत चहुँ दिश नैन।
हरि मिले दीन कुटी में,
भजते गुण दिन रैन।।

राधा नाची बंशी धुन,
गोपी श्याम नचाय।
शबरी के जूठे बेर,
प्रेम बस राम खाय।।

करनी आप सँवारिये,
दोष न पर में डाल।
हम चलें नेक राह पर,
बदल न अपने चाल।
@अवि
अविनाश तिवारी
अमोरा
जांजगीर चाम्पा

मां
★★★★★★★★★★★
मां मंदिर की आरती,मस्जिद की अजान है।
मां वेदों की मूल ऋचाएं, बाइबिल और कुरान है।

मां है मरियम मेरी जैसी,
मां में दिखे खुदाई है।
मां में नूर ईश्वर का
रब ही मां में समाई है।

मां आंगन की तुलसी जैसी
सुन्दर इक पुरवाई है।
मां त्याग की मूरत जैसी
मां ही पन्ना धाई है।।

मां ही आदि शक्ति भवानी
सृष्टि की श्रोत है
मां ग्रन्थों की मूल आत्मा
गीता की श्लोक है।

मां नदिया का निर्मल पानी
पर्वत की ऊंचाई है
मां में बसे हैं काशी गंगा,
मन की ये गहराई है।

मां ही मेरा धर्म है समझो
मां ही चारों धाम है।
मां चन्दा की शीतल चाँदनी
ईश्वर का वरदान है।
@अवि
अविनाश तिवारी
अमोरा
जांजगीर चाम्पा

जीवन सत्य
☆★★★☆★☆★★★★☆

मन के आईने में झांक
       बिखरे पन्ने समेट रही है।
क्या खोया क्या पाया
भंवर में खो रही है।
अनजानी सपनों ने नींदे तोड़ दी है
#आज फिर गुलमोहर ने अर्जी दी है।

समय का घोड़ा अपने पथ में दौड़ा
रिश्ते नातों ने साथ भी छोड़ा
खाएं कसमे वादे वफ़ा की
जख्मों को उसने हवा दी है, #आज फिर गुलमोहर ने अर्जी दी है।

बचपन बीता जवानी आई
उनींदें स्वप्न ने रैन चुराई
सफेदी ने कनखियों से दस्तक दी है।
#आज फिर गुलमोहर ने अर्जी दी है।

बासन्ती ये चित बासन्ती है भेष
मन मयूर नाचे होके बैचैन,
उन्मुक्त गगन ने हलचल सी दी है।
#आज फिर गुलमोहर ने अर्जी दी है।

गन्तव्य का प्रस्थान ये आवागमन
बन्ध खुल ही जाएँ कहे अन्तर्मन
काल खड़ी बाँह फैलाते
जीवन ने अंतिम प्रहर दी है,
#आज फिर गुलमोहर ने अर्जी दी है।।
@अविनाश तिवारी
अमोरा
जांजगीर चाम्पा


विदूषक
★★★★★★★★★★★

रंगमंच है ये दुनिया और हम विदूषक हैं।
रंग बदलती दुनिया के बहूरुपये जोकर हैं।।


जीवन क्षण भंगुर हमें अगले पल का भान नहीं।
जोड़ लिया सात पीढ़ी का धन
परम् सत्य का ज्ञान नहीं।

कुछ विदूषक हृदय तलों से दिल मे बस जाते हैं।
गम को छुपाये सीने में चेहरे में हंसी लाते हैं।

घर घर में आज विदूषक
    छद्म वेश में बैठे हैं।
निहित स्वार्थ में बैठकर सारे
    मुखौटों में छुपे हैं।

नाट्य रूप में मसखरे चुपके से कह जाते हैं।
स्वांग भरे जीवन के राज खोल
जाते हैं।

पर्दे के पीछे जाने कितने विदूषक बन घूम रहे ।
कुछ पापी पेट के मारे कुछ
पेट के पापी जूझ रहे।

बहुरूपिया हम भी बने है
  जीवन के हैं ये रंग।
क्या सच्चा क्या झूठा
अजब दुनिया के ढंग।।


@अवि
अविनाश तिवारी
अमोरा
जांजगीर चाम्पा

ममता
☆★☆★☆★☆★

मूरत तेरी क्या बनाऊं
ममता की तू सागर है,
तूने सारा जगत बनाया
दया प्रेंम की गागर है।
शब्दों से बयाँ क्या होगा
जिसने ममता से है रोपा,
अंकुरित बीज बना एक पौधा
माँ ने इसे अपने रक्त से है सींचा।

मैं सोता तू जगती मैं रोता तू रोती
सुखा बिस्तर मेरा तू गीली पर सोती
कितनी रातें तू जागी मुझको मीठी नींद दिलाके,
तेरा कर्ज क्या चुकाएं तू हमसे क्या चाहे।
हो सके माँ तो रब से इतना चाहूं,
हर जन्म में तेरी कोख से जन्म लेके आउँ
तेरा अक्स हृदय में इस तरह समाया है।
ईश्वर से पहले तेरा सुमिरन लबों पे मेरा आया है ।।          

@अविनाश तिवारी
अमोरा
जांजगीर चाम्पा

सलाम मेरीकॉम
☆★★★★★★★★

पंच से अपने कमाल कर दिया
मेरीकॉम आपने देश का नाम कर दिया।

नारी की महिमा को नाम दे दिया
35 की उम्र को भी मात दे दिया
मेडल स्वर्ण देश के नाम कर दिया।।


बच्चों को भी पाला मां का फर्ज भी निभाया।
तेरी दृढ़ शक्ति से इतिहास बन गया
मेरीकॉम आपने कमाल कर दिया।।

महिला सशक्ति की पहचान बन गयी,
उम्मीदों के हौसलों की उड़ान बन गयी,
औरत के जीवन का नया नाम दे दिया
मेरीकॉम तूने कमाल कर दिया।।
@अवि
अविनाश तिवारी
अमोरा जांजगीर चाम्पा

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