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कहानी // बाढ़ – सुधीर ओखदे

जब राष्ट्रीय समाचारों में उनके क्षेत्र को बाढ़-पीड़ित घोषित कर दिया गया तो वे अचानक चौंक पड़े।

उन्होंने अपनी खिड़की से बाहर का नजारा देखा। कहीं तो बाढ़ नहीं थी। हाँ! पिछले कई दिनों से तेज बारिश का सौंदर्य वे महसूस कर रहे थे। पहली बारिश में पत्नी सहित भीगने का आनंद भी लिया था। दो-एक कविताओं की बुद्धिवादी परम्परा को आगे बढ़ाने की असफल चेष्टा भी की थी। पर शीघ्र ही साहित्य के इस अरसिक कार्य से उन्हें अरुचि उत्पन्न हो गई।

पहले ऐसा नहीं होता था। जब उनके पास न पद था न पैसा। तब वे हल्की फुहार में भी काव्य रच लेते थे। जब से वे पैसों की बारिश अथवा कहें, काले पैसों की धुआँधार बारिश‍ और अधिकार का नजारा करने लगे थे तब से उनकी कलम को जंग लग गयी थी ।

पत्नी कहती थी तुम फिर से आरंभ करो। याद करो उस संघर्ष को। याद करो उस प्रेम को। याद करो उस फुहार को। रिश्वत की रकम साहित्य संवेदना को कम कर देती है। व्यक्ति डरा-डरा-सा रहता है। सहमा-सहमा-सा रहता हे और इन कमजोरियों को छुपाने के लिए वह कठोर बनता जाता है।

वह हँस पड़ते थे ऐसी बातें सुनकर। क्या करना है साहित्य से। साहित्य क्या ऊँचा घर देता है? क्या करना है संवदेना से। संवेदना क्या ऊँची गाड़ी देती है? क्या करना है कोमल हृदय से। कोमल हृदय क्या शासन करने देता है?

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गत कई दिनों से इस आनंददायी बारिश का सम्पूर्ण रसास्वादन ले रहे राज्य के इस जिम्मेदार सरकारी अधिकारी को अंतत: उनके क्षेत्र में बाढ़ की सूचना मिल ही गई।

घर समाचार पत्र आता था। पर समाचार वे अधीनस्थों से ही सुनने के आदी थे। जब सारे कार्य सुनकर करने की आदत हो तब कहाँ दिमाग चल पाता है।

अभी तीन दिन पूर्व ही नंदू ने एक समाचार उन्हें सुनाया था। किसी वृध्द विधवा से बलात्कार का समाचार। सुनकर वे हँस पड़े थे। उन्हें बलात्कारी पर दया आई थी। उसकी मानसिक स्थिति पर उन्हें संदेह उत्पन्न हुआ था। उन्होंने कहा था, पागल है। बलात्कार की सजा सात साल है। पकड़ा गया तो बुढ़िया के फेरे में अंदर जाएगा इतने वर्षों तक। पत्नी ने पूछा था, उस बुढ़िया पर क्या बीत रही होगी। तो वे ठहाका मारकर हँस पड़े थे। बेतहाशा हँसते हँसते उनकी आँखों में आँसू आ गए थे। ठीक उस बुढ़िया के आँसुओं की तरह। सिसकियाँ जब भयावह हो जाती हैं तो वह ठहाकों-सी लगती हैं।

बाढ़ की सूचना नंदू लाया था। उनका नौकर। उनका दास। सरकार की तरफ से कार्यालय‍ में नियुक्त। पर अपनी प्रखर बुद्धि के कारण साहब के घर को ही दफ्तर समझता है ।बस पहली को छोड़कर।

"सरकार बाढ़ अपने क्षेत्र में हाहाकार मचा रही है।"

"मुझे तो दिखाई नहीं देती। कहाँ है बाढ़ ?"

"सरकार बाढ़ गाँवों में आई है। कई घर बह गए। हजारों लोग बेघर हो गए।"

"अच्छा। हमारे क्षेत्र में गाँव भी आते हैं? कैसे होते है गाँव?"

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"सरकार गाँवो में तो भारत की आत्मा निवास करती है। अब वही बहे जा रहे हैं।"

साहब ने सोचा कैसा नजारा होगा। बहते घर, डूबते लोग। एकदम फिल्म की तरह। वह बोले, मैं गाँव के दौर पर जाऊॅंगा। वहाँ जाने की व्यवस्था करो।

साहब निश्चिंत हो गए। नंदू जो है। वह सारी व्यवस्था कर लेगा। फिर उन्होंने सोचा मैं अकेला क्यों जाऊँ? पत्नी सहित पिकनिक का आनंद भी आएगा। दौरे का दौरा रहेगा।

पत्नी से पूछा तो वह बोली, मैं तो धन्य हो गई। तुम्हें पत्थरदिल समझती थी। पर बाढ़ ने तुम्हारी संवेदना को जाग्रत कर दिया है। अब तुम मुझे फिर वही पुराने पति नजर आ रहे हो। सामान्य इंसानो की तरह। पैसे के मोह से दूर। पद के अभिमान से दूर। वही मेरे पुराने प्यारे पति। संवेदनशील पति। चलिए। हम काफी सारा सामान भी साथ ले कर चलेंगे। भोजन के पैकेट, कपड़े, दूध के डिब्बे, कम्बल। सभी कुछ।

साहब ने कहा, उसकी क्या आवश्यकता है। नंदू डाकबंगले फोन करने गया है। वहाँ का चौकीदार सारी व्यवस्था कर देगा। हमें यहाँ से कुछ ले जाने की जरूरत नहीं है। साला टिप भी तो तगड़ी लेता है। दारू की तरफ ललचाई नजरों से देखता है सो अलग।

पत्नी ने पूछा, तो क्या तुम................

हाँ। भई, अब जल्दी तैयार हो जाओ। गाँव बह रहे हैं, कहीं ऐसा न हो कि हमारे हिस्से कुछ बचे ही न। देखने का मजा तो मिलना चाहिए।

पत्नी घम्म से पास पड़े सोफे पर गिर पड़ी। उसे लगा बाढ़ उसके घर में भी प्रवेश कर गई है और वह उसमें बही जा रही है प्रवाह के साथ। पर साहब नंदू के साथ इस दृश्य पर आनंदित हो कर तालियाँ बजा रहे हैं।

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परिचय

सुधीर ओखदे

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जन्म -21 दिसम्बर 1961 (बीना मध्य प्रदेश)

शिक्षा -रीवा ,शहडोल और छतरपुर मध्य प्रदेश में .....

1-कला स्नातक -(B.A.)

2-पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान स्नातक -(B.Lib.I.sc)बी.लीब .आई एस सी

लेखन -सभी प्रतिष्ठित हिंदी पत्र पत्रिकाओं में व्यंग्य ,आलोचना , कवितायें और संस्मरण प्रकाशित .

प्रकाशित पुस्तकें -(व्यंग्य)

1-बुज़दिल कहीं के ...

2-राजा उदास है

3-सड़क अभी दूर है

4-गणतंत्र सिसक रहा है

विशेष -1-मुंबई विश्वविद्यालय के B.A. (प्रथम वर्ष) में 2013 से 2017 तक “प्रतिभा शोध निकेतन “व्यंग्य रचना पाठ्यक्रम में समाविष्ट

2-अमरावती विश्वविद्यालय के B.Com (प्रथम वर्ष) में 2017 से “खिलती धूप और बढ़ता भाईचारा”व्यंग्य रचना पाठ्यक्रम में शामिल .

सुधीर ओखदे की अनेक रचनाओं का मराठी और गुजराती में उस भाषा के तज्ञ लेखकों द्वारा भाषांतर प्रकाशित

इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी सहित अनेक साहित्य वार्षिकी और महाराष्ट्र में प्रसिद्ध दीपावली अंकों में रचनाओं का प्रकाशन

आकाशवाणी के लिए अनेक हास्य झलकियों का लेखन जो “मनवा उठत हिलोर“और “मुसीबत है “शीर्षक तहत प्रसारित

सम्प्रति -आकाशवाणी जलगाँव में कार्यक्रम अधिकारी

सम्पर्क -33, F/3 वैभवी अपार्टमेंट व्यंकटेश कॉलनी

साने गुरुजी कॉलनी परिसर जलगाँव(महाराष्ट्र)425002

ईमेल -ssokhade@gmail.com

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