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व्यंग्य // जुमले और जुमलेबाजी // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

ज़मीन और आसमान तक फैली हुई, कबूतरबाजी से लेकर पतंगबाजी तक, न जाने कितनी और कैसी कैसी तो बाजियां हैं। आदमी इन्हें खेलता है, लगाता है; इंतज़ार करते करते कुछ लोगों की बाज़ी आखिर आ ही जाती है, कुछ उसकी प्रतीक्षा ही करते रह जाते हैं, और बाज़ी नहीं आती। कुछ दबंग लोग जहां खड़े होते हैं, वहीं से उनकी बाजी शुरू होती है। कुछ बाज़ी लगाने के लिए खड़े ही नहीं हो पाते।

भाषा में सिर्फ शब्द नहीं बोले जाते। शब्दों से वाक्य बनाए जाते हैं। वाक्य ही शब्दों का अर्थ स्पष्ट करते हैं। वाक्य को अंग्रेज़ी में ‘संटेंस’ कहते हैं और उर्दू में ‘जुमला’। वाक्य और संटेंस के साथ लोग भाषाई खेल भले खेलते हों लेकिन ‘जुमलेबाजी’ सिर्फ जुमले के साथ ही हो सकती है। लोग जुमला बोल देते हैं, और भूल जाते हैं। ठीक वादों की तरह। जुमला सिर्फ जुमला भर रह जाता है, सार्थक नहीं हो पाता। जो लोग इस तरह के जुमले बोलने के आदी हो जाते हैं, जुमलेबाज़ कहलाते हैं। राजनीति में जुमलेबाजी का दबबदबा है।

इलेक्शन के समय इस तरह की जुमलेबाजी खूब की जाती है। लोग भ्रम में पड़ जाते हैं और अक्सर गलत लोगों को वोट दे आते हैं। वे भूल जाते है कि बोली गई बातें महज़ ‘जुमले’ थे। बच्चा जब किसी चीज़ की फरमाइश करता है, तो पापा उसे पूरी करने का वादा करते हैं, समय बीतता है और बच्चा अपनी फरमाइश भूल जाता है औए पापा अपना वादा। पापा का वादा महज़ जुमला होकर रह जाता है।

सियासत आमतौर पर जुमलों का व्यापार है। सियासत में जुमलेबाजी अपने शबाब पर होती है। राजनीति में जुमलेबाजी न हो तो मज़ा ही क्या ? लेकिन लोग सिर्फ मज़े के लिए ही जुमलेबाजी नहीं करते, जुमलेबाजी से वे अपना उल्लू सीधा करते हैं और अक्सर मनचाहा परिणाम उन्हें प्राप्त भी हो जाता है। राजनीति इसी का नाम है।

कभी कभी हम अपनी बातों में गंभीर भी होते हैं लेकिन कुछ परिस्थितियाँ जिन पर अपना कोई वश नहीं होता हमारे कथ्य को “जुमला” बना डालती हैं। क्या किया जाए, हमारा दुर्भाग्य !

जुमला जोड़ है। दो या दो से अधिक संख्याओं का कुल जमा है। गणित की कक्षाओं में बच्चे जुमला लगाना सीखते हैं। ज़िंदगी में जुमला सिर्फ जोड़ नहीं तोड़ भी होता है। जो जोड़-तोड़ की इस कला में माहिर होते हैं, वे लोग अपनी ज़िंदगी बखूबी जी लेते हैं।

जुमले कई तरह के होते हैं। कुछ प्रश्नवाचक तो कुछ विस्मयादि सूचक। लेकिन जो न प्रश्न करते हैं न ही विस्मय का बोध कराते हैं, वे भी जुमले ही होते हैं। इनमें भी कुछ सार्थक होते हैं कुछ सिर्फ ‘जुमले’ भर होते हैं। भले निरर्थक हों अक्सर काम ये ही आते हैं। लोग जुमलों का सहारा लेकर वैतरणी पार कर लेते हैं।

हर कोई जुमले नहीं बोल सकता। अंतरात्मा के मारे लोग जुमलों से परहेज़ करते हैं। वे सिर्फ वही बोलते हैं जो कर सकें। किन्तु ऐसे लोग अब गिने-चुने ही रह गए हैं। जब जुमलों से काम निकल आए तो काम की बात कौन करे !

किसी की बात को महज़ जुमला कहना बात को कमतर करना है। हर बात महज़ जुमला नहीं होती। लेकिन आक्षेप करने वाले गंभीर बात को भी जुमला बना देते हैं। बात को मात्र जुमला कहकर उसका विरोध करना विरोध करने की एक नई शैली विकसित हुई है, जिसे विरोधी पक्ष अपने हित में धड़ल्ले से प्रयोग करता है।

व्यापार और राजनीति में जुमलेबाजी, काम निकालने की एक स्वीकृत शैली है। लेकिन साहित्य में जुमलेबाजी सिर्फ एक शैली नहीं बल्कि यह साहित्य का ही एक अपमान (पढें, सम्मान) जनक नाम है। सारा साहित्य सिवा जुमलेबाजी के भला और है क्या ?

जुमलेबाज़ी को आप कमतर न समझें। यह मक्कारी का खेल है; राजनीति का माध्यम है। साहित्य की जान है। यह कर्म-कौशल है।

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--डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

1 टिप्पणियाँ

  1. सरजी, आप जुमले या जुमलेबाजी की तरफदारी कर रहे थे या विरोध! हम यह समझ ही नहीं पाए। आपने जुमले का प्रयोग कुछ इस कदर किया की यह आलेख केवल जुमलेनाजी न रहकर राजनीति का परिचय बन गया, कमाल के जुमले है। धन्यवाद।

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