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विभा परमार की प्रेम- विरह की कविताएं

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1. प्रेम की सड़कें
प्रेम की सड़कें  ज़रूरी नहीं
कि सीधी और सपाट ही हो,
कभी कभी सीधी और सपाट सड़कें
दिखने में खूबसूरत ज़रूर होती है
मगर अंदर से होती है
"वो भयावह"
जो चुभती है पैरों में
जिससे कभी कभी घायल
तो कभी कभी चोटिल हो जाते
वैसी ही होती है ये लड़कियाँ
सड़कों  जैसी
सीधी और सपाट
जिस पर चल कर क्षणभंगुर  प्रेमी
उसको सकरा कर देते है
वो पकने की बजाय दिन पे दिन
और बदसूरत हो जाती है
उनकी देह पर दिखते है
रोज़
छलने के छाले
वो बिलखती है,
वो कुंठित होने लगती है
वो बहती रहती है अपने ग़म में
तो कभी ठहर जाती है 
और ठहर तक सड़ती रहती है
सड़े पानी के जैसे
धीरे धीरे उन्हें हो जाती है खुद से नफरत
हर ग़लती, हर शह में ढूंढती फिरती है
अपना उजड़ा हुआ
"अस्तित्व"


2.पवित्र भाव
मैं दिल में पवित्र भाव लिए बैठी रहती हूं
जिसे कह सकते है हम लोग
"प्रेम"
  ये भाव  मुझे बार- बार
  तुममें विचरने को कहते है
  इस विचरने की यात्रा में
   हम मिलते है
   घंटों साथ रहते है
   और और
   एक दूसरे निहारते है
   इस निहारने की प्रक्रिया में
   हम कब
   एक दूसरे के आलिंगन में आ जाते है
   ये तो हम भी नहीं जान पाते!
   बस बोसा के प्रतिकार में बोसा
   घबराहट ऐसे होती है कि
   अपनी सांसों की आवाज़ भी बोलती नज़र आती है
   और शब्द, शब्द भी शरमा  जाते है
   मानों मुझसे बिना पूछे ही ले लिया हो प्रतिकार
   मैं देखती हूं तुम्हें ऐसे कि ताउम्र
   देखती ही रहूं।

  पर तुम ठहरे
   प्रेमी स्वभाव के शांत समुंदर
   कुछ वक्त लेकर
   मुस्कुराकर
   करने लगते हो
    प्रेम
   तुम्हारे बोलने
   तुम्हारा स्पर्श भर से ही
   मैं बन जाती हूं
   "नदी"
   प्रेम में नदी
   अन्ततः मिल जाती हूं तुममें
   तब नदी, नदी नहीं
   वो समुद्र हो जाती है
   हां,
   तुम हो जाती है
   यानि मैं, मैं नहीं
   हम हो जाते।

3. सूखा
तुम मेरे अंदर ठहरे हुए हो
जैसे ठहरा होता है
रेगिस्तान पर सूखा
तुम सूखा ही तो हो
जो  मेरे अंदर ठहरे हुए हो
ठहरा हुआ सूखा कभी बहता नहीं
वो तो वक्त दर वक्त
  बंजर होता जाता है
और बंजर करता है खोज नये संगीत की
जिसकी धुन रुदन है
रुदन की धुन रोज़ बजती है
ये जो धुन हैना
वो  ग़मों की है
जो कभी शोर नहीं करती
बस बजती रहती है धीमी गति में

सुनो परवाज़
मैंने बहुत कोशिश की
कि मैं लिखूं
प्रेम में झूमना,
प्रेम में दिन व्यतीत करना
प्रेम में प्रसन्न रहना
प्रेम में खट्टी-मीठी तकरार का होना
पर मैं
निर्मोही
लिख ना पाई
ये सब
  मैं तो लिख पाई सिर्फ़
"विरह"
  जिसकी है
विफलताएं
व्यथाएँ
और कई अनगिनत
पीड़ाएं

मैंने फिर कोशिश की और इनको
मिटा दिया
ये मिटे भी
लेकिन!
इनके निशां मेरे निर्मल मन को
जिंदगी भर के लिए भयभीत कर गए
और फिर लिख दिया मैंने
जीते जी
"प्रेम एक ख़ौफ़नाक मौत है"

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